सामाजिक समरसता के प्रतीक भगवान श्रीराम
April 14, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

श्रीराम का चरित्र केवल शास्त्रीय या कुलीन सीमाओं में आबद्ध नहीं है, वरन् वह लोक-जीवन का स्पन्दन है। श्री कमलेश कमल जी का यह सारगर्भित लेख ‘श्रीरामचरितमानस’ में निहित इसी 'लोकतत्त्व' की विशद और प्रामाणिक विवेचना करता है। लेख में कमलेश जी यह बताते हैं कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने किस प्रकार श्रीराम को एक आदर्श शासक और लोकमंगलकारी नायक के रूप में प्रस्तुत कर समाज के सभी वर्गों में समरसता और समन्वय स्थापित किया। राम-जानकी विवाह के लौकिक आचार हों या शबरी और केवट के प्रसंग, इन सब में निहित लोकजीवन के तत्त्वों को प्रकाश में लाकर कर यह लेख रामचरितमानस को एक लोक-महाकाव्य सिद्ध करता है।
युग-युगान्तर के लिए मनुष्य की स्मृति में अत्युत्तम आदर्श का प्रकाशस्तम्भ हैं श्रीराम। चारित्रिक औदात्य, पूर्ण-चेतना, आलोचनात्मक विवेक एवं दार्शनिक मूल्यानुभूति के पूर्ण-परिपाक हैं प्रभु राम। रामचरितमानस राम के चरित को हर मानस में अवस्थित करने का, उद्भासित करने का मानवता के इतिहास का सर्वोत्तम प्रयास है।
इसके माध्यम से गोस्वामी तुलसीदास ने राजनीतिक, पारिवारिक, सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन के उच्च आदर्शों को प्रस्तुत कर विशृंखलित समाज को सूत्रबद्ध करने का महनीय प्रयास किया है। यह तुलसी की सर्जनात्मक कल्पना का वैभव भा-स्वर है, जो असाधारण अर्थ-गांभीर्य से युक्त है एवं लोक-मंगल विधायिनी चेतना का ऊर्जस्वित् स्वर है। यह केवल एक महाकाव्यात्मक ग्रन्थ ही नहीं है जिसके साथ धार्मिक आस्था जुड़ी है; वरन् यह तो मनुष्य जाति के आत्यन्तिक शुभ की सम्यक् परिकल्पना है।

रामचरितमानस- जिसमे निहित हैं जीवनविद्या के सूत्र
आर्ष परम्परा में महानायकीय चारित्र्य हेतु सत्य, धर्म, प्रतिभा, कृतज्ञता, उदारता, अनसूया, सात्त्विक क्रोध, आत्मसम्मान, सर्वभूतहित, अक्रोध एवं वाग्मिता जैसे गुण बताए गए हैं। रामचरितमानस में प्रभु श्रीराम में ये सभी गुण घनीभूत रूप में विद्यमान मिलते हैं। इन सब के अतिरिक्त रामकथा का जो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व इस ग्रन्थ में मिलता है, वह है लोकतत्त्व। लोक का सामान्य अर्थ जनसाधारण है। लोकतत्त्व से आशय लोकसाहित्य, लोककला, लोकमान्यता, लोकवार्ता और लोकपरम्परा से है।
तुलसीदास जी ने राम के चरित्र को आदर्श मानकर उनके विभिन्न पहलुओं को प्रस्तुत किया है। रामचरितमानस केवल धार्मिक ग्रन्थ नहीं है, बल्कि इसमें सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवतावादी मूल्य भी प्रकट होते हैं। तुलसीदास ने इस महाकाव्य के माध्यम से सामान्य जनता के जीवन और मूल्यों को बड़े ही सरल और सुन्दर ढंग से प्रस्तुत किया है।
यह ऐसा है कि सरस्वती तत्त्व और लोकतत्त्व की अद्भुत जुगलबन्दी का विश्व-इतिहास में इससे बढ़कर कोई उदाहरण नहीं मिलता। एक आदर्श राजा वही होता है जो अपने प्रजाजनों के कल्याण के लिए तत्पर रहता है। राम का चरित्र इस बात का प्रतीक है कि राजा का धर्म अपनी प्रजा के प्रति न्यायप्रिय और कर्तव्यनिष्ठ होना है।
तुलसीदास ने रामचरितमानस में कई ऐसे प्रसंगों का उल्लेख किया है जो लोक को सामाजिक समानता, मानवता और भाईचारे का सन्देश देते हैं। उन्होंने श्रीराम को भीलनी माता शबरी के जूठे बेर खाते हुए दिखाया है जिससे समरसता का सन्देश मिलता है। समाज में ऊँच-नीच का भेदभाव मिटाने के लिए भरत और निषादराज को गले मिलते हुए दिखाया गया है।
राम और शबरी का मिलन, केवट की भक्ति और विभीषण का राम की शरण में आना इस बात का प्रतीक है कि रामचरितमानस में जाति और वर्ग के भेदभाव को समाप्त करने का सन्देश निहित है। यह एक आदर्श समाज की परिकल्पना है जहाँ हर व्यक्ति का सम्मान होता है।

