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पर्व विशेष : | तदनुसार 21 अप्रैल 2026

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भारतीय चिंतन में अवतारवाद

भारतीय चिंतन में अवतारवाद

स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'सत्यार्थप्रकाश' में माना है कि भगवान के अवतार नहीं होते तथापि पौराणिक ग्रंथों में प्रपादित अवतारों का वर्णन मानव सृष्टि के क्रमिक विकास की वैज्ञानिकता को निरूपित करता है। निराकार से साकार और सजीव रूप में आने के लिए पंचतत्वों का मेल (संयुक्त होना) चाहिए। पंचतत्वों में से एक-एक तत्त्व क्रमवार सृष्ट होता गया तो उनमें से प्रांरभ के तीन तत्व अर्थात् आकाश (गगन), समीर (वायु), पावक (तेज या अग्नि) सूक्ष्म रूप हैं जिन्हें हम प्रत्यक्ष नहीं देख सकते हैं इसलिए लौकिक अर्थ में उसे गौण मानते हैं।

स्थूल सृष्टि में सर्वप्रथम जल तत्व है जिसमें सर्वप्रथम जीव की उत्पत्ति (विकास) हुई। आधुनिक भौगोलिक विज्ञान में भी हम यही पाते हैं कि सूर्य (अग्निपिण्ड) से अलग हुआ भाप का गोला धीरे-धीरे ठण्डा हुआ और सर्वप्रथम जल बना इसलिए ईश्वर की प्रथम स्थूल सृष्टि (निर्माण या रचना) जल हुई। जब जल के सिवाय और कुछ नहीं है तो भगवान का पहला अवतार (पौराणिक दृष्टिकोण से) तो वैसा ही होगा जो जल में रहने लायक जीव हो और इसका प्रतीक (पुराण अनुसार) है मत्स्य (मछली)।

यूं मछली के अलावा सृष्ट जीव (अमीबा वगैरह आधुनिक शोध से पहले से जल में उपस्थित होगा तथापि मानव के लिए सहज दृश्य और अधिक परिचित मत्स्य होने से भगवान का पहला अवतार मत्स्य (मछली) माना गया। कुछ ऐसी सूक्ष्म वनस्पतियां भी हुई जो जल के अनुरूप पोषित हो सकें और जलचरों के कान आये।

उसके बाद जल की शीतलता से जल में घुली वायु , धूलकण (मिट्टी, धातु) इत्यादि धीरे-धीरे घनीभूत होकर मिट्टी (पृथ्वी) के रूप में उभरा तो कुछ इस प्रकार का जीव सृष्ट होना चाहिए जो पहले से रचित जल में अधिक रह सके और मि‌ट्टी पर कम। इसका प्रतीक कच्छप (कूर्म) है। अतः भगवान का दूसरा अवतार कच्छप अर्थात् कछुआ माना गया।

पृथ्वी ने जब घनीभूत होकर अधिक (बड़ा) आकार ग्रहण किया और जल सतह से ऊपर हुआ  तब इस प्रकार का जीव उत्पन्न (विकसित) हुआ जो अब पृथ्वी (मिट्टी या थल) पर ज्यादा रह सके और जल में कम। इस प्रकार का गुण वराह (शूकर) में है। अतः वराह सृष्टि क्रम में उस युग का प्रतीक है जब पृथ्वी जल सतह के ऊपर आई और इसीलिए वराह द्वारा पृथ्वी को समुद्र (जल सतह) से ऊपर निकालते हुए बताया जाता है। इस प्रकार भगवान का तीसरा अवतार वराह निरूपित किया गया।

जब पृथ्वी जल सतह से ऊपर आई तब पृथ्वी पर उत्पन्न जीवों के आहार और विहार (निवास तथा ठहराव) के लिए पृथ्वी पर पोषित होने योग्य वनस्पतियां भी हुई। वनस्पतियों के पोषक तत्व पोटेशियम, कैल्शियम, नाइट्रोजन, फास्फोरस, मैग्नेशियम, सल्फर आदि हैं। वनस्पतियों को ये तत्व जहां कहीं प्राप्त होंगे, वहीं वे उग आयेंगे।

