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हिमाचल प्रदेश में मंदिर निर्माण शैलियाँ

हिमाचल प्रदेश में मंदिर निर्माण शैलियाँ

हिमाचल प्रदेश को देव भूमि के नाम से जाना जाता है। यहाँ के लोग धार्मिक क्रिया-कलापों में बहुत विश्वास रखते हैं। यहाँ के प्रत्येक गाँव में एक से अधिक मन्दिर होना आम बात है। प्रत्येक गाँव का अपना ग्राम देवता होता है, जिसकी पूजा ग्रमीण लोग सामूहिक रूप से करते हैं। इस कार्य को पूरा करने के लिए प्रत्येक गाँव में कई मन्दिर बनाए जाते हैं। अतः हिमाचल प्रदेश को 'मंदिरों की भूमि' कहा जा सकता है। कलात्मक रूप में ये मन्दिर सांस्कृतिक धरोहर को संजोये हुए हैं। कला के रूप में मंदिर निर्माण शैली, लकड़ी पर की गई नक्काशी, मूर्तिकला, पत्थरों पर की गई चित्रकला तथा भित्तिचित्र विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।

मन्दिर के निर्माण के लिए ऐसे स्थान का चयन किया जाता है जहाँ पहाड़ी, झरना, तालाब, गुफा आदि हों। मन्दिरों के आस-पास कोई न कोई वृक्ष भी होता है। मंदिर के अन्दर तथा बाहर देवताओं की मूर्तियाँ होती है। स्थानीय देवता के अतिरिक्त मन्दिर में ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा दुर्गा की मूर्तियाँ भी होती हैं।

हिमाचल प्रदेश में जो मन्दिर बने हैं वे किसी न किसी विशेष शैली के पोषक रहे हैं। यह शैलियाँ समय तथा राजनीतिक सत्ता के परिवर्तन के साथ बदलती रही हैं। ये मंदिर निर्माण शैलियाँ इस क्षेत्र के प्राचीन इतिहास तथा परंपराओं से सम्बन्ध रखती हैं। धार्मिक कृत्यों तथा मन्दिरों के बाहुल्य के कारण यहाँ के कई स्थानों को विशेष संज्ञा प्रदान की गई है। भरमौर को 'शिव भूमि', मण्डी तथा निरमण्ड को पर्वतीय क्षेत्रों में छोटी काशी के नाम से जाना जाता है।

हिमाचल में मंदिर निर्माण की प्रमुख तीन शैलियाँ हैं। ये हैं शिखर शैली, पैगोडा शैली, पहाड़ी वास्तु शैली। पहाड़ी वास्तु शैली के अतिरिक्त बौद्ध वास्तु शैली, बंगला वास्तु शैली, मुगल तथा सिक्ख वास्तु शैली का प्रचलन भी प्रदेश में देखा जा सकता है।

हिमाचल प्रदेश में शिखर शैली के मंदिर आठवीं शताब्दी के पाए जाते हैं। यह शैली गुप्तकाल और प्रतिहार काल में विशेष रूप से प्रचलित थी। इस शैली के मंदिरों का आधार चार कोनों वाला होता है। चबूतरे के चारों ओर सीढ़ियाँ होती हैं। मंदिर की छतें सपाट तथा शिखराकार की होती हैं। मंदिर के लिए ऐसा स्थान चयनित किया जाता है जिसमें सूर्य की प्रथम किरण प्रवेश द्वार से सीधे प्रमुख देवस्थल पर पड़े।

प्रवेश द्वार से अन्दर प्रमुख देवता की प्रतिमा दिखाई देती है। मंदिरों की दीवारों को सुन्दर ढंग से अलंकृत भी किया जाता है। गर्भगृह के आस पास सभा मंडल बनाया जाता है।हिमाचल प्रदेश में शिखर शैली के मंदिरों के तोरण द्वारों पर आकर्षक नक्काशी की गई है। द्वारों के चौखटों पर भी चित्रकारी उकेरी जाती है। ऊपर के प्रमुख चौखट पर विष्णु, शिव, गणपति, दुर्गा आदि के चित्र शिर्ष पर बनाए जाते हैं। प्रमुख द्वारों की दाई तथा बाईं भुजाओं पर जानवरों, पक्षियों, मनुष्य, सांप आदि के चित्र बनाए जाते हैं।

