श्री रंगनाथस्वामी मंदिर तिरुचिरापल्ली: जहाँ भगवान आज भी राजा की भांति विराजते हैं
May 24, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार
नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

भारत की पुण्यभूमि पर अवस्थित श्री रंगनाथस्वामी मंदिर, जिसे श्रीरंगम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, तमिलनाडु राज्य के तिरुचिरापल्ली (त्रिची) शहर के पास श्रीरंगम द्वीप पर स्थित एक विश्व प्रसिद्ध और अत्यंत भव्य मंदिर है। ऐतिहासिक दृष्टि से इस स्थान की प्राचीनता का प्रमाण तमिल संगम साहित्य जैसे 'शिलप्पादिकारम' और 'अहनानुरु' में मिलता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पहली सदी में भी यहाँ एक पूजनीय स्थल मौजूद था।
पुरातात्विक साक्ष्यों और शिलालेखों के अनुसार, पत्थरों से निर्मित मुख्य मंदिर (गर्भगृह) और उसके आस-पास के आरंभिक प्राकारों का सबसे पहला प्रामाणिक निर्माण चोल राजवंश के शासकों द्वारा 9वीं सदी के उत्तरार्ध और 10वीं सदी में किया गया था। चोल राजाओं ने ही इसे एक सुव्यवस्थित प्रस्तर-मंदिर का रूप दिया।

श्रीरंगम प्रवेश द्वार ,1890 के दशक का छायाचित्र
कावेरी और कोल्लिडम् नदियों के मध्य टापू के रूप में स्थित यह पावन धाम सहस्राब्दियों से अनन्य भक्तों के लिए 'भूलोक वैकुंठ' अर्थात इस मृत्युलोक पर साक्षात वैकुंठ के रूप में सर्वत्र पूजित और वन्दित रहा है। इस पावन परिसर में पग रखते ही किसी भी जिज्ञासु को ऐसा दिव्य आभास होने लगता है मानो लौकिक जगत और अलौकिक देवलोक के मध्य की समस्त भौतिक सीमाएँ स्वतः ही विलीन हो गई हों।
मन्दिर का 11 मञ्जिला गगनचुम्बी राजगोपुरम, जिसकी विशाल ऊँचाई लगभग 236 फीट है, दूर से ही भव्यता नजर आती है। जैसे ही कोई भक्त उस विराट सिंहद्वार से भीतर प्रवेश करता है, वह स्वयं को किसी देवालय में नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक नगर में उपस्थित पाता है।

भव्य गोपुरम हैं विशेष आकर्षणों में से एक
इस विशाल प्रांगण और गगनचुम्बी गोपुरमों के मध्य में श्रद्धालुओं के आवागमन, दोनों ओर सजी पवित्र पुष्प, नैवेद्य और पूजन-सामग्री की सुसज्जित दुकानें, मोगरा पुष्प की भीनी-भीनी सुगन्ध, सुस्वादु पेय की महक और वैष्णव मठों की परम शान्त उपस्थिति, ये सब विस्मयकारी तत्व मिलकर श्रीरंगम को केवल एक अद्वितीय तीर्थ बना देते हैं।
मन्दिर के इन 7 प्राकारों (घेरा युक्त प्रांगण) और गोपुरमों को पार करना एक आध्यात्मिक यात्रा है। प्रत्येक प्राकार मानो साधक को बाहरी संसार के कोलाहल से खींचकर भीतर की ओर ले जाता है। जैसे-जैसे साधक के कदम गर्भगृह के निकट पहुँचते हैं, वैसे-वैसे मन का समस्त कोलाहल और उद्वेग शान्त होने लगता है।

श्रीरंगम मंदिर का हवाई दृश्य: 7 प्राकार
अन्ततः जब भगवान रंगनाथ के सम्मुख पहुँचकर शेषनाग की शय्या पर शयनमुद्रा में विराजमान उस दिव्य अलौकिक स्वरूप के साक्षात दर्शन होते हैं, तो मनुष्य के समस्त शब्द, विचार और सांसारिक तर्क स्वतः ही मौन हो जाते हैं। पावन शालिग्राम शिला से निर्मित भगवान विष्णु का वह दिव्य स्वरूप केवल एक कलात्मक विग्रह नहीं है, अपितु वह साक्षात करुणा, असीम शान्ति और दिव्यता का एक साक्षात अनुभव है।

