मुंशी प्रेमचन्द: भाषा, साहित्य और कथाकार
July 31, 2026
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पर्व विशेष : | तदनुसार 10 अगस्त 2026

भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर में श्री जगन्नाथ उपासना का अद्वितीय स्थान है। यह लेख पाठकों को पुरुषोत्तम क्षेत्र पुरी की पावन धरा पर दारु ब्रह्म से लेकर विश्व प्रसिद्ध रथयात्रा तक के रहस्यमयी और दिव्य इतिहास से परिचित कराता है। यहाँ पौराणिक गाथाओं के भक्ति भाव के साथ साथ ऐतिहासिक शिलालेखों, मध्यकालीन संघर्षों और विदेशी यात्रियों के संस्मरणों का एक सन्तुलित संयोजन प्रस्तुत किया गया है। यह आलेख हमारी आस्था के विविध आयामों को उजागर करते हुए यह सन्देश देता है कि भगवान अपने मन्दिर की सीमाओं से परे जन जन के कल्याण हेतु स्वयं बाहर आते हैं।
वैष्णव भक्त भगवान श्री जगन्नाथ को भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण का स्वरूप मानते हैं। स्कन्द पुराण के उत्कल खण्ड में भगवान जगन्नाथ और पुरुषोत्तम क्षेत्र (वर्तमान पुरी) का वर्णन मिलता है। इस ग्रन्थ के अनुसार भगवान विष्णु ने यहाँ नीलमाधव के रूप में निवास किया था। कथा के अनुसार मालवा के राजा इन्द्रद्युम्न ने नीलमाधव के दर्शन की इच्छा की। उन्होंने अपने दूत विद्यापति को नीलमाधव को खोजने भेजा। बाद में भगवान की प्रेरणा से राजा इन्द्रद्युम्न ने पुरी में मन्दिर बनवाया। उन्होंने मन्दिर में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ स्थापित कीं।

भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी
ब्रह्म पुराण और पद्म पुराण में भी यह स्थान मोक्ष देने वाला प्रमुख तीर्थ है। यहाँ भगवान के दर्शन और पूजा का विशेष आध्यात्मिक महत्व है। नारद पुराण बताता है कि कलियुग में भगवान जगन्नाथ की भक्ति और दर्शन से पुण्य मिलता है और जीवन का कल्याण होता है। वैष्णव परम्पराओं में भक्त भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण का रूप मानते हैं। एक लोक मान्यता है कि श्रीकृष्ण के देह त्यागने के बाद उनका ब्रह्म तत्व सुरक्षित रखा गया। बाद में इसे भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में स्थापित किया गया। यह मान्यता स्थानीय और मन्दिर की धार्मिक परम्पराओं पर आधारित है। जगन्नाथ संस्कृति में इसका विशेष स्थान है। 16वीं शताब्दी में वैष्णव सन्त श्री चैतन्य महाप्रभु पुरी में रहे। उनकी भक्ति और साधना से जगन्नाथ संस्कृति को पूरे भारत में नई पहचान मिली।
गंग वंश और मन्दिर निर्माण के शिलालेख
वर्तमान श्री जगन्नाथ मन्दिर का निर्माण पूर्वी गंग वंश के शासक राजा अनन्तवर्मन चोडगंगदेव ने सन् 1078 से 1147 ईस्वी के बीच शुरू कराया था। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों से पता चलता है कि उन्होंने 12वीं शताब्दी की शुरुआत में इस मन्दिर की नींव रखी। इसके बाद उनके उत्तराधिकारी अनंगभीम देव तृतीय ने मन्दिर निर्माण का कार्य पूरा कराया। उन्होंने भगवान जगन्नाथ को राज्य का राजा घोषित किया। उन्होंने स्वयं को भगवान का सेवक और प्रतिनिधि माना। मन्दिर और गंग वंश के अभिलेखों में भगवान जगन्नाथ को ‘पुरुषोत्तम’ और ‘पुरुषोत्तम देव’ कहा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि 12वीं और 13वीं शताब्दी तक जगन्नाथ उपासना पूर्वी भारत में एक बड़ी धार्मिक परम्परा बन चुकी थी।

