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चोलकालीन कला का सौंदर्यशास्त्र

चोलकालीन कला का सौंदर्यशास्त्र

चोल वंश पल्लवों का उत्तराधिकारी राजवंश था, अतः उन्हें पल्लवों की कला-सम्पदा भी विरासत में मिली थी, जिसे चोल शासकों ने इस सीमा तक समृद्ध किया कि उनके शासन काल में द्रविड़ स्थापत्य एवं शिल्पकला अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। मंदिरों के निर्माण में जिस द्रविड़ शैली का आरम्भ पल्लवों के काल में हुआ, चोल नरेशों के काल में उसका अत्यधिक विकास हुआ।

11वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में राजराज तथा राजेन्द्र चोल के राज्यकाल में चोल साम्राज्य चरमोत्कर्ष पर था। चोल सम्राटों ने अपनी शक्ति और ऐश्वर्य का प्रदर्शन भव्य तथा उत्तुंग शिखर मंदिरों के निर्माण में किया। कलाविद् फर्गुसन के अनुसार चोल कलाकारों ने 'दैत्यों के समान कल्पना की तथा जौहरियों के समान उसे पूरा किया' (They conceived like giants and finished like jewellers).

चोल शिल्पियों ने चट्टान काटकर बनाये गये मन्दिरों की प्रणाली को छोड़ कर एक स्वतन्त्र रूप से खड़े पत्थर के मन्दिर बनाने पर अपना ध्यान केन्द्रित किया। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि इस काल के मकान शेष नहीं बचे हैं- केवल मंदिर ही शेष हैं। चोल मंदिरों में पूजा-स्थल के केन्द्रीय कक्ष पर बल दिया जाता था जिसमें प्रवेश के लिए एक या दो बड़े कक्षों को मंदिरों के आकार के अनुसार पार करके जाना पड़ता था और उनके ऊपर लगभग पिरामिड की शक्ल का एक लम्बा शिखर होता था जो मन्दिर के आकार के अनुपात में होता था।

मंदिर को चारों ओर घेरकर एक चौक होता था साथ ही चारों ओर की दीवार के अंदर की ओर खम्भों की श्रेणी होती थी, जैसा कि तंजोर तथा गंगईकोंडा-चोल-पुरम् के मंदिरों में है। प्रवेश के लिए शिखर की शैली पर ही बने हुए अलंकृत प्रवेश-द्वार होते थे। धीरे-धीरे इन प्रवेश-द्वारों पर अधिक बल दिया जाने लगा, यहाँ तक कि ये शिखर से बराबरी करने लगे जैसा कि मदुरई के मीनाक्षी मंदिर और त्रिचनापल्ली के निकट स्थित श्रीरंगम मंदिर से स्पष्ट है।

पत्थर की मूर्तिकला बहुत कुछ शिल्प कला की सहायक होती थी। इनका उपयोग बहुधा खम्भे के ऊपर कार्निस के ठीक नीचे के भाग में तथा स्तम्भों और जंगलों (जालियों) की सजावट में होता था। परन्तु काँसे की मूर्तियों के निर्माण में चोल शिल्पी बेजोड़ थे, और वे संसार के किसी भी भाग में निर्मित मूर्तियों की अपेक्षा श्रेष्ठ मूर्तियों का निर्माण करते थे। ये मूर्तियां मुख्यतया देवताओं, दानदाताओं तथा सन्तों की होती थीं और इनका निर्माण एक कलात्मक प्रक्रिया से होता था तथा वे मन्दिर के आन्तरिक पूजागृह में रखी जाती थीं।

ये मूर्तियां दक्षिण के कारीगरों की मूर्तिकला सम्बन्धी प्रतिभा की ओर विशेष रूप से इंगित करती हैं। चोल कालीन मंदिर स्थापत्य कला को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम वर्ग में दशवीं शताब्दी तक निर्मित प्रारम्भिक चोल मंदिर हैं, जिनमें तिरू कट्टलाई का सुन्दरेश्वर मन्दिर, नरतमालै का विजयालय मंदिर एवं कदम्बर मलाई मंदिर विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। दूसरे वर्ग के चोल-कालीन मन्दिर स्थापत्य कला का युग तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर के साथ प्रारम्भ होता है।

यह मंदिर द्रविड़ मंदिर-स्थापत्य कला शैली का पूर्ण विकासमान रूप है। और इसके निर्माण के दो शताब्दियों बाद तक चोलों ने सम्पूर्ण सुदूर दक्षिण एवं श्रीलंका में श्रृंखलाबद्ध रूप में अनेक मंदिरों का निर्माण कराया। चोलों ने मंदिरों के निर्माण के लिए प्रस्तर खण्डों एवं शिलाओं का प्रयोग किया। इस काल के मंदिरों का आकार बहुत विशाल और इनका धार्मिक कार्यों के अतिरिक्त सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक प्रयोजनों के लिए भी उपयोग किया जाता था। इतने विशाल मन्दिरों को व्यवस्था के लिए मन्दिरों को प्रभूत भूमि अनुदान प्रदान किये गये और सैकड़ों सेवकों को नियुक्त किया गया।

