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गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम्: जहाँ आचार्य रामानुज की करुणा ने रचा भक्ति का नया इतिहास

गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम्: जहाँ आचार्य रामानुज की करुणा ने रचा भक्ति का नया इतिहास


प्रस्तुत आलेख दक्षिण भारत के सुप्रसिद्ध श्रीवैष्णव तीर्थ 'गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम्' की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गाथा को समर्पित है। यह केवल एक स्थान का परिचय नहीं है, बल्कि महान समाज सुधारक और दार्शनिक आचार्य रामानुज के जीवन के उस स्वर्णिम अध्याय का जीवन्त वर्णन है, जिसने भक्ति मार्ग के द्वार प्रत्येक जन के लिए खोल दिए। इस लेख के माध्यम से हम उस गुरु-शिष्य परम्परा के दर्शन करते हैं, जहाँ ज्ञान से बड़ी करुणा को माना गया। यहाँ रामानुज की अट्ठारह कठिन यात्राओं, उनके धैर्य और अन्ततः मानवता के कल्याण के लिए उनके द्वारा किए गए महान त्याग की कथा समाहित है, जो आज भी प्रासंगिक है।


 दक्षिण भारत की पावन भूमि में कुछ तीर्थ ऐसे हैं जहाँ केवल देवमूर्तियाँ ही नहीं, बल्कि इतिहास, आस्था और मानवता के अमर आदर्श भी जीवित हैं। तमिलनाडु के शिवगंगा जनपद में स्थित थिरुकोष्टियूर, जिसे श्रीवैष्णव परम्परा में गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम् कहा जाता है, ऐसा ही एक दिव्य स्थल है।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, हिरण्यकशिपु के अत्याचारों से संसार की रक्षा के उपाय पर विचार करने के लिए देवताओं ने इसी पावन भूमि पर एक महत्त्वपूर्ण गोष्ठी की थी। इसी कारण इस स्थान का नाम थिरुकोष्टियूर पड़ा, जिसका अर्थ है दिव्य गोष्ठी का स्थान।

परन्तु इस पवित्र धाम की सबसे बड़ी महिमा केवल पुराणों तक सीमित नहीं है। लगभग 1000 वर्ष पूर्व यहाँ घटी एक अद्भुत घटना ने भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा, ज्ञान, करुणा और लोककल्याण के अर्थ को सदा के लिए एक नया आयाम प्रदान किया।


108 दिव्यस्थानों  में से एक गोष्ठिपुरम दिव्यदेशम्-थिरुकोष्टियूर
 

यह गाथा आचार्य रामानुज के अडिग संकल्प और उनके गुरु गोष्ठीपूर्ण के बीच हुए उस संवाद की है, जिसने मोक्ष के मन्त्र को मन्दिर की चारदीवारी से बाहर निकाल कर जन-जन तक पहुँचा दिया। आचार्य रामानुज के जीवन की यह यात्रा वास्तव में एक महान उत्तराधिकार की प्राप्ति से आरम्भ होती है।

रामानुज उस समय यह नहीं जानते थे कि एक महान आचार्य उन्हें अपना आध्यात्मिक उत्तराधिकारी मान चुके हैं। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि आचार्य यमुनाचार्य उनसे मिलना चाहते हैं, तो वे तत्काल श्रीरंगम के लिए रवाना हो गए। उनके साथ पेरिया नम्बि भी थे। दुर्भाग्यवश, जब वे वहाँ पहुँचे, तब तक आचार्य यमुनाचार्य दिव्यधाम पधार चुके थे।

जिस गुरु के चरणों में बैठकर ज्ञान प्राप्त करने का स्वप्न रामानुज ने संजोया था, उनसे मिलना अब सम्भव नहीं था। वे विह्वल होकर उनके पार्थिव शरीर के समीप पहुँचे। तभी उनकी दृष्टि एक विचित्र बात पर गई। आचार्य यमुनाचार्य के दाहिने हाथ की 3 उँगलियाँ मुड़ी हुई थीं।

शिष्यों ने बताया कि आचार्य के मन में 3 अधूरे संकल्प थे। प्रथम संकल्प था ब्रह्मसूत्रों पर विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के अनुरूप एक प्रामाणिक भाष्य की रचना करना। दूसरा संकल्प था नम्मालवार के दिव्यप्रबन्धों का व्यापक प्रचार और तीसरा संकल्प महर्षि पराशर तथा व्यास के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उनकी शिक्षाओं को जन-जन तक पहुँचाना था।