रामायण के प्रसंग हैं आदर्श समाज के पर्याय
तुलसीदास ने समाज में व्याप्त विषमता को दूर करने के लिए समन्वय की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित किया। उन्होंने लोकमंगल के लिए धर्म, राजनीति, समाज और पारिवारिक जीवन में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। समाज के विभिन्न वर्गों, जातियों और धार्मिक समुदायों के बीच परस्पर प्रेमभाव को प्रोत्साहित किया गया है।
आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ठीक ही कहा है, "लोक-नायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके; रामचरितमानस शुरू से अन्त तक समन्वय का काव्य है।"। तुलसीदास ने सगुण और निर्गुण दोनों रूपों में राम की आराधना की है तथा शिव भक्तों और राम भक्तों के बीच सामंजस्य बनाने का पूर्ण प्रयास किया। ज्ञानमार्गी और भक्तिमार्गी समुदायों के बीच के भेद को भी मिटाने का प्रयास किया गया।
मानस में राम के जन्म और उनके बाल्यकाल की लीलाओं का अद्वितीय वर्णन किया गया है। राम का जन्म केवल अयोध्या के राजा के रूप में नहीं हुआ, बल्कि वे सम्पूर्ण मानवता के उद्धारक के रूप में प्रकट हुए। उनके आगमन से सभी वर्गों के लोगों में हर्षोल्लास की लहर दौड़ गई। बाल लीलाओं में उन्हें अन्य बच्चों की तरह खेलते और आनन्द करते हुए दिखाया गया है।

बाल्यकाल से ही जन-जन को प्यारे रहे रामलला
ये लीलाएं हमें यह सिखाती हैं कि भगवान भी जब मनुष्य रूप में आते हैं तो वे हमारे जैसे ही होते हैं। यह लोक के धरातल पर समानता का महत्त्वपूर्ण सन्देश है।राम-जानकी विवाह में लोकतत्त्व स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। यह ऐतिहासिक घटना समाज में लोकतान्त्रिक मूल्यों और सिद्धान्तों के महत्त्व को बताती है। सीता स्वयंवर एक सार्वजनिक आयोजन था जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों को एक साथ लाया गया।
स्वयंवर की प्रक्रिया अपने आप में लोकतान्त्रिक थी। इतना ही नहीं राम और सीता का विवाह दो प्रमुख राजवंशों के बीच हुआ जो विभिन्न संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते थे। यह विवाह आपसी समझ और समरसता को बढ़ावा देता है। गोस्वामी जी ने विवाह की वैदिक व्यवस्था एवं लोकाचार के कृत्यों का पूर्णतः पालन करवाया है।
इसमें वरदेखी, कलश स्थापना, मंडप स्थापना, बारात प्रस्थान, पाणिग्रहण, सिन्दूरदान, अगवानी, जनवासा, गारी गाना और कोहबर आदि विविध लौकिक विवाह-रीतियों का सजीव वर्णन मानस की लोक-केन्द्रित दृष्टि का ही द्योतक है।विवाह प्रसंग में धनुषभंग के समय परशुराम-लक्ष्मण का एक महत्त्वपूर्ण संवाद है। सीता स्वयंवर के पश्चात परशुराम के कोप पर जब लक्ष्मण प्रत्युत्तर देते हैं तो वह लोकवार्ता का अनुपम उदाहरण बन जाता है।

