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अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति: वीरांगना रानी दुर्गावती का शौर्य

अदम्य साहस की प्रतिमूर्ति: वीरांगना रानी दुर्गावती का शौर्य


भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में वीरांगना रानी दुर्गावती का नाम केवल एक शासिका के रूप में नहीं, वरन स्वाभिमान और पराक्रम के सर्वोच्च प्रतीक के रूप में अंकित है। यह लेख महारानी दुर्गावती के जीवन के उन अनछुए पहलुओं को उजागर करता है, जहाँ उन्होंने न केवल मुगल साम्राज्य की विशाल सैन्य शक्ति को चुनौती दी, अपितु जल प्रबन्धन और सामाजिक समरसता के क्षेत्र में भी युगांतरकारी कार्य किए। उनके शासनकाल में गोंडवाना की समृद्धि और उनके युद्ध कौशल की गाथाएँ आज भी प्रासंगिक हैं। इस विशेष प्रस्तुति के माध्यम से हम उस महान वीरांगना को स्मरण कर रहे हैं, जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा हेतु अपने प्राणों की आहुति देना स्वीकार किया, पर दासता कभी स्वीकार नहीं की।


उस ऐतिहासिक दृश्य की कल्पना कीजिए, जब एक ओर तोपखाने, बन्दूकधारियों और तेजतर्रार घोड़ों से सजी मुगल साम्राज्य की विशाल सेना खड़ी थी और दूसरी ओर अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए गिने-चुने पैदल सैनिकों तथा हाथियों के भरोसे युद्ध मैदान में उतरी एक महारानी। यह सोलहवीं शताब्दी के भारत का वह ऐतिहासिक घटनाक्रम है, जिसने विश्व इतिहास को उसकी सबसे साहसी महिला योद्धाओं में से एक, वीरांगना रानी दुर्गावती से परिचित कराया।


वीरांगना रानी दुर्गावती

रानी दुर्गावती का संघर्ष इसलिए और अधिक विस्मयकारी है क्योंकि उनका मुकाबला उस दौर की सबसे साधन सम्पन्न सेना से था। गोंडवाना राज्य की सैन्य व्यवस्था परम्परागत थी, जहाँ पैदल सैनिक मुख्य आधार थे और सेनापति हाथियों पर सवार होते थे।

इसके विपरीत, मुगलों के पास अरबी घोड़ों की एक ऐसी फौज थी जो पलक झपकते ही हमला करने और संकट में तेजी से पीछे हटने में सक्षम थी। हाथियों की धीमी गति और घोड़ों की तीव्र चपलता के बीच जो रणनीतिक अंतर था, उसे रानी ने अपने अदम्य साहस और बेजोड़ युद्ध कौशल से पाटा।

यही कारण था कि उन्होंने एक बार नहीं, अपितु लगातार तीन बार अकबर के सेनापति आसफ खाँ को युद्ध के मैदान में धूल चटाई। इस अद्वितीय शौर्य को सुप्रसिद्ध कवि और लेखक स्व प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव 'विदग्ध' ने अपनी पंक्तियों में बहुत सुन्दरता से पिरोया है। वे लिखते हैं कि-

विंध्याचल की माटी और नर्मदा (रेवा) की घाटी ने देश को कई रत्न दिए हैं, जिनमें से एक अनोखी गढ़ मण्डला की रानी दुर्गावती थीं। वे युद्ध भूमि में साक्षात मर्दानी थीं, तो अपनी प्रजा के लिए एक ममतामयी माता भी थीं। जब अकबर का साम्राज्य विस्तार हर दिशा में सूरज की तरह चढ़ रहा था, तब गोंडवाना की यह पहचान अरावली की तरह अडिग खड़ी रही।


रानी दुर्गावती -अद्वितीय शौर्य की धनी

ऐतिहासिक सन्दर्भों के अनुसार, अकबर ने रानी को नीचा दिखाने के उद्देश्य से सोने का एक करेला भिजवाया था। इसके कड़वे सन्देश को समझकर रानी ने भी बदले में सोने का एक 'पिंजन' (रूई धुनने का औजार) आगरा भिजवा दिया। इस कूट संकेतिक भाषा ने अकबर के क्रोध को भड़का दिया, क्योंकि रानी झुकने को तैयार नहीं थीं।

घने जंगलों और नदियों से घिरा गोंडवाना उस समय बेहद सम्पन्न था। अबुल फजल ने 'आइने अकबरी' में स्पष्ट लिखा है कि यहाँ की प्रजा इतनी समृद्ध थी कि लगान का भुगतान सोने के सिक्कों और हाथियों के रूप में करती थी। यही अटूट सम्पन्नता मुगलों के लालच का मुख्य कारण बनी।

रानी दुर्गावती का व्यक्तित्व केवल युद्धों तक सीमित नहीं था। वे एक दूरदर्शी प्रशासक और चन्देल राजपूत राजकुमारी थीं। राजा दलपत शाह के साथ उनका विवाह उस दौर में सामाजिक समरसता की एक अनूठी मिसाल थी।

राजा दलपत शाह के असामयिक निधन के बाद रानी पर दुखों का पहाड़ टूटा। ऐसी कठिन परिस्थिति में उन्होंने घुटने टेकने के स्थान पर अपने मात्र 3 वर्ष के पुत्र वीर नारायण को गद्दी पर बैठाया और स्वयं शासन की बागडोर सम्भाल ली। उनके राज्य में नारी सम्मान सर्वोपरि था और अपराधियों को त्वरित दण्ड दिया जाता था।

उनकी प्रशासनिक कुशलता का सबसे बड़ा प्रमाण उनका जल प्रबन्धन था। आज से लगभग 450 वर्ष पूर्व उन्होंने जबलपुर में तालाबों की एक ऐसी श्रृंखला बनवाई, जो अद्भुत इंजीनियरिंग का उदाहरण थी। ऊंचे तालाबों के भरने के बाद पानी बिना किसी पम्प के, प्राकृतिक बहाव से स्वतः ही निचले तालाबों में चला जाता था।


जल प्रबंधन और समृद्धि की विरासत

उन्होंने अपने वफादार दीवान आधार सिंह के नाम पर 'अधारताल', अपनी प्रिय सखी के नाम पर 'चेरीताल' और अपने चहेते हाथी सरमन के नाम पर 'हाथीताल' बनवाए। ये तालाब आज भी शहर की जीवन रेखा बने हुए हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने मालवा के सुल्तान बाज बहादुर को भी युद्ध में बुरी तरह परास्त कर अपनी सैन्य धाक जमाई थी।

महारानी की वीरता का तेज तब दिखा जब अकबर की विशाल सेना ने गोण्डवाना को घेर लिया। रानी ने साहसपूर्वक नेतृत्व किया, मगर युद्ध के दौरान एक तीर उनकी आँख में और दूसरा गर्दन में जा लगा।

जब उन्होंने देखा कि विजय असम्भव है और शत्रु उन्हें बन्दी बना सकता है, तब उन्होंने अपनी कटार स्वयं के सीने में उतार ली। 24 जून का वह दिन भारतीय शौर्य के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो गया। उनका बलिदान हमें सिखाता है कि शक्ति केवल शस्त्रों में नहीं, बल्कि संकल्प और स्वाभिमान में भी होती है।

-विवेक रंजन श्रीवास्तव
  भोपाल 

 

 

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