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रामचरितमानस में पर्यावरणीय संरक्षण : वैदिक ज्ञान और रामराज्य का अद्भुत सन्देश

रामचरितमानस में पर्यावरणीय संरक्षण : वैदिक ज्ञान और रामराज्य का अद्भुत सन्देश


वर्तमान समय में सम्पूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी असन्तुलन की गम्भीर समस्याओं से जूझ रहा है। ऐसे में भारतीय वैदिक परम्परा और हमारे महाकाव्य पर्यावरण संरक्षण के शाश्वत समाधान प्रस्तुत करते हैं। गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस केवल एक भक्ति ग्रन्थ नहीं है, अपितु यह प्रकृति और मनुष्य के मध्य अटूट सम्बन्धों का जीवन्त दस्तावेज भी है। इस लेख में रामराज्य के उस आदर्श पारिस्थितिकी तन्त्र का विश्लेषण किया गया है, जहाँ जल, वायु, वनस्पति और जीवजन्तु परस्पर सामंजस्य के साथ फलते-फूलते थे। यह आलेख हमें अपनी गौरवशाली विरासत से सीखने और वर्तमान संकटों से निपटने के लिए जागरूक करता है।


भारतीय संस्कृति में प्रकृति को केवल उपभोग की वस्तु न मानकर उसे माता का दर्जा दिया गया है। वैदिक ऋषियों ने सहस्रों वर्षों पूर्व प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का जो मन्त्र दिया था, गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में रामराज्य के चित्रण के माध्यम से उसे धरातल पर उतारा है। रामराज्य की परिकल्पना में पर्यावरण प्रबन्धन इतना उत्कृष्ट था कि वहाँ मानवीय समाज और प्रकृति के बीच कोई द्वन्द्व नहीं था।

तुलसीदास जी वर्णन करते हैं कि रामराज्य में जल के स्रोत सदैव शुद्ध और निर्मल रहते थे। नगर के कुएं और बावड़ियां स्वच्छ जल से परिपूर्ण रहती थीं। यह जल प्रबन्धन की उस सूक्ष्म दृष्टि का परिचायक है, जिसमें जल संचयन और उसकी पवित्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई थी।

अयोध्या के प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण करते हुए मानसकार लिखते हैं :

बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं |
आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं ||


जल प्रबंधन की महत्ता बताते कुएं व  
बावड़ियां

राम के राज्य में केवल अयोध्या ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण धरा पल्लवित और पुष्पित थी। नगर में अशोक, पारिजात और कदम्ब जैसे वृक्षों की बहुलता थी। ये वृक्ष न केवल छाया प्रदान करते थे, बल्कि पर्यावरण को शुद्ध रखने में भी महती भूमिका निभाते थे।

इन वृक्षों पर अनेक प्रजातियों के पक्षी विचरण करते थे और अपनी मधुर तान से पथिकों की थकावट दूर करते थे। यहाँ प्रकृति एक आतिथ्य सत्कार करने वाली परिचारिका की भूमिका में दिखती है, जहाँ वन सम्पदा का प्रबन्धन इतना श्रेष्ठ था कि संसाधनों की कभी कमी नहीं होती थी।

पर्यावरण संरक्षण में सन्तों और मुनियों की भूमिका को रेखांकित करते हुए तुलसीदास जी ने लिखा है कि वे नदियों और तालाबों के किनारों पर तुलसी के पौधों का रोपण करते थे। तुलसी को हमारे धर्म में पूजनीय माना गया है, परन्तु इसका वैज्ञानिक महत्व इसके वायु शोधक गुणों में निहित है।

मानस में उल्लेख है :

तीर तीर तुलसिका सुहाईं |
बृंद बृंद मुनिन्ह लगाई ||

तुलसी- तट संरक्षण और जैव विविधता की संरक्षक
तुलसी- तट संरक्षण और जैव विविधता की संरक्षक

मुनियों द्वारा समूह में लगायी गयी यह तुलसी न केवल धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा थी, बल्कि यह नदी के तटों के संरक्षण और जैव-विविधता को बनाए रखने का एक उपक्रम भी था। रामराज्य की प्रकृति की अनुपम छटा का वर्णन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं :

लता बिटप मांगे मधु चवहीं |
मन भावतो धेनु पय स्त्रवहीं ||

यह चौपाई वन प्रबन्धन और पशुपालन के उस स्वर्ण युग की बानगी देती है, जहाँ लताओं से स्वतः मधु प्राप्त होता था और गौवंश मनचाहा दुग्ध प्रदान करता था। यह संसाधनों के अति-दोहन के स्थान पर उनके सन्तुलित उपयोग का संकेत है। जब राजा और प्रजा दोनों ही प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हैं, तो प्रकृति भी उदारतापूर्वक अपने कोष खोल देती है।

