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"छत्तीसगढ़ का पारंपरिक गौरा-गौरी उत्सव: शिव-पार्वती विवाह का लोक पर्व

"छत्तीसगढ़ का पारंपरिक गौरा-गौरी उत्सव: शिव-पार्वती विवाह का लोक पर्व

हमारी समृद्ध परंपराओं में गौरा-गौरी एक अत्यंत महत्वपूर्ण और प्राचीन लोक पर्व है, जो दीपावली के अवसर पर कार्तिक माह की अमावस्या को विशेष धूमधाम से मनाया जाता है। गौरा-गौरी उत्सव कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को प्रारंभ होता है और गोवर्धन पूजा तक चलता है। कुछ क्षेत्रों में यह पर्व दीपावली से 5-7 दिन पूर्व से लेकर देव उठनी एकादशी तक मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ में दीपावली को "सुरहुत्ती" (त्योहार की शुरुआत) भी कहा जाता है, जो इस बात का संकेत है कि यह केवल लक्ष्मी पूजा तक सीमित नहीं बल्कि एक विस्तृत उत्सवों श्रृंखला का आरंभ है।


भगवान शिव (गौरा) और माता पार्वती (गौरी)

गौरा-गौरी उत्सव मूलतः भगवान शिव (गौरा) और माता पार्वती (गौरी) के विवाह का लोकरूप है। इस पर्व में गौरा का तात्पर्य महादेव शिव से है और गौरी का अर्थ देवी पार्वती से है। लोक मान्यताओं के अनुसार, यह उत्सव पौराणिक कथा से प्रेरित है जिसमें शिव-पार्वती का विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ था। एक अन्य किंवदंती के अनुसार, प्राचीन काल में एक गोंड दंपति ने माता पार्वती की कठोर तपस्या की और उनसे मनोकामना पूर्ति का वरदान प्राप्त किया, जिसके बाद से यह परंपरा गोंड समुदाय में विशेष रूप से मनाई जाती है। गौरा-गौरी की पूजा से माना जाता है कि सभी प्रकार के दुख-दर्द दूर होते हैं, अच्छी फसल की प्राप्ति होती है, और पारिवारिक सुख-समृद्धि बनी रहती है।


शिव जी की बारात

यह पर्व मुख्यतः छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के विभिन्न समुदाय मिल जुल कर मानते है।  विशेषतौर पर गोंड, बैगा आदि समुदायों द्वारा अत्यंत श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है। विशेष बात यह है कि यह केवल गोंड समाज तक सीमित नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ के शहरों और गांवों में सभी जाति और समुदाय के लोग इस उत्सव में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। यह सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक एकता का अद्भुत उदाहरण है। छत्तीसगढ़ के गोंड समुदाय में दीपावली को "देवारी" के नाम से जाना जाता है, जो दिवाली का अपभ्रंश है।

दीपावली से लगभग एक सप्ताह पूर्व "फूल कूटने" की परंपरा से उत्सव की शुरुआत होती है। गांव के "गौरा चौरा" (निर्धारित स्थान) में महिलाएं एकत्रित होकर तुमानार के फूलों को बैगा लाठी में बांधकर कुटती हैं। यह प्रक्रिया विवाह की तैयारी का प्रतीक है। दीपावली की दोपहर में गांव के लोग गाजे-बाजे के साथ तालाब या नदी किनारे जाते हैं और वहां से कुंवारी मिट्टी और जल लाते हैं। बैगा द्वारा भूमि पूजा और जल देवी की पूजा करने के बाद ही मिट्टी खोदी जाती है। लक्ष्मी पूजा के बाद मध्यरात्रि में उसी कुंवारी मिट्टी से शिव (गौरा) और पार्वती (गौरी) की मूर्तियां बनाई जाती हैं। गौरा को बैल की सवारी पर विराजमान करते हैं और गौरी को कछुए की सवारी पर स्थापित करते हैं। इन मूर्तियों को लकड़ी के पिड़हे (आसन) पर रखा जाता है और सुंदर रंगों, चमकीले कागजों, फूलों और दीपों से सजाया जाता है।


"गौरा चौरा"

दीपावली की रात्रि में विवाह की तरह सभी रस्में निभाई जाती हैं। गौरा की ओर से ग्रामीण गौरी के घर बारात लेकर जाते हैं और गौरी के पक्ष से बारात का स्वागत किया जाता है। बैगा (पुजारी) द्वारा पूरी रात विधि-विधान से विवाह संपन्न कराया जाता है और रातभर भक्तजन जागकर गौरा-गौरी गीत गाते हैं और पूजा-अर्चना करते हैं। विवाह के अवसर पर "दूधफरा" नामक विशेष प्रसाद बनाया जाता है, जो दूध में उबाले गए चावल के आटे से बना पकवान है जिसमें घी-तेल का उपयोग नहीं किया जाता। इसे टोकरीनुमा कलश में रखा जाता है और गौरा-गौरी को भोग लगाया जाता है। विवाह के बाद कुंवारी लड़कियां और महिलाएं गौरा-गौरी के पिड़हे को सिर पर कलश सहित रखकर पूरे गांव का भ्रमण करती हैं, इस दौरान गौरा-गौरी गीत गाए जाते हैं, गड़वा बाजा बजाया जाता है और लोग नाचते-गाते हुए जुलूस में शामिल होते हैं।


