आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल पंचमी | मंगलवार

नक्षत्र: मृगशिरा | योग: शोभन | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 21 अप्रैल 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल पंचमी | मंगलवार

नक्षत्र: मृगशिरा | योग: शोभन | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 21 अप्रैल 2026

थाईलैण्ड- भारतीय संस्कृति जहां आज भी जीवित है

थाईलैण्ड- भारतीय संस्कृति जहां आज भी जीवित है

आज दिसम्बर की 14 तारीख है। दिल्ली में घना कुहरा है। सुबह 'इंदिरा गांधी हवाई-अड्‌डे' के लिए निकले तो हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। जब हवाई अड्‌डे तक पहुँच पाना ही इतना दुष्कर है तो फिर वहां से रवाना होने वाली उड़ानों का क्या होगा ?

पर, वहाँ पहुँचकर अच्छा लगा कि ऐसी कोई सम्भावना नहीं है। सारी उड़ानें नियत समय पर रवाना हो रही हैं।

थाईलैण्ड का नाम लेते ही अनायास अनेक चित्र आँखों के आगे तैरने लगते हैं। बचपन में भूगोल पढ़ते समय इसे 'स्याम' या 'सयाम' लिखते थे। संस्कृत मूल के इस शब्द 'स्याम' का अर्थ 'हरित स्वर्णिम' धरा से था। परन्तु पश्चिम के प्रभाव से धीरे-धीरे रंग बदलने लगे। बाद में 'हिन्द-चीन' 'इण्डोचायना' हो गया। 'हिन्देशिया' 'इण्डोनेशिया' कहलाने लगा।

पर कभी-कभी अब लगता है शताब्दियों के इन परिवर्तनों के बावजूद जैसे कहीं विशेष कुछ बदला नहीं। अतीत वहाँ आज भी जीवित है, अपने वास्तविक रूप, वास्तविक रंग में। विशुद्ध भारतीय परिधान में, नृत्य की मनमोहक भाव-भंगिमाओं में थाई बालाएं। रामायण के विभिन्न कलात्मक रूपक। आचार-व्यवहार में भारतीय परम्पाएँ। बृहत्तर भारत, नहीं, नहीं एक और भारत अपने एक और अछूते रूप में-

सदियों पुरानी कलात्मक भव्य प्रतिमाएँ। बुद्ध, शिव, विष्णु, गणेश की मूर्तियाँ। आसमान को छूते स्वर्णिम पगोडा-बौद्ध एवं वैदिक धर्म का अद्भुत समन्वय। सब अनायास एकाकार हो जाते हैं। संस्कृति, कला, धर्म का यह सहज सम्मिश्रण किस उदान्त भाव का प्रतीक है, सहसा समझ में नहीं आता। ऐसा भारत, भारत में क्यों नहीं है.......

विमान धीरे-धीरे गत्ति पकड़ता हुआ, आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा है। जिन घने, उनीले, उनींदे बादलों से शंकाएँ पैदा हो रही थी वे कहीं निचली से भी निचली सतहों पर रह गए हैं। इसके ऊपर मेघ-मालाएँ नहीं, मांत्र निरभ्र स्वच्छ नीला आकाश है- अपनी विशालता एवं विविध अनुपम छटाओं के साथ।

कुछ वर्ष पहले जब दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर के लिए रवाना हो रहा था तो किसी सहयात्री ने बतलाया था कि दिल्ली से पोर्ट ब्लेयर और बैंकॉक की दूरी लगभग समान है तो आज उसी समान दूरी को, एक दूसरे रूप में तय कर रहा हूँ।

साढ़े तीन घण्टे का सफर। थाई दूतावास से कुछ उपयोगी सामग्री मिल गई थी, उसके पन्ने पलटने लगता हूँ। सोचता हूँ-

सीमाओं से परे का यह असीम भारत मेरे लिए हमेशा क्यों गहरी जिज्ञासाओं का विषय रहा है? वह इतना रहस्यमय, रोचक, रोमांचक क्यों है? कभी-कभी कल्पना करते हुए भी सब सच नहीं लगता। अंग्रेजों के द्वारा हमें तो हमेशा मात्र यही सिखलाया गया था कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक सीमाएँ हैं भारत की। फिर श्रीलंका, नेपाल, बर्मा, भूटान, तिब्बत, इण्डोनेशिया, लाओस, कम्बोडिया, थाईलैण्ड, विएतनाम, चीन, जापान, कोरिया, मंगोलिया आदि में बिखरा यह भारत कौन सा है? क्या है?