रामराज्य में प्रकृति का यह स्वरूप केवल अयोध्या तक सीमित नहीं था। तुलसीदास जी ने जनकपुरी की वाटिका और यहाँ तक कि रावण की लंका के वनों का भी मनोहर चित्रण किया है, जिससे स्पष्ट होता है कि उस युग में वन और उपवन जीवन के अनिवार्य अंग थे।

वन्य जीवों के संरक्षण और उनके व्यवहार पर रामराज्य का प्रभाव अद्भुत था। गोस्वामी जी लिखते हैं :

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन 
रहहिं एक संग गज पंचानन ||
खग मृग सहज बयरु बिसराई |
सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई ||
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा |
अभय चरहिं बन करहिं अनंदा ||

मानस के अनुसार, उस काल में वनों के वृक्ष वर्ष भर फलते और फूलते थे। सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि हाथी और सिंह जैसे स्वाभाविक शत्रु भी एक साथ प्रेमपूर्वक रहते थे। यह दृश्य पारिस्थितिकी तन्त्र में व्याप्त पूर्ण शान्ति और निर्भयता का प्रतीक है। जब समाज में न्याय और धर्म का शासन होता है, तो उसका प्रभाव मूक पशुओं और पक्षियों पर भी पड़ता है। वे अपनी स्वाभाविक शत्रुता त्याग कर परस्पर प्रीति बढ़ा लेते हैं।

रामराज्य में सबके मध्य था परस्पर प्रेम
रामराज्य में सबके मध्य था परस्पर प्रेम 

रामराज्य में पर्यावरण प्रबन्धन की सफलता का सबसे बड़ा कारण राजा और प्रजा के मध्य का अद्भुत सामंजस्य था। तुलसीदास जी के अनुसार, उस समय पृथ्वी सदैव सस्य-श्यामला रहती थी। "ससि सम्पन्न सदा रह धरनी .." इस पंक्ति के माध्यम से वे कृषि और मृदा की उर्वरता के संरक्षण की ओर संकेत करते हैं।

मानवीय समाज और प्रकृति के सम्बन्ध को तुलसीदास जी ने सहोदर यानी सगे भाई के समान माना है। जिस प्रकार एक भाई दूसरे भाई के उत्थान के लिए समर्पित रहता है, उसी प्रकार मानव समाज को प्रकृति के पोषण के लिए तत्पर रहना चाहिए।

श्रीराम का पुण्य प्रताप ही है कि हमें यह वसुन्धरा अपने पूर्वजों से हरी-भरी और पुष्पित विरासत में प्राप्त हुई है। आज हम उन पेड़ों के फल खा रहे हैं जिन्हें पूर्वजों ने बड़ी श्रद्धा से लगाया था। परन्तु आज प्रश्न यह है कि क्या हम आने वाली पीढ़ी को भी वैसा ही सुन्दर और समृद्ध स्वरूप सौंप पाएंगे?

यदि हमें भविष्य के सूखे ताल-तलैया में धूल के स्थान पर जल की बूंदों को संजोकर रखना है, तो हमें अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा। प्रकृति का आशीर्वाद और उसके सौन्दर्य का अनुभव केवल तभी सम्भव है, जब हम पर्यावरण संरक्षण में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करें।


प्रकृति को सहेजना है हम सबका साझा दायित्त्व

रामचरितमानस हमें यह सिखाता है कि विकास और प्रकृति के मध्य कोई विरोध नहीं है। रामराज्य एक ऐसा सामाजिक ढांचा था जहाँ तकनीकी और आध्यात्मिक उन्नति के साथ-साथ पर्यावरण की रक्षा भी समाहित थी। आज के सन्दर्भ में हमें पुनः उन्हीं वैदिक मूल्यों को अपनाने की आवश्यकता है।

हमें पेड़ों को काटने के स्थान पर उन्हें रोपने और नदियों को प्रदूषित करने के स्थान पर उन्हें निर्मल रखने का संकल्प लेना होगा। अन्ततः, रामराज्य की वह हरियाली और शुद्धता केवल कहानियों का हिस्सा न रह जाए, इसके लिए हमें आज से ही प्रकृति के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलना होगा। तभी हम आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा संसार दे पाएंगे जहाँ शुद्ध वायु, निर्मल जल और चहचहाते पक्षी केवल कल्पना न होकर यथार्थ होंगे।

- पुष्पा शर्मा 

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