आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | भाद्रपद कृष्ण द्वादशी | बुद्धवार

नक्षत्र: मघा | योग: शुभ | करण: तैतिल

पर्व विशेष : | तदनुसार 07 अक्टूबर 2026

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देवकी के त्याग से तारणहार का प्राकट्य

देवकी के त्याग से तारणहार का प्राकट्य


रात्रि का निशीथकाल अपनी सहज गति से आगे बढ़ रहा था। बंदीगृह को सहसा प्रकाशित होता देख, देवकी ने अचंभित होकर अपनी दृष्टि खिड़की की ओर किया। उसे चन्द्र का आलोक भीतर प्रवेश करता दिखा। यद्यपि प्रसव की असह्य पीड़ा से लगभग निष्प्राण हो चुकी उसकी देह, उसे इतनी अनुमति तो नहीं दे रही थी कि वह उस खिड़की के समीप भी जा सके, किंतु घोर आश्चर्य से अचंभित देवकी अपनी प्रसव पीड़ा को भूलकर यकायक उठ खड़ी हुई। वह बंदीगृह की उसी एकमात्र छोटी सी खिड़की के समीप जाकर खिड़की से बाहर विश्व आकाश को निहारने लगी और चंद्रमा को अपनी पूर्णकला में उदित हुआ देख, विस्मय से भर गई।

इस अप्रत्याशित घटना से विस्मित हुई देवकी ने वसुदेव से पूछा, ''नाथ! आज कौन सी तिथि है?''  

चेहरे पर स्मितभाव लिए वसुदेव ने देवकी को उत्तर दिया, "प्रसव की वेदना से क्या यह भूल गई हो देवी कि आज भाद्रपद अश्वेत पक्ष की अष्टमी तिथि है?"

देवकी की जिज्ञासा अभी भी अशांत थी। वह आगे पूछती हुई बोली, ''तो फिर चंद्रमा अपनी पूर्ण कला में क्यों उदित हुआ है नाथ? आज तो पूर्णिमा है ही नहीं।" 

"कदाचित तुम कुछ विस्मरण कर रही हो देवकी!"

"विस्मरण! कैसा विस्मरण नाथ?"

"स्मरण करो कि तुम अदिति की अवतार हो देवी! पूर्वजन्म में बारह हजार वर्षों के कठिन तपस्या के फल में तुमने मोक्ष नहीं, बल्कि ईश्वर को अपनी संतान के रूप में माँगा था। स्मरण करो कि यह तुम्हारा आठवाँ गर्भ है।" 

देवकी के चेहरे पर गर्व उतरा आया। वह उसी गर्व के साथ आगे प्रश्न की, "तो क्या ईश्वर स्वयं चंद्र की वंश परम्परा में प्राकट्य होने जा रहे हैं... और क्या मैं ईश्वर की माता बनने जा रही हूँ नाथ?"

"हाँ देवकी! सभ्यता का उद्धारक शीघ्र ही आने वाला है। चारु चन्द्र की किरणें उसी ईश्वर के स्वागत में बिछी हुई हैं। बाहर सब कुछ शुभ और अद्वितीय हो रहा है। स्वयं ब्रह्मा द्वारा संचालित रोहिणी नक्षत्र अपनी प्रबलता पर है। नदियाँ जल से पूर्ण होकर भी शांत और मर्यादित बह रही हैं। समस्त सरोवर कमल से आच्छादित हैं

 और तो और द्वारपाल भी यह बता रहा है कि अभी रात्रि में भी वनों के पक्षियों का कलरव नगरों तक श्रव्य है।"

स्वप्न के सत्य होने की संभावना भी मनुष्य को प्रसन्न कर देती है। वसुदेव की बातें सुनकर देवकी के अधरों पर भी एक क्षण के लिए मुस्कान तैर गई, वह प्रसन्न हो गई। लेकिन दूसरे ही क्षण, देवकी उदास होकर बोली, "कैसे मिलेगा सभ्यता को तारणहार? सूर्य के उदय होते ही तो कर्तब्य के अधीन ये द्वारपाल, अपने नरेश कंस को बालक के जन्म का समाचार सुना ही आएंगे। फिर वह दुष्ट इसे भी इसके शेष भाइयों की भाँति" देवकी इसके आगे कुछ बोल न सकी, उसका गला रुंध गया।

"नहीं-नहीं देवकी! तुम बस देखती जाओ। परिस्थितियां शीघ्र ही अनुकूल होने वाली हैं। यह चन्द्र हमारे पुत्र के आते ही अस्त हो जाएगा। अंधेरे आकाश में भादों के मेघ तांडव करेंगे। शांत यमुना भी अत्यंत उग्र होकर बहेगी। मथुरा निद्रा की गोद में विश्राम करेगा और हमारा पुत्र अपने सुरक्षित स्थान पर सकुशल विस्थापित हो जाएगा।"

"विस्थापित हो जाएगा? आप यह क्या कह रहे हैं नाथ?"

