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जबलपुर का चौसठ योगिनी मन्दिर

जबलपुर का चौसठ योगिनी मन्दिर

मध्यप्रदेश के जबलपुर जिले के अन्तर्गत नर्मदा तटीय भू-भाग में भेड़ाघाट एक प्रमुख स्थान है। यहाँ पर नर्मदा और बाणगंगा नदी के संगम पर 50 फीट एक ऊंची पहाड़ी पर एक प्राचीन गोलाकार मन्दिर है जिसे चौसठ योगिनी कहते है। भारत में जितने भी चौसठ योगिनी के मन्दिर है उनमें सबसे अधिक भव्य और प्राचीनतम उपासना विधि से संयुक्त देवालय यही माना गया है। यह मन्दिर, मुख्यालय जबलपुर से कुछ ही दूरी पर उक्त दोनों नदियों के संगम पर है।


वृत्ताकार चौसठ योगिनी मंदिर

इस मन्दिर के केन्द्र में भगवान शिव और देवी पार्वती की विवाह मूर्ति नन्दी पर आसीन है जो पूरे देश की अकेली मूर्ति है। इसलिये इस मन्दिर को गौरीशंकर मन्दिर भी कहा जाता है। वहीं इस मन्दिर के देवालय में चारों ओर 84 स्तम्भों पर एक वृहद् वृत्ताकार दालान बनी है जिसमें चारों ओर योगिनियों की मूर्तियाँ स्थापित है। इसलिये इसे गोलकी (वृत्ताकर) मन्दिर भी कहा जाता है। योगिनी तन्त्र पूजा की प्राचीन परम्परा पर निर्मित इस मन्दिर में योगिनियों की 64 नहीं अपितु 81 मूर्तियाँ है।


नन्दी पर आसीन शिव पार्वती

इतिहासकार डॉ. आर.के. शर्मा का मानना है कि इस मन्दिर पर कोण रूप में प्रत्येक कोण को ध्यान में रखते हुए योगिनी की मूर्तियाँ स्थापित की गयी थी। ये योगिनियाँ तन्त्र शक्ति अर्जन की परिचायिका मानी गई है। तांत्रिक अपनी तंत्र साधना के लिये इन्हीं योगिनियों को सिद्ध करते थे। प्राचीनकाल में यह मन्दिर तंत्र साधना का एक विशाल महाविद्यालय था और दूर-दूर से अनेक तांत्रिक यहाँ साधना करने तथा योगिनियाँ को सिद्ध करने हेतु आते थे। त्रिभुजी कोण की संरचना पर आधारित इस मन्दिर में योगिनियों की अब भग्न मूर्तियाँ हैं परन्तु उसके बावजूद भी ये सब देश, विदेशी पर्यटकों की आकर्षण की केन्द्र है।

यह मन्दिर सबसे भव्य प्राचीनतम उपासना विधि से संयुक्त देवालय माना गया है। विद्वान डॉ. हेमूयुद अपने ग्रन्थ प्राचीन नर्मदा (उत्पत्ति, प्राचीनता एवं परम्परा) में इस मन्दिर का वर्णन करते हुए इसका निर्माण कलचुरि नरेश लक्ष्मणराज और युवाराज देव द्वितीय द्वारा अपने राज्य की श्रीवृद्धि और उत्कर्ष की कामना के निमित्त करवाया जाना रेखांकित करते है। बाद की खोजों से यह भी स्पष्ट हुआ है कि इन योगिनी के मन्दिरों की संख्या दो प्रकार से की जाती थी। प्रथम जब कोई शासक अपने राज्य की सीमाओं में वृद्धि अथवा अनेक स्वास्थ्य लाभ हेतु योगिनी मन्दिर बनवाया करता था जो 81 योगिनियों के निर्मित होते थे। दूसरा जब सामान्य जनता अपने स्वयं के उत्कर्ष या स्वास्थ्य कामना के लिये मन्दिर निर्माण करती थी तो वह 64 योगिनियों के मन्दिर होते थे। जबलपुर में चौसठ योगिनी के नाम से प्रसिद्ध इस मन्दिर के 81 कक्ष (देवकुलिका) है, ना कि 64 जैसा की सामान्य जनता की जानकारी में पूर्व से प्रसारित किया है।