शिखर शैली के मंदिर हिमाचल में जिला कांगड़ा में विष्णु मंदिर नुरपूर, शिव मंदिर मसरूर, चम्बा जिले में लक्ष्मी नारायण मंदिर चम्बा, शक्ति देवी मंदिर छत्राड़ी, लक्ष्णा देवी मंदिर भरमौर, कुल्लू जिले में विश्वेश्वर महादेव मंदिर बजौरा गायत्री व गौरी शंकर मंदिर जगतसुख, गौरी शंकर मंदिर नगर, मण्डी जिला में अर्धनारीश्वर, भूतनाथ, त्रिलोकनाथ, पंचवक्त्र, सिद्धभद्रा, साहिबनी, महामृत्युंजय के मंदिर स्थित हैं। लाहुल के उदयपुर में स्थित मृकुला देवी मंदिर तथा जिला शिमला में शिव शक्ति मंदिर हाटकोटी तथा सूर्य मंदिर, भी शिखर शैली में बनाए गए हैं।

पैगोडा शैली हिमाचल प्रदेश में मंदिर निर्माण की अन्य विशिष्ट शैली है। यह पहाड़ी क्षेत्रों, नेपाल, भूटान, सिक्किम में भी प्रसिद्ध है। इस शैली से बनाए गए मंदिर वर्गाकार अथवा आयताकार होते हैं। मंदिर की दीवारें देवदार की मोटी-मोटी लकड़ी की कड़ियों से बनाई जाती हैं। इन कड़ि‌यों के मध्य गारे तथा पत्थरों की चिनाई की जाती है। इस तरह की बनाई गई दीवारें बहुत मजबूत होती हैं। ऐसे मंदिरों की छतों को स्लेटों अथवा लकड़ी से ढ़‌का जाता है।

प्रत्येक मन्जिल का फर्श मोटे-मोटे तहतों द्वारा बनाया जाता है। इस प्रकार के मंदिरों में कई छते होती है। कई मंदिरों में सात तक मन्जिले हैं। ये छते नीचे से ऊपर की ओर घटती जाती हैं। अर्थात् नीचे वाली छत सबसे बड़ी तथा सबसे ऊपर वाली छत सबसे छोटी है ये छते एक के ऊपर दूसरी, दूसरी के ऊपर तीसरी, तीसरी के ऊपर चौथी वर्गाकार होती है। कई मंदिरों में सबसे ऊपर वाली छत शंकु की तरह गोल होती है।

पैगोडा शैली के मंदिर में सबसे नीचे वाला कक्ष उठने-बैठने के लिए प्रयोग किया जाता है। मन्दिर के बीच का मुख्य भाग छतरी की तरह गोल होता है यहाँ प्रधान देवता की मूर्ति स्थापित होती है। इस भाग के चारों ओर बालकनी होती है। इन मंदिरों में लकड़ी के ऊपर की गई चित्रकारी उच्च स्तर की पाई जाती है। पैगोड़ा शैली के मन्दिर प्रदेश के दो जिलों मण्डी तथा कुल्लू में अधिक पाए जाते हैं।

पैगोडा शैली के मंदिर जिला मण्डी में पराशरदेव मंदिर पराशर, ब्रह्मा मंदिर हीरी, कामक्षा तथा गौरी शंकर मंदिर करसोग, बौद्ध मंदिर रिवालसर हिडिम्बा देवी मन्दिर मनाली, त्रिपुरसुन्दरी मन्दिर नगर, त्रियुगीनारायण मंदिर दियार, ब्रह्म मंदिर खोखण, मनुऋषि मंदिर शैशर में देखे जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त जिला शिमला के भीमाकाली मंदिर सराहन, शिव मंदिर बलग, मण्डी जिला का मगरू महादेव मंदिर छत्तरी और किन्नौर जिला के शिव महेश्वर मंदिर सुंगरा में भी पैगोडा शैली का प्रभाव देखा जा सकता है। ये मंदिर पैगोडा मिश्रित पहाड़ी शैली के मंदिर हैं। शिव महेश्वर मंदिर सुगरा तिकोने आकार का मंदिर हैं।

इन मंदिरों के किवाड़, स्तंभ, तोरण, छत तथा दरवाजों पर आकर्षक चित्रकारी की गई है। चम्बा के शक्ति देवी मंदिर और लक्षणा देवी मंदिर, मण्डी के पराशर देव मंदिर और मगरू महादेव मंदिर, लाहुल के मृकुला देवी मंदिर, कुल्लू के हिडिम्बा देवी मंदिर तथा शिमला के भीमा काली मंदिर उत्कृष्ट काष्ठ कला के नमूने हैं।

हिमाचल प्रदेश के उत्तर-पूर्व के जनजातीय दो जिलों लाहौल स्पीति और किन्नौर में बौद्ध धर्म का अधिक प्रभाव रहा है। यहाँ अनेक बौद्ध मन्दिर है यहाँ की भौगोलिक स्थिति प्रदेश के अन्य भागों से भिन्न है। अतः इन बौद्ध मंदिरों के भवनों की शैली प्रदेश के अन्य भागों से भिन्न है। यहाँ के बौद्ध विहारों में तिव्बत का प्रभाव पड़ा है।