सदियाँ बीत गई, पर सदियों पूर्व संजोया सब, आज भी वहाँ ज्यों-का-त्यों धरा है, अनमोल धरोहर के रूप में।

भी-काडू नदी 'माँ गंगा' की ही अपभ्रंश है। इण्डोनेशिया की भाषा को 'भाषा इण्डोनेशिया' कहते हैं जिसमें लगभग अठारह प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं। वहाँ के पूर्व राष्ट्रपति का नाम सुकर्ण था। सुकर्ण की पुत्री का नाम 'सुकर्णपुत्री मेधावती' है। कहा जाता है कि सुकर्ण के पिता महाभारत के प्रकाण्ड पण्डित थे। उन्होंने भाषा इण्डोनेशिया में अपना अलग महाभारत लिखा था। सुकर्ण स्वयं अपने को घटोत्कच कहते थे। घटोत्कच का अवतार मानते थे । इण्डोनेशिया का नगर जकार्ता 'यज्ञकर्ता' का ही बिगड़ा हुआ रूप है। इण्डोनेशिया की तीनों सेनाओं की सम्मिलित पत्रिका का नाम 'त्रिशक्ति' है। बालिद्वीप के अधिकांश लोग वैदिक मत के अनुयायी हैं। उनके धर्मग्रंथ पाली और संस्कृत में है।

कम्बोडिया में अंकोरवाट विश्व का सबसे बड़ा हिन्दू मन्दिर है-आठ वर्ग मील के दायरे में बिखरी विष्णु, शिव आदि की विशाल प्रस्तर प्रतिमाएँ। वहाँ के राजघराने की सम्भ्रान्त महिलाओं को "देबी" नाम से सम्बोधित किया जाता है। लाओस की राष्ट्रभाषा तथा जन भाषा विशुद्ध पाली है, हाँ, उसे वे अब लिखते किसी अन्य लिपि में हैं। इन दक्षिण-पूर्व के एशियाई देशों से थाईलैण्ड यानी स्वतंत्रता प्रेमियों का देश जिसे कभी स्वर्ण देश के नाम से भी जाना जाता था, वह और भी भारतमय है। इस समय वहाँ के राजा भूमिबल अतुल तेज का वंशगत नाम राचन्द्र नौ है। वहाँ भी एक अयोध्या है। उनको अपनी एक 'लव पुरी' भी।

विमान धीरे-धीरे दलान की ओर फिसल रहा है। माइक पर सूचना प्रसारित की जा रही है "अब हमारा विमान बैंकाक के निकट है। डान युवान हवाई अड्‌डे पर उतरने ही बाला है....."।

यात्री सामान समेटने के लिए उतावले दीखते हैं। जैसे ही विमान उतरता है, चारों और एक नया नजारा दिखने लगता है। एक नई दुनिया।

अमेरिकी या यूरोपियन ढंग के विशाल ऐक्सप्रैस हाईवे से हवाई अड्‌डा मुख्य शहर से जुड़ा है। कारें हवा से बातें करती हुई फर्राटे से भागी जा रही हैं।

बैंकाक दक्षिण-पूर्वी एशिया का सबसे महत्वपूर्ण शहर है। सड़कों की अपेक्षा नहरें अधिक हैं यहां। नावें यातायात के काम ही नहीं आती, उनके माध्यम से दैनिक व्यापार भी होता है। सब्जी की ये तैरती दूकानें गली-गली में घूमती रहती हैं। वहीं कहीं इन में जलपान की भी व्यवस्था होती है।

यहाँ भारत की तरह फेरीवाले नहीं दीखते। प्रायः सारा कारोबार इन्हीं जल-मागों से सम्पन्न हो जाता है। कहा जाता है कि 20-25 साल पहले की अपेक्षा अब ये जल-मार्ग कुछ कम संख्या में हैं। फिर भी आज बैंकाक 'पूर्व का वेनिस' कहा जाता है, इन जल-पथों के कारण। इनसे यात्रा करना सचमुच में एक रोमांचक अनुभव होता है।

