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पर्व विशेष : | तदनुसार 09 अक्टूबर 2026

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धनतेरस पर्व में निहित आयुर्वेद और स्वास्थ्य समृद्धि का उत्सव

धनतेरस पर्व में निहित आयुर्वेद और स्वास्थ्य समृद्धि का उत्सव

भारत में दीपोत्सव की शुरुआत जिस पर्व से होती है, वह केवल नए बर्तन या खरीदारी का दिवस नहीं, बल्कि भारतीय चिंतन की गहराई से जुड़ी एक वैदिक परम्परा है, धनतेरस। कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व ‘धनत्रयोदशी’ या ‘धन्वंतरि त्रयोदशी’ के नाम से भी प्रसिद्ध है। यह पर्व बतलाता है कि धन का वास्तविक स्वरूप सोना-चाँदी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, ज्ञान और संतोष है।

धनतेरस से सम्बंधित पौराणिक कथा भी प्रचलित है, इस दिन समुद्र मंथन के दौरान भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। उन्हें सृष्टि का प्रथम चिकित्सक और आयुर्वेद का आदिदेव माना गया है। उन्होंने यह संदेश दिया कि स्वस्थ शरीर और दीर्घायु जीवन ही मानव की सबसे बड़ी संपत्ति है। भारतीय जीवन-दर्शन में “पहला सुख निरोगी काया” का सिद्धांत इसी परंपरा का विस्तार है। यही कारण है कि भारत सरकार ने इस दिन को ‘राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस’ घोषित किया है, ताकि धनतेरस का संबंध पुनः उसके मूल आयुर्वेद और स्वास्थ्य से जोड़ा जा सके।


 समुद्र मंथन, धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए

धनतेरस की रात्रि यमदीपदान की परंपरा भी जुड़ी हुई है, जो जीवन की नश्वरता और मृत्यु पर चेतना की विजय का प्रतीक है। कथा के अनुसार, राजा हिम के पुत्र की मृत्यु सर्पदंश से निश्चित थी, किंतु उसकी पत्नी ने सोने-चाँदी के सिक्कों का ढेर लगाकर दीप प्रज्वलित किए, जिससे यमराज की दृष्टि भ्रमित हो गई और उसके पति के प्राण बच गए। यह कथा केवल चमत्कार की नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक सन्देश की है, सोना-चाँदी यहाँ माया और विषय-वासनाओं का प्रतीक है, जबकि दीपक आत्मज्योति का। जब तक भीतर का दीप नहीं जलता, तब तक मनुष्य अंधकार में भटकता रहता है। धनतेरस का यह दीप हमें भीतर की चेतना जगाने का आह्वान करता है।


यमदीप दान का महत्व

वैदिक ग्रंथों में ‘धन’ का अर्थ केवल भौतिक संपत्ति नहीं माना गया है। ऋग्वेद में कहा गया है: 
“प्रजापते वयं स्याम पतयो रयीणाम्।” अर्थात् हे प्रजापति! हम सभी प्रकार के ऐश्वर्यों के स्वामी हों। यहाँ ‘रयी’ शब्द में विद्या, तप, बल, आरोग्य, श्री और बुद्धि जैसे सभी धन सम्मिलित हैं। इस दृष्टि से धनतेरस केवल व्यापारिक लाभ का नहीं, बल्कि इन समग्र संपत्तियों की प्राप्ति का पर्व है।
प्राचीन तांत्रिक परंपरा में भी यह दिन औषधीय दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। कहा जाता है कि दीपावली से पूर्व के ये दिन औषधीय वनस्पतियों के लिए सबसे प्रभावशाली होते हैं। इसलिए आयुर्वेदाचार्य इसी अवधि में औषधियाँ तैयार करते थे। इससे स्पष्ट है कि धनतेरस का संबंध प्रकृति, औषधि और आरोग्य से गहराई से जुड़ा रहा है।


धनतेरस का संबंध प्रकृति, औषधि और आरोग्य

बर्तन खरीदने की परंपरा भी इसी अमृत-कलश से प्रेरित है, जिसके साथ धन्वंतरि प्रकट हुए थे। यह परंपरा केवल सौभाग्य या ‘तेरह गुना लाभ’ की मान्यता नहीं, बल्कि यह स्मरण दिलाती है कि जीवन रूपी पात्र को शुद्ध रखकर उसमें अमृत तत्व को धारण करने की तैयारी करनी चाहिए। चाँदी के सिक्कों को चंद्रमा का प्रतीक माना गया है, जो मन में शीतलता और संतोष लाता है।


धनतेरस के दिन नये बर्तन खरीदने की परम्परा

किन्तु आधुनिक समय में धनतेरस का स्वरूप अपनी मूल भावना से दूर होता जा रहा है। अब यह पर्व केवल उपभोग और खरीदारी का प्रतीक बन गया है। समाज ने स्वास्थ्य, आयुर्वेद और आत्मज्योति के सन्देश को भुलाकर इसे व्यापारिक अवसर में बदल दिया है। जबकि ऋषियों की दृष्टि में धनतेरस का उद्देश्य था, आयुर्वेद का स्मरण, आरोग्य की कामना और आत्मचेतना का विकास।


धनतेरस आयुर्वेद-आरोग्य-आत्मचेतना का पर्व

धनतेरस का वास्तविक संदेश यही है कि धन का प्रथम स्वरूप स्वास्थ्य है। जब शरीर स्वस्थ, मन प्रसन्न और चेतना जागृत होती है, तभी लक्ष्मी (समृद्धि) और काली (सिद्धि) दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि दीपक केवल मिट्टी का नहीं, बल्कि आत्मा का होना चाहिए, जो भीतर से अंधकार को मिटा सके।
भारतीय मनीषा ने कहा है  “आरोग्यं परमं भाग्यं, स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्।” धनतेरस उसी सत्य की याद दिलाता है कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है, और यही दीपावली के उत्सव की वास्तविक ज्योति है।

लेख
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर
संपादक, दक्षिण कोसल टुडे

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