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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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श्रीराम के जीवन से आलोकित पंच प्रण

श्रीराम के जीवन से आलोकित पंच प्रण


मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का जीवन केवल एक महाकाव्य नहीं है, अपितु यह मानव जीवन को उत्कृष्ट बनाने वाले आदर्शों का एक अत्यन्त व्यावहारिक और शाश्वत शास्त्र भी है। श्री अजय कुमार जी का यह लेख श्रीराम के जीवन में दृष्टिगोचर होने वाले उन पंचप्रणों का परिचय कराता है, जो आज भी हम सभी के लिए व्यवहार्य है। आज के आधुनिक और संघर्षपूर्ण युग में यदि हम विश्व का कल्याण चाहते हैं, यदि भारत को एक समर्थ और वैभवशाली राष्ट्र बनाना चाहते हैं, तो हमें श्रीराम के इन पांच प्रणों को अपने आचरण में अनिवार्य रूप से उतारना होगा। यह लेख हमें श्रीराम के पदचिह्नों पर चलकर एक आदर्श समाज गढ़ने की महती प्रेरणा प्रदान करता है।


मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने अपने सम्पूर्ण जीवन के प्रत्येक क्षण का उपयोग केवल लोककल्याण और समाज के उत्थान के लिए किया है। कोई भी साधारण मनुष्य यदि उनके इस उदात्त जीवन को केवल एक कथा न मानकर उसे अपने व्यावहारिक जीवन में कर्तव्य के रूप में भलीभांति आत्मसात कर ले, तो इस सृष्टि पर भविष्य में कोई भी बड़ा संकट या आंच नहीं आ सकती है।

वस्तुतः यही सबसे बड़ा कारण है कि सम्पूर्ण भारतीय जनमानस में उन्हें सदैव पुरुषोत्तम राम के पावन नाम से जाना जाता है। वर्तमान समय में जब सम्पूर्ण विश्व अनेक प्रकार के संघर्षों और अस्थिरताओं के कठिन दौर से गुजर रहा है, तब हमारे देश को अधिक वैभवशाली, शक्तिशाली और सच्चे अर्थों में विश्वगुरु बनाने के लिए समाज के प्रत्येक नागरिक से यह अपेक्षा की जाती है कि वह पांच प्रमुख विषयों पर एक दृढ़ संकल्प ले और उन्हें अपने नित्य व्यावहारिक जीवन में कर्तव्य स्वरूप निरन्तर पालन करे।

राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने वाले ये पंच प्रण हैं- अपने परिवार को सुदृढ़ करना, अपने समाज को समरस बनाना, भारत के नागरिक के रूप में अपने कर्त्तव्यों का पालन करना, स्वदेशी को महत्त्व देना और अपने पर्यावरण का संरक्षण करना। यदि हम त्रेतायुग के उस पावन कालखण्ड का गहनता से अवलोकन करें, तो हम पाएंगे कि ये सभी पांचों विषय भगवान श्रीराम के आचरण और उनके जीवन में पूर्णतः परिलक्षित होते हैं।

इन पांच प्रणों में सबसे पहला प्रण अपने "परिवार को मजबूत" करने से जुड़ा है। भगवान श्रीराम ने अपने पवित्र आचरण से सम्पूर्ण मानव समाज को यह अमूल्य शिक्षा दी है कि एक आदर्श परिवार में प्रेम, त्याग और अनुशासन का क्या सर्वोच्च महत्त्व होता है। अपने पिता महाराज दशरथ की आज्ञा का बिना किसी प्रश्न के सहर्ष पालन करना, अपनी माताओं का सर्वोच्च सम्मान करना और अपने अनुज भाइयों को अगाध स्नेह से गले लगाना उनके इसी कुटुम्ब प्रबोधन का ही एक अभिन्न हिस्सा था।