रामचरितमानस में मिलता है सिया-राम के विवाह का सुन्दर वर्णन
लक्ष्मण जी कहते हैं कि यहाँ कोई कुम्हड़बतिया नहीं है जो तर्जनी अंगुली को देखते ही मर जाए। आज भी पूरे उत्तर भारत में यह लोक-मान्यता है कि कुम्हड़बतिया की ओर ऊँगली नहीं दिखानी चाहिए क्योंकि वह मुरझा जाती है। इसी प्रकार शकुन और अपशकुन पर भी रामचरितमानस में विशेष जोर दिया गया है। गधे और सियार का विपरीत बोलना या कौवे का बुरी जगह बैठकर काँव-काँव करना आज भी लोक में अपशकुन की श्रेणी में रखा जाता है।
विवाहोपरान्त राम वनगमन करते हैं और लोक के लिए अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते जाते हैं। केवट प्रकरण न केवल रामायण का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है बल्कि यह समानता, भक्ति और सेवा के मूल्यों को भी प्रकट करता है। केवट का यह कथन कि "मुझे अपने हाथ से अपने प्रभु के चरण धोने दो" उसकी विनम्रता को दर्शाता है। राम का विनम्रता से केवट से सहायता मांगना लोकतत्त्व का अद्भुत उदाहरण है।
किष्किन्धाकांड, सुन्दरकांड और लंकाकांड सर्वत्र लोकतत्त्व का प्राचुर्य परिलक्षित होता है। उत्तरकांड में कलिवर्णन मिथकीय कम और वर्तमान कालिक अधिक है। यह सामाजिक और युगीन संस्कृतियों की जीवन्त कथा है। गोस्वामी तुलसीदास ने जिस नवधा भक्ति का उपदेश श्रीराम द्वारा शबरी को दिलवाया है उसमें भी सर्वत्र आचरण की व्यावृति है। तुलसी की भक्ति दिखावे से सर्वथा मुक्त है। नवधा भक्ति का महत्त्व बताकर उन्होंने लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त किया।
रामचरितमानस में जीवन के विभिन्न पहलुओं पर गहन दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है। इसमें मुखिया, राजा, मित्र और पत्नी के आदर्श स्वरूप का सुन्दर वर्णन मिलता है जो समाज को सही दिशा प्रदान करता है। मुखिया कैसा होना चाहिए? मुखिया का कार्य समाज को सही मार्गदर्शन और नेतृत्व देना है।
रामचरितमानस में बताया गया है कि मुखिया को मुख के समान होना चाहिए जो खान-पान तो अकेला करता है परन्तु सभी अंगों का समान रूप से पोषण करता है और उनके बीच सन्तुलन बनाए रखता है।
एक सच्चे मित्र की क्या पहचान है? मित्रता में सच्चाई, विश्वास और सहयोग का होना नितान्त आवश्यक है। सुग्रीव और राम की मित्रता इसका उत्कृष्ट उदाहरण है। श्रीराम कहते हैं कि सच्चा मित्र वही है जो अपने मित्र की कठिनाइयों को अपनी कठिनाइयों से बढ़कर जाने।
अपने पहाड़ जैसे दुःख को धूल के समान माने और मित्र के धूल के समान दुःख को सुमेरु पर्वत के समान बड़ा समझे। इसी प्रकार एक आदर्श पत्नी को पति का सहयोगी, मित्र और मार्गदर्शक होना चाहिए। माता सीता का चरित्र एक आदर्श पत्नी का सर्वोच्च प्रतीक है जिन्होंने हर परिस्थिति में प्रभु राम का साथ दिया।

भार्या होने की अनुपम व्याख्या करते माँ सीता के प्रसंग
लोक में सत्संग की महिमा अपरम्पार मानी जाती है। मानस में वर्णन मिलता है कि स्वर्ग और अपवर्ग के सारे सुख तराजू के एक पलड़े पर रखे जाएं तो भी वे सत्संग के सुख के समान नहीं हो सकते। यह लोक धर्म सहिष्णुता, समर्पण और परोपकार पर आधारित होना चाहिए। गोस्वामी जी लिखते हैं कि दूसरों की भलाई के समान कोई दूसरा धर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा देने के समान कोई नीचता नहीं है।
तुलसीदास ने सदाचार और परोपकार को भक्ति का अनिवार्य अंग माना है। उनका स्पष्ट मानना था कि बिना सदाचार के भक्ति अधूरी है और वह केवल आडम्बर बनकर रह जाती है। श्रीराम को ईश्वर मानते हुए भी उन्होंने उनके लोककल्याणकारी स्वरूप का सजीव वर्णन किया है।
तुलसीदास जी ने हर ढोंगी व्यक्ति को यह उपदेश दिया है कि जो राम नाम के आलसी हैं और भोजन के होशियार हैं, ऐसे लोगों को बार-बार धिक्कार है। आज भी लोक में 'राम नाम के आलसी, भोजन के होशियार' जैसी कहावतें खूब प्रचलित हैं। मानस में सूक्तिपरकता की छटा और उद्धरणीयता की मोहक शैली सर्वत्र बिखरी हुई है और यह सब लोक से ही सम्पृक्त है।

लोकजीवन के लिए प्रेरक रहीं हैं तुलसीदासजी की रचनाएँ
तुलसीदास ने लोकमंगल का ऐसा सहज मार्ग बताया है जो सामान्य जनता के लिए पूरी तरह अनुकरणीय है। राम नाम का जाप, सदाचार का पालन और राम कथा का निरन्तर पारायण करने से मनुष्य का अवश्य ही मंगल होता है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि तुलसीदास का काव्य लोककल्याण का दिव्य दीप है और मनुष्य के लोकमंगल का सच्चा मुक्ति पथ है। रामचरितमानस में निहित भगवान श्रीराम का चरित्र, भक्ति भावना, जीवन दर्शन तथा नीति के हर पृष्ठ पर ऐसे सुन्दर पुष्प विद्यमान हैं जिनसे निरन्तर लोकमंगल की मनोहारी सुगन्ध निकलती रहती है। तुलसीदास ने समाज को सदाचार, परोपकार और समन्वय का जो मार्ग दिखाया है वह लोकतत्त्व आज भी समाज को सही दिशा देने और कल्याणकारी जीवन जीने की अपार प्रेरणा प्रदान करता है।
-लेख
कमलेश कमल
(लेखक प्रतिष्ठित भाषाविद् व आईटीबीपी में जनसम्पर्क अधिकारी हैं, जो “भाषा संशय शोधन” जैसी अपनी चर्चित कृतियों व प्रशासनिक अनुभवों से निरन्तर भाषाई शुचिता के क्षेत्र में योगदान करते हैं।)
श्रीरामचरितमानस में गुँथे लोकजीवन के तत्त्व
April 01, 2026