अतः तार्किक तौर पर यह वास्तव में 81 योगिनियों का ही अधिकारिक मन्दिर है। यदि तंत्रमंत्र की दृष्टि से अनुशीलन किया जाये तो ज्ञात होता है कि कपालिकों एवं कालमुखे तान्त्रिक साधकों की शक्ति पूजा में कुछ शक्तियाँ विषय विलास से सम्बन्धित भी होती है। इनमें आनन्द भैरवी, त्रिपुरा सुन्दरी ऐसी शक्तियाँ मानी जाती है। इनके शिव संयोग से जो अहं शब्द बना वह सृष्टि का द्योतक है अर्थात् इस सृष्टि की रचना में शिव का स्वर 'अ' तथा त्रिपुरी का 'हं' है। उक्त मन्दिर में एक विशेष मूर्ति जो तीसवीं देवकुलिका में स्थापित हैं यह एक योगिनी मूर्ति है जिसकी पहचान नर्मदा देवी के रूप में की गई है। इसमें देवी मुकुट धारण किये हुए मकर पर आसीन है। इस नवीन तथ्य को अभी कुछ वर्षों पूर्व से ही प्रसारित किया गया है। इस देव कुलिका में जिस योगिनी की मूर्ति की पहचान नर्मदा से की गई है उसके पादपीठ पर "रुषिणी" शब्द उत्कीर्ण है। इस मूर्ति का माप 79X126 सेमी है। यह जटा मुकुट धारण किये मकर पर आरूढ़ है लेकिन इसके दोनों कर भग्न है। मूर्ति विद्वानों ने भी इसे देवी नर्मदा की मूर्ति ही प्रमाणित की है।

इतिहासकार ब्लाख एवं हीरालाल ने इस योगिनी के पादपीठ के नाम को "श्रीझषिणी' पढ़ा था। झषिणी का अर्थ "मकर वाहन" या "मीन वाहन" होता है। नर्मदा देवी को दोनो वाहन मकर और मीन प्राप्त है अतः पाठपीठ पर श्री झषिणी लेख पढ़ने पर उक्त मूर्ति को नर्मदा मानने में कोई आपत्ति भी नहीं होती। इसके अलावा पुरावेत्ता एलेक्जेण्डर कनिंघम ने इस लेख को "श्री ऋक्षिणी' पढ़ा था और उसके मत से ऋक्षिणी नर्मदा नदी है जो ऋक्ष (सतपुड़ा) पर्वत से निकली है। इस प्रकार कनिंघम का मत अधिक तर्क संगत, उपयुक्त और सटीक होने से स्वीकार मानने योग्य है। इस आशय से यह भी माना जा सकता है कि इस विस्तृत क्षेत्र में नर्मदा की बरसों से रही आस्था के कारण योगिनी देवियों के मध्य प्रारम्भिक कलचुरी काल में उसे (नर्मदा) योगिनी देवी के रूप में मान्यता मिल चुकी थी। न केवल नर्मदा (श्री ऋक्षिणी)  अपितु श्री यमुना, श्री जाह्नवी (गंगा), श्री जटा (सरस्वती) ये तीन अन्य पूज्य नदी देवियाँ भी योगिनियों में स्थान पाकर चौसठ योगिनी मन्दिर में कलचुरि काल में पूजित हुई।


