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कृष्ण का विश्वरूप: माध्यम -चित्रकला

कृष्ण का विश्वरूप: माध्यम -चित्रकला

'भारतीय  चित्रकला में विश्वरूप' विषय पर मैंने बरसों पहले सामग्री एकत्रित करना आरंभ किया था क्योंकि मैं गीता में अर्जुन द्वारा विश्वरूप दर्शन की परिकल्पना और इसके इतिहास को समझना चाहती थी। इतने बरसों में इस विषय पर मैंने जो शोध किया है और जो अद्भुत सामग्री एकत्रित की है उसकी एक झलक आपको इस लेख में मिलेगी।


चित्रकला के माध्यम से निरूपति कृष्ण का विश्वरूप

'विश्वरूप' विशेषतः भगवान के उस रूप को इंगित करता है जब कृष्ण के रूप में भगवान का अवतार हुआ। 'विश्वरूप' का अर्थ है 'भगवान का वह रूप जिसमें सारा ब्रह्माण्ड समाया है।' इस रूप के कुछ तत्व, एकरूप और बहुरूप की 'प्रजापति' और 'पुरुष' जैसी प्राचीन भारतीय संकल्पनाओं में देखे जा सकते हैं। '

'विश्वपुरुष' का प्राचीनतम उल्लेख ऋग्वेद के 'पुरुषसूक्त' (1000 ईसा पूर्व) में मिलता है और विश्व का संपूर्ण चित्रण पूरे गौरव के साथ गीता के अध्याय X और XI (400 ई.) में विद्यमान है।

कृष्ण को, त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) में विष्णु का अवतार माना गया है। महाभारत की कथा में, कुरुक्षेत्र के युद्ध में जब कौरव और पाण्डव एक-दूसरे के सामने होते हैं, उस समय अर्जुन के सखा और सारथी, श्रीकृष्ण अवसाद में डूबे अर्जुन को इस रूप का दर्शन कराते हैं। अर्जुन अपने निकट संबंधियों के साथ युद्ध नहीं करना चाहता और इस बात का चिंतन करता है कि हम भौतिक प्रलोभनों के लिए एक-दूसरे से क्यों लड़ें जबकि सब कुछ एक दिन नष्ट हो जाना है।

ऐसे मार्मिक दृश्य में, महाभारत का रचयिता कथा में तत्व का ज्ञान कराने वाली 'भगवद्गीता (भगवान् कृष्ण का गीतोपदेश) का समावेश कर देता है। युद्ध के उमड़ते बादलों के बीच जब भाई-भाई की जान का दुश्मन बना खड़ा है ठीक उस समय पाठक अकस्मात तत्वज्ञान के शान्त और गहरे सागर में उतर जाता है।


विश्वरूप, राजस्थान, 19वीं शती, साराभाई फाउंडेशन, अहमदाबाद

गीता की रचना अर्जुन और कृष्ण के बीच एक संवाद के रूप में की गई है। रणभूमि में इसका चित्रांकन मात्र एक भौतिक स्थल की ओर ही संकेत नहीं करता, अपितु यह एक मनोस्थिति का भी सूचक है। हम देखते हैं शिथिल, संदेही और हतोत्साहित अर्जुन जिसने अपना धनुष, 'गांडीव' एक ओर फेंक दिया है और जो युद्ध करने के अपने कर्तव्य को स्वीकारने में स्वयं को असमर्थ पाता है।

इस बिंदु पर अर्जुन को दिए गए कृष्ण के उपदेश ही गीता का मूल विषय है। जब परमाणु बम के जनक, विलियम ओपनहीमर ने हिरोशिमा और नागासाकी पर की गई बम वर्षा की तस्वीरें देखीं, तो उन्होंने इसकी तुलना गीता, विशेषतः अध्याय 11, श्लोक 12 में विश्वरूप को चित्रित करने वाले बिम्बों से की 'यदि सहस्त्रों सूर्य आकाश में एक समय उदित हों तो उनका एकीभूत आलोक उस महान् आत्मा के तेज के समान होगा।' (बार्बरा स्लेपर मिलर द्वारा रचित 'भगवद्‌गीता एक अनुवाद से उद्धृत, श्लोक 12, 11वां अध्याय)

देवत्व की सर्वशक्तिमत्ता एक ऐसी संकल्पना है जो अधिकांश संस्कृतियों में समान रूप से विद्यमान है और अनेक धार्मिक परंपराओं में परिलक्षित होती है। गीता की विषय-वस्तु लाखों हृदयों में प्रतिष्ठापित है, तथा यह विश्व-साहित्य की सर्वश्रेष्ठ निधियों में से एक है। आसक्ति अथवा फल की इच्छा से निरपेक्ष रहकर, कर्तव्य के प्रति निष्ठा के इसके सिद्धांत ने धनी और निर्धन, ज्ञानी और अज्ञानी, सभी को जीने की एक राह दिखाई है।