जगन्नाथ मंदिर
पूर्वी गंग और बाद के गजपति शासकों ने ताम्रपत्रों और दानपत्रों के माध्यम से जगन्नाथ मन्दिर को भूमि, गाँव और धन दिया था। इन दस्तावेजों में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है। मध्यकालीन फारसी स्रोतों और इतिहास की पुस्तकों में ओडिशा पर आक्रमण का उल्लेख है। 16वीं शताब्दी में बंगाल के अफगान सेनापति काला पहाड़ ने ओडिशा पर हमला किया था। उसने मन्दिर को नुकसान पहुँचाया था। फारसी इतिहास ग्रन्थों में इसका वर्णन मिलता है।
16वीं और 17वीं शताब्दी में भारत आने वाले कई यूरोपीय यात्रियों और व्यापारियों ने पुरी के जगन्नाथ मन्दिर और रथयात्रा का उल्लेख किया है। उन्होंने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की लकड़ी की मूर्तियों का विशेष रूप से वर्णन किया है। इन यात्रियों ने हर साल होने वाली रथयात्रा देखी थी। उन्होंने हजारों श्रद्धालुओं को रथ खींचते हुए देखा था। मन्दिर के बड़े रसोईघर और महाप्रसाद व्यवस्था को देखकर उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया था। अंग्रेजी भाषा का शब्द “जगरनॉट” (Juggernaut) वास्तव में “जगन्नाथ” शब्द का ही अंग्रेजी रूप है। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग ने ओडिशा क्षेत्र (कलिंग) का उल्लेख किया है। उनके यात्रा वृत्तान्तों में वर्तमान जगन्नाथ मन्दिर या उसकी मूर्तियों का उल्लेख नहीं मिलता है। इसका कारण यह है कि वर्तमान मन्दिर का निर्माण उनके आने के कई शताब्दियों बाद हुआ था।
साक्ष्यों के आधार पर श्री जगन्नाथ की मूर्तियों की विशेषता
भगवान श्री जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियाँ भारतीय मूर्तिकला और धार्मिक परम्परा में विशेष स्थान रखती हैं। इनका स्वरूप अन्य हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियों से अलग है। इस स्वरूप के पीछे धार्मिक ग्रन्थों, ऐतिहासिक अभिलेखों और लोक परम्पराओं में कई प्रमाण मिलते हैं। अधिकतर हिन्दू मन्दिरों में मूर्तियाँ पत्थर या धातु से बनती हैं। जगन्नाथ मन्दिर की मूर्तियाँ पवित्र नीम की लकड़ी (दारु ब्रह्म) से बनती हैं। इस परम्परा का उल्लेख स्कन्द पुराण के उत्कल खण्ड और जगन्नाथ मन्दिर की प्राचीन परम्पराओं में मिलता है। जगन्नाथ परम्परा में भक्त इन मूर्तियों को लकड़ी में बसी दिव्य चेतना यानी ‘दारु ब्रह्म’ का स्वरूप मानते हैं।

जगन्नाथ स्वामी जी की मूर्ति
यह मन्दिर 12 से 19 वर्षों के अन्तराल में नवकलेवर अनुष्ठान आयोजित करता है। यह अवसर तब आता है जब अधिक मास के साथ आषाढ़ मास पड़ता है। इस अनुष्ठान में नई मूर्तियाँ बनाई जाती हैं। नवकलेवर के समय पुरानी मूर्ति से ब्रह्म पदार्थ निकालकर नई मूर्ति में स्थापित करते हैं। मन्दिर प्रशासन इस प्रक्रिया को पूरी तरह गुप्त रखता है। इस ब्रह्म पदार्थ के स्वरूप का कोई ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध नहीं है। इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों में एक विशेष मेल दिखता है। यह मेल ओडिशा की प्राचीन सबर (शबर) जनजाति की पूजा परम्पराओं और वैष्णव धर्म का है। विद्वानों का मत है कि शुरुआत में नीलमाधव की पूजा स्थानीय जनजातीय समुदाय करते थे। बाद में इसे वैष्णव परम्परा में शामिल कर लिया गया।
नीम की लकड़ी का चयन
मूर्तियों के निर्माण के लिए सामान्य लकड़ी का उपयोग नहीं होता है। इसके लिए मन्दिर के सेवक विशेष रूप से नीम (दारु) के वृक्ष को चुनते हैं। धार्मिक परम्परा में लोग नीम को पवित्र, रोगनाशक और लम्बी आयु देने वाला मानते हैं। नवकलेवर के समय चुने जाने वाले वृक्षों में कुछ विशेष लक्षण होने चाहिए:
1. वृक्ष पर शंख, चक्र, गदा या पद्म जैसे चिह्न होने चाहिए।
2. वृक्ष के पास नदी, तालाब या श्मशान होना चाहिए।
3. वृक्ष पर पक्षियों का घोंसला नहीं होना चाहिए।
4. वृक्ष पर बिजली गिरने या किसी नुकसान का निशान नहीं होना चाहिए।