शेषनाग की शय्या पर भगवान विष्णु
श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की प्राचीन परम्परा में यह दृढ़ मान्यता है कि यही वह मूल देव-विग्रह है जिसकी आराधना सूर्यवंश में प्रभु श्रीराम के कुलदेव के रूप में हुआ करती थी। लंका-विजय के पश्चात प्रभु श्रीराम ने इसे उपहार स्वरूप विभीषण को प्रदान किया था, किन्तु परम दैवीय विधान और नियति से यह अलौकिक विग्रह कावेरी तट की रेतीली माटी पर सदा के लिए स्थापित हो गया और वही पवित्र स्थान आगे चलकर श्रीरंगम नाम से विख्यात हुआ।
इस पौराणिक कथा का श्रद्धापूर्वक स्मरण मात्र ही मन्दिर के सम्पूर्ण वातावरण को और अधिक पावन तथा रहस्यमयी बना देता है। गर्भगृह से पूर्व स्थित विशाल मण्डप और प्राङ्गण अपने आप में अटूट भक्ति और सनातन परम्परा का एक जीवित संसार है।
सुवर्ण-जड़ित गरुड़ स्तम्भ, उत्सव-मण्डप, अलंकृत रथ और राजसी वाहनों की लम्बी पंक्तियाँ यह अनुभव कराती हैं कि यहाँ भगवान केवल मन्दिर में पूजित देव नहीं हैं, अपितु अपने अनन्य भक्तों के मध्य साक्षात विराजमान एक सम्राट हैं।
हाथी, घोड़े, गरुड़ और सिंह के राजसी स्वरूप वाले सुवर्ण तथा रजत अलंकृत उत्सव-वाहन इस बात के प्रत्यक्ष साक्षी हैं कि प्राचीन समय से यह मंदिर एक समृद्ध आस्था का केंद्र रहा है।
इसी पावन परिसर के भीतर विशिष्टाद्वैत वेदान्त दर्शन के महान प्रवर्तक आचार्य श्री रामानुजाचार्य की उपस्थिति आज भी प्रत्यक्ष अनुभव की जाती है। उनका औषधियों से संरक्षित शरीर सहस्राब्दी पुरानी उस अखंड वैष्णव परम्परा का एक अद्भुत और विस्मयकारी प्रमाण है, जिसने श्रीरंगम को केवल स्थापत्य की दृष्टि से ही नहीं, अपितु एक आध्यात्मिक संस्कृति रूप में आज तक सुरक्षित रखा है।