 

इस क्षेत्र के मंदिरों तथा बौद्ध विहार के निर्माण में बौद्ध वास्तु शैली का प्रयोग किया गया है। भवनों के निर्माण के लिए मिट्टी का प्रयोग किया गया है। छतें भी मि‌ट्टी से सपाट बनाई गई हैं। मटकंधी दीवारों का प्रयोग जलवायु के अनुरूप किया गया है। ये भवन सर्दी में गर्म रहते हैं। सपाट छतों से बर्फ हटाना आसान होता है। इन बौद्ध मंदिरों में बालू-मिट्टी की मूर्तियाँ तथा भित्तिचित्र बनाए गए हैं। स्पीति घाटी में बनास ताबो बौद्ध विहार 10वीं-11वीं शताब्दी में बनाया गया है।

ऐसे विहार दो या तीन मन्जिल वाले होते हैं। अधिकतर मन्दिरों में नीचे की मन्जिल में मूर्तियाँ रखी जाती हैं जब कि ऊपर वाली मन्जिल में पूजा की जाती है। कई मंदिरों में धार्मिक पुस्तकें तथा मूर्तियाँ ऊपर वाली मंजिल में ही रखी जाती हैं। गर्भगृह में प्रधान देवता का वास होता है जिसके चारों ओर परिक्रमा पथ कक्ष होता है। इस परिक्रमा पथ में आलिंदों में दीवार की तरफ मणिचक्र की श्रृंखला बनी होती है। श्रद्धालु परिक्रमा करते समय हाथ के स्पर्श से मणिचक्रों को घुमाते हैं।

भिक्षुओं के ठहरने की पूजा स्थल बहुत बड़ा होता दण्डवत स्थिति में सैकड़ों कई बड़े बौद्ध विहारों में हजारों बौद्ध व्यवस्था की गई है। बौद्ध वास्तु शैली में है जहाँ श्रद्धालु बैठकर, खड़े होकर अथवा की संख्या में पूजा अर्चना करते हैं। इन बौद्ध विहारों में शयनकक्ष, रसोईघर, अतिथि गृह, भण्डार आदि के लिए अलग-अलग व्यवस्था की गई है। "की" बौद्ध मठ में इस प्रकार की अच्छी व्यवस्था देखी जा सकती है।

पूजा स्थल में पूजा की विशेष सामग्री हमेशा उपलब्ध रहती है। पूजा उपकरणों में मणिचक्र, घंटा, वज्र, ढोल, कङलिङ प्रमुख हैं। बौद्ध वास्तु शैली में से निर्मित रिवालसर (मण्डी) का बौद्ध मंदिर आठवीं सदी का बना है। इसमें पैगोडा शैली का प्रभाव भी परिलक्षित होता है। बौद्ध वास्तु शैली के दो बड़े बौद्ध विहार स्पीति घाटी में 'ताबो' गोम्पा बौद्ध विहार' तथा 'की गोम्पा बौद्ध विहार' है। अधिकतर बौद्ध विहार गुरु पद्म सम्भव को समर्पित है।

हिमाचल प्रदेश में कई मंदिर पहाड़ी वास्तु शैली से निर्मित हुए हैं। इसे स्थानीय परम्परागत शैली कहा जा सकता है। यह शैली पिछड़े ग्रामीण आँचलों में अधिक प्रचलित है। मंदिर निर्माण के लिए पत्थरों का प्रयोग किया गया है। छत के लिए स्लेट तथा लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। दीवार के अन्दर और बाहर चिकनी मिट्टी का प्रयोग किया जाता है। दरवाजों, खि‌ड्कियों तथा किवाड़ों में देवदार की लकड़ी का प्रयोग किया गया है। इस लकड़ी में नक्काशी की गई है। नक्काशी में फल-फूल, पशु-पक्षिओं के चित्र बनाए गए हैं।

इस शैली के मन्दिर तीन मन्जिलों से अधिक नही होते हैं। मन्दिर के गृह भाग में प्रधान देवता का मोहरा रखा जाता है जिसके दर्शन के लिए दरवाजा खुला रखा जाता है। देवता के धुने के लिए अलग स्थान बनाया जाता है। देवता के आभूषणों, वस्त्रों, वाद्य यन्त्रों, मोहरों को सुरक्षित रखने के लिए विशेष स्थल बनाया जाता है। इन्हें धरातल के कमरे में रखा जाता है। लेकिन इन्हें रखने के लिए ऊपर की मंजिल से रास्ता होता है।

