आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार

नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

भारतीय लोक जीवन और समरसता

भारतीय लोक जीवन और समरसता


भारतीय लोक जीवन जन जागरण का सशक्त माध्यम है। लोक मानस में अभिव्यक्ति का आधार परम्परा से मिलता है। गाँव की चौपालों में प्रहसन, नुक्कड़, नीतिवाक्यों, सुभाषित सूत्रों, अहानों, कहावतों, पर्व, उत्सवों के माध्यम से दैनिक जीवन में भारतीय लोक जाने-अनजाने में समरसता की अनेक सीख दे जाता है। त्योहारों पर परस्पर एक-दूसरे के यहाँ जाना, प्रसादी का आदान-प्रदान करना भारतीय संस्कार हैं। जो आज स्वार्थ लिप्सा व भौतिकवादी चकाचौंध में घूम रहे हैं। इनका पुनर्जागरण आवश्यक है।

यूँ तो भारतीय समाज जन्म से मृत्युपर्यन्त सामाजिक समरसता में जीता है। यह समरसता रिश्ते-नाते व सामाजिक बहनों, बंधुओं, द्वारा निभाई जाती है। उदाहरण के लिए जन्म के समय दाई जो (अनुसूचित जाति से है) के द्वारा गर्भनाल अलग कर बच्चे को प्रथम बार गोद लेकर माँ को सौंपना, प्रसूता के कपड़ों की धुलाई धोबिन द्वारा कराई जाना, नाई स्त्री द्वारा प्रति दिन मालिश कर शिशु को हष्ट-पुष्ट बनाना, पंडित द्वारा बच्चे की जन्मपत्रिका तैयार करवाना। रिश्ते में सासु माँ द्वारा चरुआ का पानी देना। ननंद के पति द्वारा बधावा लाना, जेठानी, भाभी द्वारा खान-पान की व्यवस्था तथा अड़ोस-पड़ोस द्वारा सोहरे मंगल गायन से जीवन रस भरना आदि समसरसता के ही परिचायक हैं।

लोकजीवन में सामूहिक सहभागिता
लोकजीवन में सामूहिक सहभागिता

इसी तरह वैवाहिक कार्यक्रम में नाई और पंडित विवाह पक्का करने में भूमिका निभाते हैं तो दर्जी कपड़े सिलता, कुम्हार के घड़े से आस-पास की सभी बच्चियों व महिलाओं द्वारा मंगल गीत गाते हुए कुलदेवी पूजन का जल भर कर घर लाना, धोबी द्वारा लड़की को सौभाग्य का सिंदूर देना, कुम्हार की मिट्टी से हवनकुंड आदि तैयार करना, बाजे वालों द्वारा बैंड-बाजा बजाना, पंडित द्वारा वैदिक मंत्रों के रीति-रिवाज से विवाह सम्पन्न कराना उत्सव समरसता है।

यही नहीं अश्व, चाँद, तारे जहाँ विवाह के साक्ष्य बनते वहीं आम्र-जामुन, पल्लव, दूर्वा, पलाश व बाँस आदि की डालियों, पत्तों आदि से विवाह मंडप आच्छादन करना, दूध, दही, घी, फूल, अक्षत्, वनस्पति, मिट्टी, हल्दी, चंदन, रंग-गुलाल, खान-पान, मंगल गीत, बैण्ड-बाजा बारात, हर्ष-उल्लास, लड़की की विदाई के समय रूदन आदि की उपस्थिति भारतीय समाज की समरसता के ही तो प्रतीक हैं। जो समरसता के उत्कृष्ट उदाहरण बन पड़ते हैं।

विवाह संस्कार में सामाजिक सहभागिता
विवाह संस्कार में सामाजिक सहभागिता

यह सब हमारे संस्कारों में हैं। लोक जीवन के प्रत्येक क्रिया-कलापों में यह सनातन संस्कार घुला-मिला है। ग्रामीण वातावरण या कि सुदूर अंचल में भी विश्वास, पूजा-अर्चना, अनुष्ठान, लोककथाओं, लोकरूढ़ियों, लोकभाषा, लोकगीत, लोकनाट्यों और प्रथित परम्पराओं आदि में लोक जीवन की सुरभि घुली-मिली है। बस आवश्यकता है चेतस मानस से समझने की और जातीय समीकरण हल करने की। आपस में मिलकर काम करना जिसे हम सहकारिता कह सकते हैं यह भारत की विशिष्टता है।

