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जनजातीय वर्ग का सामाजिक और आध्यात्मिक दर्शन

जनजातीय वर्ग का सामाजिक और आध्यात्मिक दर्शन

जब हम किसी जाति या समूह विशेष का अध्ययन करते हैं, तो हम अतीत में मानव-जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में उसके योगदानों का विश्लेषण करते हैं। पर Anthropology के दृष्टिकोण से देखते हुए हमने जनजातीय समाज को स्वयं से अलग देखते हुए अध्ययन किया और अंग्रेजों की सिखायी बातों के अनुसार ही अपने जनजातीय समाज को पिछड़ा, गरीब और हाशिए पर पड़ा समाज मान लिया। पर जब हम जनजातीय समाज के निकट रहकर उनके जीवन का सूक्ष्मता से अवलोकन करते हैं, तो पाते हैं कि हम सभी के जीवनमूल्यों में कोई अन्तर नहीं है।


बैगा जनजातीय समुदाय के साथ मड़ई के दौरान

जीवन के प्रति हमारी दृष्टि और विश्व के प्रति अपनत्व का भाव यह तो हम सबकी अस्मिता का मूल तत्त्व है। आरम्भ करने के लिए हम देवत्व का उदाहरण लेते हैं। संथाल जनजाति की उत्पत्ति के विषय में लोककथाओं के अनुसार जब देवताओं ने उन्हें कहा कि गाँव बसाओ। जब गाँव बसा लिए गए, तब देवताओं ने किसी एक पेड़ की ओर इंगित कर कहा कि हम इस पेड़ पर रहेंगे। लोग गांव में रहें। और जब कोई समस्या हो, तो उस पेड़ के पास जाएँ। वहाँ देवता उनसे मिलेंगे। इस तरह संथाल जनजाति के लोग उस पेड़ की पूजा करने लगे। वास्तव में वे पेड़ के रूप में स्वयं को अभिव्यक्त कर रहे ईश्वर या देवता की पूजा कर रहे हैं। कितना गहरा अध्यात्म है।


संथाल जनजाति की उत्पत्ति सम्बंधित लोककथा

क्या हम ऐसा नहीं मानते? मानते हैं। “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, “तत्त्वमसि” जैसे उपनिषद वाक्यों में भी तो आखिर यही भाव निहित हैं। पर हम तो यह समझ ही नहीं पाते। देवताओं की मान्यता गोंडों में भी है। वे पूछते हैं कि कितने देवता हैं, और देवताओं के आधार पर ही गांव बसाते हैं। उनकी आध्यात्मिक पहचान इतनी गहरी है कि हम उसे समझ ही नहीं पाते।

इसी तरह भारत में एक सामान्य धारणा है कि हम जो भी खाते-पीते हैं, पहले वह ईश्वर को, देवताओं को समर्पित करते हैं। जनजातीय समाज में भी ऐसा ही है। लेकिन जब वे दारू की धार देवता को देते हैं, तब हमारे जैसे शहर के लोग पुजारी के भाव को न समझ कर सही-गलत के बीच उलझ जाते हैं।

There is presence of mango tree in every rite - News18 हिंदी
देवता को अर्पित करने के बाद ही फल खाने की परम्परा

हमारे यहाँ कहा जाता है कि भगवान भाव के भूखे होते हैं। पर जब पुजारी देवता को भावपूर्वक दारू अर्पित करता है, तो हम केवल बाहरी वस्तुओं को देखने लग जाते हैं। भारत के प्राचीन साहित्य में देखें तो रामायण में माता शबरी का जिक्र मिलता है, जिन्होंने रामजी के दर्शन के लिए कितनी लम्बी प्रतीक्षा की। और जब श्रीराम उनके यहाँ पहुँचे, तो माता शबरी ने उन्हें चख-चख कर बेर खिलाए, ताकि खट्टे बेर रामजी को न खाना पड़े।