"सत्य कह रहा हूँ भद्रे!"

देवकी अपने गर्भ के ऊपर अपना हाथ रखती हुई बोली, "नहीं स्वामी! सात संतानों के बिछोह के बाद यह देवकी अपनी आठवीं संतान को नहीं त्याग सकती। यह संतान ही तो मेरे जीवन का अवलंबन बनेगा, इसे भला मैं कैसे त्याग दूँ? आप पिता हैं नाथ! आपका कर्तव्य आपको भावुकता छोड़कर पत्थर बनने को कह रहा है, किंतु मेरी ममता मुझे पत्थर होने की अनुमति नहीं दे रही है।" 

"बात को तनिक समझो देवकी! आज की रात्रि यदि हम अपना भाग्य निर्धारित करने में असफल हो गए, तो सूर्य के उदय होते ही हमारे भाग्य का निर्धारण कंस करेगा। यह विधाता की योजना है। इसमें तुम्हारी या मेरी इच्छाओं का समावेश नहीं हो सकता और योजना की सुंदरता तो देखो कि तुम्हें पुत्र का नहीं, बस मोह का त्याग करना है। पुत्र तो उचित समय आने पर, लौटकर तुम्हारे ही पास आ जाएगा।"

"किंतु नाथ?" देवकी ने थोड़ा प्रतिवाद किया।

"किंतु-परन्तु के व्यर्थ संवाद का यह समय नहीं है देवी! बस तुम्हें इतना बोध हो कि धर्म, शांति और पुण्य की पुनर्स्थापना तथा विश्व कल्याण के लिए तुम्हारा यह त्याग परम आवश्यक है। आने वाला समय अपने भाग्य पर तभी मुस्कुराएगा, जब तुम अपने आठवें पुत्र का वियोग स्वीकार करोगी। आने वाले समय की दिशा और दशा दोनों तुम्हारे त्याग पर आश्रित है। क्या तुम यह नहीं जानती हो कि जिनके वर्तमान को सिर्फ़ विपत्तियाँ ही प्रेम करें, उनके भविष्य को सम्पूर्ण सभ्यता प्रेम करती है। तुम देखना! सभ्यता जितना प्रेम तुम्हारे पुत्र से करेगी, उतनी ही निष्ठा से तुम्हारे इस त्याग को भी स्मरण करेगी। तुम्हें यह त्याग करना ही होगा देवकी....... तुम्हें यह त्याग करना ही होगा।"

देवकी मौन हुई। देवकी का मौन, वसुदेव के बातों पर सहमत होने का संकेत था।

कुछ क्षण बाद.....

"मुझे संभालिए नाथ! ..... पीड़ा अब अपने उत्कर्ष पर है, देह अब दो भाग होने की अवस्था में आ चुकी है। लगता है सभ्यता के मुस्कुराने का समय समीप ही आ चुका है, किंतु यह पीड़ा अब असहनीय हो रही है नाथ! मुझे संभाल लीजिए।"

"बस थोड़ा सा धीरज और धरो देवकी! ईश्वर का प्राकट्य निरुद्देश्य नहीं है इसलिए प्रतीक्षा की घड़ी तनिक दीर्घ है, लेकिन ज्ञात तो है न कि शरभंग और अहिल्या से लेकर शबरी तक की प्रतीक्षा को ईश्वर ने पूर्ण किया था; हमारी भी होगी।" 

आगे, पीड़ा का ताप इतना अधिक था कि देवकी अपनी मुख से तो कुछ कह न सकी। उसने सहमति में अपना सिर हिलाते हुए दाँत की दोनों पाटियों और अपनी आँखों को कसकर भींच लिया। वह ईश्वर का स्मरण करने लगी।

अब तीसरा प्रहर त्रियामा आरंभ होने को था। देवकी एक बार पुनः विस्मय से भर गई, किंतु यह विस्मय बहुत सुखद था। उसकी चेतना ने उत्तर-पूर्व की दिशा से आ रही शंख की दिव्य ध्वनि को अनुभव किया। वह ईश्वर के प्राकट्य का स्वागत धुन था। देवकी आश्वस्त हो गई कि अब तारणहार आने को है, प्रतीक्षा पूर्ण होने को है।

ठीक मध्य रात्रि में बंदीगृह देदीप्यमान हो उठा। परम नियन्ता अवतरित हो चुके थे। धर्म की स्थापना होने को थी। अधर्म का कोहरा छंटने को था। युग बदलने को था। 

श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारी। हे नाथ नारायण वासुदेवा।।

लेख: करुणा सागर पण्डा, रायपुर (छत्तीसगढ़)

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