भारतीय डाक सेवा की ऐतिहासिक यात्रा
October 09, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल अष्टमी | रविवार
नक्षत्र: उत्तराषाढ़ा | योग: सुकर्मा | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 18 अक्टूबर 2026

भारतीय सनातन परम्परा में गायत्री मन्त्र सर्वोच्च है। इसे वेदों का सार माना गया है। पुष्पा शर्मा द्वारा लिखित यह आलेख गायत्री मन्त्र की महिमा से भलीभांति अवगत कराता है। इसमें प्राचीन ऋषि मुनियों जैसे विश्वामित्र व्यास और मनु के साथ साथ आधुनिक विचारकों जैसे स्वामी विवेकानन्द महात्मा गांधी और सर्वपल्ली राधाकृष्णन के मत भी प्रस्तुत किए गए हैं। यह लेख हाल ही में राजस्थान के पुष्कर में सम्पन्न हुए 200 कुंडीय विराट गायत्री महायज्ञ पर विशेष प्रकाश डालता है। ज्ञान और अध्यात्म से परिपूर्ण यह रचना निश्चित रूप से पाठकों को आत्मिक शान्ति की ओर प्रेरित करेगी।
सनातन परम्परा में वेद का शाब्दिक और आध्यात्मिक अर्थ विशुद्ध ज्ञान है। मानव कल्याण के लिए इस ज्ञान के चार मुख्य भेद ऋक् यजु साम और अथर्व के रूप में मिलते हैं। ये चारों प्रकार के दिव्य ज्ञान वास्तव में उस परम चैतन्य शक्ति के ही स्फुरण हैं जिसे सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने ब्रह्मांड की उत्पत्ति के समय उत्पन्न किया था। धर्म और उपासना के क्षेत्र में इसी आदि शक्ति को माँ गायत्री के नाम से पूजा जाता है। पौराणिक धर्म कथाओं में यह उल्लेख स्पष्ट रूप से मिलता है कि यदि देवी गायत्री माता हैं तो चारों वेद उनके पुत्र कहलाते हैं। यह भी माना जाता है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने चारों वेदों की विस्तृत रचना करने से पूर्व चौबीस अक्षरों वाले परम पवित्र गायत्री मन्त्र की रचना की थी। इसी कारण इसे ज्ञान का आदि स्रोत माना गया है।
सनातन धर्म के विस्तृत स्वरूप में अनेक सम्प्रदाय और शाखाएं सदियों से प्रचलित हैं। उपासना की विविध पद्धतियों के कारण यहाँ कई मत मतान्तर आसानी से देखे जा सकते हैं। इन सबके बीच गायत्री मन्त्र की महिमा एक ऐसा अनूठा तत्व है जिसे सभी सम्प्रदायों और महान ऋषियों ने एकमत होकर स्वीकार किया है। वेदों में गायत्री माता को अपने आराधक के लिए लम्बी आयु प्राणवान जीवन उत्तम कीर्ति असीम शक्ति पर्याप्त धन और विलक्षण ब्रह्म तेज प्रदान करने वाली माना गया है।
गायत्री मन्त्र का मूल स्वरूप इस प्रकार है:
ओम भूर्भुवः स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात
यह महामन्त्र अपने भीतर 24 अक्षरों को समाहित किए हुए है जो साधक में 24 विभिन्न शक्तियों को जाग्रत करते हैं। इसके अक्षरों में निहित अर्थ जीवन के हर आयाम को उन्नत बनाते हैं। 'तत्' अक्षर प्रखरता का संचार करता है और 'स' अक्षर से प्रेरणा मिलती है। 'वि' सद्गुणों का विकास करता है तथा 'तु' इन्द्रियों पर संयम सिखाता है। 'व' अक्षर से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और 'रे' मेधा को निखारता है। 'णि' पराक्रम जगाता है। 'यं' क्षमा भाव और 'भ' निस्वार्थ प्रेम को बढ़ाता है। 'र्गो' हृदय में दया का उदय करता है। 'दे' सद्ज्ञान का विकास करता है और 'व' से जीवन में उत्साह आता है। 'स्य' आध्यात्मिक जागृति लाता है तथा 'धी' से सन्तोष मिलता है। 'म' सेवा भाव को मजबूत करता है और 'हि' जीवन की समस्याओं का समाधान देता है। 'धि' दिव्य दृष्टि प्रदान करता है। 'यो' वाणी में मधुरता लाता है और अगला 'यो' व्यवहार में उदारता सिखाता है। अन्तिम चरण में 'न:' पवित्रता का संचार करता है। 'प्र' रचनात्मक सक्रियता बढ़ाता है। 'चो' निर्भयता और 'दा' भविष्य की दूरदर्शिता का विकास करता है। 'यात्' सहनशीलता की स्थापना करता है। इन सभी चौबीस गुणों के सम्यक जागरण के साथ ही साधक के जीवन में अष्ट सिद्धि और नव निधियों को प्राप्त करने का मार्ग स्वतः ही प्रशस्त होना प्रारम्भ हो जाता है।