कैसा सुन्दर भाव था वह! और जब रामजी ने उनसे वरदान मांगने को कहा तो, उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। क्योंकि स्वार्थ, लोभ या अन्धी भौतिकता ने हमारे जनजातीय समाज को कभी स्पर्श भी नहीं कर पाए हैं। ऐसे जनजातीय समाज और ऐसे महात्माओं आज हमें नमन करना चाहिए।

पूर्वजों की पूजा के विषय में भी लगभग ऐसा ही है। अंग्रेजों ने हमसे कहा कि जनजातीय लोग गाँव-शहरों में रहने वाले भारतवासियों से अलग है, क्योंकि वे तो पूर्वजों की पूजा करते हैं। हमने भी इसे मान लिया और जनजातीय समाज को स्वयं से अलग कर लिया। पर क्या केवल जनजातीय समाज ही पूर्वजों की पूजा करता है? क्या हम अपने पूर्वजों की पूजा नहीं करते? हर साल सोलह दिनों के पितृपक्ष में हम क्या करते हैं? पूर्वजों की पूजा ही तो करते हैं।

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पर हमने अभी अंग्रेजों के जिन षड्यंत्रों पर बात की थी। यह उनका ही दुष्प्रभाव है कि श्राद्ध पक्ष में पितृगणों का तर्पण करने वालों ने यह बिना विचारे यह मान लिया कि जनजातीय समाज हमसे अलग है, क्योंकि वह तो पूर्वजो की पूजा करता है।

ऐसी ही भ्रान्तियाँ जनजातीय समाज की सामाजिक व्यवस्थाओं को लेकर भी है। अभी कुछ वर्षों पहले महाराष्ट्र प्रदेश के जनजातीय क्षेत्र में सामूहिक विवाह का आयोजन किया गया था। विवाह हेतु जो जोड़े आए थे, उनके साथ उनके बच्चे भी आए थे। अर्थात् उनके बच्चे तो थे, पर विवाह नहीं हुआ था। अब शहर का कोई व्यक्ति इसे देखेगा, तो उसे सीधे लिव-इन रिलेशनशिप से जोड़ लेगा। पर लिव-इन रिलेशनशिप और इस विवाह के बीच भावों का अन्तर वह नहीं समझ सकता। और फिर उसे उनकी समाज-व्यवस्था की भी तो जानकारी नहीं है।

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इसी प्रकार के सामूहिक विवाह की तश्वीर: बस्तर

यदि रहती, तो उसे यह पता रहता कि उस जनजातीय समाज की व्यवस्था ऐसी है कि यदि विवाह के समय वर या वधू पक्ष में से किसी भी पक्ष के पास संसाधनों का अभाव होता है, तो दूसरा पक्ष उसकी पूर्ति करता है। वधू पक्ष को तो वर पक्ष द्वारा वैसे भी सहायता मिलती ही है। पर यदि किसी कारणवश दोनों ही पक्षों के पास संसाधनों का अभाव हो, तो विवाह नहीं रोका जाता। बिना किसी आयोजन के विवाह सम्पन्न मान लिया जाता है। और बाद में कभी भी जब संसाधनों की व्यवस्था हो जाती है, तब विवाह की सारी रस्में और समारोह किए जाते हैं।

क्या यह भाव लिव-इन रिलेशनशिप में रहता है? नहीं। यह तो बड़ी उन्नत सामाजिक व्यवस्था है। ऐसे ही किसी के घर विवाह के अवसर हो या कोई और बड़ा कार्य हो, तो पूरा समाज सेवा के लिए तत्पर रहता है।  बड़े-से-बड़ा कार्य मिल-जुल कर आसानी से कर डालने की कला जनजातीय समाज के पास है। यदि विवाद का कभी प्रश्न हो, तब पूरे समाज के मध्य उन पर निर्णय किया जाता है।