अभी मनुष्य रूप में अवतार (जीव सृष्टि का विकास) नहीं हुआ है। अब आगे देखिये।

वनस्पतियां धीरे-धीरे अधिक मात्रा में हुई और पृथ्वी पर फैली तो जंगल का रूप हुआ। चौथा अवतार वराह के आगे का क्रम है, कुछ इस प्रकार का कि वह जंगल में रहने वाले पशु रूप भी है और मनुष्य रूप भी अर्थात् दोनों का मिला हुआ आधा मनुष्य आधा पशु (जानवर) और यह प्रतीक  'नरसिंह' के रूप में है। अतः भगवान का चौथा अवतार 'नरसिंह' हुआ। यानी समाजशास्त्रियों के मंतव्य और पुरातत्व विज्ञान से यह उस युग का प्रतिनिधित्व करता है जब मनुष्य अपनी आदिम अवस्था में है और वह पशु (जानवर) के समान व्यवहार करता है। इसीलिए उसका (नृसिंह का) दिल-दिमाग, मस्तिष्क यानी शरीर का ऊपरी हिस्सा (बनावट में) सिंह (जंगली व्यवहार) के जैसा है।

पृथ्वी का ज्यादा उभरा भाग पर्वत हुआ। दो जगह के उभरे भाग (पर्वतों) के बीच बहने वाले जल ने नदी का रूप लिया और वनस्पतियां (पेड़-पौधे) तो थीं ही। पृथ्वी पर हुए इस रचना के अनुकूल आदि मानव हुआ। समाजशास्त्र, पुरातत्व विज्ञान के अनुसार आदि मानव सभ्य नहीं थे। वे जंगलों और पर्वत की गुफाओं में रहते थे। पत्थरों से पशुओं को मारा करते थे- अपनी रक्षा के लिए, आहार के लिए नहीं, क्योंकि वनस्पतियों से फल-फूल प्राप्त करना अधिक आसान था अपेक्षा इसके कि वह पशुओं को मारने के झंझट में पढ़ें।

अतः प्रारंभ में मानव शाकाहारी ही था बाद में मारे गये पशुओं को खाने लगा। वे पशु-पालन अथवा खेती नहीं जानते थे यानी सभ्यता के दृष्टिकोण से वह बिल्कुल अविकसित मानव था और जिसका सही ढंग से विकास नहीं हुआ हो वह बौना (ठिगने कद का) कहलाता है। इससे यह नहीं समझना चाहिए कि उस समय मनुष्य अथवा उनका प्रतीक-'वामन', सचमुच में शरीर की बनावट से बौना था।

मूर्तियों और चित्रों के माध्यम से सिर्फ उनका बौनापन प्रकट किया जाता है- यह प्रकट करने के लिए कि उस समय के मनुष्य विद्या, संस्कृति और सभ्यता के विषय में ज्यादा उन्नत नहीं थे। वे अविकसित थे और उस युग का प्रतीक है वामन अवतार बौना को वामन कहते हैं। इस प्रकार भगवान का पाँचवां अवतार- वामन अवतार हुआ।

लेकिन एक तथ्य स्वीकार करना होगा कि उस अविकास की अवस्था में भी आपस में एक-दूसरे की बात को समझने के लिए भाषा (शब्द) संकेत अवश्य रहा है क्योंकि आदि मानव भले ही हों, शारीरिक रचना में उनके कान भी तो थे। माना मुंह का काम भोजन करने का है, पैर का काम चलने का है, लेकिन कान का काम तो सुनने का है- प्रकृति की तरफ से आती (उत्पन्न हुई) ध्वनि को, साथ ही साथ मानवों के मुंह से निकली हुई आवाजों को (जिसे) सुनकर आपस में तालमेल बनाए रखने के लिए। अतः भाषा प्रारंभ से ईश्वर की तरफ से मानवों के बीच एक-दूसरे को समझने का माध्यम रहा है। इसका रूप अभी के रूप से भिन्न, चाहे जैसा रहा हो।