मार्ग में 'राम-पथ' दिख रहा है, कहीं 'सीता वाटिका'। जिस पाँच सितारा होटल में हमारे ठहरने की व्यवस्था है, कहा जा रहा है कि वह किन्हीं भारतीय मूल के नामधारी सिख महाशय का है, जिनके पूर्वज कई पीढ़ियों पूर्व यहाँ आकर बस गए थे।लगभग दो लाख वर्ग मील में फैले, सवा तीन करोड़ आबादी वाले इस देश की कुल जनसंख्या के लगभग सात प्रतिशत लोग भारतीय मूल के हैं, जो विभिन्न व्यवसायों से जुड़े हैं।

थाइलैण्ड का सारा व्यापार दो समुदायों के उद्योगपतियों के हाथों में बतलाया जाता है। भारतीय तथा चीनी मूल के। बड़े-बड़े औद्योगिक प्रतिष्ठानों एवं होटलों के वे ही मालिक हैं। भारतीयों में भी अधिकांश नामधारी सिख हैं या पूर्वी उत्तर प्रदेश या बिहार के।

रास्ते के सड़क के किनारे-किनारे कचनार के हल्के बैंगनी रंग के फूलों से लदे वृक्ष देखकर नई दिल्ली की सड़कों की स्मृति ताजा हो जाती है। होटल में पहुँचकर कहीं से भी ऐसा नहीं लगता कि हम भारत में नहीं हैं। स्वागत कक्ष में सिख गुरुओं के भव्य रंगीन चित्र सुशोभित हैं। ताजा फूलों को रंग-बिरंगी मालाएँ। नीचे अगरबत्ती की सुगन्ध। प्रज्वलित दीपक ।

होटल के मालिक सरदारजी लपक कर हमारा स्वागत करते हैं। कहते हैं यह होटल नहीं, घर है, आप लोगों का। आपको कोई कष्ट नहीं होगा।जितने दिन रहे, सचमुच कोई कष्ट नहीं हुआ, घर-जैसा ही लगा।

दिल्ली के मुकाबले थोड़ा गर्म मौसम है। पूरे कपड़ों की आवश्यकता अनुभव नहीं होती, बल्कि दोपहर को धूप चुभती हुई जैसी लगती है। यहाँ के थैमसेट, धर्मशास्व विश्वविद्यालय में दो दिन का सेमीनार है। दोपहर पश्चात् विश्वविद्यालय जाते हैं तो वह हर तरह से हमें आकर्षित करता है। परिसर के मध्य में अश्वत्य यानि पीपल का एक विशाल वृक्ष है। जड़ों के ऊपर उसके तने पर रंग-बिरंगे कपड़ों की पट्टियाँ-सी फीते की तरह बँधी हैं। कच्चा रंगीन धागा भी लपेटा हुआ है। लगता है कि वृक्ष की पूजा-अर्जना का कार्य अभी हाल ही में सम्पन्न हुआ है।

भारत-विद्या विभाग की अध्यक्षा, प्राचीन इतिहास की प्राध्यापिका प्रो० श्रीसुरंग पुलधोपियों हमारी मेजबानी करती हुई बतलाती हैं कि थाई भाषा में युनिवर्सिटी को 'महाविधिलया' कहते हैं। हाँ, थाई भाषा के लगभग चालीस प्रतिशत शब्द संस्कृत एवं पाली के हैं। उच्चारण में भिन्नता के कारण सीधे-सीधे समझने में व्यवधान आता है। बातचीत का तथा सेमीनार का क्रम साथ-साथ चलता रहता है।

भारत थाई सांस्कृतिक सम्बन्धों के परिप्रेक्ष्य रामायण मुख्य विषय है। अनेक देशों के विद्वान अपने-अपने अनुभव एवं अनुभूत्तियों को उजागर करते हैं। केवाड़ सान विश्वविद्यालय मलेशिया की परशियन विभाग की अध्यक्षा प्रो० नोरिया मुहम्मद कहती हैं, मैं रामायण से बहुत प्रभावित हुई हूँ। इस्लाम पर आस्था रखती हैं, पर यह ग्रंथ मेरे लिए प्रेरणा का अजस्र स्रोत है। मैं इसे धर्मग्रंथ नहीं, युग का एक यथार्थ काव्य मानती हूँ।

