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गुजरात की काष्ठ कला

गुजरात की काष्ठ कला

प्राचीन काल से ही भवन निर्माण में काष्ठ सामग्री का उपयोग तथा काष्ठ के माध्यम से कला की अभिव्यक्ति यत्र-तत्र देखने को मिलती है। जिसका साक्ष्य वैदिक काल के परम्परागत साधन तथा हड़प्पा कालीन प्राप्त प्राचीन अवशेष है। मानव और काष्ठ कला का संबंध कब स्थापित हुआ इसकी तिथि निर्धारण करना मुश्किल ही नहीं अपितु असंभव भी है। काष्ठ की नैसर्गिक आयु तथा वातावरण का उस पर होने वाला प्रभाव तिथि निर्धारण के लिये सबसे बड़ी बाधा माना है।

आदिकाल से ही मानव लकड़ी के औजार तथा खाने-पीने के बर्तन के रूप में लकड़ी का प्रयोग करता रहा है। कालांतर से निपुणता प्राप्त होने पर उसमें कला-कौशल का भी समावेश किया जाने लगा। आज की काष्ठ कला का सबसे पुराना साक्ष्य 'शेख रूल बैलेड' माना जाता है। जिसमें मानवाकृति उत्कीर्ण की गई है। यह काष्ठकला इजिपशियन मकबरा "होसी" में पाई जाती है। साधारणतः 600 वर्ष पूर्व इजिपशियनों ने लकड़ी के अलंकारिक फर्नीचर तथा ताबूत बनाये थे। अकोरियन तथा चालेडियन लोगों ने इसमें 15वीं सदी तक काफी कुशलता प्राप्त की तथा काष्ठकला के इतिहास में एक नया आयाम ई० पूर्व 320 से लेकर ई० पू० 140 तक प्रदान किया। ग्रीक लोगों ने काष्ठकला को ज्यामितीय तथा अन्य नमूनों के माध्यम से सम्पन्न किया और भगवान की मूर्तियां काष्ठ में उत्कीर्ण की जाने लगी। ई०पू० 1000 ई. पू० 100 से 327 ई०पू० तक रोमन लोगों ने काष्ठ कला का उपयोग स्थापत्य के लिये तथा समुद्री परिवहन नौकाएं बनाने के लिए किया। ऐसी नौकाओं पर विभिन्न प्रकार के अलंकरण पशु-पक्षी, पेड-पौधे, फूल-पत्ते आदि का चित्रांकन किया गया है। रोमन लोगों के साथ ही ईस्वी सन् 330 से लेकर 1453 ईस्वी सन् तक वैसेन्टाइन तथा और्सियन व पारसी लोगों का भी काष्ठ कला में योगदान रहा है। ईसाई धर्म के उत्थान के साथ बाइबल की कई घटनाएं भी काष्ठ कला में उत्कीर्ण की जाने लगी।

भारत में ई० पूर्व चौथी शताब्दी में काष्ठकला, मौर्यकाल की प्रमुख स्थापत्य विद्या बन चुकी थी। बच्चे के साथ स्त्री और नारी-सेविका का काष्ठ रूप पाटलिपुत्र, उत्खनन से प्राप्त हुआ था। यह मौर्यकाल की काष्ठ कला का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। कुमशहर में उत्खनन के दौरान सागौन में विभिन्न प्लेटफार्म प्राप्त हुये हैं। इसके अतिरिक्त बुलन्दीबाग एवं उज्जैन में भी परकोटे की दीवारों को संबल देने के लिये लकडी के स्तंभों के रूप में प्रयोग किया जाता था। शैलकृत गुफाओं, बाराबर नागार्जुनी पहाडियों, अजन्ता, भाजा, कारले एवं कनेहरी में भी लकड़ी का प्रयोग प्रमाणित हो चुका है। प्रथम ई० में भी तटवर्ती व्यापार के संदर्भ प्राप्त होते हैं। सागौन एवं तेदू के लट्ठ भड़ोंच बन्दरगाह से पश्चिमी एशिया बाजार में परवर्ती काल तक निर्यात किये जाते थे। गुजरात में चालुक्यों द्वारा निर्मित काष्ठ मंदिर के जीर्णोद्धार का संदर्भ मरूतंग की प्रबन्ध चिन्तामणी (1304 ई०) में तथा कामिल-उल-इबल असीर (1230 ई0) में मिलता है। सोमनाथ मंदिर में 56 स्तंभों एवं सागौन की फर्श का उल्लेख मिलता है। इसके अतिरिक्त इबन बतुआ (1333 ई०) ने भी गुजरात साम्राज्य की कलात्मक एवं स्थापत्य काष्ठ कला का विवरण उपलब्ध करवाया है।