प्रथम प्रण - कुटुंब प्रबोधन 
प्रथम प्रण - कुटुंब प्रबोधन 

परन्तु श्रीराम का यह पारिवारिक बोध केवल उनके रक्त-सम्बन्धियों या राजमहल की सीमाओं तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने वनवास के दौरान निस्वार्थ भाव से विभीषण, पवनपुत्र हनुमान और वानरराज सुग्रीव जैसे मित्रों के साथ भी एक ऐसा आत्मीय और पारिवारिक भाव निर्मित किया जिसने सम्पूर्ण समाज को एक मजबूत सूत्र में एकजुट कर दिया।

इसी वृहद कुटुम्ब की अजेय शक्ति से उन्होंने रावण जैसी बड़ी-बड़ी विनाशकारी और आसुरी शक्तियों को सर्वदा के लिए समाप्त कर दिया। श्रीराम के उदात्त चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्हें जो भी भारी विजय या अपार यश प्राप्त हुआ, उसका श्रेय उन्होंने कभी भी स्वयं नहीं लिया। उन्होंने सदैव अपनी हर सफलता का पूरा श्रेय अपने बन्धु-बान्धवों और सहयोगियों को ही सहर्ष प्रदान किया, जबकि किसी भी प्रकार के अपयश को स्वयं आगे बढ़कर स्वीकार किया। एक आदर्श परिवार और सुगठित समाज के निर्माण के लिए श्रीराम का यह निस्वार्थ आचरण एक अत्यन्त अद्भुत और अलौकिक उदाहरण है।

इसी शृंखला में दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रण है अपने "समाज को संघर्ष से परे ले जाकर सौहार्द्रपूर्ण व समरस बनाना"। यद्यपि रामायण काल में वर्तमान समाज जैसी समस्याएँ व कुप्रथाएं नहीं थीं, परन्तु फिर भी भगवान श्रीराम ने अपने वनवास काल में समरसता के जो सर्वोच्च प्रतिमान स्थापित किए, वे आज के खण्डित होते समाज के लिए एक महान् और अचूक औषधि हैं। सदियों की लम्बी गुलामी के कारण हमारे समाज में जो ऊंच-नीच और अवांछित भेदभाव उत्पन्न हुआ है, उसे श्रीराम के आदर्शों का पालन करके ही समूल मिटाया जा सकता है।

द्वितीय प्रण- सामाजिक सौहार्द्र
द्वितीय प्रण- सामाजिक सौहार्द्र

वन गमन के प्रारम्भिक समय में निषादराज गुह को अत्यन्त आत्मीयता से अपने गले लगाना और पम्पा सरोवर के तट पर माता शबरी के जूठे बेरों को अगाध श्रद्धा और असीम प्रेम के साथ ग्रहण करना सामाजिक समरसता का अत्यन्त अद्भुत और हृदयस्पर्शी दृश्य है। समाज के इन उपेक्षित समझे जाने वाले वर्गों को पूर्ण सम्मान देने के साथ-साथ महान् ऋषि-मुनियों का सर्वोच्च आदर करना भी हमें भगवान श्रीराम के आचरण से ही भलीभांति सीखना चाहिए। यदि आज का हमारा समाज श्रीराम के इस समरस जीवन को पूर्णतः अपना ले,तो हमें समरसता जैसे शब्द को अलग से कहने या परिभाषित करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं होगी।

राष्ट्र निर्माण का तीसरा बड़ा प्रण अपने "कर्तव्यपालन" का होना चाहिए। भगवान श्रीराम ने अपने सम्पूर्ण जीवन में कभी भी किसी के साथ छल-कपट या जल्दबाजी से कोई भी वस्तु प्राप्त करने का तनिक भी प्रयास नहीं किया। माता सीता को लंका से वापस लाने के उस विकट महाभियान में भी उन्होंने कभी रावण के साथ कोई अनैतिक छल या बल का अनुचित प्रयोग नहीं किया।