मन्दिर से कुछ दूरी पर देहरा बना होता है। यह एक छोटा-सा मंदिर है जहां प्रत्येक संक्रान्ति को देवता की पूजा होती है। देहरे में देवता का गुर आवेश में आकर लोगों को शुभकामनाएँ, देता है और मनोकामना पूर्ण करने का वचन देता है। देवता का गुर लोगों के बारे में भविष्यवाणी भी करता है।पहाड़ी वास्तु शैली के निर्मित मन्दिर मण्डी जिले में मगरू महादेव मंदिर छतरी और वशिष्ठ मंदिर तथा जिला किन्नौर में कामरू मंदिर, कुल्लू में बिजली महादेव मंदिर सांगला प्रमुख हैं।

हिमाचल प्रदेश में मुगलों तथा सिक्खों के प्रभाव के कारण मंदिर निर्माण की शैली प्रभावित हुई है। इस प्रकार के मंदिरों में गुबन्द की तरह आकार प्रदान किया गया है। गुबंदनुमा शैली का प्रभाव निचले हिमाचल में अधिक देखा जा सकता है। इस शैली में बने मंदिरों का ढाँचा चौकोर होता है। गुबन्द को सुनहरे रंग में रंगा जाता है। दीवारों तथा छतों को भित्तिचित्रों से सजाया गया है। मन्दिरों को अन्दर से शीशों के विभिन्न आकार के टुकड़ों तथा संगमरमर से सजाया गया है।


श्यामा काली मंदिर (हिमांचल प्रदेश)

इस शैली के मंदिरों में जिला मण्डी का श्यामाकाली और भुवनेश्वरी मंदिर, जिला कांगड़ा का ज्वालामुखी तथा ब्रजेश्वरी मंदिर, जिला शिमला का भीमाकाली मंदिर प्रमुख हैं। पौटा साहिब तथा रिवालसर के गुरुद्वारों में मुगल अथवा सिक्ख आधारित गुबन्दनुमा शैली का प्रयोग हुआ है। प्रदेश में अनेक मंदिर दो मन्जिलों वाले भी हैं। ये पत्थरों से बनाए गये हैं तथा छतों में स्लेटों का प्रयोग किया गया है। दीवारों की चिनाई के लिए पत्थरों के साथ लकड़ी का प्रयोग भी हुआ है। इस शैली को बँगलानुमा शैली कहा जाता है।

इन मंदिरों का मध्य भाग पत्थरों तथा मिट्टी की दीवार से बना है जहाँ देवता का स्थाई वास होता है। गर्भगृह के चारों ओर खुला बरामदा बना है। नीचे वाली मन्जिल में चारों ओर लकड़ी के खम्भों से बना बरामदा बना है। यह बरामदा बाहर की तरफ खुला होता है। खुले बरामदे से ही गर्भगृह को रास्ता (दरवाजा) बना होता है। इन मंदिरों की लम्बाई अपेक्षाकृत कम होती है। और कई मंदिरों की छतें तीन कोनों वाली होती है।

कुल्लू जिले में बना श्रृंग ऋषि का मंदिर बँगलानुमा शैली का अच्छा उदाहरण है। ऐसा मंदिर मणिकर्ण में भी है परन्तु यह एक मन्जिल वाला है। शिमला जिले में दतनगर में बना दतोत्रेय मंदिर भी बँगलानुमा शैली में बना है। हिमाचल में अनेक मंदिर पत्थरों तथा च‌ट्टानों से काट कर बनाए गए है। यहाँ कई गुफा मंदिर भी हैं। यह एक अलग प्रकार की शैली है। ये मंदिर बलुओं चट्टानों को काटकर बनाए गए हैं। पत्थरों को काटकर तथा शिलाओं को कुरेदकर मूर्तियाँ तथा तस्वीरें बनाई है।

कांगड़ा जिले के मसरूर में 160 फुट लम्बी तथा 105 फुट चौड़ी शिला को काटकर मंदिर बनाए गए हैं। इन मंदिरों का निर्माण आठवीं शताब्दी में हुआ है। बैजनाथ के रॉक कट मंदिरों का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ है। यहाँ पर चट्टानों को काटकर मूर्तियाँ बनाई गई हैं। पाषाण मंदिर शिमला जिला के निरत, रामपुर, चम्बा जिला के गुम, मणिमहेश चम्बा, कुल्लू जिला के बजौरा, निरमंड, नगर, जगतसुख तथा मण्डी नगर में भी देखे जा सकते हैं।

लेख-
किशोरी लाल शर्मा
गांव-थाच, डाकघर-पांगना
तहसील करसोग, जिला मण्डी, हिमाचल प्रदेश-175046
संस्कृति संयुक्तांक- 8/9

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