धीरे-धीरे मनुष्य सभ्यता की दौड़ में आगे बढ़ता गया। लकड़ी में पत्थर फंसा कर कुल्हाड़ीनुमा औजार बनाने लगा-पशुओं को मारने व अन्य काम के लिए। इसीलिए वामन अवतार के बाद मनुष्य, जरा मनुष्य रूप में व्यवहार करने लगा तो प्रथम उसके हाथ में कुल्हाड़ी (परशु) ही था। बाद में भाला, तीर-कमान भी चलाना सीखा। पशु-पालन, खेती भी सीख लिया। आग तो प्राकृतिक थी लेकिन मनुष्य उस पर नियंत्रण पा गया।

फिर भी इस युग की सभ्यता के पूर्व का आचरण तो बना हुआ था, वह इतनी जल्दी कैसे दूर होता। जरा जरा सी बात पर एक-दूसरे से लड़ जाना, क्रोधी स्वभाव का होना, जरा सी बात पर भड़क उठना, क्रूरता आदि और इस युग में इन सब गुणों को लिए हुए सोचें तो परशुराम इस युग के प्रतीक हैं जो कुल्हाड़ी (परशु) धारण किये हुए हैं और बात-बात पर भड़कने वाले क्रोधी स्वभाव के हैं। अतः भगवान विष्णु का छठा अवतार 'परशुराम' है।

अब तक मनुष्य पूर्ण विकसित हो गया। यह आदिमानव (अविकसित वामन) के रूप में ही रहा। बहुत ही सभ्य हो गया। परिवार, समाज और सामाजिक मर्यादाओं की स्थापना हुई। मनुष्य समाज में रहकर परिवार और समाज के नियमों में बंध गये और मनुष्य पूर्ण रूप से मनुष्य जैसा जीवन जीने लगा जैसा ईश्वर ने अपनी सृष्टि में एक पूर्ण मनुष्य की कल्पना की होगी और इस युग के प्रतीक हैं-'राम'।

'राम' उस युग के पूर्ण मानव के प्रतीक हैं। ब्रह्म की सृष्टि में, मानव के रूप में, यह अवतार हर तरह से पूर्णता प्राप्त किये हुए हैं। इसलिए राम ऐसे प्रथम व्यक्ति हुए जिन्हें पूर्ण ब्रह्म कहा जाता है अथवा जो ब्रह्म की पूर्ण सृष्टि में रम रहे हैं या रमण करते हैं, वे 'राम' हैं। इसलिए भारत की सभ्यता और संस्कृति के कण-कण में राम समाये हुए हैं। भारतीय जीवन के आधार है 'राम' हैं। भारतीय जन राम को इसीलिए इतना महत्व देते हैं कि इस युग तक में मनुष्य में अपनी पूर्णता को प्राप्त कर लिया। अतः उस युग के प्रतीक भगवान 'राम' के सातवें अवतार हैं।

वर्तमान में उपलब्ध अनेक विख्यात कवियों जैसे बाल्मीकि, तुलसीदास, कालिदास, कृतिवास आदि रचित रामायणों के आधार पर यहां कुछ लोगों को शंका होती है कि क्या ये युग प्रतीक राम वहीं हैं जो दशरथ पुत्र राम हैं क्योंकि अगर राम सामाजिक मर्यादा की स्थापना करने वाले हैं तो अंत में, अपने जीवन में हर तरह से नियमों का अनुशीलन करनेवाली अपनी पत्नी सीता का परित्याग कर समाज की नजरों में कलंकित जैसे क्यों लगते हैं?

