शारदीय नवरात्रि: छत्तीसगढ़ के सोनपैरी और लचकेरा ग्राम की लोकपरम्पराएँ
October 17, 2026
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पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

तमिल साहित्य का इतिहास लगभग ई.पू. तीसरी या चौथी शताब्दी से माना जाता है। तमिल संस्कृति को जानने के लिए हमें तमिल भाषा, तमिल लोगों के स्वभाव, उनके चरित्र और उनके चिंतन को समझना आवश्यक है। हर भाषा की अपनी परंपरा होती है। तमिल भाषा का विकास एवं संवर्धन भी उसी परंपरा का परिणाम है।
तमिल भाषा का विकास स्वतंत्र रूप से हुआ है। यहाँ कोई संघर्ष की स्थिति नहीं रही है। राजनैतिक, सामाजिक या सांस्कृतिक दृष्टि से तमिल भाषा बाहरी संघर्ष से बाधित नहीं हुई। तीसरी और चौथी शताब्दी में बौद्ध और जैन संन्यासी उत्तर भारत से तमिलनाडु में पहुँचे थे और अपने धर्म का प्रचार कर रहे थे। उन लोगों को राज्याश्रय भी प्राप्त था। उत्तर भारत की तरह तमिलनाडु में विदेशी आक्रमण बहुत ही कम हुए।
यही कारण है कि यहाँ की संस्कृति, भाषा, लोकाचार, जातीय सभ्यता आदि सुरक्षित रही। तमिल भाषा अति प्राचीन भाषा है। यह भाषा लगभग 5000 वर्ष पुरानी है। सबसे प्राचीन लक्षण ग्रन्थ का नाम 'तोलकाप्पियम' है। इसके पहले भी अनेक लक्षण ग्रन्थ लिखे गये थे, परन्तु आजकल वे अनुपलब्ध हैं।
हमने चिदम्बरम, कन्याकुमारी और कांचीपुरम आदि अनेक स्थानों के दर्शन किये होंगे। तमिलनाडु के भरतनाट्यम से भी हम सब भली-भाँति परिचित हैं। ऐसा कहा जाता है कि तमिल साहित्य शिवजी का वरप्रसाद है, यही कारण है कि तमिल लोग शिवजी के परम भक्त हैं। महर्षि अगस्त्य शिवजी के परम भक्त थे। इन्होंने ही सबसे पहले तमिल साहित्य की प्रथम व्याकरण लिखी, जिसका नाम अगतियम है, जो अभी उपलब्ध नहीं है।
तमिल के प्रारंभिक काल को संघकालीन युग कहते हैं। प्राचीन तमिल साहित्य में हमें तमिलों की विश्व बन्धुत्व की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। उस समय के साहित्य का मुख्य लक्ष्य 'समस्त मानव जाति मेरे बन्धु हैं था। संघकालीन रचना पुरतालुरु में यह उल्लेख है कि दूसरों के परिश्रम पर जीवित रहने वाले को घृणा की दृष्टि से देखना चाहिए जो अपने परिश्रम से जीवन-यापन करता है उसे सम्मानपूर्वक देखना चाहिए। "यारुम ऊरे यावरुम केलिर" (समस्त भुवन मेरी जगह और समस्त मानव जाति मेरे भाई-बन्धु हैं) यही तमिलनाडु की संस्कृति है।
संघकालीन युग में आत्म-सम्मान, आत्म-गौरव को बहुत अधिक महत्त्व दिया गया। यद्यपि उस समय के कवि राज्याश्रय प्राप्त कवि थे, फिर भी उन कवियों ने आत्म सम्मान और स्वाभिमान को बहुत महत्व दिया।
पुरुनानुरु की प्रसिद्ध उक्ति है:-
"माँगना नीचता है,
उससे नीचता है,
माँगने पर न कहना।
दान देना उत्तम कार्य है,
मगर उससे भी उत्तम है,
उसे नकार देना।"
संघकालीन कवियों ने सादा जीवन और उच्च विचार वाली भारतीय संस्कृति को अपनाया। तमिल एक शास्त्रीय भाषा है जैसे संस्कृत। यह भाषा बहुत ही प्राचीन और समस्त विशेषताओं से युक्त है। किसी अन्य भाषा से इसका उद्रम नहीं है। इसका स्वतंत्र विकास रहा है। तमिल भाषा समस्त दक्षिण भारतीय संस्कृति और साहित्यिक परम्पराओं का प्रतिनिधित्व करती है।