इसी विशिष्टता के साथ हमें आगे बढ़ना है तो सब को एकता रखनी होगी, समता रखनी होगी। उपर्युक्त उदाहरण इस विशिष्टता को इंगित करते हैं। हर व्यक्ति अपने आप में स्वतंत्र है। उसकी अपनी पहचान है। इस स्वतंत्रता के साथ समतामूलक भाव भी रखना है। यह व्यवहार मन का है। मन का यह व्यवहार हमें एक्य बनाता, समरसता लाता है। जो पीछे हैं उन्हें आगे लाएँ इसे आदत में शामिल कर आगे बढ़ें।

एकता से जुड़ता लोकसमाज
एकता से जुड़ता लोकसमाज

मन में दृढ़ भाव मनुज मनुज को स्वीकार कर आगे बढ़ता है। यह भी सही है कि सबके मनोभाव एक से नहीं होते हैं परिवार में भी विविधता होती है। यही विविधता समाज में भी है। सम-रसता एक आनंदित भाव है जो समाज से मिलकर आनंद की गंगा बहा सकती है। हमेशा याद रहे हम सब भारत माँ की संतान हैं। हम सब भारतीय हैं। हम सब एक हैं। इसे अपने आचरण में समाहित कर सब को गले लगाना, सबके साथ भोज प्रसादी ग्रहण करना, मंदिर, जल स्थान आदि में भेद न करना ही समरस संस्कार हैं।

सब के साथ आदरपूर्वक व्यवहार करना, जाति सूचक शब्द प्रयोग न करना, अपने से बड़ों को आदर देना, छोटों के प्रति स्नेहिल भाव, गिरते को सहारा देना, पेड़-पौधे, नदी-पहाड़, जीव-जन्तु, सब को ईश्वर की सृष्टि की दृष्टि से देखना, दया, करूणा का भाव, लौकिक आचरण, परम्पराओं का सम्मान, कोई छोटा-बड़ा नहीं, सब ईश्वर की संतान हैं। यह भाव आचरण में उतारना ही भारतीय संस्कार हैं। यह भारतीय संस्कार ही समरसता का मूल आधार हैं। समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए पंच परिवर्तन के अंतर्गत जिस शब्द 'सामाजिक समरसता' को लिया है, से तात्पर्य है-सभी नागरिकों के साथ बंधुत्व, सम व्यवहार एवं समानता हो । आपस में बंधुत्व बढ़े और देश में सामाजिक समरसता स्थापित हो। भारत की चुनौतियों का समाधान इस पंच परिवर्तन विधान में है। 

समानता का सामूहिक भोजन
समानता का सामूहिक भोजन

बिगड़ते पर्यावरण को संरक्षण, पर्यावरण सम्मत जीवनशैली अपनाने से मिलेगा, तो भारतीय जीवन मूल्यों पर आधारित स्वत्व बोध का आग्रह आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करने में सहयोगी होगा। परिवार राष्ट्र की एक छोटी इकाई है, परन्तु एक-एक व्यक्ति का आचरण  ही तो देश का आचरण बनता है। परिवार इकाई मजबूत होने से ही राष्ट्र मजबूत होता है। यह इकाई ही व्यक्ति को समूचे संसार से जोड़ती है। इसलिए कुटुम्ब प्रबोधन आयाम परिवार के साथ समाज को दिशा देगा। समरसता से सुख-शांति मिलेगी, जात-पात का भेद मिटाकर सद्भाव आएगा और सभी नागरिक अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए सामाजिक जागृति लाने में सक्षम होंगे।

लेख-
डॉ वन्दना मिश्र 

(यह लेख इनकी पुस्तक सामाजिक समरसता से लिया गया है )

Follow us on social media and share!