भारतीय प्राचीन ग्रंथ बौद्ध शास्त्र पुराणों आदि में भी लकड़ी के उपयोग पर काफी सामग्री पाई जाती है। भारत में लकड़ी के स्थापत्य को प्रस्तर के स्थापत्य में परिवर्तन करने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। कार्ला, भाजा, नासिक तथा लोमांस रूपी गुफाएं इस बात की साक्ष्य है कि आदि स्तूपों में भी लकड़ी को पत्थरों द्वारा स्थानान्तरण किया गया।

आज भारत में विभिन्न प्रकार की काष्ठ कला का स्थापत्य विद्यमान है। इनमें कोरियन मुगल, मराठा तथा स्थानीय कला शैली पाई जाती है। साथ में विभिन्न अलंकरण तथा जीव जन्तु और सामाजिक व राजकीय घटनाओं का भी काष्ठ कला द्वारा प्रदर्शन दिखाई देता है। इसके साथ में जैन, बौद्ध तथा हिन्दू धर्मों की विभिन्न पौराणिक आख्याओं को भी लकड़ी में उत्कीर्ण किया गया है। यद्यपि आज के युग में लकड़ी का उपयोग स्थापत्य में केवल नाममात्र रह गया है। फिर भी भारत में आज भी पर्वतीय प्रदेश, नेपाल, कश्मीर, गुजरात ढक्खन आदि में काष्ठ कला के उत्कृष्ठ नमूने पाये जाते हैं।

यद्यपि भारतीय काष्ठ वास्तुकला की पारम्परिक कला अन्य क्षेत्रों से मिलती है परन्तु गुजरात इस मामले में अदितीय है। क्योंकि इस प्रदेश का संबंध दीर्घकाल से अपनी बन्दरगाह के कारण पश्चिमी देशों से विशेष रहा है। जिसका प्रभाव गुजरात को विभिन्न इमारतों में देखने को मिलता है। गुजरात में काष्ठ के गृह तथा काष्ठ मंदिर आदि की भरमार आज भी विद्यमान है। यहां की काष्ठ कला अपने आप में सभी शैलियों को समेट कर आज भी यथावत खड़ी है। विद्वानों के विचारों में साधारणतः 650 वर्ष पूर्व गुजरात में काष्ठ कला का अभ्युदय हुआ था, ऐसा मत प्रचलित है। किन्तु गुजराती काष्ठ कर्मी इस बात से असहमत होकर अपनी कला को उससे भी अधिक प्राचीन मानते हैं।

गुजरात काष्ठ कला की वास्तु शैली का प्रमुख ग्रंथ "दिव्याधिकारा" तथा जिन्न द्वारा लिखित श्री कुमार बाल प्रभा नामक ग्रंथ 1435 ई० सन् की गुजराती काष्ठ कला की एक महत्वपूर्ण पुस्तक है। साधारणतः ई० सन् 1000 से 1665 ई0 सन् में लिखा गया "समरांगण सूत्रधार" वास्तु स्थापत्य हवेली और उसके बनाने की विधि पर सूक्षमोत्तर लक्षणों के साथ काष्ठ कला की प्रस्तुति करता है।


 

मारूकला गुजर की 'प्रबन्ध चिन्तामणी' (ई0 1304) कल्हण की 'राजतरंगिणी' में जैन तथा कश्मीरी काष्ठ स्थापत्य का विस्तृत विवेचन करती है। गुप्तकालीन मनसारा की काष्ठ कला उदृघ्त है। जैन भंडार ग्रंथागार पाटन में रखे हुए हस्तलिखित पाटन की काष्ठ कला शैली को आज भी संजोये हुये हैं। जैन, वैष्णव और इस्लाम द्वारा गुजरात में काष्ठ स्थापत्य को शैलियों में अपना अनुदान दे चुके हैं। 11वीं सदी ई० से 13वीं सदी ई० तक मध्यकालीन भारत में जैनों ने काष्ठ-कला के अनेक स्तंभ पर उत्कीर्ण मराठा योद्धा मंदिर बनवाए तथा 15वीं सदी में स्वामीनाथन मंदिर, कालुपुर अहमदाबाद वल्लभाचार्य द्वारा स्थापित वैष्णव सम्प्रदाय गुजरात की काष्ठ कला में अपनी एक अमिट छाप छोड़ते हैं। इस्लाम धर्मियों द्वारा गुजरात में आधिपत्य के बाद बहुत बड़ी मात्रा में काष्ठ कला का विध्वंश किया गया किन्तु समय उपरान्त काष्ठ कला नष्ट करने की इस्लामी प्रवृत्ति धीरे-धीरे शांत हुई और काष्ठकला में रेखाकृति, अलंकरण तथा ज्यामितीय अलंकरण किये जाने लगे। गुजरात के काष्ठ शिल्पियों ने इस्लामिक ज्यामितीय तथा रेखाकृतियां, फूल-पौधे, वृक्ष, पक्षी आदि को अपनाते हुये काष्ठकला को नये आयाम प्रस्तुत किये है। मुगलों शासन के दौरान भी मुगलकालीन शैली इमारतों के स्तंभों आदि पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकी। राजपूत तथा मराठों ने भी अपनी शैलियों काष्ठ कला में उद्धृत की और आज के गुजरात में स्थापत्य कला का समयानुचित विकास देखने को मिलता है। इसका उदाहरण हमें गुजरात की विभिन्न हवेलियों एवं देवालयों में प्रचुर मात्रा में देखने को मिलता है जो कि सहज ही दर्शकों, पर्यटकों को आकृष्ट करता है।

