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पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

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दिव्य न्याय की प्रतिमूर्ति-विष्णु का नृसिंह स्वरूप

दिव्य न्याय की प्रतिमूर्ति-विष्णु का नृसिंह स्वरूप


क्या पुराणों में वर्णित विष्णु के अवतार केवल आस्था हैं, या सृष्टि के विकास का कोई संकेत भी छिपाए हुए हैं? मत्स्य से नृसिंह तक की यह यात्रा जीवन के क्रमिक उत्कर्ष की अनोखी झलक देती है। नृसिंहावतार केवल एक कथा नहीं, बल्कि विश्वास, न्याय और अहंकार के अंत का प्रतीक है। इस रहस्य को समझने के लिए यह लेख आपको एक रोचक दृष्टि प्रदान करता है   


पुराण- प्रतिपादत अवतारों में विकास- वाद का क्रम व्याख्यात होता है | धर्म ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि सृष्टि के प्रारम्भ में सर्वत्र जल ही जल था | अत: जगत के विकास में मत्स्य ही प्रथम जीव था जिसने प्राणियों की रचना का प्रतिनिधित्व किया | जल के बाद पर्वतों का उदय प्रारम्भ हुआ जिसका प्रतीक कूर्म-अवतार, समुद्र-मंथन उस विकास का सूचक है| जल से भूमि के उदय में सृष्टि के विकास के तृतीय सोपान का मर्म छिपा है,जो वराहावतार ने सम्पन्न किया| नृसिंहावतार में मानव एवं पशु- दोनों के विकास की कथा छिपी है |

विकासक्रम को दर्शाते भगवन विष्णु के विविध अवतार
विकासक्रम को दर्शाते भगवन विष्णु के विविध अवतार

विष्णु का अवतारवाद भागवत अथवा वैष्णव सम्प्रदाय की एक विशिष्ट देन है | विष्णु के अवतारों के तीन प्रभेद उल्लेखित है – पूर्णावतार, आवेशावतार एवं अंशावतार | विष्णु के अवतारों की संख्या में बड़ा मतभेद है | वराह पुराण में सर्वमान्य रूप से दस अवतारों का उल्लेख है | अग्नि पुराण में भी यही साम्यता है | 1.मत्स्य 2.कूर्म 3.वराह 4 .नृसिंह 5.वामन 6.परशुराम 7.राम 8.कृष्ण 9.बलराम 10.कल्कि |

प्रतिमा विज्ञान के अनुसार नृसिंहावतार की वैष्णव-प्रतिमा की दो प्रधान कोटियाँ है – 1. गिरिज- नृसिंह तथा 2. स्थाणु-नृसिंह | प्राचीन परम्पराओं के अनुसार विष्णु के नृसिंहावतार का उद्देश्य हिरण्यकशिपु का वध और प्रहलाद की रक्षा करना था |हिरण्यकशिपु जब अपने पुत्र भक्त प्रहलाद का वध कराने में किसी प्रकार सफल नही हुआ तब उसने प्रहलाद को मारने का बीड़ा स्वयं उठाया और उसे वज्र श्रृंखलाओं द्वारा जयस्तम्भ से बाँध दिया किन्तु भक्त प्रहलाद द्वारा विष्णु स्तुति करने पर नृसिंह- भगवान प्रकट हुए और दानव का नाश कर पृथ्वी का राज्य प्रहलाद को प्रदान किया |

पुराण,नृसिंह की मूर्तियों में दो तथ्यों पर जोर देते है |1. चतुर्भुज नृसिंह अपनी दो भुजाओं से असुर को विदीर्ण करते हुए तथा पीछे की दो भुजाएं विष्णु के आयुध गदा एवं चक्र धारण किये होती है |2.इन मूर्तियों में नृसिंह को संघर्षरत अवतार के रूप में असुर के साथ दर्शाया जाता है |इस प्रकार की मूर्ति में असुर को खड्ग एवं खेटक हाथ में लिए नृसिंह से युद्ध करते हुए उत्कीर्ण किया जाता है | इनमें प्रथम प्रकार की मूर्ति चन्द्रावती के देवी मन्दिर के बाहर पाषण-खंड पर उत्कीर्ण है | इसमें चतुर्भुज नृसिंह अपनी गोद में हिरण्यकशिपु को लिटाये अपने हाथो के नाखूनों से राक्षस का उदर विदीर्ण करते हुए दर्शाए गये है |

केकड़ी के निकटवर्ती ग्राम बघेरा से नृसिंह प्रतिमा का शिलाखंड प्राप्त हुआ है जो राजपूताना संग्रहालय (अजमेर) में संरक्षित है| जिसमे भगवान नृसिंह ने प्रहलाद को अंक में बैठा रखा है| केकड़ी के ग्राम सावर में भगवान नृसिंह की देवालय में अद्भुत प्रतिमा है| विष्णु अवतार देव नृसिहं भक्त प्रहलाद को अपनी जंघा पर लिए है| प्रहलाद मानो अपने इष्टदेव को पाकर करबद्ध विराजित है| सावर में नृसिंह जयंती पर शोभा यात्रा का आयोजन किया जाता है|

राजपूताना संग्रहालय, अजमेर
राजपूताना संग्रहालय, अजमेर

ब्यावर जिले  के ब्रिटिश कालीन श्री वेंकटेश श्रीरंग जी मन्दिर में नृसिंह संग प्रहलाद की नयनाभिराम वृहद प्रतिमा है | मन्दिर की स्थापत्यकला दक्षिण भारतीय शैली पर आधारित है | विधानानुसार नृसिंहावतार मानव व पशु रूप धारण किये , शीश पर मुकुट ,बड़े नाख़ून अपनी गोद /जंघा (जानू ) पर स्नेह के साथ प्रहलाद को बैठाए हुए है |  बालक प्रहलाद आँखें मूंदे,करबद्ध विनम्र भाव से स्तुति करते प्रतीत हो रहे है |

श्री वेंकटेश श्रीरंग जी मन्दिर, ब्यावर जिला (राजस्थान)
श्री वेंकटेश श्रीरंग जी मन्दिर, ब्यावर जिला (राजस्थान)

नृसिंह जयंती के अवसर पर अजमेर में पारम्परिक रूप से लाल्या- काल्या के मेले का आयोजन एवं सवारी निकाली जाती है | जिसमें काल्या देवरूप एवं नकटी होलिका के स्वरूप माने जाते है, इस मेले में श्रद्धालु काल्या के सोटे को प्रसाद मान कर ग्रहण करते है | भगवान नृसिहं के खम्भे के अवशेष को जनसमुदाय अपने प्रतिष्ठान में रखते है |नृसिंह अवतार भक्त वत्सलता, अटूट विश्वास,अहंकार का अंत,मर्यादा,क्रोध में भी करुणा और दिव्य न्याय का प्रतीक है |

लाल्या- काल्या मेला, अजमेर
लाल्या- काल्या मेला, अजमेर

अवतारवाद की दार्शनिक व्याख्या में भगवद्गीताके श्लोक "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवतिभारत,अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्| परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ,धर्म- संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे का भाव परिलक्षित होता है|"

- श्रीमती पुष्पा शर्मा
   राजस्थान

  प्रमाणीकरण-प्रेषित आलेख पौराणिक कथाओं ,सामुख्य अध्ययन एवं प्रतिमा विज्ञान पर आधारित है | नृसिंह प्रकटोत्सव  के लिए एक प्रयास ।

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