एक पिता के रूप में, एक पति के रूप में, एक पुत्र के रूप में, एक शासक के रूप में राम का जीवन-हर दृष्टि से मुझे आदर्श लगता है। मुझे विश्व इतिहास में ऐसा नायक कोई दूसरा नहीं दीखता, जो इतना दयालु, इतना कर्त्तव्यनिष्ठ, समय आने पर इतना कठोर भी हो सके। ऐसा नीतिनिष्ठ आदर्श मुझे हर तरह से प्रेरित करता है। इसे धर्म की सीमाओं से बाँधना इसके प्रति न्याय करना नहीं होगा। यह एक व्यक्ति नहीं, विचार की महागाथा है।

थाईलैण्ड की राजकुमारी चक्री श्रीधरोन अपने वक्तव्य में कई महत्वपूर्ण नए तथ्यों को उजागर करती हैं। मुझे याद आता है थाईलैण्ड की ही एक विदुषी राजकुमारी गलियानी यानी कल्याणी ने कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की थी।

शाम को नदी में नौका विहार का कार्यक्रम है। चाव-फरी नदी के तट पर बसा यह शहर, कई दृष्टियों से सदैव उल्लेखनीय रहा है। नदी के पश्चिमी तट पर धनपुरी है, और पूर्व में बैंकाकं। दो भिन्न शहर हुए भी हर अर्थ में अभिन्न।

बैंकाक से पहले थाईलैण्ड की राजधानी सुखोदया थी, फिर अयोध्या बनी। सुखोदया साम्राज्य की स्थापना राजा इन्द्रादित्य ने की थी। उसके शासन काल में नव निर्माण के अनेक कार्य हुए। सन् 1377 में यह साम्राज्य समाप्त हो गया। डीजल बोट जल-धाराओं को चीरती हुई, शनैः शनैः आगे बढ़ रही है। उसकी दिशा अब दक्षिण नहीं, पश्चिम की ओर है।

चाव-फरी नदी में साँझ' का सूरज डूब रहा है। जल पर रंग-बिरंगे अनेक प्रतिबिम्ब झिलमिला रहे हैं। चारों ओर विद्युत-प्रकाश टिमटिमाने लगता है। नदी का विस्तृत पाट दूर तक अपनी बाँहें पसारे अनन्तकाल से निश्चिन्त लेटा है।

यही है चाव-फरी का ऐतिहासिक तट, जहाँ पर ईसा से लगभग छह शताब्दी पूर्व सब से पहले भारतीय वैदिक धर्म प्रचारक एवं व्यवसायी रुके थे। इसी नदी के किनारे अपनी नन्हीं-नन्हीं बस्तियाँ बसाई थीं उन्होंने। अपने साथ वे अपना दर्शन लाए थे, अपनी विशिष्ट संस्कृति लाए थे, अपना धर्म लाए थे, अपनी भाषा अपने संस्कारों के साथ-साथ अपनी विशेष पहचान भी लाना न भूले थे।

यहाँ रहकर यहाँ के लोगों के साथ वे दूध में पानी की तरह समाकर, हमेशा-हमेशा के लिए यहां के होकर रह गए थे। आज उनमें और यहाँ के मूलनिवासियों में कहीं कोई अन्तर नहीं रह गया है। यह पहचान भी एक तरह से समाप्त हो गई है कि उनमें कौन क्या था। सभी थाई हैं, थाई धरती के अपने सुपुत्र ।

बौद्ध-धर्म, वैदिक धर्म के बहुत समय बाद आया। जातक कथा में, 'सुत्तपिटक' में लिखा है कि राजा महाजनक अपना भाग्य अजमाने के लिए 'समवर्णद्वीप' जाता है। इसका अर्थ यह है कि बुद्ध से पहले 'सुवर्षा द्वीप' से भारतीयों का आत्मीय सम्पर्क था। कालान्तर में तीसरी शताब्दी ईस्वी पूर्व सम्राट अशोक ने अपने कुछ बौद्ध भिक्षु विद्वानों को यहाँ धर्म-प्रचार के लिए भेजा था।