नीम का पेड़ (प्रतीकात्मक)
पत्थर की मूर्तियाँ स्थायी होती हैं। लकड़ी समय के साथ पुरानी होती जाती है। इसी कारण जगन्नाथ परम्परा में समय-समय पर नवकलेवर होता है। इसमें कारीगर नई मूर्तियाँ बनाते हैं। यह परम्परा हिन्दू दर्शन के एक सिद्धान्त को दर्शाती है। इसके अनुसार आत्मा अमर है और शरीर बदलता रहता है। जीवात्मा पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है। इसी तरह भगवान का तत्व पुरानी मूर्ति से नई मूर्ति में स्थापित करते हैं।
मूर्तियों का विशेष और अधूरा दिखने वाला स्वरूप
भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों में हाथ और पैर पूरी तरह नहीं बने हैं। उनकी आँखें बड़ी और गोल हैं। भारतीय मूर्तिकला में यह स्वरूप सबसे अलग है। लोक परम्परा के अनुसार भगवान विश्वकर्मा मूर्तियाँ बना रहे थे। राजा इन्द्रद्युम्न ने समय से पहले द्वार खोल दिया। इस कारण मूर्तियाँ अधूरी रह गईं। भगवान ने उसी अधूरे रूप में स्थापित होने की इच्छा की। इस कथा का उल्लेख स्कन्द पुराण के उत्कल खण्ड और जगन्नाथ परम्परा के ग्रन्थों में मिलता है। भगवान जगन्नाथ की बड़ी और गोल आँखें उनकी व्यापक दृष्टि का प्रतीक हैं। वे सभी प्राणियों को एक समान भाव से देखते हैं। यह स्वरूप बताता है कि भगवान बिना पलक झपकाए अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और उनका कल्याण करते हैं।

वैष्णव परम्परा के अनुसार भगवान जगन्नाथ भगवान श्रीकृष्ण का स्वरूप हैं। बलभद्र (बलराम) उनके बड़े भाई हैं। सुभद्रा उनकी बहन हैं। पुरी में इन तीनों का एक साथ विराजमान होना भगवान के पारिवारिक स्वरूप को दर्शाता है। हिन्दू धर्म में इसे परिवार, प्रेम और भाई तथा बहन के स्नेह का प्रतीक मानते हैं। एक लोक मान्यता के अनुसार सुभद्रा ने एक बार अपने भाइयों श्रीकृष्ण और बलराम से द्वारका नगर देखने की इच्छा की थी। तब दोनों भाई उन्हें रथ पर बैठाकर नगर घुमाने ले गए थे। इसी घटना की याद में रथयात्रा का आयोजन होता है। प्रमुख पुराणों में इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता है।
जगन्नाथ परम्परा में भक्त भगवान को ईश्वर के साथ-साथ परिवार का सदस्य भी मानते हैं। भाई और बहन का एक साथ पूजन कई महत्वपूर्ण सन्देश देता है। इससे परिवार में प्रेम और सहयोग बना रहता है। समाज में एकता और समरसता आती है। स्त्री और पुरुष दोनों को समान सम्मान मिलता है। कई इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मत है कि जगन्नाथ परम्परा पर ओडिशा की प्राचीन जनजातीय परम्पराओं का प्रभाव है। इन जनजातियों में परिवार या समूह के देवताओं की सामूहिक पूजा होती थी। बाद में यह परम्परा वैष्णव धर्म के साथ जुड़ गई।

रथ पर सवार भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी
जगन्नाथ मन्दिर में देवी सुभद्रा की मूर्ति दोनों भाइयों के बीच स्थापित है। धार्मिक दृष्टि से यह परिवार में बहन के सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक है। गुण्डिचा मन्दिर पुरी में स्थित है। यहाँ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा रथयात्रा के दौरान कुछ दिनों के लिए विराजमान होते हैं। इसके महत्व के बारे में कई धार्मिक मान्यताएँ हैं। परम्परा के अनुसार यह मन्दिर राजा इन्द्रद्युम्न की पत्नी रानी गुण्डिचा के नाम पर बना था। इसलिए लोग इसे गुण्डिचा मन्दिर कहते हैं। लोकमान्यता में गुण्डिचा मन्दिर को भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर भी कहते हैं।

गुण्डिचा मन्दिर पुरी
कुछ परम्पराओं के अनुसार राजा इन्द्रद्युम्न ने यहीं पर भगवान जगन्नाथ की मूर्तियों की स्थापना करवाई थी। इसलिए भक्त रथयात्रा को भगवान के मूल स्थान या जन्म स्थल की यात्रा मानते हैं। रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा लगभग सात दिनों तक गुण्डिचा मन्दिर में निवास करते हैं। इसके बाद वे बहुदा यात्रा के माध्यम से फिर से श्री जगन्नाथ मन्दिर लौटते हैं। धार्मिक दृष्टि से यह यात्रा भगवान के मन्दिर से बाहर निकलकर अपने सभी भक्तों के बीच आने का प्रतीक है। यह सन्देश देती है कि भगवान मन्दिर के गर्भगृह तक सीमित नहीं हैं। वे सभी लोगों से मिलने स्वयं आते हैं।
लेख:
डॉ. नेहा प्रधान, राजस्थान
मधुश्रावणी: मिथिला के गाँवों में जीवित एक गुप्त स्त्री-लोक परंपरा
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