इनमें प्रमुख रूप से काष्ठ पर उत्कीर्ण भगवान गणेश की प्रतिमा जो कि मूली हवेली, गुजरात में है (चित्र 1) काष्ठकला का उत्कृष्ट उदाहरण है।

आज के गुजरात में कैलिकों संग्रहालय ईटों तथा लकड़ी के काम से गुजराती शैली में बनाया गया है। इसके स्तंभों पर गुजराती शैली का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इनके स्तंभ पत्थर की नींव पर खडी गोल झीरी के नक्काशी के साथ गोलाकृति संभागीय चौकोर द्वारा निर्मित किये हैं।

बाला जी मंदिर हवेली में ढोल की पोल (चित्र-2) में स्थित 18वीं सदी का एक झरोखा गुजराती शैली में काष्ठ कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह झरोखा गुजराती शैली का बालकनी नुमा बनाया गया है।

इसका उपयोग मुसलिम तथा हिन्दू हवेलियों में कुछ बदलाव के साथ उच्च पदस्थ लोगों के लिए किया जाता था। ऊपरी सतह पर लकड़ी के बिम्ब पर यह झरोखा लटकननुमा आकृति द्वारा एकलता लकड़ी से बनाया गया प्रतीत होता है। इस पर फूलों पत्तियों की बनावट का उपयोग सहायक स्तंभ के रूप में लिया गया है। इसके स्तंभ पर बेल-बूटी नक्काशी पाई जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि गोलाकृति मानों हवा में झूल रही है। वर्षा तथा सूरज की रोशनी से बचने के लिए इसकी ऊपरी सतह पर छोटा छज्जा भी बनाया गया है।

स्वामी नारायणा मंदिर के (चित्र-3) विभिन्न स्तंभों पर प्रचुर मात्रा में काष्ठ कला अंकित है। इसमें आदम कद मराठा सैनिक की प्रतिभा विशेष रूप से विलोकनीय है। इसके अतिरिक्त आकर्षक एवं मनोहारी काष्ठ कला बड़े ही सिद्धहस्त कर्मकारों द्वारा साईबाग हवेली (चित्र-4-5) में काष्ठ स्तंभ पर इठलाता हुआ मोर उत्कीर्ण किया गया है तथा काष्ठ स्तंभों पर उत्कीर्ण गजवलय काष्ठ कला का एक उत्कृष्ट नमूना है।

उपरोक्त काष्ठ कला के उत्कृष्ट उदाहरणों तथा प्रदर्शित चित्रों से स्पष्ट होता है कि उस समय की स्थापत्य कला चिरस्थायी ही नहीं अपितु निर्जीव में काष्ठ में संजीव चित्रणा उत्कीर्ण कर काष्ठ कला को एक नया आयाम प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। जिससे विभिन्न संस्कृतियों एवं कलाओं का संगम देखने को मिलता है। ऐसे अद्वितीय कला के सजीव उत्कीर्ण चित्र आगामी पीढ़ी के लिये पथ-प्रदर्शन ही नहीं अपितु मील का पत्थर सिद्ध होंगे। आशा है कि इस अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर के परिरक्षण के लिये शासन सतत् प्रयासरत रहेगा ताकि काष्ठ कला प्रेमियों, अनुसंधानकर्ताओं एवं संस्कृति व कला की इस विरासत को चिरस्थायित्व प्राप्त हो सके।

लेख-
ओंकार चौहान

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