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झालावाड़ संग्रहालय की दो अद्वितीय अर्द्धनारीश्वर और चामुण्डा नवग्रह मूर्तियाँ अर्द्धनारीश्वर

झालावाड़ संग्रहालय की दो अद्वितीय अर्द्धनारीश्वर और चामुण्डा नवग्रह मूर्तियाँ अर्द्धनारीश्वर

झालावाड़ के पुरातत्व संग्रहालय में अनेक बेशकीमती मूर्तियाँ है। इनमें से दो ऐसी सुन्दर मूर्तियाँ है जो भारत देश की मूर्तियों में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। झालावाड़ के संग्रहालय में इसी क्रम में एक विशेष 8वीं सदी की मूर्ति शिव पार्वती के मिलन के ‘अर्द्धनारीश्वर’ स्वरूप की प्रदर्शित है। इस मूर्ति को झालावाड संग्रहालय के प्रथम अध्यक्ष पं. गोपाललाल व्यास ने झालरापाटन के निकट चन्द्रभागा के किनारे बसी चन्द्रावती नगरी से खोजकर इस संग्रहालय में प्रदर्शित किया था। चूंकि यह संग्रहालय 1915 ई0 में बना था अतः यह मूर्ति 1915 ई0 के लगभग खोजी गई।

इतिहासकार ललित शर्मा के अनुसार अर्द्धनारीश्वर मूर्ति में स्त्री और पुरूष दोनो के रूप दिखाई देते है जो सृष्टि सर्जन के प्रतीक है। इस मूर्ति में बायां आधा अंग स्त्री (पार्वती) व दायां आधा अंग पुरूष (शिव) के शरीर को प्रदर्शित करता है। मूर्ति के चारो हाथो में से पुरूष की ओर के दो हाथो में पीछे की ओर के ऊपर उठे हाथों में त्रिशूल है तथा उसके पीछे बलदार सर्प का अंकन है। मुख्य हाथ नीचे की ओर नन्दी के रूप में बने पुरूष के शीश पर आशीर्वाद के रूप में है। हाथ में सुन्दर कड़े का अंकन है। यहाँ नन्दी को धोती पहने दर्शाया गया है।

बांयी ओर की नारी भुजाओं में ऊपर की ओर का एक हाथ खण्डित है। नीचे के मुख्य हाथ नारी के पतले घुमावदार रूप में मोर पर बैठे कार्तिकेय के मस्तक पर रखा हुआ है। मूर्ति के सिर के पुरूष वाले भाग पर भारी जटाजूट एवं स्त्री भाग में सुन्दर जुड़ा दर्शाया गया है। अर्द्धनारीश्वर की इस मूर्ति का मुख मण्डल अत्यन्त सुन्दर है जिसके ललाट पर तीसरा नैत्र है। इसमें पुरूष के कान में सुन्दर कुण्डल और स्त्री के कान में गुट्टा है। मूर्ति के गले की सलवटें, बालों का कन्धे तक लहराता अंकन, गले की रूद्राक्ष माला कला की दृष्टि से अत्यन्त सुन्दर है। शरीर पर जनेऊ और हाथों में सुन्दर भुजबन्ध है। शरीर पर हल्के झीने वस्त्रों का अंकन भी प्रभावी है। यदि एक पक्ष छिपाकर देखा जाये तो स्त्री (पार्वती) की आधी देह व दूसरी ओर से पुरूष (शिव) की आधी देह दिखाई देती है।


मूर्ति के दोनो पक्षों में नख से शिख तक स्त्री व पुरूष के दिव्य मिलन का यह भावपूर्ण अंकन है। मूर्ति में नुकीली नासिका, आधे खुले नैत्र, पांवों की अंगुलियाँ, ललाट एवं त्रिनेत्र जैसे अंकन इस मूर्ति को भारतीय मूर्तिकला में गरिमा प्रदान करते है। लाल बलुआ पाषाण खण्ड पर बनी इस मूर्ति का आकार साढ़े तीन फुट लम्बा, ढाई फुट चौड़ा तथा डेढ़ फुट मोटा है। इस मूर्ति ने इंग्लैण्ड में 1982 में आयोजित ‘भारत कला महोत्सव’ में भारतीय मूर्तिकला खण्ड में द्वितीय स्थान प्राप्त किया था। 1990 ई0 में जब इस मूर्ति को जयपुर के जवाहरकला केन्द्र की प्रर्दशनी में प्रदर्शित किया तब देश वे प्रख्यात मूर्ति विशेषज्ञों ने इस मूर्ति की कला से प्रभावित होकर इसे ‘मास्टर पीस आब्जेक्ट ऑफ राजस्थान’ के रूप में मान्यता दी थी।