आप किस सोच में डूब गए भाई साहब ? इकबाल कहते हैं। मैं जैसे जागता हूँ। देखता हूँ-डीजल-बोट अब बीच धार में है। ऐसी एक नहीं, अनेक नावें कागज की कश्तियों की तरह, समुद्र की जैसी विस्तृत, इस विशाल नदी के विस्तीर्ण वक्ष में तैर रही हैं। कतार की शक्ल में कुछ तेजी से भागती हुई पूर्व की ओर जाने के लिए मचल रही हैं। मुझे केरल में कोचीन का दृश्य सहसा याद आता है, जब इसी तरह दैनिक यात्रियों से नाबें कोचीन से एर्नाक्यूलम की दिशा से आती-जाती हैं।

प्राचीन वैदिक-संस्कृति का प्रभाव थाई-संस्कृति में आज भी विद्यमान है। हाँ, यह भी एक यथार्थ है कि बौद्ध मत के आगमन के बाद धीरे-धीरे वह धूमिल होने लगा था। परन्तु अपने अस्तित्व का अहसास वह आज भी जतलाता है। लगभग दो हजार छह सौ वर्ष पूर्व थाईलैण्ड से भारत के आवागमन का जो क्रम आरम्भ हुआ था, वह आज तक अबाध गति से चल रहा है।

दूसरे विश्व युद्ध के समय हजारों भारतीय रोजी-रोटी के लिए थाईलैण्ड गए थे, जो बाद में स्थायी रूप से वहीं बस गए। बाजारों में यत्र-तत्र उनकी खोखेनुमा दूकानें बड़ी संख्या में दिखती हैं। वे आज भी परस्पर भोजपुरी, मैथिली में बातें करते हैं। अपने उत्सव त्यौहार मनाते हैं। आज बौद्ध और वैदिक मत यहाँ पर इतने घुल-मिल गए हैं कि उन्हें अलग-अलग करके देखना सम्भव नहीं।

लौटते समय नदी का दृश्य और भी अ‌द्भुत लगता है। अंधियारे में सारा शहर दीपावली की तरह जगमगा रहा है। नदी की श्यामल लहरों के साथ-साथ प्रकाश की अनगिनत धाराएँ भी प्रवाहित हो रही हैं। लग रहा है, जैसे स्वप्न-लोक का कोई अलौकिक दृश्य हो। दिन में विश्वविद्यालय परिसर में ही बैंकाक में रहने वाली प्रवासी भारतीय महिलाओं के संगठन ने अतिथियों के लिए भारतीय भोजन की व्यवस्था की थी। परम सन्तोष हुआ कि इस यात्रा में भूखा नहीं रहना पड़ेगा। जापान और कोरिया प्रवास के कटु अनुभव अभी तक स्मृति-पटल पर कहीं अंकित थे।

वहाँ से लौटते ही एक विशाल भवन के विशाल रंग-मंच में विशेष रूप से अतिथियों के लिए रामकीयन के मंचन की व्यवस्था की गई है। थाई संस्कृति की पहचान है- रामकीयन यानी रामकीर्ति। विश्वविद्यालय में प्राध्यापक बतला रहे थे कि कुछ स्थानों पर पाँचवीं कक्षा से ही रामकीयन का पारायण आरम्भ कर दिया जाता है। बच्चे अपने-अपने ढंग से इसका मंचन भी करते हैं।

महाकवि बाल्मीकि द्वारा संस्कृत में लिखी रामायण थाई कवियों के लिए विशेष प्रेरणा का स्रोत रही। थाई-भाषा के अनेक महाकवियों ने अपने-अपने ढंग से इसकी पुनर्रचना की। उसी का परिणाम है कि इस तरह की अनेक प्राचीन थाई रामायण आज भी उपलब्ध हैं। परन्तु आधुनिक राजवंश के निर्माता रामचन्द्र प्रथम द्वारा लिखी रामकीयन सबसे अधिक चर्चित रही।