श्री जान्हवी

शैवमत से शक्ति या शाक्त मत का प्रमुख स्थान है। इस में भैरवी चक्र की प्रधानता आवश्यक रूप से होती है। शाक्त मत में योनि चित्र की पूजा का विधान है और यह चित्र इस मन्दिर में सर्वत्र योनि चित्र प्रस्तर के निर्माणों में भी दिखायी देते है। ये चित्र पंचस्थ शैली में निर्मित उक्त वर्णित गौरीशंकर मन्दिर में स्थान-स्थान पर उत्कीर्ण है जिन्हें सामान्य व्यक्ति भी देख सकता है। यही चित्र ध्यान से अध्ययन करने पर वृत्ताकार योगिनी दीर्घा की बहुसंख्यक योगिनी मूर्तियों की पादपीठ में भी उत्कीर्ण सहसा दिखायी देते है।

सम्पूर्ण मन्दिर का निर्माण काल 10वीं-12वीं सदी ईस्वी के मध्य का होना प्रतीत होता है। इस कालावधि में कलचुरी शासकों का शासन भी था अतः कलचुरी काल में इस मन्दिर का निर्माण माना जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। चूंकि यह मन्दिर 81 कोष्ठों में है जिसमें विभिन्न योगिनी की मूर्तियाँ है। मंत्रोत्तर पुराण में यह भी निर्देश 81 योगिनियों के मन्दिर सत्तारूढ़ शासक के अनिष्ट निवारण हेतु ही निर्मित करवाये जाते थे। इन योगिनी मूर्तियों का प्रथम बार वर्णन राखलदास बनर्जी ने अपनी पुस्तक "हैहयाज ऑफ त्रिपुरी एण्ड देयर मान्यूमेन्ट्स" में विस्तार पूर्वक किया है। भारत में योगिनियों के जितने भी मन्दिर है उनमें जबलपुर का यह मन्दिर सबसे विशाल है जो शिखर और मण्डप से युक्त है।

योगिनी वृत्ताकार के मध्य में जो गौरीशंकर मन्दिर है उसके गर्भग्रह में स्थापित नन्दी पर सवार उमा महेश की मूर्ति दरअसल कल्याण सुन्दर (शिव पार्वती) की वैवाहिक मूर्ति मानी जाती है। इस स्वरूप को रोगों के निवारक एवं प्राणी मात्र का रक्षक माना गया है। यह मन्दिर उक्त दोनों निर्माताओं की माता (रानी) ने अनिष्ठ निवारण हेतु बनवाया था। यह एक दुर्लभ मूर्ति है।

पुरातत्त्ववेत्ता मुनि जिन विजय की मान्यता है कि इस मन्दिर का निर्माण सन् 1155-56 ई० (कलचुरी संवत 907) में अल्हणदेवी ने करवाया था। इस मूर्ति में शिव के कर में त्रिशूल एवं पार्वती के कर में दर्पण है। मूर्ति के उभयपार्श्व में ब्रह्मा और विष्णु की मूर्तियाँ है। दाहिनीं ओर सूर्य तथा बायीं ओर विष्णु की मूर्ति हैं। बायीं भित्ति पर एक सुन्दर गणेश की कलात्मक नृत्य मूर्ति दर्शनीय है। संभवतः यह दसवीं सदी की है। वृत्ताकार (गोलाकार) मन्दिर में प्रवेशद्वार पर एक भू-गर्भ है जिसमें साधना कक्ष है।

यह कक्ष साधना वाले मतावलम्बियों के हेतु योनि साधना का प्रारम्भिक साधना कक्ष था। इस प्रारिम्भक विद्या में प्रशिक्षित एवं सफल होने के पश्चात् ही साधक आगे की साधना की ओर अग्रसर होता था। अर्थात् इस कक्ष में प्रवेश के लिये शरीर संकुचन की विद्या का ज्ञान होना आवश्यक होता था। शरीर को संकुचित करने की यौगिक क्रिया में साधक निष्णांत हो जाता था। मन्दिर की रचना शैली और पाषाण खण्डों का ध्यान से अवलोकन करने पर प्रतीत होता है कि यह मन्दिर दो चरणों में निर्मित हुआ होगा अथवा किसी अन्य भग्न मन्दिर से पाषाण लाकर यहाँ लगाये होगें। मन्दिर का अधोभाग अधिक प्राचीन है परन्तु इर्द-गिर्द का भाग बाद का लगता है।

