अन्तर्मन में विराजमान मेरे राम
March 27, 2026
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नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

सन् 1947 ईस्वी में 15 अगस्त की मध्यरात्रि को पण्डित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले पर तिरंगा फहराया। इसके साथ ही हमारा देश अंग्रेजों के शासन से मुक्त हो गया। सत्ता का हस्तान्तरण पूरा हुआ।
इस क्षण को पाने के लिए अनेक वर्षों का संघर्ष सार्थक हुआ था। सत्ता का हस्तान्तरण अवश्य हुआ। इसके बाद भी गुलामी की मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। समाज ने अंग्रेजों की दो बुराइयों को अपना लिया। पहली बुराई साहेबी दिखाना और अपने अधीन कर्मचारियों पर रौब झाड़ना है। दूसरी बुराई अपने से कम हैसियत वाले व्यक्ति को हीन समझना है।
परतन्त्र और पराधीन दो समान अर्थ वाले शब्द हैं। परतन्त्र का अर्थ है: दूसरों की व्यवस्था या दूसरों का शासन है। तो वही पराधीन का अर्थ दूसरों के अधीन होना है। हमें परतन्त्रता से स्वतन्त्रता मिली। इसका अर्थ है- अपनी व्यवस्था और अपना शासन। स्वाधीन का अर्थ स्वयं के अधीन होना है। अब हम किसी बाहरी देश के अधीन नहीं हैं। हम अपने निर्णय स्वयं लेंगे।

स्वतंत्र भारत 1947
लोग प्रायः यह मानते हैं कि भारत ने केवल अंग्रेजों के शासन काल में अत्याचार और अन्याय सहे हैं। यह पूर्ण सत्य नहीं है। 8वीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण के साथ ही अत्याचार आरम्भ हो गए थे। 11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी और मोहम्मद गोरी जैसे आक्रान्ताओं ने भारी अत्याचार किए। यदि अंग्रेजों ने यहाँ शासन नहीं किया होता, तब भी हम पूरी तरह स्वाधीन या स्वतन्त्र नहीं थे।
अंग्रेजों के आगमन से पूर्व के इतिहास में पृथ्वीराज चौहान जैसे कुछ ही शासकों का उल्लेख मिलता है। उन्होंने विदेशी अत्याचारों से समाज को मुक्ति दिलाने का प्रयास किया। धर्म की रक्षा और अधर्म का नाश करने के लिए उस काल में अनेक सन्त, महात्मा और कवि हुए। इस समय को भक्ति काल कहा गया। इन विभूतियों ने अखण्ड राष्ट्र की भावना को जीवित रखा।

पृथ्वीराज चौहान
धार्मिक और सांस्कृतिक रूप से भारत एक था। इसके बावजूद क्षेत्रीय शासक अपने राज्यों तक सीमित थे। बाद में शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप जैसे महान योद्धा और राष्ट्रभक्त हुए। तत्कालीन परिस्थितियों के कारण सम्पूर्ण भारत एक राजनीतिक इकाई नहीं बन सका। अंग्रेजों ने भारत की धार्मिक और सांस्कृतिक एकता को देखा। उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच फूट डाली। इस प्रकार उन्होंने सम्पूर्ण भारत को अपने अधीन कर लिया। उन्होंने अपनी सत्ता स्थापित की।
विदेशी आक्रान्ताओं के कारण समाज में महिलाओं का जीवन सुरक्षित नहीं था। उनकी सुरक्षा के लिए उस काल में घूंघट प्रथा, बाल विवाह और सती प्रथा जैसी कुप्रथाएँ उत्पन्न हुईं। ये सभी कुप्रथाएँ थीं। तत्कालीन परिस्थितियों में समाज ने इन्हें मजबूरी में अपनाया।
"यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत"

