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जगन्नाथ मंदिर में सामाजिक सद्भाव के दर्शन

जगन्नाथ मंदिर में सामाजिक सद्भाव के दर्शन

मंदिर में सभी समाज के लोग सेवा-कार्य में जुटते हैं। न कोई छोटा, न बड़ा। न ही किसी से जाति पूछी जाती है, न उसका पंथ-संप्रदाय। मंदिर की स्वच्छता से लेकर प्रबंधन तक, हर कार्य स्थानीय लोग मिल-जुलकर करते हैं। सही अर्थों में कहें तो सामाजिक समरसता का भाव स्वत्व के जागरण से आरंभ होता है।

छत्तीसगढ़ में सामाजिक समरसता की जड़ें अत्यंत गहरी हैं। यहां की धार्मिक एवं ऐतिहासिक धरोहरें सामाजिक सद्भाव के प्रकल्प हैं। महासमुंद जिले के बागबाहरा विकासखंड अंतर्गत स्थित नारायण (जगन्नाथ) मंदिर सामुदायिक एकजुटता की अनुपम देन है। खल्लारी से प्राप्त प्रस्तर अभिलेख से पता चलता है कि इस नारायण मंदिर को देवपाल मोची ने 13वीं शताब्दी में बनवाया था। आर्थिक अभाव में रहकर भी आध्यात्मिक मूल्यों की स्थापना के लिए देवपाल का यह प्रयास सनातन, संस्कृति एवं सामाजिक सरोकार की त्रिवेणी है। ‘उत्कीर्ण लेख’ नामक पुस्तक में शिलालेख का देवपाल मोची संबंधी विस्तृत वर्णन मिलता है, जिसमें कहा गया है कि इसका मुख्य विषय खल्वाटिका में जसी के नाती, शिवदास के पुत्र, मोची देवपाल द्वारा नारायण मंदिर बनाए जाने की सूचना देता है।

jagannath mandir, khallari
जगन्नाथ मंदिर, खल्लारी

शिलालेख में देवपाल को धर्मकार्य का अभिलाषी तथा भगवान नारायण का भक्त बताया गया है। शिलालेख में देवपाल मोची के इस कार्य की काव्यात्मक शैली में प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि “गंगा जब तक संसार में यमुना के साथ बहती है, आकाश में (जब तक) तारामंडल का स्वामी सूर्य चमकता है, तब तक (इस) देवमंदिर के बहाने मोची देवपाल की यह कीर्ति जीवित रहे। श्रीवास्तव्य वंश के श्रेष्ठ पंडित रामदास ने यह प्रशस्ति स्वच्छ अक्षरों में लिखी है।”

प्रस्तर अभिलेख में इस स्थान का नाम ‘नामोत्तुख (अल्लारिका)’ के रूप में उल्लिखित है। यह मंदिर पूर्वाभिमुख है। इसमें तीन अंग हैं- गर्भगृह, अंतराल और मंडप। मंडप 16 स्तंभों पर आधारित है। यह स्मारक नागर शैली में निर्मित है। रायपुर-कलचुरी कालीन यह मंदिर वास्तुकला का आदर्श उदाहरण है।

जिस पहाड़ी पर यह मंदिर विद्यमान है, वहीं खल्लारी माता मंदिर भी स्थित है। यहां प्रत्येक नवरात्रि में मेला लगता है। इस मेले में भी सभी समाज के लोग सेवा-कार्य में जुटते हैं। न कोई छोटा, न बड़ा। न ही किसी से जाति पूछी जाती है, न उसका पंथ-संप्रदाय। मंदिर की स्वच्छता से लेकर प्रबंधन तक, हर कार्य स्थानीय लोग मिल-जुलकर करते हैं। सही अर्थों में कहें तो सामाजिक समरसता का भाव स्वत्व के जागरण से आरंभ होता है। यह प्रकृति के प्रति कर्तव्यों के साथ-साथ नागरिक कर्तव्य और परिवार-प्रबोधन से भी सिंचित होता है।

इस मंदिर में स्थानीय समाज की भूमिका में ‘पंच परिवर्तन’ के सभी पक्ष देखे जा सकते हैं। आसपास के लोग पीढ़ियों से मंदिर में श्रमदान को अपना कर्तव्य समझते आए हैं। स्थानीय समाज ने वर्षों पहले जो पौधे लगाए थे, वे अब वृक्ष का रूप ले चुके हैं। पास ही स्थित खल्लारी देवी का मंदिर 15वीं शताब्दी में स्थापित हुआ था। इसे राज्य संरक्षित स्मारक का दर्जा प्राप्त है। वर्तमान में जगन्नाथ मंदिर ‘श्री खल्लारी मातेश्वरी जगन्नाथ स्वामी ट्रस्ट’ के अधीन है।