यहाँ दशकों से सुरक्षित है रामानुजाचार्य का पार्थिव शरीर
कुङ्कुम, कपूर, चन्दन और विशेष दुर्लभ जड़ी-बूटियों से संरक्षित यह दिव्य स्वरूप श्रद्धालुओं को आज भी गुरु-परम्परा की अमरता का बोध कराता है। श्रीरंगम की विशेषता इसकी भव्य वास्तुकला तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सदियों से बह रही अनवरत भक्ति की धारा इसे विशेष बनाती है। प्राचीन आलवार संतों की दिव्य वाणी आज भी मन्दिर के प्राङ्गणों में गूँजती है।
'नालायिर दिव्य प्रबन्धम्' के पवित्र पद यहाँ गाए जाते हैं। नम्मालवार की अनन्य शरणागति, पेरियालवार का वात्सल्य भाव, देवी आण्डाल का मधुर प्रेम और तिरुमंगै आलवार की यात्राएँ, ये सब दिव्य भाव मिलकर श्रीरंगम को भक्ति का एक लोक बना देते हैं।
विशेष रूप से देवी आण्डाल की रचना 'तिरुप्पावै' और आलवार सन्तों की भावपूर्ण वाणी यह परम अनुभव कराती है कि ईश्वर केवल दूर आकाश में बैठकर आराधना के विषय नहीं हैं, अपितु वे अन्तरात्मा के अत्यन्त निकट, आत्मीय और स्नेहमय आश्रयदाता हैं।
यही कारण है कि श्रीरंगम आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु स्वयं को केवल एक दर्शक के रूप में अनुभव नहीं करता, अपितु वह उस दिव्य परम्परा का एक सहभागी बन जाता है।
यहाँ का नित्योत्सव श्रीरंगम की सबसे अद्भुत विशेषताओं में से एक माना जाता है। प्रातःकालीन सुप्रभात सेवा के मंगल गान से लेकर रात्रि शयन आरती तक मन्दिर का प्रत्येक क्षण पूर्णतः उत्सवमय रहता है।
वेदघोष, दिव्य प्रबन्धम् का सस्वर गान, प्रभु का अलंकृत भव्य श्रृङ्गार, सुगन्धित पुष्पमालाएँ और राजोपचार की प्राचीन शासकीय परम्परा यह प्रत्यक्ष अनुभूति कराती है कि भगवान आज भी यहाँ एक राजा की भाँति ही विराजते हैं और मन्दिर की सम्पूर्ण व्यवस्था उनके दिव्य राजदरबार की भाँति ही संचालित होती है।
ब्रह्मोत्सव के पवित्र दिनों में यह आध्यात्मिक अनुभव अपने परम चरम उत्कर्ष पर पहुँच जाता है। जब भगवान का उत्सव-विग्रह रत्नजटित आभूषणों और बहुमूल्य रेशमी वस्त्रों से अलंकृत होकर गरुड़, हनुमान, अश्व अथवा विशाल काष्ठ निर्मित रथों पर बैठकर नगर-भ्रमण के लिए निकलता है, तब पूरा श्रीरंगम धाम 'रंगनाथा! रंगनाथा!' के जयघोष से गूँज उठता है। उस पावन दृश्य को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं साक्षात वैकुंठ ही इस धरा पर उतर आया हो।

ब्रह्मोत्सव के अवसर पर नगर-भ्रमण
विशेष रूप से गरुड़-सेवा और रथोत्सव के समय मन्दिर की वीथियों में भक्तों का एक विशाल जन-समुद्र उमड़ पड़ता है। जब उस विशाल काष्ठ-रथ को खींचने के लिए समाज के सभी वर्गों के लोग बिना किसी सामाजिक भेद के एक साथ रस्से को थामते हैं।
उस पवित्र क्षण में केवल भक्त और भगवान के मध्य का निश्छल प्रेम ही शेष रह जाता है। यही वह अलौकिक अनुभूति है, जिसे लोग महसूस करने दूर दूर से आते है।
ऐसी प्राचीन मान्यता है कि ब्रह्मोत्सव के दौरान स्वर्ग से समस्त देवता, ऋषि-मुनि और समस्त दिव्य शक्तियाँ सूक्ष्म रूप में श्रीरंगम की धरती पर उपस्थित होकर इस अलौकिक उत्सव का आनन्द लेती हैं। सम्भवतः यही कारण है कि इन उत्सवों के समय मन्दिर का सम्पूर्ण वातावरण सामान्य मानवीय अनुभूतियों से कहीं अधिक पवित्र और अलौकिक प्रतीत होने लगता है।
श्रीरंगम का मूल तत्व उस पारलौकिक अनुभूति में है, जो आत्मा को परमात्मा से जोड़ता है। यहाँ दर्शन करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने साथ एक परम शांत, मधुर और अलौकिक आध्यात्मिक ऊर्जा लेकर लौटता है। इसी अद्वितीय अहसास के कारण श्रीरंगम 'भूलोक वैकुंठ' कहलाता है।
-श्रीनिवासा चारी
(लेखक भारतीय संस्कृति व रामायण परंपरा के कथाकार हैं, जो कॉरपोरेट अनुभवों के साथ पौराणिक प्रसंगों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करते हैं।)
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