मन्दिर मण्डप के अन्तराल में दाहिनी ओर एक लेख में निम्न पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं- "महाराज विजय सिंह देव की माता गोसल देवी स्व पौत्र अजय देव के साथ नित्य प्रति भगवान बैद्यनाथ के दर्शनार्थ आती थी।"
वृत्ताकार में जितनी भी योगिनी मूर्तियाँ प्रतिष्ठित है वे कला की दृष्टि से पूर्ण विकसित परिपक्व ओझिल नितम्बों वाली, शारीरिक सौष्ठव कलश स्तनी सुन्दरियों के प्रतिरूप में है। माना जाता है कि योगिनियाँ जीवन को अपनाती है। यदि योगी जीवन से दूर होते है तो योगिनियाँ जीवन को जीती है। योगी अमरता की इच्छा रखता है तो योगिनी को मृत्यु से भय नहीं है। यदि योगी इच्छाओं पर काबू पाना चाहता है तो योगिनी सभी इच्छाओं को स्वतन्त्र रखने में विश्वास रखती है।

इसी क्रम में पुराविद् देवलमित्रा एवं डॉ. आर.डी. बनर्जी ने इन मूर्तियों का विशेष अध्ययन किया था। उससे ये मूर्तियाँ गुप्तोत्तर कालीन मातृका मूर्तियाँ है। ऐसा भी पुराणोक्त वर्णन मिलता है कि जिस समय शिव अन्धकासुर से युद्ध कर रहे थे तब अन्धकासुर के शरीर से जितनी रक्त की बूंदे गिरती उतने ही नए अन्धकासुर पैदा हो जाते थे तब शिव ने अपनी शक्ति छोड़ी और इसी के साथ ही ब्रह्मा, विष्णु, स्कन्द, इन्द्र, यम आदि देवों ने भी अपनी शक्तियाँ छोड़ी। ये शक्तियाँ ही फिर सप्त मातृकाओं के नाम से प्रसिद्ध हुई। मूर्तिकला के रूप में कुषाण काल से सप्तमातृका पूजा को विशेष मान्यता मिली। बाद में मातृका पट्टो में उनके आयुध व वाहन भी दर्शाये गये। कुषाणकाल के बाद इन मातृकाओं की संख्या में विशेष वृद्धि हुई। सात मातृकाओं के अतिरिक्त फिर 10, 12, 16 मातृकाएँ मानी गई। चौसठ योगिनियाँ भी फिर मातृकाओं के ही रूप में थी। देवियों की एक सूची में तो यहाँ तक कहा गया कि लोक में मातृकाओं की संख्या का अन्त नहीं है।

मूर्ति विज्ञान की दृष्टि से उक्त दोनों विद्वानों की मान्यता है कि जबलपुर के उक्त मन्दिर में सप्तमातृका मूर्तियाँ गुप्तकाल के बाद की अर्थात 7वीं 8वीं सदी की है। यहाँ की देवकुलिकाओं में लगभग 7 गुप्तोत्तर कालीन मूर्तियाँ प्राप्त हुई है जो मन्दिर के वृत्त भाग में है। ये सभी लाल बलुआ पाषाण से निर्मित है। इनमें से एक पुरूष की व एक गणेश की मूर्ति हैं शेष मातृकाओं की है। सभी मातृका मूर्तियाँ चतुर्भुजी हैं। उक्त स्थल पर जो मातृका मूर्तियाँ है उनमें इन्द्राणी, कौमारी, ब्रह्माणी, महेश्वरी और वैष्णवी का प्रतिरूप है। अन्य में वाराही एवं चामुण्डा की मूर्तियाँ भी थी जो अब नहीं है। इनमें चामुण्डा की मूर्ति की ओर 1955 ई. में देवलमित्रा ने ध्यान आकर्षित किया था जिसमें वीरभद्र और गणेश को मातृका के अभिभावक रूप में दर्शाया गया है। कनिंघम ने भी इन मूर्तियों का वर्णन किया था तथा इनकी स्थानक मुद्रा, भारीपन व निर्माणकला के आधार पर इन्हें यक्षी जैसा जान इन्हें कुषाण कालीन बताया। डॉ. आर.डी. बनर्जी ने इनकी शिल्पकला के आधार पर इन्हें गुप्तोत्तर काल की माना।


