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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

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अन्तर्मन में विराजमान मेरे राम

अन्तर्मन में विराजमान मेरे राम


क्या हमारा हृदय इतना पवित्र है कि हम उसमें मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम को आसीन कर सकें? डॉ. के.एन. बापट जी का यह आत्मचिन्तन से परिपूर्ण लेख हमें इसी गम्भीर प्रश्न की ओर ले जाता है। प्रस्तुत लेख स्पष्ट करता है कि श्रीराम को केवल मन्दिरों में खोजना पर्याप्त नहीं है, अपितु अपने भीतर के काम, क्रोध, मद और लोभ जैसे अवगुणों का शमन कर उन्हें अपने अन्तःकरण में प्रतिष्ठित करना ही सच्ची रामभक्ति है। माता सीता का निश्छल समर्पण और भरत को दिए गए श्रीराम के तपोमय उपदेश इस निबन्ध को एक दार्शनिक गहराई प्रदान करते हैं। यह लेख हमें यह स्मरण कराता है कि संसार का अन्तिम सत्य केवल राम ही हैं।


प्रायः प्रत्येक भक्त के मन में यह गम्भीर विचार उत्पन्न होता है कि क्या वह राम का है, या राम उसके हैं। भारतीय दर्शन और भक्ति परम्परा के अनुसार भक्तवत्सल भगवान श्रीराम तो सदैव अपने निश्छल भक्तों के हृदय में ही निवास करते हैं। अतः तात्त्विक दृष्टि से देखा जाए, तो मेरे राम मेरे हृदय में ही विराजमान हैं। परन्तु यह आत्मचिन्तन का विषय है कि क्या हमने अपने हृदय को इतना पवित्र और निर्मल बना लिया है कि हम उसमें साक्षात् परब्रह्म श्रीराम को आसीन कर सकें। यह एक अत्यन्त कठिन साधना है।


हनुमान जी के निर्मल हृदय में सीता-राम

मर्यादा पुरुषोत्तम राम तो भक्त की एक पुकार पर तत्काल दौड़े चले आते हैं, किन्तु प्रश्न यह है कि क्या मैं उनके स्वागत के लिए पूर्णतः तैयार हूँ? क्या मैं अपने समस्त अवगुणों, विकारों और अपवित्रताओं से भरी हुई इस मलिन देह में उस परम सत्ता को विराजमान कर सकता हूँ? एक साधारण मनुष्य के रूप में मेरे भीतर अपने इन जन्म-जन्मान्तर के अवगुणों को समूल नष्ट कर पाने की तनिक भी क्षमता नहीं है। ऐसे में मेरी आत्मा की आर्त पुकार केवल यही कह सकती है कि हे प्रभु! “मेरे अवगुण चित न धरौ”।


शबरी की भक्ति और राम की अहेतुकी कृपा

यदि मैं गर्व से यह कहूँ कि राम मेरे हैं, तो मुझे यह भी सोचना होगा कि क्या भगवान राम मुझ जैसे अधम और पामर प्राणी के हृदय में अपना स्थान ग्रहण करेंगे। मुझे इस बात का निरन्तर आत्मचिन्तन करना चाहिए कि मैं किस प्रकार अपने आचरण को शुद्ध कर उस परम पद अर्थात् राम पद को प्राप्त कर सकूँ। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के अयोध्याकाण्ड में उन विशिष्ट गुणों का अत्यन्त सुन्दर वर्णन किया है, जो किसी भी मनुष्य को राम का सच्चा भक्त बनाते हैं।

परोक्ष रूप से गोस्वामी जी यह स्पष्ट सन्देश देना चाहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर ये ईश्वरीय गुण अवश्य होने चाहिए, केवल तभी हम सच्चे अर्थों में राममय हो सकते हैं। गोस्वामी जी ने यह सिद्धान्त स्थापित किया है कि प्रभु अपने भक्तों के हैं और भक्त अपने प्रभु के हैं। “प्रभु भक्तन के भक्त प्रभु के।” तो क्या विनती करते हैं तुलसीदास जी प्रभु राम से? वे कहते हैं-

काम कोह मद मान न मोहा। 
लोभन छोभन राग न द्रोहा॥

जिन्हके कपट दंभ नहिं माया
तिन्हके हृदय बसहु रघुराया॥

अर्थात् हे श्रीराम! आपके पावन मन में काम, क्रोध, मद, मोह, मान, लोभ, क्षोभ, राग, द्वेष, कपट, दम्भ और माया का लेशमात्र भी स्थान नहीं है। स्वभावतः जिन मनुष्यों के भीतर से ये समस्त अवगुण पूर्णतः समाप्त हो चुके हैं, आप केवल उन्हीं के निर्मल हृदय में अपना निवास बनाइए।