गौरा-गौरी का गांव में भ्रमण

गौरा-गौरी पूजा के दौरान एक विशेष परंपरा है जिसमें कुश-घास से बने सोंटे (कोड़े) से लोगों की कलाइयों पर मारा जाता है। यह भगवान का आशीर्वाद और प्रसाद माना जाता है, और लोक विश्वास है कि इससे सभी प्रकार की परेशानियां और दुख-दर्द दूर होते हैं। मान्यता है कि इस दौरान कुछ व्यक्तियों पर देवी-देवता का अवतरण होता है और ऐसे व्यक्ति अत्यंत जोश में नृत्य करते हैं, जिसे लोग दैवीय आशीर्वाद मानते हैं। गोवर्धन पूजा के दिन सुबह गाजे-बाजे के साथ भव्य शोभायात्रा निकालकर गौरा-गौरी की मूर्तियों को तालाब या नदी में विसर्जित किया जाता है। विसर्जन के समय महिलाएं मंगल गीत गाती हैं और कई महिलाएं मूर्तियों के सामने लेटकर आशीर्वाद और मनोकामना मांगती हैं।

गौरा-गौरी उत्सव का सबसे विशिष्ट गड़वा बाजा है, जो छत्तीसगढ़ का पारंपरिक वाद्य यंत्र समूह है जिसमें दमऊ (ढोल), सींग बाजा (तुरही), ढोल, गुदुम (छोटा ढोल), मोहरी (शहनाई), मंजीरा और झुमका (झांझ), दफड़ा (डफली) आदि शामिल हैं। परंपरागत रूप से गांडा समुदाय के लोग ये वाद्य यंत्र बजाते हैं और गड़वा बाजा की मधुर और गंभीर धुन पूरे वातावरण को भक्तिमय बना देती है। महिलाएं रातभर गौरा-गौरी गीत गाती हैं जो शिव-पार्वती के विवाह, उनकी महिमा और लोक जीवन की खुशियों का वर्णन करते हैं। ये गीत छत्तीसगढ़ी लोक साहित्य का अमूल्य खजाना हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा से संरक्षित हैं।

Desi beat gandwa baja,cg song - YouTube
गड़वा बाजा समूह

गौरा-गौरी उत्सव के समानांतर छत्तीसगढ़ में सुआ नृत्य भी किया जाता है, जो छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध महिला लोकनृत्य है। सुआ नृत्य में मिट्टी या लकड़ी से सुआ (तोता) की प्रतिमा बनाई जाती है और धान से भरी बांस की टोकरी में सुआ को सजाया जाता है। महिलाएं गोल घेरा बनाकर हाथ की ताली बजाते हुए नृत्य करती हैं और सुआ गीत गाते हुए घर-घर जाकर नृत्य किया जाता है। लोग अनाज और पैसे भेंट में देते हैं जिसे गौरा-गौरी विवाह के खर्च में लगाया जाता है। सुआ नृत्य में नारी जीवन के सुख-दुख, प्रेम-विरह और सामाजिक संदेशों की अभिव्यक्ति होती है। रियासत काल में राज महल की सेविकाओं को गाँव-गाँव जाकर यह नृत्य करती थी, और गाँव वाले कुछ भेंट भी किया करते थे। 


सुआ नृत्य करती महिलाएं

बैगा जाति इस पूजा में मुख्य पुजारी की भूमिका निभाती है और बैगा द्वारा ही फूल कुटाई की प्रक्रिया संपन्न की जाती है, मिट्टी और जल की पूजा की जाती है, विवाह के सभी संस्कार कराए जाते हैं और देवी-देवताओं का आह्वान किया जाता है। छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में गौरा-गौरी पर्व की परंपराओं में कुछ भिन्नता है - रायपुर क्षेत्र में दीपावली को प्रमुखता दी जाती है, बिलासपुर क्षेत्र में देव उठनी एकादशी तक मनाया जाता है, जबकि बनगवां, कोरबा और सरगुजा में पूस पूर्णिमा तक यह उत्सव चलता है। महासमुंद, गरियाबंद और कवर्धा में विशेष धूमधाम से इसका आयोजन होता है।

गौरा-गौरी उत्सव का गहरा संबंध राउत (यादव) समुदाय की परंपराओं से भी है। गोवर्धन पूजा के दिन राउत समुदाय मातर पर्व मनाता है और राउत नाच में गड़वा बाजा का प्रयोग होता है। गौरा-गौरी विवाह में भी वही बजकरी बाजा बजाते हैं, जो विभिन्न समुदायों के बीच सांस्कृतिक आदान-प्रदान का उदाहरण है। आधुनिक समय में इस प्राचीन परंपरा को संरक्षित रखने के लिए युवा पीढ़ी सक्रिय रूप से भाग ले रही है, शहरी क्षेत्रों में भी गौरा चौरा स्थापित किए जा रहे हैं।


गोवर्धन पूजा के दिन गाँव में मातर पर्व का दृश्य

छत्तीसगढ़ का गौरा-गौरी उत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि हमारी भारतीय संस्कृति की समृद्ध लोक परंपरा, सामाजिक समरसता और प्रकृति के प्रति श्रद्धा का जीवंत प्रतीक है। यह पर्व दर्शाता है कि किस प्रकार भारतीय लोक समाज ने पौराणिक आख्यानों को अपनी स्थानीय परंपराओं और जीवन शैली में समाहित कर उन्हें सजीव बनाए रखा है। दीपावली के समय शिव-पार्वती का यह विवाहोत्सव हमारी गौरवशाली सांस्कृतिक पहचान है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित होकर आज भी अपनी पूरी भव्यता और पवित्रता के साथ मनाया जा रहा है।


लेख
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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