परिणाम स्वरूप, चोलकालीन मंदिर विशाल भूस्वामी एवं नियोजक भी थे। सिंचाई संसाधानों के विकास एवं हस्तशिल्प को संरक्षण प्रदान करने में भी चोल मंदिरों ने योगदान दिया। इस प्रकार चोल कालीन मंदिरों की आर्थिक भूमिका भी थी। तंजौर का भव्य शैव मंदिर, जो राजराजेश्वर अथवा बृहदीश्वर नाम से प्रसिद्ध है, का निर्माण राजराज प्रथम के काल में हुआ था। भारत के मंदिरों में सबसे बड़ा तथा लम्बा यह मन्दिर एक उत्कृष्ट कलाकृक्ति है जो दक्षिण भारतीय स्थापत्य के चरमोत्कर्ष को द्योतित करती है।

भारतीय वास्तु कलाकारों द्वारा बनाए गए मंदिरों में यह विशाल मंदिर है। मंदिर 180 फुट लम्बा है और इसके पिरामिड आकार का शिखर 196 फुट ऊँचा है। इससे मंदिर के आकार की विशालता तथा इसके बनाने में साहस और कौशल का परिचय मिलता है। इस मंदिर के चार भाग एक-दूसरे से सम्बद्ध एक ही धुरी पर बने हुए हैं। नंदी मण्डप, अर्द्ध मंडप तथा गर्भगृह, सारा मन्दिर एक चार दीवारी के भीतर बना हुआ है।

मंदिर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है- गर्भगृह तथा शिखर (विमान)। यह तीन भागों में बाँटा गया है: (i) आधार-यह 42 फुट वर्ग क्षेत्रफल में बना है और 50 फुट ऊँचा है। यह आधार बीच में बनी हुई कार्निस द्वारा दो भागों में विभक्त है। इन दोनों भागों के बाहरी हिस्से अनेक प्रकार के वास्तुकला के अलंकरणों से सुसज्जित हैं जैसे ज्ञानवृक्ष अथवा मूर्तियां; (ii) विमान का मध्य भाग ऊपर की ओर पतला होता गया है। पिरामिड आकार का यह भाग तेरह मंजिलों में बनाया गया है। ऊपर की मंजिलें बराबर छोटी होती गई हैं।

परिणामस्वरूप सबसे ऊपर की मंजिल सबसे नीचे की मंजिल का एक तिहाई भाग रह गया है; (iii) मंदिर का शीर्ष भाग ऊपरी भाग होता है और एक गोलाकार गुंबद के रूप में है। इसके चारों ओर पंखदार ताखे बनाए गए है। पर्सी ब्राउन का मत है कि तंजौर का बृहदीश्वर मंदिर द्रविड़ शिल्प कला की सर्वोत्तम कृति है और भारतीय वास्तुकला की कसौटी है।

चोलों के वैभवकाल में बनाया गया दूसरा मंदिर गंगैकोंड चोलपुरम का मंदिर है। इसका निर्माण राजराज के पुत्र राजेन्द्र चोल के शासन-काल में हुआ। यह 340 फीट लम्बा तथा 110 फीट चौड़ा है। इसकी शैली तंजौर मंदिर की शैली के ही समान है। इसका शिखर 150 फुट ऊँचा है। इस मंदिर का विमान, बृहदीश्वर मंदिर की ही भांति, तीन भागों में विभक्त है। मंडप कम ऊँचा है किन्तु इसमें 150 स्तम्भ हैं। इस स्तम्भ युक्त मंडप में हमें बाद में आने वाले मंदिरों के सहस्त्र स्तम्भ वाले मण्डपों की शुरूआत परिलक्षित होती है।

तंजौर मंदिर में शक्ति, सन्तुलन और गांभीर्य अधिक है जबकि गंगैकोंड चोलपुरम के मंदिर में मार्दव, सौन्दर्य और विलास अधिक है। इन दो विशाल स्मारकों से सिद्ध होता है कि चोल काल में वास्तुकला चरमोत्कर्ष पर थी। इन मंदिरों के निर्माण के साथ ही ऐसा दिखाई देता है कि वास्तुकला की गतिविधि का प्रबल वेग क्षीण हो चला था। इसके बाद कोई विशेष उल्लेखनीय मंदिर नहीं बने।