1952 में स्थापित ट्रस्ट के सदस्य श्री सुरेश चंद्राकर कहते हैं कि मंदिर में प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा-अर्चना होती है। प्रतिवर्ष चैत्र नवरात्रि और क्वार नवरात्रि में नौ दिनों तक विशेष पूजा की जाती है। इन दिनों दर्शनार्थियों का तांता लगा रहता है।

इस मंदिर से रथयात्रा भी निकाली जाती है। इस यात्रा में सभी समाजों और वर्गों की सहभागिता होती है। पास ही एक प्राचीन बावली स्थित है, जो भारतीय सांस्कृतिक धरोहरों की पर्यावरण-अनुकूलता को परिलक्षित करती है। यह बावली मंदिर-निर्माण काल से ही मौजूद बताई जाती है। स्थानीय निवासी श्री गोविंद यादव कहते हैं-

“जो लोग खल्लारी माता के दर्शन के लिए पहुंचते हैं, वे जगन्नाथ मंदिर के भी दर्शन करते हैं। यहां आने वाले व्यक्ति के मानस-पटल पर जाति, पंथ, भाषा के भेदभाव वाली सामाजिक बुराइयां कहीं नहीं रहतीं। रहता है तो केवल एक भाव-समरस जीवन और मूल्यों के साथ जीवन जीना; समाज में एकता के साथ बेहतरी के लिए प्रयास करना।”

इतिहास का स्वर्णिम पृष्ठ
इतिहास के पन्नों में खल्लारी का उल्लेख 15वीं शताब्दी से ज्ञात होता है। उस समय रतनपुर राज्य दो भागों-रतनपुर और रायपुर में विभक्त था। एक की राजधानी रतनपुर और दूसरे की राजधानी रायपुर स्थापित की गई थी। दोनों राज्यों में 18-18 गढ़ थे। खल्लारी भी रायपुर राज्य का एक गढ़ माना जाता था। प्रायः शिवनाथ और महानदी दोनों की सीमाएं तय करने में भूमिका निभाती थीं। खल्लारी के अंतर्गत 84 ग्राम शासित होते थे।

रायपुर के शासक ब्रह्मदेव का एक शिलालेख विक्रम संवत 1471 (19 जनवरी, 1415 ई.) खल्लारी में प्राप्त हुआ है। इस शिलालेख से पता चलता है कि हैहयवंश की कलचुरी नामक शाखा में राजा सिंघण के पुत्र रामचंद्र ने नागवंश के भोडिंगदेव को युद्ध में घायल किया था। रामचंद्र का पुत्र ब्रह्मदेव था, जो शिवभक्त था। शिलालेख में अंकित है कि ब्रह्मदेव योद्धाओं के लिए यम के समान और याचकों के लिए कल्पवृक्ष के समान था। इस शिलालेख के सातवें और आठवें श्लोक में खल्वाटिका नगरी का वर्णन है। नौवें श्लोक में मोची देवपाल की वंशावली तथा दसवें श्लोक में उनके द्वारा नारायण मंदिर निर्मित कराए जाने का उल्लेख मिलता है।

प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था थी, पर हमारा समाज किस तरह समरस था, इसका अनुमान इस तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि महिलाओं ने वैदिक मंत्रों की रचना की। पुरुषों में ऋषि महिदास कथित ऊंची जाति से न होकर भी समाज में पथप्रदर्शक माने गए। कबीरदास से लेकर रैदास तक हमारे यहां उतने ही पूज्य हैं, जितने किसी भी जाति-पंथ के संत। प्रसिद्ध इतिहासकार श्री रमेंद्र नाथ मिश्र कहते हैं-

“सामाजिक सद्भाव का यह अनूठा उदाहरण है। छत्तीसगढ़ की यह धरोहर इस बात का प्रमाण है कि राज्य में सैकड़ों वर्षों से लोग जाति, पंथ, भाषा और रंग से ऊपर उठकर सुखी व समृद्ध जीवन जीते रहे हैं।”

समाज में एक धार्मिक-आध्यात्मिक प्रकल्प किस प्रकार सामाजिक उत्थान और समरस समाज का निर्माण करता है, जगन्नाथ मंदिर और उसके निकट स्थित खल्लारी माता मंदिर इसके सुंदर उदाहरण हैं।

भारत के प्राचीन मंदिर और धार्मिक प्रकल्प मानवीय जीवन के नवोत्थान की ऐसी अनेक प्रेरक गाथाओं को सहेजे हुए हैं, जिनकी आत्मा सामाजिक सद्भाव और समरसता है। खल्लारी माता और भगवान जगन्नाथ का मंदिर इन्हीं भावों का साकार रूप है। छत्तीसगढ़ की भूमि वही है, जहां देवपाल मोची जैसे भक्त और समाज के आदर्श जन्म लेते हैं, और अपने पुरुषार्थ से समाज को एकजुट करने के लिए ऐसे प्रकल्पों की स्थापना करते हैं।

लेख:
अरविंद मिश्रा
वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार

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