प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों ने इस महामन्त्र की व्यापकता और प्रभाव का गान किया है। देवर्षि नारद जी की स्पष्ट उक्ति है कि गायत्री साक्षात भक्ति का ही स्वरूप है। उनका मानना है कि जहाँ भक्ति रूपी गायत्री का वास होता है वहां भगवान श्रीनारायण का निवास होने में तनिक भी सन्देह नहीं करना चाहिए। भगवान मनु का कथन है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने इसे तीनों वेदों का सार और तीन चरण वाला मन्त्र बताया है। उनके अनुसार संसार में इसके अतिरिक्त कोई भी अन्य मन्त्र इतना पवित्र करने वाला नहीं है। महर्षि विश्वामित्र का दृढ़ विश्वास है कि गायत्री मन्त्र के समान वेदों में कोई दूसरा मन्त्र उपलब्ध नहीं है। सम्पूर्ण वेद सम्पूर्ण यज्ञ समस्त दान और कठोर तपस्या मिलकर भी गायत्री मन्त्र की एक कला के समान नहीं हो सकते।
अन्य ऋषियों ने भी इसकी अपार महिमा का वर्णन किया है। शंख ऋषि का मत है कि नरक रूपी अथाह समुद्र में गिरते हुए जीव को हाथ पकड़ कर बचाने वाली शक्ति केवल गायत्री ही है। उनसे उत्तम वस्तु इस पृथ्वी और स्वर्ग लोक में कोई दूसरी नहीं है। जो व्यक्ति गायत्री का भलीभांति ज्ञाता हो जाता है वह निस्सन्देह स्वर्ग को प्राप्त करता है। शौनक ऋषि के अनुसार कोई उपासक जीवन में अन्य उपासना करे चाहे न करे केवल गायत्री के निरन्तर जप से ही वह सांसारिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के सुखों को पा लेता है। अत्रि मुनि के अनुसार गायत्री आत्मा का परम शोधन करने वाली सबसे प्रबल शक्ति है।
महर्षि व्यास जी ने भी इसे अत्यन्त सुन्दर रूपकों के माध्यम से समझाया है। उनके कथनानुसार जिस प्रकार पुष्प का अन्तिम सार शहद है और दुग्ध का सार घृत है ठीक उसी प्रकार समस्त वेदों का सम्पूर्ण सार गायत्री ही है। तीर्थों में गंगा जिस प्रकार शरीर के पापों को धोकर उसे निर्मल करती है वैसे ही गायत्री रूपी ब्रह्म गंगा में स्नान करने से मनुष्य की आत्मा पवित्र हो जाती है। जीवन में सफलता और तप की वृद्धि के लिए गायत्री मन्त्र से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है। आयुर्वेद के प्रणेता चरक ऋषि कहते हैं कि जो व्यक्ति पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए गायत्री की उपासना करता है और आंवले के ताजे फलों का नियमित सेवन करता है वह निरोगी रहकर दीर्घजीवी होता है। भारत के शास्त्रों और धर्म ग्रन्थों में गायत्री की महिमा एवं उपासना साधना से सम्बन्धित अनेकानेक श्लोक इसी कारण से आज भी संग्रहित हैं।
प्राचीन ऋषियों के साथ साथ भारत के अनेक आधुनिक दार्शनिक और आध्यात्मिक महापुरुषों ने भी गायत्री की शक्ति को एकमत से स्वीकार किया है। जगद्गुरु शंकराचार्य का कथन है कि गायत्री की महिमा का पूरा वर्णन करना मनुष्य की सामर्थ्य के बाहर है क्योंकि यह ब्रह्मांड का आदि मन्त्र है। स्वामी रामकृष्ण परमहंस अपने उपदेशों में स्पष्ट कहते थे कि लम्बी और कठिन साधना करने की उतनी आवश्यकता नहीं है। एक छोटी सी गायत्री साधना करके देखने से ही जीवन के सत्य का भान हो जाता है। गायत्री का जप करने से साधक को सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। यह देखने में भले ही एक लघु मन्त्र है मगर इसकी शक्ति अत्यन्त व्यापक और बड़ी भारी है।