यह जीवन के गहनतम और मूलभूत प्रश्नों का उत्तर प्रस्तुत करती है। अध्याय 11 विश्वरूप दर्शन की उस प्रक्रिया को उद्घाटित और परिलक्षित करता है जिसमें अर्जुन, संपूर्ण ब्रह्माण्ड को कृष्ण रूप के चारों ओर सिमटा हुआ देखता है। कृष्ण, अर्जुन को दिव्य चक्षुओं से उपकृत करते हैं ताकि अर्जुन उनके असीम ईश्वरीय स्वरूप को देखने में समर्थ हों। अर्जुन प्रभावोत्पादक तेजोमय विराट स्वरूप को देखता है

एक सर्वव्यापी दिव्य पुरुष के अंश के रूप में भूत, वर्तमान और भविष्य के एक साथ दर्शन करता है। वह ब्रह्माण्ड में व्याप्त चराचर जगत का, उसकी उत्पत्ति से वर्तमान तक और तत्पश्चात् भविष्य में होने वाले अस्तित्व का दर्शन वहीं उस देह में करता है।


विश्वरूप, राजस्थान,  दीवार पर फ्रेस्को पेंटिंग, जयपुर.

अर्जुन, 'विश्वरूप' में सभी देवों तथा अनेक प्राणियों के दर्शन करता है। कृष्ण का यह अद्भुत दर्शन, बहुरूपी - शरीर में अनगिनत मुख, नेत्र, दिव्य आभूषण और दिव्य शस्त्र धारण किए हुए है और यह ऐसा सर्वव्यापी, असीम रूप है जिसका कोई अंत, कोई मध्य एवं कोई प्रारंभनहीं। अर्जुन सब ओर से दीप्त अग्नि के एक ऐसे पुंज का अवलोकन करता है जिसमें सभी प्राणी निःस्सहाय रूप से काल के ग्रास बन रहे हैं।

यह कृष्ण का काल-स्वरूप है। इस संवाद के अंत में, कृष्ण, अर्जुन को विराट रूप दिखाता है कि वह तो केवल पूर्व निश्चित कर्म फल पाने का निमित्त मात्र है। अर्जुन को आत्मिक बल की अनुभूति होती है और वह धर्म के मार्ग पर चलने के लिए अपना गांडीव उठा लेता है।

"भारतीय बहुत पहले से जानते थे कि जैविक मानव के सीमित 'लघु ब्रह्माण्ड' का, अस्तित्व के कई स्तरों पर 'वृहत् ब्रह्माण्ड' से संबंध होता है। इस अवधारणा से इस विश्वास को बल मिलता है कि 'मानव शरीर ब्रह्माण्ड की प्रतिकृति है', अर्थात् 'यत ब्रह्माण्डे तत् पिंडे'

यह उल्लेखनीय है कि 'विश्वरूप' का यह चित्रण वेदों में सर्वरूप के चित्रण से बहुत भिन्न नहीं है। वस्तुतः, यह स्वरूप इसे सीधे ऋग्वेद में उल्लिखित ब्रह्म पुरुष (10.90.1) और भगवान् विश्वकर्मा (10.82.3.5) परम शिल्पी के चित्रणों से जोड़ता है। कृष्ण के अत्यंत प्रिय केवल अर्जुन को ही संपूर्ण विश्वरूप के दर्शन का सौभाग्य मिला है। यह दृश्य गलती से संजय भी देख लेता है जो दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को युद्ध स्थल की घटनाओं का वृतांत सुनाता रहता है।

अर्जुन, कृष्ण के इस तेजोमय, अनन्त, अनादि, अद्भुत सर्वरूप से विस्मित हो उठता है और कृष्ण को अपने सौम्य रूप में आने का आग्रह करता है। इस विषय से संबंधित कला-चित्र दर्शकों को स्तंभित और व्याकुल कर देते हैं परंतु साथ ही उसके मन को शान्त करते हुए कहते हैं कि विश्वरूप का यही यथार्थ है। मैं इस विषय पर लगभग 50 कला-चित्र एकत्र कर पाई हूं। ये चित्र कागज, कपड़े और कैनवास पर, पाण्डुलिपियों में बनाए गए हैं । इनमें से कुछ भित्तिचित्र भी हैं।                                                                                          


विश्वरूप, श्रीमद् भागवतगीता केश्विरी; राज्य संग्रहालय, लखनऊ 

इन्हें देश-विदेशों से पुस्तकों, पाण्डुलिपियों, सूचीपत्रों, प्रकाशनों, संग्रहालयों, कलावीथियों, पुस्तकालयों, निजी संग्रहों तथा भित्तिचित्रों से लिया गया है। (पावन दृश्यों तथा तत्वज्ञान के ग्रंथों, जिनकी हम प्रतिदिन पूजा करते है, गहराई से जुड़े इन कला-चित्रों की व्याख्या करना दुष्कर है)। इन्हें समझने के लिए विश्वरूप की संकल्पना के उद्गम् इतिहास और विकास से संबंधित दर्शनशास्त्र, धर्म, इतिहास, पौराणिकता तथा प्रतिमाविज्ञान के अन्तसंबंधों की समझ तथा अध्ययन की आवश्यकता है।