वे अपने अन्तिम समय तक शत्रु के साथ भी पूर्ण सौहार्द और श्रेष्ठ नीति का ही पालन करते रहे। रावण की मृत्यु के पश्चात भी उसकी पत्नी महारानी मन्दोदरी के साथ अत्यन्त सम्मानपूर्ण संवाद करना और क्षमा याचना का पुनीत भाव रखना उनके महान् नागरिक और मानवीय कर्तव्य को ही दर्शाता है। लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व विशाल समुद्र से पूरे तीन दिनों तक मार्ग देने की सविनय प्रार्थना करना इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि वे अपनी असीम शक्ति और बल का प्रयोग केवल अन्तिम विकल्प के रूप में ही करते थे।

तृतीय प्रण - कर्तव्यनिष्ठा
तृतीय प्रण - कर्तव्यनिष्ठा 

अयोध्या लौटने के पश्चात जब राज्य के एक साधारण नागरिक के द्वारा उनकी पत्नी पर निराधार संदेह प्रकट किया गया, तब श्रीराम ने राजधर्म का कड़ाई से पालन करते हुए अपने सम्पूर्ण व्यक्तिगत सुख को त्याग दिया और अपनी प्रिय पत्नी का वनवास कर दिया। जब तक विरोध का एक भी स्वर शान्त नहीं हो गया, तब तक उन्होंने प्रमाणित होने के बाद ही अपने पुत्रों को स्वीकार किया।

एक आदर्श राजा के रूप में जनमत का पूर्ण सम्मान करते हुए अपने नागरिक कर्तव्य का कठोर निर्वहन करने का ऐसा अनूठा उदाहरण संसार के किसी अन्य इतिहास में प्राप्त नहीं होता। यदि आज का प्रत्येक मनुष्य इसी प्रकार अपने नागरिक कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करता रहे, तो यह समाज स्वतः ही शान्ति और निरन्तर उन्नति के प्रशस्त मार्ग पर अग्रसर हो जाएगा।

इस पुनीत अभियान का चौथा प्रण "स्वदेश प्रेम" का है। जब लंकाधिपति रावण ने माता सीता का बलपूर्वक हरण किया, तब श्रीराम ने उस महाशक्तिशाली राक्षस के घोर अत्याचार से समाज को मुक्त कराने के लिए अपनी जन्मभूमि अयोध्या, अपने ननिहाल दक्षिण कोसल या अपने ससुराल मिथिला से कोई भी विशाल सैन्य सहायता नहीं मंगवाई।

उनका यह दृढ़ विश्वास था कि जहां की जो समस्या है, उसका स्थायी समाधान भी वहीं के स्थानीय संसाधनों और समाज से ही खोजना होगा। इसी प्रबल स्वदेशी और स्वावलम्बी भाव के कारण उन्होंने वहीं के वनवासी समाज, साधारण वानरों और भालुओं को संगठित कर एक अजेय सेना खड़ी कर दी। उन्होंने उन स्थानीय निवासियों को अपार बल दिया और उनके भीतर असीम आत्मविश्वास जगाया।


चतुर्थ प्रण- स्वदेश प्रेम

इसी जगे हुए अपार आत्मविश्वास के फलस्वरूप उन्होंने सर्वसम्पन्न राक्षसी वृत्तियों वाले रावण का समूल नाश कर दिया। अपने सम्पूर्ण वनवास की सुदीर्घ अवधि में अयोध्या की पावन मिट्टी को अपनी चेतना मानकर उसकी नित्य पूजा करना उनके स्वदेशी भाव और अपनी मातृभूमि के प्रति अगाध प्रेम का सबसे बड़ा और प्रेरक प्रमाण है। इससे बड़ा स्वदेशी भाव संसार में और कुछ नहीं हो सकता।

