आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | आषाढ़ शुक्ल पंचमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वा फाल्गुनी | योग: वरीयान | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 18 जुलाई 2026

विष्णु का विशिष्ट गण्डभेरुण्ड पक्षी अवतार

विष्णु का विशिष्ट गण्डभेरुण्ड पक्षी अवतार


भारतीय पुराणों में भगवान विष्णु के दश अवतारों की चर्चा सर्वविदित है, किन्तु कुछ ऐसे दिव्य स्वरूप हैं जो सामान्य चर्चा से परे, गहन रहस्यों और शिल्पगत भव्यता से ओतप्रोत हैं। 'गण्डभेरुण्ड' अवतार उन्हीं में से एक है। यह स्वरूप न केवल पौराणिक कथाओं का हिस्सा है, बल्कि दक्षिण भारत की स्थापत्य कला और राजकीय प्रतीकों का गौरवशाली आधार भी रहा है। प्रस्तुत लेख में प्रो. आर. एन. विश्वकर्मा ने नृसिंह अवतार की उग्रता को शांत करने के लिए अवतरित हुए इस अद्वितीय मानव-पक्षी स्वरूप का सूक्ष्म विश्लेषण किया है। यह लेख हमें न केवल धार्मिक दर्शन से जोड़ता है, बल्कि शिल्प और इतिहास की अनकही परतों को भी उद्घाटित करता है।



यदा-यदा हि धर्मस्यग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे-युगे।।

  • भगवदगीता, 4/7/8।

अर्थात् भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन जब-जब इस धरा पर धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं अवतरित होता हूँ। सज्जनों की रक्षा करने, दुष्टों का विनाश करने और धर्म की फिर से स्थापना करने के लिए, मैं हर युग में जन्म लेता हूँ।

ब्राह्मण धर्म के त्रिदेवों (ब्रह्मा-विष्णु-महेश) को प्राकृतिक गुणों (सत-रज-तम) के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को सत, पालनकर्ता विष्णु को रज एवं संहारकर्ता शिव को तमस का प्रतीक माना गया है। पौराणिक युग में त्रिदेवों की मान्यता के पीछे सृष्टि के उद्भव और प्रलय की बातों का विचार किया गया था। देवता से ही स्फुरित होकर जगत, प्रलय काल में उन्हीं में मिल जाता है। विष्णु के अवतारों की संख्या पुराणों (महाभारत,1 हरिवंशपुराण, वायुपुराण,2 अग्निपुराण, भागवतपुराण,3 वराहपुराण एवं मत्स्यपुराण आदि) में भिन्न-भिन्न दी गई है। कालान्तर में सर्वमान्य प्रमुख दश अवतारों यथा- मत्स्य, कूर्म, नरसिंह, वराह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि को कला में प्रायः अंकन हुआ है। विष्णु के दशावतारों में चौथा नरसिंह (नृसिंह) अवतार है। नरसिंह एक स्वतंत्र देवता प्रतीत होता है, जिसकी एकता विष्णु से की गई है। बेबीलोनिया तथा असीरिया में नृसिंह की पूजा प्रचलित थी। वहाँ की मूर्तियों में पूरा शरीर सिंह का और मुख मनुष्य का है। किन्तु भारत में नृसिंह मूर्ति का सिर सिंह का और पूरा शरीर मनुष्य का है। कहा जाता है कि बालि, नृसिंह का उपासक था। गुप्तकाल के बाद वैष्णव धर्म में एक पृथक सम्प्रदाय बन गया था, जिसके मानने वाले अपने को नारसिंह कहते थे।4

विष्णुपुराण में नृसिंह अवतार का वर्णन अत्यन्त संक्षेप में हुआ है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में ऐसा प्रसंग प्राप्त होता है कि हरि ने संकर्षण के अंश से नरसिंह रूप धारण किया।5 नरसिंह अवतार की कथा अनेक पुराणों में मिलती है। भागवत पुराण से ज्ञात होता है हिरण्यकश्यपु ने ब्रह्मा से यह वरदान माँगा था कि वह किसी प्राणी से, आकाश, पृथ्वी आदि कहीं भी, किसी शस्त्र से, दिन अथवा रात में न मारा जाय।6 इस तरह का वरदान प्राप्त कर दुर्दान्त दैत्य हिरण्यकश्यपु, हरि का घोर विरोधी हो गया। किन्तु उसका पुत्र प्रह्लाद हरि (विष्णु) का अनन्य भक्त था। एक दिन क्रोधित होकर हिरण्यकश्यपु ने प्रह्लाद से पूँछा कहाँ है, तेरा हरि? इस पर प्रह्लाद ने उत्तर दिया भगवान सर्वत्र हैं, यहाँ तक कि इस स्तम्भ में भी। इतना सुनते ही हिरण्यकश्यपु ने असि से स्तम्भ पर प्रहार किया, जिसमें से भगवान विष्णु, नृसिंह रूप में दहाड़ते हुए विचित्ररूप में प्रकट हुए। वह रूप न पूर्णतः सिंह का था और न मनुष्य का ही।7 इस नरसिंह रूप में उन्होंने दैत्य को अपनी जंघा पर रख अपने नाखूनों से उसका उदर विदीर्ण कर प्राणान्त कर दिया। तत्पश्चात प्रह्लाद को वरदान देकर अन्तर्ध्यान हो गए।