राजा रामचन्द्र प्रथम संस्कृत एवं थाई भाषा के उद्भट विद्वान थे। अब से सैकड़ों साल पहले लिखी यह 'रामायण' आज भी वहाँ इतनी लोकप्रिय है कि थाई लोग विश्वास करने लगे हैं कि ये घटनाएं थाईलैण्ड में ही घटित हुई थीं। राम-रावण, सीता-सारे पात्र मूलतः थाई हैं। थाई बौद्धों के घर-घर में आदर एवं श्रद्धा से पूजा जाने वाला यह ग्रंथ 'रामकीयन' ही है। संस्कृतियों एवं धर्मों का ऐसा अद्भुत समन्वय थाईलैंड में ही देखा जा सकता है।

नियत समय पर 'रामकीयन' आरम्भ होती है। परिष्कृत परिधानों में भारतीयता की स्पष्ट छाप दीखती है। जहां शब्द नहीं, मात्र भाव अभिव्यक्ति का जीवन्त माध्यम बनते हैं। मणिपुरी-नृत्य की जैसी स्वप्निल लय। श्रोता मुग्ध भाव से उसके अवलोकन में खो जाते हैं। इसमें अपने किस्म के राम, अपने किस्म का रावण और अपनी तरह के हनुमान हैं। लगता है, पात्र अभिनय नहीं कर रहे, बल्कि यथार्थ का एक-एक सजीव क्षण स्वयं जी रहे हैं।

थाई नरेश ने बाल्मीकि रामायण का थाई में इस तरह रूपान्तरण किया है, थाई परम्पराओं में उसे इस तरह ढाल दिया है कि ऐसा लगने लगता है जैसे 'रामकीयन' थाईलैंड के अलावा, अन्यत्र की हो ही नहीं सकती। बहुत से मूल नाम भी अपनी सुविधा से थाई में ही कर दिए हैं, ताकि वह अधिक-से-अधिक स्वाभाविक लगे। रावण को रावण न कहकर 'तात सकान' यानी 'दशासन' दानव कर दिया है।

मूल कथा में भी यत्र-तत्र परिवर्तन दीखता है। जैसे हनुमान को ब्रहमचारी नहीं दिखलाया है। बालि को राम के हाथों क्यों मरना पड़ा, इसकी भी अपनी एक अलग व्याख्या है। मन्दोदरी के बारे में एक और दिलचस्प अध्याय जोड़ा गया है। 'सीदा' यानी 'सीता' के परित्याग की भी एक दूसरी ही कहानी है। थाई रामायण को देखना, स्वयं एक सुखद अनुभव से गुजरना है।

लौटते-लौटते बहुत वक्त हो जाता है। दिन भर की थकान। हम भोजन के पश्चात् चलने लगते हैं तो एक स्वीडिश पर्यटक व्यंग से हँसता हुआ कहता है, 'दुनिया में यह अपने किस्म का अकेला महानगर है, जो सारी रात जागता रहता है। शायद इसीलिए विदेशी सैलानियों की यहाँ इतनी भीड़ है। विलासिता में तो इसने पश्चिम को भी पीछे छोड़ दिया है।' जगह-जगह पोस्टर लगे हैं 'एड्स से सावधान'। पोस्टर-ही-पोस्टर।

कहा जाता है कि विश्व में एड्स के सबसे अधिक रोगी यहाँ पाए जाते हैं। प्रातः अभी बिस्तर पर ही हूँ कि पास कहीं से कोयल का जैसा सुमधुर स्वर सुनाई देता है। चौंककर उठता हूँ। बाहर बालकनी की ओर लपक कर जाता हूँ-नन्हें-नन्हें वृक्षों के आकार के अनेक पौधे हैं। नाना भाँति के फूलों के। पूरा एक जंगल बालकनी में उगा है। हरा-भरा। फूल ही फूल।

बाईं तरफ से फिर वही मधुर आवाज। अपने सहयात्रियों को जगाता हूँ। वे भी भागते हुए आते हैं। चौंकता है। 'हाँ, कोयल ही तो है।' जितने दिन यहाँ रहते हैं, यह चिड़ियाँ रोज-रोज आकर हमें जगा जाती है। थाईलैंड में भारत का भ्रम जगाती है।

अभी अयोध्या देखनी है। लवपुरी भी !

श्री हिमांशु जोशी
थाईलैण्ड- भारतीय संस्कृति जहां आज भी जीवित है
"संस्कृति :अंक-02"

Follow us on social media and share!