लेकिन गहराई से सोचने पर शंका मिट जाएगी क्योंकि उन्हें मर्यादा की स्थापना और रक्षा करने वाला कहा गया है। जब किसी गुरू के शिष्य के रूप में उनका व्यवहार बताना रहा तो उनका आचरण और मर्यादा शिष्य के रूप में रही। उसी तरह पुत्र के रूप में, पति के रूप में, वनवासी तपस्वी के रूप में, प्रजापालक के रूप में, शत्रुहन्ता और ऋषि रक्षक के रूप में किसी नरश्रेष्ठ का क्या व्यवहार और आचरण होना चाहिए वह उन्होंने प्रतिपादित करके बताया।

उसी तरह से एक राजा को कैसा होना चाहिए-एक राजा यानी राज्याधिकारी को अपना एकाकी जीवन और अपने साथ जुड़े चन्द पारिवारिक सदस्यों की अपेक्षा पूरे जनसमूह का ध्यान रखकर पूरे जनसमूह के लिए संतोषप्रद, कल्याणकारी कार्य करना ही एक आदर्श राजा का कर्तव्य और मर्यादा है और ऐसी बात नहीं कि पति के रूप में स्वयं राम को सीता का त्याग करके दुःख नहीं हुआ लेकिन पति के रूप में जब कर्त्तव्य और मर्यादा का निर्वाह करना पड़ा था तब उन्होंने वैसा निर्वाह किया भी था लेकिन जीवन के उस मोड़ पर, जब उनको एक राज्याधिकारी का आदर्श और मर्यादा बताना हुआ तो पूरे राज्य को ध्यान में रख कर एक राज्याधिकारी की ओर से, जा समूह द्वारा सीता को अलग करने की मांग पर सीता को अलग किया और यहीं (जनसमूह यानी प्रजा की आकांक्षा और मांग का समर्थन करना) राज्याधिकारी की मर्यादा और आदर्श कर्तव्य है। अगर वे ऐसा नहीं करते तो एक राज्यपालक के रूप में वे मर्यादा से गिर जाते और फिर हर दृष्टिकोण से, मानवीय जीवन के हर पहलू से जो आज हम उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं, वे नहीं कहलाते।

कोई भी एक पुरुष किसी का भाई होता है तो किसी अन्य का पुत्र भी होता है, किसी स्त्री का पति होता है, किसी का पिता होता है, चाचा, नाना, दादा, मामा, भांजा, देवर, जेठ, साला, बहनोई इत्यादि सब होता है और जीवन में जब जिस रूप में (अर्थात् पद को प्राप्त) प्रस्तुत होता है, उस समय उस पद की गरिमा निभानी होती है। उसी प्रकार एक स्त्री किसी की माता, किसी की पुत्री, किसी पुरूष की पत्नी और किसी की दादी अथवा नानी हो सकती है।

उसे हर पद की गरिमा (कर्तव्य) अलग-अलग निभानी पड़‌ती है। वह स्त्री अपने पुत्र के सामने एक आदर्श माता जैसी व्यवहार करेगी जबकि उसका पिता और पति दोनों ही, प्राकृतिक और शारीरिक बनावट में एक जैसा यानी पुरुष रूप है लेकिन अलग-अलग पदों की अलग-अलग मर्यादा और कर्तव्य हैं और पद के अनुसार आदर्श कर्तव्य निभाने वाले ही सही माने जाते हैं।

उसी तरह एक पंचायत (मनुष्यों का) में मुखिया का अपने पंचजनों के प्रति जो कर्तव्य होना चाहिए, उसी का निर्वहन राम ने जीवन के उस पद पर भी रह कर किया जब वे राज्याधिकारी के पद पर आसीन हैं। अतः उस पर आसीन अवस्था में, जन आकांक्षाओं की पूर्ति के सिलसिले में, सीता के प्रति जनता के बीच भ्रम की स्थिति दूर होने के समय तक, सीता को अलग करना राज्याधिकारी राम को कलंकित नहीं करता और वे (राम) पूज्य बने हुए हैं, वरना उनकी गति महाभारत के धृतराष्ट्र जैसी होती।