राजेन्द्र चोल के उत्तराधिकारियों के समय में भी मंदिर निर्माण की गति जारी रही। इस दौरान कई छोटे-छोटे मंदिरों का निर्माण किया गया। इनमें मंदिर की दीवारों पर अलंकृत चित्रकारी एवं भव्य मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। राजराज द्वितीय तथा कुलोत्तुंग तृतीय द्वारा बनवाये गये कमशः दारासुरम का ऐरावतेश्वर मंदिर तथा त्रिभुवनम् का कम्पहरेश्वर मंदिर अत्यन्त भव्य एवं सुन्दर है। इन मंदिरों का निर्माण भी तंजौर मंदिर की योजना पर किया गया है। ऐरावतेश्वर मन्दिर में महामण्डप के सामने अग्रमण्डप बनाये गए हैं।

ये पहियेदार रथ की भाँति हैं जिन्हें हाथी खींच रहे हैं। इनमें अलंकृत स्तम्भ लगे हुए हैं। सूर्य का मंदिर (कोणार्क) इससे प्रभावित लगता है। कम्पहरेश्वर, जिसे त्रिभुवनेश्वर भी कहा जाता है, की योजना भी ऐरावतेश्वर मंदिर के ही समान है। इसमें मूर्तिकारी की अधिकता है। मूर्तियां कलात्मक दृष्टि से भी अच्छी है। नीलकण्ठ शास्त्री जी ने इसे मूर्ति दीर्घा से सम्बोधित किया है।

चोलों ने अपनी महानता एवं गौरव गाथा के झण्डे तक्षणकला के क्षेत्र में भी गाड़े हैं। चोलों ने पत्थर तथा धातु की बहुसंख्यक मूर्तियों का निर्माण किया। उनके द्वारा निर्मित मूर्तियों में देवी-देवताओं की मूर्तियों ही अधिक है। कुछ मानव मूर्तियां भी प्राप्त होती हैं। चूँकि चोलवंश के अधिकांश शासक उत्साही शैव थे, अतः इस काल में शैव मूर्तियों का निर्माण ही अधिक हुआ। इस काल में पाषाण मूर्तियों की अपेक्षा धातु (कांस्य) मूर्तियों का निर्माण अधिक हुआ। सर्वाधिक सुन्दर मूर्तियां नटराज (शिव) की हैं।

इनकी पूजा दक्षिण में विशेष रूप से होती है। नटराज की एक विशाल प्रतिमा त्रिचनापल्ली के तिरूभरंग कुलम में प्राप्त हुई है। वह इस समय दिल्ली संग्रहालय में है। यहीं से शिव अर्द्धनारीश्वर रूप की एक मूर्ति मिलती है जो मद्रास संग्रहालय में सुरक्षित है। इसमें नारी तथा पुरूष की शारीरिक विशेषताओं को उभारने में कलाकार को विशेष सफलता मिली है। साथ ही ब्रह्मा, विष्णु, लक्ष्मी, भूदेवी, राम-सीता, कालिया नाग पर नृत्य करते हुए बालक कृष्ण तथा कुछ शैव सन्तों की मूर्तियाँ भी प्राप्त होती हैं जो कलात्मक दृष्टि से भव्य एवं सुन्दर हैं।

एक विशिष्ट विद्या की शुरूआत यहीं से मानी जाती है। चोल मूर्तिकला मुख्यतः वास्तुकला की सहायक थी और यहीं कारण है कि अधिकांश मूर्तियों का उपयोग मंदिरों को सजाने में किया जाता था। इनमें धातु मूर्तियाँ ही स्वतंत्र रूप से निर्मित हुई हैं। चित्रकला का विकास चोलों की महत्वपूर्ण विशेषता रही है। इस युग के कलाकारों ने मंदिरों की दीवारों पर अनेक सुन्दर चित्र उत्कीर्ण करवाये। बृहदीश्वर मन्दिर की दीवारों के चित्र आकर्षक एवं कलापूर्ण हैं।

इन चित्रों में पौराणिकता का बाहुल्य हैं। यहाँ शिव की विविध लीलाओं से सम्बन्धित चित्रकारियां प्राप्त होती हैं। इसमें प्रमुख राक्षस का वध करती हुई दुर्गा तथा दूसरा राजराज को सपरिवार शिव की पूजा करते हुए प्रदर्शित किया गया है। इस प्रकार चोल राजाओं के शासन काल स्थापत्य, तक्षण-कला तथा चित्रकला का चरमोत्कर्ष काल रहा है। साथ ही साथ ये चोल सम्राटों की महानता एवं गौरव गाथा को आज भी सारे जहां में सूचित कर रहे हैं।

लेख-
डॉ० वीरेन्द्र सिंह यादव
संस्कृति अंक- 10

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