गोस्वामी तुलसीदास जी रामचरितमानस सुनाते हुए

इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी पुनः लिखते हैं,

सबके प्रिय सब के हितकारी।
दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी॥

कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी।
जागत सोवत सरन तुम्हारी॥

तुम्हहि छाड़ि गति दूसरी नाही।
राम बसहु तिन्ह के मन माही॥

अर्थात् हे श्रीराम! आप सम्पूर्ण चराचर जगत् के प्रिय हैं और प्राणिमात्र का हित करने वाले हैं। आपकी चाहे कोई कितनी भी बड़ाई करे या निन्दा करे, आप सुख और दुःख दोनों में ही सर्वथा समान भाव रखते हैं। यदि हम पामर मनुष्य इन महान् गुणों को अपने जीवन में थोड़ा भी आत्मसात कर सकें, तो आप अवश्य ही हमारे हृदय में निवास करेंगे। जो मनुष्य जागते और सोते हुए केवल आपकी ही शरण में रहते हैं और जिनके लिए आपके अतिरिक्त जीवन का कोई दूसरा सहारा या गति नहीं है, हे राम! आप उन्हीं के मन में निवास कीजिए।

भगवान श्रीराम मर्यादा की सर्वोच्च पराकाष्ठा हैं। उनके पावन चरित्र में प्रत्येक स्त्री माता के समान पूजनीय है। यदि मनुष्य को एक बार रामरूपी अनमोल धन की प्राप्ति हो जाए, तो इस संसार की अन्य सभी आधिभौतिक धन सम्पत्ति और ऐश्वर्य उसके लिए पूर्णतः अरुचिकर और व्यर्थ हो जाते हैं। हम जैसे साधारण और अधम प्राणी प्रायः दूसरों को फलता-फूलता देखकर गहरी ईर्ष्या से भर उठते हैं और उन पर आई विपत्ति से भीतर-ही-भीतर प्रसन्न होते हैं।

हमें भगवान से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमें इन निकृष्ट दुर्गुणों से उबारें और अपने श्रीचरणों की पावन गोद में हमें विश्राम करने का सुअवसर प्रदान करें। वस्तुतः “हरि अनन्त हरिकथा अनन्ता ।” यदि कोई मनुष्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के चरित्र को थोड़ा भी समझ पाता है, तो उसके निर्मल और निश्छल अन्तर्मन से उत्पन्न होने वाला प्रत्येक सात्त्विक चिन्तन ही अपने आप में एक रामकथा बन जाता है।

महर्षि वाल्मीकि का गहन चिन्तन ही प्रस्फुटित होकर रामायण कहलाया और गोस्वामी तुलसीदास जी का लोकमंगलकारी चिन्तन ही बहती हुई निर्मल धारा बनकर रामचरितमानस के रूप में प्रतिष्ठित हुआ। जहाँ परब्रह्म के साकार रूप और सम्पूर्ण सृष्टि के पालनहार श्रीहरि विष्णु अवतरित होंगे, वहाँ शेषनाग की उपस्थिति तो अनिवार्य होगी ही। अतः जहाँ विष्णु के अवतार श्रीराम होंगे, वहाँ शेषनाग के अवतार लक्ष्मण का होना भी अपरिहार्य है। जिस प्रकार रमापति के साथ सदैव रमा विराजमान रहती हैं, ठीक उसी प्रकार सीतापति श्रीराम के साथ माता सीता का होना भी विधिलिखित और शाश्वत सत्य है।


राजा दशरथ से आशीर्वाद लेकर वनवास जाते श्री राम-सीता-लक्ष्मण

वनवास गमन के समय जब श्रीराम ने माता सीता को अयोध्या के सुरक्षित राजमहल में ही रुकने के लिए सहमत करना चाहा, तब सीता जी ने पतिव्रत धर्म और अगाध प्रेम के जो तर्क प्रस्तुत किए, वे अत्यन्त मार्मिक और प्रेरक हैं। सीता जी ने अत्यन्त दृढ़ता से श्रीराम से निवेदन किया कि जिस कठिन मार्ग पर उनके नाथ के चरण पड़ेंगे, उसी मार्ग पर वे भी सदैव उनकी परछाई बनकर साथ चलेंगी।

उन्होंने स्पष्ट किया कि जब स्वयं भाग्यविधाता उनके साथ हैं, तो उन्हें सघन और भयानक वन से कैसा भय हो सकता है। माता सीता ने श्रीराम को यह विश्वास दिलाया कि उनके सान्निध्य में भयंकर जंगल भी उनके लिए राजमहल से अधिक आनन्ददायक होगा और जिस शिला पर प्रभु विराजमान होंगे, लोग उसी शिला को उनका राजसिंहासन मानेंगे।