मंदिर के अन्दर का एक भाग 

चौसठ योगिनी मन्दिर परिसर की वृत्ताकार देव कुलिका में स्थित नृत्यरत सप्तमातृकाओं में जो मूर्तियाँ शेष है वे पादपीठो पर है। इनमें एक मूर्ति इन्द्राणी की है। एक मूर्ति कौमारी की है। एक-एक मूर्ति ब्रह्माणी एवं वैष्णवी की है। इन्द्राणी की चतुर्भुजी मूर्ति में वह अधोवस्त्र, मेखला, ग्रैवयक, एकावली, केयूर एवं नुपुर धारण किए है। उनके कन्धों पर स्कार्फनुमा वस्त्र है जो देवी के बायीं ओर लटका हुआ है। नृत्यरत देवी के दोनों पैरों के मध्य साड़ी की चुन्नटे लटकी हुई है। मूर्ति के कर, शीश एवं पृष्ठ का अधिकांश भाग भग्न है। मूर्ति के दाहिनें नीचे के भाग में हस्ति प्रदर्शित है, जिस कारण यह इन्द्राणी की मूर्ति है। कौमारी की मूर्ति में शीश भाग एवं कर भग्न है। देह पर पारदर्शी साड़ी का अंकन है। उनके कटि प्रदेश में कटिबन्ध, स्तनों पर कुचबन्ध, ग्रैवेयक, लम्बी माला जिसका नीचे की ओर लटकता भाग दोनों स्तनों के मध्य से होकर दाहिने चरण की जंघा तक पहुंचता हुआ प्रदर्शित है। माला के अन्तिम भाग में गोलाकार लाकेट है। देवी के स्तन व उदर भाग के मध्य के भाग में 3 पसलियाँ दिखाई देती है। मूर्ति के अधोभाग में देवी के वाहन मोर का अंकन है और इसी आधार पर उनकी पहचान कौमारी के रूप में की गयी है। इस वाहन को पुरातत्वविद् वी.वी. मिराशी ने हंस माना और उनकी मान्यता है कि यह देवी ब्रह्माणी है।

एक चतुर्भुजी नृत्यरत मातृका मूर्ति के दैहिक अलंकरण उपरोक्त कौमारी मूर्ति के समान है। इस मूर्ति के चारो कर व शीश भग्न है। देवी के चरण के दाहिनीं ओर हंस का अंकन है जिस कारण यह मातृका ब्रह्माणी की मूर्ति है। एक मूर्ति मातृका माहेश्वरी की है परन्तु इसके कर व शीश भग्न है। लेकिन उस पर जटाजूट शेष है। इसी आधार पर देवल मित्रा ने इसे महेश्वरी मूर्ति माना है, क्योंकि शिव (महेश) भी जटाजूट से सेवित होते है। एक मातृका मूर्ति वैष्णवी की है। यह भी शीश व कर में भग्न है। देवी अपनी देह पर अर्द्ध पारदर्शी साड़ी धारण किये है। वे कटिमेंखला, वनमाला, ग्रैवेयक आदि आभूषणों से अलंकृत है। उनके चरणों के निकट उनका वाहन भी भग्न है परन्तु गरूड़ का पंख अभी भी मूर्ति में शेष है, के आधार पर वाहन को गरूड़ मानकर देवी की पहचान वैष्णवी के रूप में की गई है।