इसलिए प्रत्येक तमिल भाषी को अपनी भाषा, संस्कृति, साहित्य और अपनी मातृभाषा पर गौरव होना चाहिए। तमिल भाषा का प्रयोग तमिलनाडु, श्रीलंका, सिंगापुर, मलाया, मॉरिशस, मलेशिया, थाईलैंड, दक्षिण पूर्व के अनेक देशों में होता है। विदेशों में भी जहाँ तमिलभाषी जाकर बस गए हैं. वे भी दूसरों से तमिल भाषा में ही बोलते हैं। 'फिजी' में पहले तमिल भाषी मजदूरी के लिए वहाँ गए और वहीं पर बस गए। जाते वक्त वे अपने साथ तमिल की संस्कृति, भाषा और चिंतन भी लेते गए। आज इस देश में तमिलवासियों की संख्या लाखों में है।
तमिलनाडु में ईसा की पाँचवीं और छठी शताब्दी तक जैन और बौद्ध धर्म का अधिक प्रभाव रहा। इस समय दो महाकाव्य अधिक प्रसिद्ध है शिलप्पदिकारम' और 'मणिमेखलै'। इन दोनों महाकाव्यों में उस युग के सामाजिक जीवन, धर्म, त्योहार, संस्कृति आदि का उल्लेख मिलता है। पाँचवी शताब्दी के अंतिम चरण में तमिलनाडु में भक्ति का विकास तमिल के साहित्य में दिखाई देने लगा।
वैष्णव भक्ति का प्रचार करने वाले 'आलवार' कहलाए। उनके चार हजार दिव्य प्रबंधन का संग्रह नालायिर 'दिव्य प्रबंधम्' के नाम से प्रसिद्ध है। आलवार का अर्थ है 'प्रभु के प्रेम सागर में डूबा हुआ।' इन कवियों ने जनभाषा का प्रयोग किया। इन कवियों में प्रसिद्ध नम्माल्यार, कुलशेखर आलवार और दक्षिण की मीरा आण्डाल काफी प्रसिद्ध हैं। इन कवियों ने श्रीराम और श्रीकृष्ण को लेकर काव्य रचनाएं की हैं। आण्डाल तो तमिल साहित्य की मीरा है। उनके एक-एक पद में कृष्ण के अद्भुत कार्यों का वर्णन है।
तमिलनाडु में जहाँ एक ओर वैष्णव भक्ति का प्रचार हुआ तो दूसरी ओर शैव शक्ति का प्रचार हुआ। शिवभक्ति गाथाओं का संकलन 12 ग्रंथों में नम्बिआळवार नम्बि ने किया। शिवभक्ति के प्रमुख कविसंत तिरुज्ञानसंबंधर, अप्पर, सुंदरमूर्ति और माणिक्यवाचकर हैं। इन शिवभक्त कवियों को 'नायनमार' कहा जाता है। उनके काव्यों में त्याग, आस्था और श्रद्धा का स्वर है।
शिव भगवान के सिवाय उन्होंने और किसी भी अन्य ईश्वर की आराधना नहीं की। अपनी भक्ति साधना से इन कवियों ने समाज के अंधविश्वास को दूर कर सामाजिक सुधारों का सूत्रपात किया। दैनिक पूजा विधि के विषय में महाभारत से कुछ स्पष्ट ज्ञात नहीं होता है। रामायण की भाँति यहाँ भी शिव मंदिरों का कोई विशेष उल्लेख नहीं है परन्तु शिव-मूर्तियों की चर्चा अवश्य की गई है। एक जगह कहा गया है कि "शिव अपनी मूर्तियों की उपासना से प्रसन्न होते हैं और ये मूर्तियाँ मानवाकार और लिंगाकार दोनों होती हैं।"
इस आधार पर डॉ. यदुवंशी का विचार है कि दोनों प्रकार की मूर्तियों उस समय बनती थीं और उनकी उपासना होती थी। यहाँ हमें एक विशेष चात का ध्यान रखना चाहिए कि भक्त चाहे वैष्णव आलवार के हसे अथवा शैव नायनमार हाँ, इनमें जाति-पाति या ऊँच-नीच का कोई भेदभाव नहीं, था। यहाँ पर भक्त ब्राह्मण, क्षत्रिय अथवा शूद्र न होकर सभी ईश्वर के भक्त थे, इसी कारण इनका मुख्य लक्ष्य जनसेवा और लोक-कल्याण की ही भावना थी। यही तमिलनाडु की संस्कृति है।