छत्रपति शिवाजी महाराज और महाराणा प्रताप
समाज में अन्याय और अत्याचार अपनी चरम सीमा पर पहुँच गए थे। ऐसे में समाज को मार्गदर्शकों की आवश्यकता थी। इस कालखण्ड में अनेक महापुरुषों ने समाज का नेतृत्व किया। महर्षि वेदव्यास के विचारों को स्वामी विवेकानन्द ने आगे बढ़ाया और हिन्दू समाज को जाग्रत किया। बाल गंगाधर तिलक ने सांस्कृतिक रूप से समाज को जोड़ा। सुभाष चन्द्र बोस ने युवाओं को विपरीत परिस्थितियों से लड़ने के लिए प्रेरित किया।
सर्वप्रथम बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने वन्दे मातरम् और स्वदेशी का विचार दिया। आन्ध्र प्रदेश में वन्दे मातरम् आन्दोलन चला। बाल गंगाधर तिलक ने इसे आगे बढ़ाया। उन्होंने स्वदेशी के महत्व को स्पष्ट किया। महात्मा गान्धी ने इस आन्दोलन को राजनीतिक स्वरूप दिया। उनके नेतृत्व में देश ने अंग्रेजों को पराजित किया। इन सभी विभूतियों ने देश को स्वतन्त्र कराने में अपना जीवन समर्पित किया।

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय, बाल गंगाधर तिलक और महात्मा गान्धी
गुलामी के दो प्रमुख रूप हैं। पहला रूप राजनीतिक गुलामी और दूसरा रूप आर्थिक गुलामी है। समाज बहुत जल्दी आर्थिक गुलामी का शिकार हो जाता है। प्रत्येक मनुष्य अपना जीवन सरल और सुगम बनाना चाहता है। यहीं से बाजारवाद का आरम्भ होता है। विदेशी कम्पनियाँ मनुष्य को बिना परिश्रम के सुख और सुविधाएँ देने का प्रयास करती हैं। इससे समाज के आर्थिक रूप से गुलाम होने की सम्भावना बढ़ जाती है।
आर्थिक गुलामी से मुक्ति पाने के लिए हमें अपनी अर्थव्यवस्था को स्वाधीन बनाना होगा। जब हमारी व्यवस्था हमारे अधीन होगी, तब विदेशी कम्पनियाँ हमें अपने जाल में नहीं फँसा सकेंगी। हमें प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना होगा। दूसरों पर निर्भर रहने से हमें उनकी शर्तें माननी पड़ती हैं। वर्तमान में अमेरिका और चीन भारत को आर्थिक रूप से गुलाम बनाने का प्रयास कर रहे हैं। प्रधानमन्त्री ने सन् 2020 ईस्वी में 12 मई को स्वदेशी अभियान का आरम्भ किया। भारत में प्राकृतिक और खनिज संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। मानव संसाधन के मामले में भी हम चीन के बाद दूसरे स्थान पर हैं। इतनी क्षमता होने के बाद भी दूसरे देशों पर निर्भर रहना अनुचित है।

आर्थिक स्वाधीनता
आधुनिक तकनीक में भारत बहुत आगे है। स्वदेशी विचार अपनाकर और आत्मनिर्भर बनकर ही हम सही अर्थों में स्वाधीन होंगे। यह स्वाधीनता आने वाली सदियों तक बनी रहेगी। यह देश को मजबूती देगी। भारत ने स्वदेशी विचार को अपनाकर रक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और आधारभूत संरचना के क्षेत्र में तीव्र प्रगति की है। इससे सम्पूर्ण विश्व आश्चर्यचकित है। भारत शीघ्र ही विश्व की तीसरी बड़ी शक्ति बनेगा।
राजनीतिक गुलामी का चक्र बहुत भयानक है। कुछ राजनेताओं ने राजनीतिक स्वतन्त्रता को मनमानी मान लिया है। वे जनता से झूठे वादे करके उन्हें भ्रमित करते हैं। वर्तमान में कई नेताओं को देश से अधिक अपने वोट बैंक की चिन्ता है। इस कारण राजनीतिक स्वाधीनता पर लगातार खतरा बना हुआ है। समाज और जनता को यह बात समझनी होगी। मजबूत आर्थिक स्वाधीनता ही इस समस्या का सही समाधान है।
लेख:
- डॉ. के. एन. बापट
(लेखक रायपुर के प्रतिष्ठित शास. विज्ञान महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य हैं। वे वरिष्ठ शिक्षाविद् व वैज्ञानिक हैं, जो विज्ञान, ज्योतिष और दर्शन के गहन समन्वय से सांस्कृतिक व आध्यात्मिक विषयों पर शोधपरक विचार प्रस्तुत करते हैं।)
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