दक्षिण भारतीय आगम ग्रन्थों में हिरण्यकश्यपु-बध कथानक विस्तारित हुआ है। इन ग्रन्थों में विवर्त है कि हिरण्यकश्यपु का बध करने के बाद नरसिंह की रक्त पिपाशा इतनी बढ़ गई कि वे सम्पूर्ण जगत (देव-दानव) का रक्तपान करने हेतु चल पड़े, ऐसी स्थिति में देवताओं ने भगवान शिव से अपनी रक्षा करने हेतु प्रार्थना किया। तब शिव ने शरभेश रूप धारण कर नरसिंह को फाड़ डाला और उनकी खाल को अपने शरीर पर धारण कर लिया तथा उनके मस्तक को गले में पहन लिया। कामिकागम् के अनुसार शरभ प्रतिमा में कमर के ऊपर का भाग मानव जैसा, मस्तक भाग सिंह के समान तथा आठ पैर, दो पंख और दो निकले हुए दाँत दिखाने चाहिए। वैखानस आगम8 के अनुसार नृसिंह चार भुजा वाले बताये गये हैं, जिसमें से पीछे के दो हाथों में शंख, चक्र धारण किये हुए तथा अन्य दो हाथ घुटनों तक फैले हैं। इस प्रकार की एक प्रतिमा धेनुपुरीश्वर (शरबेश्वर शिवम् मन्दिर), मडमबक्कम, चेन्नई में मिलती है। (देखिए चित्र 1) श्री तत्वनिधि में शरभेश के बत्तीस हाथों का वर्णन किया गया है, जो आयुधों से युक्त होता है। उत्तरकर्णागम में इस प्रतिमा की बड़ी प्रशंसा की गयी है। बनर्जी महोदय ने दारासुरम् के मन्दिर में स्थित शिव की शरभेश प्रतिमा का उल्लेख किया है, जिसमें शरभेश के द्वारा नृसिंह को फाड़ने का दृश्य प्रदर्शित किया गया है।9 तंजोर जिले के त्रिभुवन के शिवमन्दिर में स्थित ताम्र निर्मित शरभेश प्रतिमा द्रष्टव्य है।

नैगम ग्रन्थों की अपेक्षा आगम ग्रन्थों में हिरण्यकश्यपु-बध कथानक और आगे बढ़ता है, जिसमें वर्णित है कि नरसिंह का बध करने के पश्चात् नरसिंह के क्रोध के अनुरूप शरभेश का क्रोध भी शान्त नहीं हुआ और वह सम्पूर्ण जगत के सभी जीवों का रक्तपान करने हेतु निकल पड़े, ऐसी स्थिति में देवताओं ने क्षीरसागर में शयन कर रहे भगवान शेषशायी विष्णु से अपनी रक्षा करने हेतु प्रार्थना किया। तब भगवान विष्णु ने गण्डभेरुण्ड नामक शक्तिशाली मानव-पक्षी का रूप धारण कर शरभेश का क्रोध शान्त किया और शरभेश को अपनी चोंच में दबा कर आकाश में उड़ गये। यह भी कथानक मिलता है कि गण्डभेरुण्ड और शरभ के बीच भयानक युद्ध हुआ, जिससे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में भय फैल गया। अन्त में आदिशक्ति प्रत्यंगिरा रूप ग्रहण करके उनके युद्ध को रोका। ध्यातव्य हो कि प्रत्यंगिरा एक शक्तिशाली हिन्दू देवी हैं, जिन्हें भगवान शिव ने हिरण्यकश्यपु के बध के बाद उग्र नरसिंह के क्रोध को शान्त करने के लिए प्रकट किया था। इस देवी का सिर सिंह का और शरीर स्त्री का होता है (नारसिंही), जो पुरुषत्व और स्त्रीत्व (शिव-शक्ति) के सन्तुलन को दर्शाता है। यह देवी शत्रुओं, काले जादू और नकारात्मक शक्तियों से रक्षा करने वाली, अथर्ववेद की अधिष्ठात्री, उग्र और परम रक्षक मानी जाती हैं, जिन्हें अथर्वन, भद्रकाली, निकुम्भला भी कहते हैं।