धृतराष्ट्र एक पुत्र के पिता के रूप में बहुत ही उत्तम पिता (दुर्योधन तथा अपने पुत्रों के लिए) हैं लेकिन जन-आकांक्षाओं के अनुरूप उन्होंने एक उत्तम राज्याधिकारी के पद की गरिमा और कर्तव्य को नहीं निभाया, परिणाम देखिए-धृतराष्ट्र को कोई पूज्य नहीं मानता।

कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि दोनों राम (युग प्रतीक राम और दशरथ पुत्र राम) एक ही हैं और कभी ऐसा लगता है कि दोनों अलग-अलग हैं। महर्षि बाल्मीकि ने अपने ग्रंथ 'रामायण' जिसे राम के विषय में जानकारी देने वाली प्रथम रचना बताया जाता है, में अलग-अलग स्पष्ट नहीं किया है, सिवाय इसके कि एक अलग सर्ग (अध्याय) में देवताओं द्वारा ब्र‌ह्मा जी की स्तुति करते हुए और अपनी वेदना कहते हुए बताया जाता है, विष्णु उपस्थित होते हैं और तब देवताओं के कष्ट निवारण हेतु विष्णु द्वारा कहा जाता है- मैं राम के रूप में अवतार लूंगा।

संत तुलसीदास ने अपने रामचरित मानस में बताया है कि दशरथ के चार पुत्र हुए और वशिष्ठ जी ने उनका नामकरण संस्कार किया। वशिष्ठ जी ने उनका नाम विचारकर राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुष्न रखा जिसका रूप, गुण और स्वभाव वेद में प्रकाशित (प्रकट) है। तो क्या कोई वैदिक राम, इस दशरथ पुत्र राम के पहले हो चुके थे? 

साथ ही युगों-युगों से जैसे दो अथवा कई घटनाएं एक दिवस पर मेल खा जाती हैं तो उस घटना को प्रक्रिया का अर्थ अनेक तरह से करते हैं। जैसे दीवाली में असंख्य दीप जलाकर दीप-उत्सव मनाते हैं। इसका अर्थ-प्राचीन समय में कृतिका नक्षत्र से और कार्तिक मास से समय-सूचक काल-गणना में सौर वर्ष का प्रारंभ मानते थे तो यह नव वर्ष के प्रारंभ की खुशी थी।

दूसरा अर्थ- भगवती लक्ष्मी दैत्यराज बलि के यहां कारावास में बंदी थी और विष्णु अवतार वामन ने उन्हें (लक्ष्मी जी को बलि के बन्दीगृह से मुक्त कराया और प्रजा द्वारा दीपोत्सव मनाया गया। तीसरा अर्थ- राम चौदह वर्ष का वनवास समाप्त कर अयोध्या लौटे थे अतः राजकीय तौर पर भी और जनसमूह द्वारा भी दीप जलाकर उनका स्वागत किया गया।

चौथा अर्थ- वर्षा ऋतु की समाप्ति पर छोटे-छोटे कीट-पतंगों की भरमार हो जाती है उसी समय कार्तिक महीने में खेतों में लहलहाते अनाज के पौधों को उन कीट पतंगों द्वारा नुकसान पहुंचता है। आज हम रासायनिक दवा का छिड़काव करते हैं लेकिन पहले ऐसी सुविधा नहीं थी। सामूहिक रूप से और अधिकांश मात्रा में दीप जलाए जाते थे क्योंकि दीपज्वाला की ओर आकर्षित होकर कीट-पतंगे नष्ट होते हैं और अनाज के पौधों (फसलों) की हानि नहीं होती।