इस प्रकार इन मूर्तियों के कलावलंकरण से ज्ञात होता है कि ये गुप्तकालीन न होकर उसके पश्चात् के काल संभवतः 7वीं, 8वीं सदी की हो सकती है, परन्तु उक्त मन्दिर में स्थापित उक्त वर्णित मातृका मूर्तियों को छोड़कर शेष सभी मूर्तियाँ कलचुरिकालीन है। अतः सम्भावना है कि गुप्तोत्तर काल में यहाँ योगिनी मन्दिर के पूर्व मन्दिर निर्मित हुआ तब यहाँ पूर्व में स्थित मातृका मूर्तियों के लिए भी पादपीठ या चबूतरे बनाकर उन्हें भी स्थापित कर दिया होगा।

वर्ष 2015 ई. में इस मन्दिर का लेखक ने भी सामुख्य अध्ययन किया था। उसमें पाया कि वृत्ताकार देवकुलिका में स्थापित अनेक मूर्तियों के नीचे पुरातत्व विभाग ने उनके नाम पाषाण पट्टिकाओं पर उकेर कर उन्हें स्थापित किया है, परन्तु कुछ मूर्तियों पर उनके नाम की पट्टिाएँ भी नहीं है। लेखक द्वारा पढ़े गये इन मूर्ति नामों की सूची इस प्रकार है-
1. छत्र संवरा, 2. अजीता, 3. चण्डिका, 4. आवन्या, 5. ऐंगिनी, 6. ब्रह्माणी, 7. महेश्वरी, 8. रकारी, 9 जयती, 10 पदमहस्ता, 11. हंसिनी, 12. ज्ञात नहीं, 13. ज्ञात नहीं 14. ज्ञात नहीं, 15. ईश्वरी, 16. इन्द्रजाली, 17. रादूनी, 18 पढ़ा नही जाता, 19. पढ़ा नहीं जाता, 20. पढ़ा नहीं जाता, 21. एंगनी, 22. उत्ताला, 23. नालिनी, 24. लम्पटा, 25. ददुरी, 26. भक्तमाला 27. गांधारी, 28. जाह्नवी 29. डांकिनी, 30. बांधिनी, 31. दर्पहाटी, 32. अस्पष्ट नाम, 33. लंकिनी, 34 ज्ञात नहीं 35. घंटाली, 36. शकिनी, 37. ठडुरी, 38 अज्ञात, 39. वैष्णवी, 40. भीषणी, 41. शबरा, 42 छत्रधारिणी, 43. खण्डिता, 44. फणेन्द्री, 45. वीरेन्द्री, 46. डकिनी, 47. सिंहसिहा, 48 झाषिणी (नर्मदा), 49. कामदा, 50. रणजिटा, 51. अन्तकारी, 52. अज्ञात, 53. एकदा, 54. नन्दिनी, 55. विभत्सा, 56. वाराही, 57. मन्दोदरी, 58. सर्वतोमुखी, 59. चिरचित्ता, 60. रवेमुखी, 61. अज्ञात, 62. जांबवती, 63. ओंतारा, 64. अस्पष्ट, 65. यमुना, 66. अस्पष्ट, 67. अस्पष्ट, 68 पांडवी, 69. नीलाम्बरा, 70. अज्ञात, 71. तेरमवा, 72 षडिनी, 73. पिंगल, 74. अहरवला, 75 अस्पष्ट, 76. अस्पष्ट, 77. जठरवा, 78. अज्ञात, 79. रिधवा देवी, 80. अज्ञात, 81 अज्ञातz
इस नामावली से यह स्पष्ट होता है कि इनमें मातृका के साथ लोक की प्रचण्ड देवियों के नाम प्रतीत होते है जो कालान्तर में योगिनी के नाम से समादृत हुई।

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