यह सुनते ही रामानुज ने वहीं खड़े होकर प्रतिज्ञा की कि वे इन तीनों संकल्पों को पूर्ण करेंगे। आश्चर्य की बात यह हुई कि प्रत्येक प्रतिज्ञा के साथ आचार्य यमुनाचार्य की एक-एक उँगली स्वतः सीधी होती चली गई। उपस्थित शिष्य यह देखकर स्तब्ध रह गए।

उन्हें अनुभव हुआ मानो आचार्य ने अपनी अधूरी इच्छाएँ अपने योग्य उत्तराधिकारी को सौंप दी हों। उसी क्षण से रामानुज केवल एक प्रतिभाशाली युवक नहीं रहे, वे एक महान उत्तरदायित्व के वाहक बन गए। आचार्य यमुनाचार्य के भौतिक रूप में न होने पर भी उनकी परम्परा जीवित रही।

भारतीय गुरु-शिष्य परम्परा का यह एक अनुपम उदाहरण है कि किसी एक गुरु ने रामानुज को नहीं गढ़ा, बल्कि आचार्य यमुनाचार्य के प्रमुख शिष्यों ने मिलकर उनका निर्माण किया। पेरिया नम्बि ने उन्हें पंचसंस्कार और शरणागति का मार्ग सिखाया।

भारत की आत्मा है गुरु-शिष्य परंपरा
भारत की आत्मा है गुरु-शिष्य परंपरा

तिरुक्कच्चि नम्बि ने निष्काम भक्ति का आदर्श दिया तथा तिरुमलै नम्बि ने रामायण का मर्म और सेवा की भावना सिखाई। अन्य आचार्यों ने उन्हें शास्त्र, साधना और व्यवहार की गहराइयों से परिचित कराया। ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरी परम्परा मिलकर एक ऐसे महापुरुष को तैयार कर रही थी जो आने वाले समय में लाखों लोगों के जीवन को दिशा देने वाला था।

समय व्यतीत होने के साथ एक दिन पेरिया नम्बि ने रामानुज से कहा कि यदि उन्हें श्रीवैष्णव सिद्धान्त के अन्तरतम रहस्यों को जानना है, तो उन्हें थिरुकोष्टियूर जाना होगा। वहाँ आचार्य गोष्ठीपूर्ण निवास करते हैं, जो रहस्यत्रय के महान ज्ञाता हैं।

रहस्यत्रय के अन्तर्गत तिरुमन्त्र, द्वय मन्त्र और चरम श्लोक आते हैं, जिन्हें श्रीवैष्णव साधना का प्राण माना जाता है। रामानुज तत्काल गोष्ठिपुरम की ओर चल पड़े। उस समय आज की भाँति यातायात की सुविधाएँ नहीं थीं। श्रीरंगम से गोष्ठिपुरम तक की यात्रा धूल भरे पथों, तपती धूप और कठिन पदयात्राओं से भरी थी, परन्तु उनके भीतर की ज्ञान की प्यास हर कठिनाई से बड़ी थी।

जब वे पहली बार आचार्य गोष्ठीपूर्ण के द्वार पर पहुँचे, तो भीतर से प्रश्न आया, "कौन है?" रामानुज ने उत्तर दिया, "मैं हूँ रामानुज।" भीतर से उत्तर मिला, "जब मैं मर जाऊँ, तब आना।" द्वार नहीं खुला और रामानुज को रिक्त हाथ लौटना पड़ा। कुछ समय पश्चात वे फिर पहुँचे, मगर पुनः वही प्रश्न और वही उत्तर मिला।

यह क्रम बार-बार दोहराया गया। दूसरी बार, तीसरी बार, यहाँ तक कि 17 बार उन्हें अस्वीकृति का सामना करना पड़ा। कोई सामान्य व्यक्ति होता तो कदाचित हताश होकर प्रयास छोड़ देता, परन्तु रामानुज समझ चुके थे कि यह केवल प्रतीक्षा नहीं, बल्कि एक गम्भीर परीक्षा है।