न्याय की बात निकल पड़ी है, तो एक बात ध्यान में आती है कि पहले से ही जनजातीय समाज में गाँव के लोग ही कायदे-कानून बनाते रहे हैं। और यह सामान्य-सी बात है कि कानून जितना सरल होता है, न्याय करना भी उतना ही सरल होता है। तो जब समाज के, गाँव के लोग ही कानून बना रहे हैं, तो हर व्यक्ति स्वयं ही, वकीलों की सहायता के बिना न्याय मांगने में सक्षम हो जाता है। और यह न्याय ऐसा होता है कि कठिन से कठिन मामलों को पंचायतों में हल कर लिया जाता है। और सिर्फ हल नहीं निकलता, बल्कि सारी समस्या, द्वेष, लड़ाईयाँ सभी समाप्त भी हो जाते है। पर क्या हम शहरी जीवन में ऐसी कल्पना कर सकते हैं? नहीं।

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हम तो एक के ऊपर दूसरी कोर्ट का दरवाजा खटखटाते रहते हैं, पर न्याय फिर भी बमुश्किल मिल पाता है। तो क्या हम यह सब अपने जनजातीय समाज से सीख नहीं सकते? हम इस दिशा में विचार क्यों नहीं करते? झारखंड के गाँवों में तो न्याय के लिए आज भी विलकिंग्सन पद्धति (पारंपरिक पद्धति) ही प्रचलित है। नाम से हमें भ्रमित नहीं होना चाहिए। वास्तव में विल्किंग्सन नामक अंग्रेज ने इसे पहली बार लिपिबद्ध किया, था इसका ऐसा नाम पड़ा। लेकिन यह पद्धति क्या है? इसमें मूल गाँव के अलावा तीन और गाँव के मुखिया बुलाए जाते हैं, और उनसे गाँवों के झगड़ों का निर्णय करने को कहते हैं। ये मुखिया जो निर्णय करते हैं, वही कोर्ट में जाता है, और कोर्ट उस पर मुहर भी लगाता है। इसीलिए यह हमारे लिए एक बहुमूल्य विरासत है।

न्याय की बात से ही जुड़ी एक बात है अपराधों की। आज महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में लगातार वृद्धि हो रही है। कड़े होते जा रहे कानून भी इन्हें रोकने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। पर जनजातीय समाज में ऐसा बिल्कुल देखने को नहीं मिलता। हम शहरों में लिंगानुपात को लेकर भी चिन्ता कर रहे हैं। पर जनजातीय समाज में लिंगानुपात की बात तो दूर, हमें महिला और पुरुषों में भी कोई अन्तर का आग्रह नहीं दिखता। यदि हम जनजातीय समाज द्वारा आयोजित मेलों, जात्राओं आदि में जाएँ और वहाँ यदि वहाँ 10 हजार लोगो हैं, तो उनमें से आपको 5000 महिलाएँ होंगी।

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भगोरिया मेले में आई युवतियां

प्रशासन की बिना किसी मदद के ऐसे आयोजन करना यूँ भी कठिन है, और उसमें महिलाों की इतनी सहभागिता और भी ज्यादा विशिष्ट है। क्या नगरीय और तथाकथित आधुनिक समाज को जनजातीय समाज से यह सीखने की आवश्यकता नहीं है कि महिलाओं का सम्मान कैसे सुरक्षित रखा जा सकता है? अभी हमने जब स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास पर बात की तब देखा कि कैसे बुद्धु भगत के दो बेटों ने बलिदान दिया तो उनकी दो बेटियाँ रुनियाँ-झुनियाँ भी पीछे नहीं हटी। वीर सिद्धो-कान्हू के साथ लड़ने वाली उनकी बहने फूलो और झानो के बारे में भी हमने बात की।

आशय यह है कि महिलाएँ भी पुरुषों के साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर अंग्रेजों का मुकाबला कर रही थी। और इससे समझ आता है कि जनजातीय समाज में महिलाओं और पुरुषों में कोई अंतर रहा ही नहीं है। यह दृष्टी आज के तथाकथित आधुनिक समाज को समझने की आवश्यकता है।


संपादक:
वेद प्रकाश सिंह ठाकुर 
दक्षिण कोसल टुडे 
 

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