पांचवां और अन्तिम प्रण "पर्यावरण के संरक्षण" का है। भगवान श्रीराम का पर्यावरण अर्थात् प्रकृति के साथ अत्यन्त गहरा और आत्मीय तादात्म्य था। वे सम्पूर्ण प्रकृति को अपने अस्तित्व का एक अभिन्न अंग मानते थे। जब माता सीता का हरण हुआ, तब श्रीराम ने किसी मनुष्य से नहीं अपितु पशु-पक्षियों, पेड़-पौधों और वन की लताओं से अपनी भारी पीड़ा साझा की और उनसे विलाप करते हुए माता सीता का पता पूछा।

तुलसी दास जी इसका वर्णन यूँ करते हैं- 
हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी।
तुम देखी सीता मृगनयनी॥

तो क्या प्रकृति के साथ एकात्मकता और आत्मीयता का इससे बड़ा कोई और प्रतीक इस संसार में हो सकता है? उन्होंने पर्यावरण के जीवों के प्रति अपनी अगाध करुणा दिखाते हुए गिद्धराज जटायु को अपने सगे पिता के समान सम्मान दिया और अत्यन्त भावुक होकर अपने हाथों से उनका अन्तिम दाह संस्कार किया। इतना ही नहीं, विशाल सागर पर रामसेतु के निर्माण के समय उन्होंने गिलहरी जैसे एक अत्यन्त छोटे जीव को कभी रुष्ट नहीं होने दिया, अपितु उसके अमूल्य योगदान का भी पूरा सम्मान किया और उसे सामाजिक कार्य में लगाकर उसका भारी महत्त्व सम्पूर्ण विश्व को समझाया।

पंच प्रण- पर्यावरण संरक्षण
पंच प्रण- पर्यावरण संरक्षण

रामेश्वरम के पावन तट पर अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि के लिए उन्होंने किसी बाहरी या कृत्रिम सामग्री की बजाय वहीं के प्राकृतिक बालू से शिवलिंग का निर्माण किया। हनुमान जी द्वारा दूर से लाए गए सुन्दर प्रस्तर खण्ड को ही शिवलिंग समझने की भूल को सुधारते हुए श्रीराम की वह अलौकिक दृष्टि सम्पूर्ण लोक को यह बताती है कि भगवान तो प्रकृति के कण-कण में विद्यमान हैं।

निष्कर्षतः यह पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि भगवान श्रीराम का जीवन हम सभी साधारण मनुष्यों के लिए सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च मार्गदर्शक है। यदि हम मनुष्य उनके इस पावन जीवन और उनके शाश्वत आदर्शों को अपने नित्य कर्तव्यों में पूरी तरह ढाल लें, तो हमें भविष्य में अलग से किसी पंच प्रण को लेने की कोई आवश्यकता ही शेष नहीं रहेगी।

आज जब सम्पूर्ण विश्व आपसी द्वेष और महाविनाशकारी युद्ध के कगार पर खड़ा दिखाई देता है, तब श्रीराम का आचरण स्वतः ही शान्ति, सहयोग, ममता, समता और एकात्मता का दिव्य सन्देश सम्पूर्ण मानवता को देने लगता है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जीवन का अन्तिम और सबसे बड़ा सन्देश यही है कि हम केवल उनकी पूजा तक ही सीमित न रहें, अपितु उनके जीवन के उच्च मूल्यों को अपने भीतर धारण कर निरन्तर कर्तव्य के प्रशस्त पथ पर आगे बढ़ें।

हर युग में प्रासंगिक हैं श्रीराम के आदर्श
हर युग में प्रासंगिक हैं श्रीराम के आदर्श 

वस्तुतः वर्तमान समय की यही सबसे बड़ी मांग है कि हम सभी उनके कर्म पथ का पूर्ण निष्ठा से अनुसरण करते हुए इस युद्धग्रस्त और अशान्त दुनिया को शान्ति और लोककल्याण की ओर ले जाएं।

- अजय कुमार
(लेखक झारखंड के समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो जनजातीय समुदाय से जुड़े विषयों समेत लोक-कला व परम्पराओं पर गहराई से लिखते हैं।)

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