अद्भुत चामुण्डा नवग्रह मूर्ति

झालावाड़ के पुरातत्व संग्रहालय में इसी क्रम की एक देवी मूर्ति ऐसी है जो अपनी विशेषताओं के कारण पूरे भारत की देवी मूर्तियों में सबसे अलग है। झालरापाटन के निकट स्थित चन्द्रावती के मन्दिरों से 2 मार्च 1924 ई0 को मिली यह मूर्ति चामुण्डा नवग्रह देवी की है जो 8वीं सदी की है। यह 58 सेन्टीमीटर ऊँची एवं 29 सेन्टीमीटर चौड़े लाल भूरे मिश्रित पाषाण खण्ड पर बनी है।

यहाँ यह भी जानना आवश्यक होगा कि भारत देश में अभी तक चामुण्डा देवी की जितनी भी मूर्तियाँ मिली है उनमें चामुण्डा के पैरो के नीचे प्रेत या मानव शव का होना माना जाता है परन्तु इस मूर्ति में दोनो उक्त प्रमाणों का अभाव है बल्कि इस मूर्ति में देवी चामुण्डा ने अपने दोनो हाथो में ब्रह्माण्ड का संचालन करने वाले नौ ग्रहों को ही ऊपर उठाया हुआ है। इस लक्षण के कारण भारत के मूर्ति विज्ञानियों डॉ. रत्न चन्द्र अग्रवाल ने इसे भारत की एक मात्र चामुण्डा नवग्रह मूर्ति प्रमाणित की थी।


मूर्ति का धार्मिक पक्ष यह है कि देवगण जब असुरो से पीड़ित हो गये तब उन्होंने अम्बिका का स्मरण किया तब अम्बिका के मस्तक से चण्ड मुण्ड का वध करने के लिए चामुण्डा देवी प्रकट हुई थी तथा उसने दोनो दानवों का वध कर फिर वह चामुण्डा नाम से जगत में पूजी गई।

इतिहासकार ललित शर्मा के अनुसार चामुण्डा नवग्रह देवी की यह मूर्ति आठ हाथों वाली है तथा उसने अपने दो मुख्य ऊपर उठे हाथों में एक पाषाण पंक्ति में अंकित नवग्रहों के सारे ब्रह्माण्ड बोझ को धारण किया हुआ है। ये नवग्रह दांये से बांये ओर है जो क्रमशः सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु मूर्ति रूप में बने हुए है। मूर्ति में शक्ति स्वरूपा चामुण्डा यहां समूचे ब्रह्माण्ड को अपने दोनों हाथों में सहज रूप से उठाते हुए दर्शित हैं ऐसे भाव की यह मूर्ति भारतीय मूर्तिकला में देश भर के किसी संग्रहालय या मन्दिर में अभी तक प्रकाश में नहीं आ पायी है।

चामुण्डा की यह मूर्ति खड़ी हुई हैं जिसके सारे शरीर में त्वचा से नीचे की अस्थियाँ व नाड़िया स्पष्ट दिखाई देती है। अत्यन्त भयानक भावभूषा, मुख की आकृति देखने वालों के शरीर में सिहरन पैदा करती है। मुख की दन्त पंक्तियों से निकली भयानक हंसी, अन्दर धंसा पेट, उस पर बिच्छु का अंकन, अस्थि रूपी शरीर में लटकते स्तन, रौद्र आँखों वाली इस मूर्ति को देखकर सहसा डर पैदा होना कोई आश्चर्य नहीं है।

मूर्ति में दांये हाथ में शिव व बांये हाथ में ब्रह्मा को धारण किया है। देवी के तीसरे दांये हाथ में कटार व बांये हाथ में रक्त का पात्र है। चौथे हाथ में देवी एक मानव को पकड़े हए है जिसके नीचे शीश विहिन शेर का अंकन है। देवी के बांये हाथ में कोई दिव्य अस्त्र है। देवी के शरीर पर भयानक नरमुण्ड़ों की माला है जो घुटनों तक पहनी हुई है। सैकड़ो वर्षे बाद आज भी यह मूर्ति क्रोध और रौद्र भाव से अपने को जीवन्त रखने में समर्थ है और यही स्वरूप इसको देशभर की देवी मूर्तियों में अलग ही पहचान प्रदान करता है।

ललित शर्मा, इतिहासकार
झालावाड़ (राज0)

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