तमिल की एक अन्य उपलब्धि कम्बन की रामायण भी है। कम्बल के बाद कई सौ वर्षों तक तमिल साहित्य टीकाओं और व्याख्यानी का काल रहा। तमिल का प्रथम वेदनायकम् पिल्लै का 'प्रताप मुदलियार चरितम है जो सन् 1876 ई. में छपा। पिछले सौ वर्षों में हजारों उपल्यास छपे हैं. इसमें कल्कि, देवन, अत्तदै, शिवशंकरी अखिलन, एम. करुणानिधि, इन्दुमती आदि प्रसिद्ध लेखक और लेखिकाएं हैं। रेडियो, समाचार-पत्र, पत्र-पत्रिकाएं, कम्प्यूटर, आई-पैड आदि के द्वारा तमिल कहानी का विकास तीव्रगति से हो रहा है। नाटक, एकाकी, आलोचना आदि के अतिरिक्त निबंध, जीवनी आदि अन्य विधाओं पर भी तमिल में प्रचुर और प्रभावशाली साहित्य है।
तमिल साहित्य और चिंतन को उत्तर भारत में पहुँचने में तमिलनाडु के विद्वान डॉ. एन. महालिंगम, डॉ. शेषन, स्वर्गीय डॉ. सुन्दरम और अनेक लेखकों का कार्य प्रशंसनीय है। बाल साहित्य की दृष्टि से सुब्रह्मण्य भारती ने भी अपना विशेष योगदान दिया। स्वर्गीय एन. सुन्दरम जी ने हिंदी से तमिल और तमिल से हिंदी में अनुवाद कर उत्तर और दक्षिण भारत को जोड़ने का प्रयत्न किया। लोगों में सौहार्द की भावना जागृत की।
शैव संत तिरुज्ञान संबंध का तमिल से हिंदी रूपांतर 'तेवारम' प्रस्तुत कर लोगों के हृदय में शिवभक्ति का प्रचार किया। 'तेवराम' में शिवभक्तों ने जिन-जिन मंदिरों में जो पदिकम् जिस-जिस राग के साथ गाए, उन-उन मंदिरों में ये पद राग के साथ उल्लिखित हैं। तमिलनाडु में शैव मंदिरों की संख्या, उनका वृद् आकार और पूजन पद्धति आज भी इस बात का साक्षी है। महाकवि सुब्रह्मण्य भारती की भी सभी रचनाएं राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत हैं।
उनकी रचनाओं में वर्तमान युग की सांसों का स्पंदन है, जनमानस की आशा, आकांक्षाओं की व्याप्ति है, इतना ही नहीं भविष्य के निर्माण के प्रति सुन्दर और सजीव परिकल्पना है। भारतीय संस्कृति आस्था प्रधान है। इसमें त्याग, सेवा, श्रद्धा आदि को विशेष स्थान दिया गया है। इन्हीं गुणों के कारण हमारा देश, अन्य देशों में पूजित है। महाकवि भारती ने साहित्य की सभी विधाओं पर प्रकाश डाला है। वे प्रथम कवि थे जिन्होंने देश-T भक्ति, राजनीति और तमिल साहित्य को आसान बनाया, जिसे साधारण से साधारण लोग भी समझ सकें।
उन्हें आधुनिक तमिल साहित्य का जनक भी कहा जाता है। उन्होंने कविता के माध्यम से लोगों के मन में आजादी की भावना जगायी। 'पांचाली शपथम द्वारा कचि भारती ने महाभारत की कथा को अल्यल्ल सरलता से जनमानस तक पहुंचाया। 'भगबद्रीला' उनकी अनुदित कृति है जिसकी प्रशंसा करते हुए महात्मा गाँधी जी ने कहा कि, "भारतवासी इस महान सपूत को आदर दें। भारत को स्वतंत्र देखला उनका एक मात्र लक्ष्य था. इसकी भविष्यवाणी उन्होंने बहुत पहले ही कर दी थी।
आडुयोमे, पल्लु पाडुयोमेI आनन्द सुदन्दिरं ऑन्दु विट्टोमेन्डु
(आइयोमे)
न केवल साहित्य और संस्कृति में वरन ललित कलाओ, संगीत, नृत्य, सभी विषयी में नमिवलार सबसे बढ़चढ़ है जिसमें मदुरै तो लोकाचार और संस्कृति में उत्तम है।
कांचीपुरम की रेशमी गाड़ियों, तंजावूर की वीणा, कोयम्बतूर के सूती कपड़े, संगीत के अनेक वाद्ययंत्र, मूर्तिकला, चित्रकला इत्यादि अनेक प्राचीन कलाओं में कीर्तिमान स्थापित कर चुका है। इसमें जरा भी संदेह नहीं। तमिल प्रदेश की गरिमा का क्या कहना देश-विदेश के पर्यटकों, यात्रियों के लिए तमिलनाडु आज भी आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। "देवभूमि का ऐसा निर्माण कहीं और नहीं मिलता, भक्ति का ऐसा कमल, कहीं और नहीं खिलता"।
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