स्वामी रामतीर्थ के अनुसार जीवन में राम को प्राप्त करना सबसे बड़ा काम है और गायत्री का मूल अभिप्राय मनुष्य की बुद्धि को काम रुचि से हटा कर राम रुचि में लगा देना है। योगी अरविन्द ने भी अपनी आध्यात्मिक यात्रा में कई जगह गायत्री जप करने का निर्देश दिया है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी कहते हैं कि गायत्री मन्त्र का निरन्तर जप रोगियों को शारीरिक रूप से स्वस्थ करने और आत्मा की आन्तरिक उन्नति के लिए बहुत उपयोगी है। लोकमान्य तिलक के कथनानुसार जिस बहुमुखी दासता के बन्धनों में भारतीय प्रजा जकड़ी हुई है उससे मुक्ति के लिए आत्मा के अन्दर प्रकाश उत्पन्न होना चाहिए। यह प्रकाश सत् और असत् का विवेक देता है और कुमार्ग को छोड़ कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। गायत्री मन्त्र में यही कल्याणकारी भावना विद्यमान है। युगप्रवर्तक स्वामी विवेकानन्द ने तो गायत्री मन्त्र को सद्बुद्धि का सर्वोच्च मन्त्र बताया है। उनके अनुसार यह मन्त्र दुनिया के सभी मन्त्रों का मुकुटमणि है। दर्शन शास्त्र के विद्वान सर्वपल्ली राधाकृष्णन का मानना है कि यदि हम सार्वभौमिक प्रार्थना के रूप में गायत्री पर विचार करें तो हमें ज्ञात होगा कि यह वास्तव में व्यक्ति और समाज को कितना ठोस लाभ देती है। यह सम्पूर्ण जीवन का स्रोत उत्पन्न करने वाली एक जीवन्त प्रार्थना है। आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द भी गायत्री के बहुत बड़े उपासक माने जाते हैं। ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है कि ग्वालियर के राजा साहब से स्वामी जी ने स्वयं कहा था कि गायत्री पुरश्चरण दुनिया में सबसे श्रेष्ठ कार्य है। उन्होंने जयपुर प्रवास के दौरान श्री सच्चिदानन्द हीरालाल रावल एवं श्री घोडलसिंह को गायत्री जप की विशेष विधि सिखलाई थी और इस मन्त्र को चारों वेदों का गुरुमन्त्र बताया था।
गायत्री मन्त्र की इस शाश्वत महिमा के दर्शन आज के युग में भी होते रहते हैं। इसी क्रम में राजस्थान की पावन भूमि को वर्ष 2026 में एक अभूतपूर्व गायत्री पुरश्चरण महायज्ञ के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ। तीर्थराज पुष्कर में महामंडलेश्वर स्वामी श्री प्रखर जी महाराज के सान्निध्य में 8 मार्च से 19 अप्रैल 2026 के मध्य 200 कुंडीय विराट शत गायत्री पुरश्चरण महायज्ञ का भव्य एवं सफल आयोजन हुआ। लगातार 43 दिवस तक चले इस विशाल महायज्ञ में कुल 27 करोड़ गायत्री मन्त्रों का विधि विधान से अनुष्ठान किया गया जिसमें 24 करोड़ मन्त्रों का जप और 3 करोड़ मन्त्रों की आहुतियाँ शामिल थीं। यह ऐतिहासिक आयोजन पुष्करराज की मणिवेदिका अर्थात गायत्री शक्ति पीठ में 80 बीघा भूमि पर विशाल यज्ञशाला निर्मित कर सम्पन्न करवाया गया। विश्व शान्ति के लिए की गई सामूहिक प्रार्थना का यह महायज्ञ देखते ही देखते एक महान आध्यात्मिक केन्द्र बन गया। यह विराट अनुष्ठान विश्व शान्ति की मंगल कामना के साथ सनातन वैदिक धर्म से जनमानस के परिचय पर्यावरण की शुद्धि सांस्कृतिक पुनर्जागरण एवं वसुधैव कुटुम्बकम् की पावन भावना का एक जीवन्त प्रतीक बनकर उभरा।
अन्ततः यह कहा जा सकता है कि यह सम्पूर्ण आलेख सनातन परम्परा की धर्म कथाओं एवं प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर लिखित है और गायत्री की महिमा को यथार्थ रूप में प्रस्तुत करता है।
- श्रीमती पुष्पा शर्मा, राजस्थान
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