इस प्रकार दीपोत्सव के अनेक अर्थ हो सकते हैं। उसी प्रकार मानव सभ्यता के विकास की अवस्था में मानव का मानवता से पूर्ण होने का जो काल है, उसका प्रतिनिधिता करते हुए विद्वानों और कवियों की कल्पना में आये भाववाचक संज्ञा-राम दोनों कथानक जुड़ गये हैं जिनको अलग-अलग समझना दुष्कर है।

यथार्थ जो भी हो, मैं समझता हूं अवतार अथवा ईश्वर का अपनी अधिकांश शक्तियों को लिए हुए सुष्ट होना, सम्पूर्ण कभी नहीं और जब संपूर्ण नहीं तो दोष आना स्वाभाविक है। अन्तर मात्र इतना है कि जहां सामान्य मनुष्य में, नीच ऊंच स्तर वर्ण अनुसार पचास प्रतिशत दोष होते हैं वहां इन स्तरों से उठकर राम मेंआधा या एक प्रतिशत दोष है और हम मानव समाज अपनी तुलना में असंख्य देवशक्तियों से निहित राम को भगवान का अवतार मानते हैं।

जब समाज स्थापित हो गया, रहन-सहन, आचार-व्यवहार को मनुष्यों ने अपने जीवन में अपना लिया, खेती, पशुपालन, निर्माण, शिल्प कला- हर दृष्टिकोण से मनुष्य परिपूर्ण हो गया तो मनुष्य सुखी हो गया। जब ऐश्वर्य वैभव से मनुष्य सुखी रहता है तब उस समय उसमें छल-प्रपंच भी कम रहता है। यहीं रामराज्य था। बहुत बाद आगे के युग में परिवर्तन हुआ। परिवर्तन युग की पहचान है। आगे के बदले हुए युग में लोग ज्यादा चतुर होने लगे, लोभ और स्वार्थ बढ़ गया।

अब सभ्यता संस्कृति की लड़ाई नहीं, बल्कि जगह-जमीन, धन-सम्पत्ति के लिए लड़ाइयां ज्यादा होने लगीं। दूसरे पर आक्रमण करना, देश जीतना, धन-सम्पदा हड़पना इत्यादि बढ़ गया। इस से समाज में अव्यवस्था और अशांति फैल गई और यह सब दूर करने के वास्ते समाज में पुनः धर्म और मर्यादा लाने के वास्ते जिस महापुरुष का जन्म हुआ उसे हम युगपुरुष 'श्रीकृष्ण' के नाम से जानते हैं और यह भगवान के आठवें अवतार माने जाते हैं।

इसके बाद के युग में मानव समाज को दया, प्रेम, करुणा, शांति, अहिंसा, सत्य-शिक्षा आदि की आवश्यकता थी, इन बातों को सिखाने वाले जिस महापुरुष का जन्म हुआ, उसे हम उन्हें भगवान के नवें अवतार के रूप में जाना जाता है। इसके बाद के युग में ज्ञान की आवश्यकता थी और मानव समाज 'भगवान बुद्ध' के नाम से जानते हैं।

भविष्य पुराण और मनीषियों का कहना है कि युग परिवर्तनशील है। समाज में संगतियां विसंगतियां, व्यवस्था-कुव्यवस्था होती ही रहती है और फिर प्रलय और सृष्टि। तो आगे आने वाले युग में कल्कि अवतार होगा (अभी हुआ नहीं है)। हममें या सामान्य मानव में यह शक्ति नहीं कि परिवर्तन को रोक सकें। सिर्फ हम प्रार्थना कर सकते हैं कि युग कोई भी हो हर प्राणी अपना-अपना कर्म सही करे, मनुष्य, मानव-गुण लिए हुए ही एक-दूसरे के प्रति व्यवहार करे, यही हमारी कामना है।
 

श्री  जगदीश प्रसाद
भारतीय चिंतन में अवतारवाद
"संस्कृति- अंक 04 "

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