इस लेख के साथ चार कला-चित्र हैं। इस विषय पर लगभग सौ कला-चित्र मौजूद है. ये कला-चित्र पूरे विश्व में छितरे पड़े हैं। इनमें बुनियादी समानताएं होते हुए भी प्रत्येक कला-चित्र अपने आप में अलग है। इन कला-चित्रों में निःसंदेह श्यामवर्ण वाले भगवान श्रीकृष्ण को प्रमुखता दी गई है। तथापि, श्री कृष्ण की विशाल छवि के भीतर, बाहर और चारों ओर दर्शाई गई वस्तुएं अत्यंत चित्ताकर्षक हैं।

कलाकारों ने अपनी-अपनी कल्पनाशक्ति के अनुसार अभिनव चित्रण किए हैं। कुल मिलाकर प्रत्येक चित्रकार इस पवित्र जगत, उसके पदानुक्रम का अपने-अपने ढंग से चित्रण करता है और सर्वव्यापिता की अवधारणा को प्रस्तुत करने के प्रयास में अपनी अलग छाप छोड़ता है।“'विश्वरूप' की विचारधारा का मूल वह भारतीय दार्शनिक परंपरा और विश्व विचार है जो यह मानता है कि प्रत्येक पदार्थ की अपनी एक जैव सत्ता होती है, जिसमें जीवन के प्रत्येक आयाम को अन्य बातों के साथ उसकी अंतः संबद्धता और अंतःनिर्भरता के परिप्रेक्ष्य में श्रेष्ठ माना जाता है।“

इन कला-चित्रों में भगवान् श्रीकृष्ण को सामान्यतया आभूषणों से सुसज्जित चित्रित किया गया है, साथ ही. कई भगवानों विशेष रूप से त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु और महेश), गोपियों के महारास नृत्य, श्रीकृष्ण के महावतार रूप और बाल रूपों को दर्शाया गया है। किन्हीं चित्रों में दिखाया गया है कि महाकाल, अपने विशाल और रुधिरावृत मुख से असंख्य मानवों को अपना ग्रास बना रहे हैं. जबकि उनके कुछ हाथ मानव-मुंडों को उनके केशों से पकड़े हुए है, जबकि कुछ हाथों में युद्ध के असंख्य शस्त्र दिखाए गए हैं।

कुछ कला-चित्रों में विश्व के भूत और वर्तमान, इस समय विद्यमान तथा भविष्य में आने वाली प्रजातियों, स्वर्ग लोक और अधोलोक को दर्शाया गया है। इन कला-चित्रों में अक्सर आमने-सामने खड़ी सेनाएं दिखाई जाती हैं और अर्जुन को श्रीकृष्ण द्वारा चलाए जा रहे रथ में बैठे हुए अथवा श्रीकृष्ण के सामने विस्मयाकुल मुद्रा में हाथ जोड़कर खड़े हुए दर्शाया जाता है। मैं यह बताना चाहती हूं कि 'विश्वरूप' की विचारधारा का मूल वह भारतीय दार्शनिक परंपरा और विश्व विचार है जो यह मानता है कि प्रत्येक पदार्थ की अपनी एक जैव सत्ता होती है, जिसमें जीवन के प्रत्येक आयाम को अन्य बातों के साथ उसकी अंतःसंबद्धता और अंतःनिर्भरता के परिप्रेक्ष्य में श्रेष्ठ माना जाता है।

यह विचार-धारा मानव शरीर को एक जैव तथा आत्मिक सत्ता मानती है। इस संस्कृति के भीतर, शरीर में परलोक के साथ संबंध स्थापित करने और वर्तमान, भूत और भविष्य काल में स्वयं के साक्षात्कार हेतु प्रणालियों का विकास करने की क्षमता विद्यमान है। यदि हम सरसरी तौर पर भी विवेचन करें तो यह पता चलता है कि भारतीय बहुत पहले से जानते थे कि जैविक मानव के सीमित 'लघु ब्रह्माण्ड' का, अस्तित्व के कई स्तरों पर 'वृहत् ब्रह्माण्ड' से संबंध होता है। इस अवधारणा से इस विश्वास को बल मिलता है कि 'मानव शरीर ब्रह्माण्ड की प्रतिकृति है, अर्थात् 'यत ब्रह्माण्डे तत् पिंडे' ।

लेख-
नीना रंजन, आई.ए.एस.
संस्कृति अंक-11

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