गण्डभेरुण्ड दो मुखी पौराणिक दैवीय पक्षी है, जिसका उल्लेख सनातन धर्म में पाया जाता है। गण्डभेरुण्ड की प्रतिमाएं कर्नाटक के विभिन्न मन्दिरों और संग्रहालयों में देखी जा सकती हैं। भारतीय शिल्पकला में गण्डभेरुण्ड को कभी-कभी उसका पूरा शरीर मनुष्य का तथा शिर दो मुखी गरुड़ पक्षी के सदृश्य होता है, जो अपने चोंचों में कभी मानवाकृति तथा कभी हाथी अथवा सिंह दबोचे हुए अंकित किये गये हैं। इस प्रकार की सबसे प्राचीन प्रतिमा कर्नाटक के शिमोगा जिले में शिकरिपुर नगर के बल्लीगेव नामक स्थान में चालुक्य कालीन (1047 ई.) श्री बरुण्डेश्वर शिवमन्दिर में देखी जा सकती है (देखिए चित्र 2)। कभी-कभी इसका अंकन षड्भुजी मनुष्य के रूप में किया गया है, जिसमें मुख्य मुख मानव का तथा उसके अगल-बगल पक्षी के मुखों को दिखाया जाता है। वे दो हाथों से शरभ को अपने कन्धे पर लिए हुए उकेरे गये हैं। उनके अन्य हाथों में विभिन्न प्रकार के आयुध प्रदर्शित होते हैं। इस प्रकार की एक प्रतिमा महाराष्ट्र में अम्बाजोगई के बाराखम्बी मन्दिर में प्राप्त होती है। (देखिए चित्र 3)। चेन्नाकेशव मन्दिर, बेलूर (कर्नाटक) में भी गण्डभेरुण्ड को एक जटिल नक्काशीदार मूर्तिकला के रूप में दर्शाया गया है। प्रायः इसका अंकन शिल्प एवं चित्रों में दो मुखी बिशाल पक्षी के रूप में भी मिलता है, जहाँ वह अपने चोंचों में सिंह और पंजों में हाथियों को पकड़े हुए दिखाये गये हैं। ऐसा ही एक अंकन रामेश्वरम मन्दिर, केलाडी, जिला शिमोगा, कर्नाटक में मिलता है। (देखिए चित्र 4)

विजय नगर साम्राज्य के प्रारम्भिक सिक्कों में इसकी नक्काशी मिलती है। दक्षिण के कई राज्यों यथा- विजय नगर, मैसूर, चालुक्य और कदम्बों ने इस प्रतीक का प्रयोग राज्य चिह्न के रूप में किया था। मैसूर पैलेस में इसे आज भी देखा जा सकता है। आज भी कर्नाटक के राज्य चिह्न के रूप में प्रयुक्त होता है। इस प्रकार दक्षिण भारत के अनेक शैवमन्दिरों की मूर्तियों एवं चित्रों में इसका अंकन प्रायः मिलता है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची:

  1. महाभारत, 12/349/37; वही, 12/ 389/77-90; वही, 12/369/104।
  2. वायु पुराण, 98/71।
  3. भागवत पुराण, 1/3/ 6-22।
  4. व्रजभूषण श्रीवास्तव, प्राचीन भारतीय प्रतिमा-विज्ञान एवं मूर्ति-कला, पृ. 37।
  5. हरिः संकर्षणांशेन नरसिंहवपुर्धरः। - विष्णु धर्मोत्तर पुराण, 78/7।
  6. यदि दास्यस्यमितानवरान् मे वरदोत्तम। भूतेभ्यस्त्वद्विसृष्टेभ्यो मृत्युर्माभून्ममप्रभो।। नान्तर्बहिर्दिवा नक्तमन्यस्मादपिचायुधैः। न भूमौ नाम्बरे मृत्युर्न नरैर्नमृगैरपि।। - श्रीमद्भागवत, 7/3/35-37।
     
  7. मीमांसमानस्यसमुत्थितोऽग्रतो नृसिंहरूप स्तदलंभयानवान्। प्रतप्त चामीकरचण्डलोचनं स्फुरत्सटाकेसरजृम्भिताननम्।।
    करालदंष्ट्रंकरवालचञ्चल- क्षुरान्तजिह्वं भ्रकुटीमुखोल्बणम्। स्तब्धोर्ध्वकर्णंगिरिकन्दराद्भुत, व्यातास्यनासंहनुभेदभीषणम्।।
    दिविस्पृशत्कायमदीर्घपीवर ग्रीवोरुवक्षःस्थलमल्पमध्यमम्। चन्द्रांशुगौरेच्छुरितंतनूरहै- विष्वग्भुजानीकशतं नखायुधम्।।
    - श्रीमद्भागवत, 7/8/20-22।

     
  8. वैखानस आगम, 42।
  9. The development of Hindu Iconography, p. 788, xxxiv, Fig. 2.
     

-प्रो. (डॉ.) आर. एन. विश्वकर्मा

 

Follow us on social media and share!