वे बार-बार गुरु के उस वाक्य पर चिन्तन करते रहे कि "जब मैं मर जाऊँ, तब आना।" धीरे-धीरे उन्हें इसका गूढ़ रहस्य समझ में आया। गुरु अपने शरीर की मृत्यु की बात नहीं कर रहे थे, वे उस 'मैं' की मृत्यु की बात कर रहे थे जो अहंकार और ममत्व से बना होता है।

जब तक साधक के भीतर अहंकार रूपी 'मैं' जीवित है, तब तक वह दिव्य ज्ञान का पात्र नहीं बन सकता। अन्ततः 18वीं बार रामानुज फिर गोष्ठिपुरम पहुँचे। जब भीतर से वही प्रश्न आया, "कौन है?", तो इस बार रामानुज ने सिर झुकाकर कहा, "अडियेन" अर्थात् "आपका दास"। द्वार तुरन्त खुल गया।

आचार्य गोष्ठीपूर्ण ने रामानुज को अपने समीप बैठाया और रहस्यत्रय के गूढ़ अर्थों का उपदेश देना आरम्भ किया। उपदेश से पूर्व उन्होंने एक गम्भीर वचन लिया कि यह ज्ञान अत्यन्त पवित्र है और इसे किसी अयोग्य व्यक्ति को नहीं बताना है। यदि इस रहस्य को प्रकट किया गया, तो घोर दण्ड भुगतना पड़ सकता है।

रामानुज ने विनम्रतापूर्वक वचन दे दिया। दिव्य ज्ञान प्राप्त कर उनका हृदय आनन्द से भर गया, परन्तु शीघ्र ही उनके भीतर एक द्वन्द्व उत्पन्न हुआ। यदि यह ज्ञान जीवों को भगवान तक पहुँचा सकता है, तो इसे कुछ लोगों तक सीमित रखना क्या उचित है? क्या ईश्वर की करुणा पर किसी का एकाधिकार हो सकता है?

अन्ततः रामानुज के भीतर की करुणा ने मौन और भय पर विजय प्राप्त कर ली। एक दिन वे गोष्ठिपुरम मन्दिर के गोपुरम पर चढ़ गए और नगरवासियों को एकत्र होने का सन्देश भेजा। वहाँ किसान, व्यापारी, स्त्रियाँ, बच्चे और विद्वान सभी उत्सुकता से एकत्र हो गए।

रामानुज ने गोपुरम के शिखर से उस महामन्त्र का उद्घोष किया जिसे अब तक गुप्त रखा गया था। जब यह समाचार आचार्य गोष्ठीपूर्ण तक पहुँचा, तो वे क्रोधित होकर वहाँ आए। आचार्य ने कठोर स्वर में पूछा कि क्या उन्हें अपना वचन स्मरण नहीं है और क्या वे जानते हैं कि इसके लिए उन्हें नरक भोगना पड़ सकता है।

रामानुज ने शान्त स्वर में उत्तर दिया, "स्वामी, यदि मेरे अकेले नरक जाने से इतने लोगों को भगवान की कृपा प्राप्त हो सकती है, तो यह मूल्य बहुत छोटा है। मेरा पतन हो जाए, मगर यदि इन सबका कल्याण हो जाए, तो मुझे कोई खेद नहीं होगा।" यह सुनकर आचार्य गोष्ठीपूर्ण की आँखें नम हो उठीं।

रामानुजाचार्य- जनकल्याण ही रहा जिनका सर्वोच्च धर्म
रामानुजाचार्य- जनकल्याण ही रहा जिनका सर्वोच्च धर्म

उन्होंने अपने शिष्य में वह करुणा देखी जो किसी भी शास्त्र और मर्यादा से बड़ी थी। उन्होंने स्वीकार किया कि रामानुज ने ज्ञान को करुणा के साथ जोड़कर मानवता का कल्याण किया है। आज गोष्ठिपुरम का वह गोपुरम उस महान क्रान्ति का साक्षी है, जहाँ से समानता और भक्ति का स्वर गूँजा था।

श्रीनिवासा चारी जी के लेखन में भारत की इस महान भक्ति परम्परा और आधुनिक जीवन के बीच एक जीवन्त सेतु बनाने का जो विनम्र प्रयत्न दिखता है, वह वास्तव में सराहनीय है। उनका कार्य श्रीवैष्णव परम्परा के इन गूढ़ भावों को सहज शब्दों में हम तक पहुँचाता है।

-श्रीनिवास चारी
  हैदराबाद 

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