जंगल के हिंसक पशुओं और क्रूर निशाचरों का भी उन्हें तनिक भय नहीं था क्योंकि उनके आगे और पीछे दोनों ओर साक्षात् धनुर्धारी राम और लक्ष्मण रक्षक के रूप में उपस्थित रहेंगे। सीता जी ने अपने आत्मसम्मान और सतीत्व का परिचय देते हुए कहा कि बिना अपने प्राणनाथ के वे अयोध्या में रहकर विरह की अग्नि में जलना और बिना कारण दासता स्वीकार करना कदापि उचित नहीं मानतीं।

Lord Rama, Sita, and Lakshmana walking through a forest in exile, traditional Indian art.
माता सीता राम के साथ वन को जाते हुए

उनका यह अखण्ड प्रेम ही था जिसने उन्हें यह कहने का साहस दिया कि वे दोनों शरीर से दो होते हुए भी आत्मा से एक ही हैं और आर्य नारी का सबसे बड़ा धर्म अपने पति के चरणों का अखण्ड पूजन करना ही है। माता सीता के इन अकाट्य तर्कों और निश्छल समर्पण के सम्मुख अन्ततः श्रीराम को अपना निर्णय बदलना पड़ा।

जहाँ एक ओर माता सीता ने अपने असीम प्रेम से श्रीराम को निरुत्तर कर दिया, वहीं दूसरी ओर वनवास के दौरान चित्रकूट में श्रीराम ने अपने लोकोत्तर ज्ञान और राजधर्म से भरत को नतमस्तक कर दिया। जब भरत अपने अग्रज को मनाने के लिए चित्रकूट पहुँचे, तो उस समय श्रीराम ने उन्हें जो तपोमय उपदेश दिया, वह मानव जीवन के लिए एक महान् दार्शनिक सूत्र है।

श्रीराम ने भरत को समझाते हुए कहा कि इस संसार में मनुष्य पूर्णतः पराधीन है और नियति ने यदि किसी के प्रारब्ध में कोई दुःख या कष्ट लिखा है, तो उसमें किसी अन्य व्यक्ति का कोई दोष नहीं होता। उन्होंने अपने वनवास के लिए न तो माता कैकेयी को दोषी माना और न ही पिता दशरथ को, अपितु इसे अपने ही पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का अटल फल बताया।

<img src="ram-pattachitra.jpg" alt="Vibrant Pattachitra painting of Bharat kneeling before Lord Rama, Sita, and Lakshmana.">
चित्रकूट में भरत-श्रीराम प्रसंग

श्रीराम ने जीवन की नश्वरता का गहन बोध कराते हुए भरत को बताया कि इस संसार में किसी भी प्रकार की उन्नति का अन्तिम परिणाम पतन ही है। जो कुछ भी प्राप्त हुआ है, उसका नाश अवश्यम्भावी है और प्रत्येक मिलन का अन्त एक दिन वियोग में ही होता है। जिस प्रकार अनन्त समुद्र में बहते हुए लकड़ी के दो लट्ठे कुछ क्षणों के लिए आपस में मिलते हैं और फिर एक तीव्र लहर उन्हें सदा के लिए अलग कर देती है, उसी प्रकार इस संसार में मनुष्यों का मिलन भी अत्यन्त क्षणिक होता है। श्रीराम ने भरत को आदेश दिया कि वे अपने आँसू पोंछ लें और अयोध्या लौटकर इस प्रकार सुशासन करें कि राज्य के जन-जन का मान बढ़े। 

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में कभी कोई चमत्कार नहीं दिखाया। वे जीवन के हर पग पर मर्यादा और मानवीय आदर्शों की सर्वोच्च प्रतिमूर्ति बने रहे। वस्तुतः उनका यह निष्कलंक और तपोमय चरित्र ही सम्पूर्ण जनमानस को उन्हें साक्षात् अवतार मानने के लिए विवश कर देता है। भगवान श्रीराम का यह पावन प्रभाव आज भी हमारे समाज में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है।

यदि हम दक्षिण कोसल अर्थात् आज के छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति को देखें, तो यहाँ के अधिकांश लोगों के नाम के अन्त में राम जुड़ा हुआ अवश्य मिल जाता है। भोलाराम, तिलकराम, कृपाराम जैसे असंख्य नाम इस बात के जीवन्त प्रमाण हैं कि इस नश्वर संसार का जो एकमात्र अन्तिम और शाश्वत सत्य है, वह केवल राम ही हैं। इसीलिए भक्त का हृदय सदैव यही पुकारता है, जय सिया राम, जय श्रीराम!

- डॉ. के. एन. बापट (लेखक रायपुर के प्रतिष्ठित शास. विज्ञान महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य हैं। वे वरिष्ठ शिक्षाविद् व वैज्ञानिक हैं, जो विज्ञान, ज्योतिष और दर्शन के गहन समन्वय से सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विषयों पर शोधपरक विचार प्रस्तुत करते हैं।)

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