ज्ञान और भक्ति का पावन संगम : तिरुवोट्टियूर का ऐतिहासिक त्यागराजस्वामी मन्दिर
June 14, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी | रविवार
नक्षत्र: रोहिणी | योग: धृति | करण: शकुनि
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

क्या आप जानते हैं कि साक्षात योगमाया, जगज्जननी जानकी जी का प्राकट्य वास्तव में कब और कैसे हुआ? क्या सीता जी केवल जनकनन्दिनी थीं या वे स्वयं महाशक्ति का वह रूप हैं जो संहार करने में भी सक्षम हैं? आइए ऋग्वेद से लेकर अद्भुत रामायण तक के प्रमाणों के साथ, "सीता तत्त्व" के इन गूढ़ रहस्यों को जानें और वैशाख शुक्ला नवमी को उनके पावन प्राकट्य को नमन करें!
लक्ष्मणगढ़, सीकर (राजस्थान) के निवासी और पूर्व उप निदेशक शिक्षा, श्री रामनिवासशर्मा जी सनातन संस्कृति और अध्यात्म के गूढ़ रहस्यों के गम्भीर अध्येता हैं। शास्त्रीय प्रमाणों के साथ 'सीता तत्त्व' की विवेचना करता उनका यह लेख पाठकों को जगज्जननी के वास्तविक स्वरूप से परिचित कराएगा।
उद्भवस्थितिसंहारकारिणी: भगवती सीता का दिव्य प्राकट्य और उनका महाशक्ति स्वरूप
सनातन धर्म के शास्त्रों और महाकाव्यों में माँ सीता का चरित्र केवल एक आदर्श नारी का ही नहीं, अपितु ब्रह्मांड की मूल शक्ति का आख्यान है। वे परम सत्य और आनन्द की साक्षात मूर्ति हैं। उद्भवस्थितिसंहारकारिणी क्लेशहारिणीम्, सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्। यह श्लोक पूर्णतः सत्य है। सीता जी ऋग्वेद में असुर संहारिणी और कल्याणकारी हैं, सीतोपनिषद में मूल प्रकृति और विष्णु सान्निध्या हैं। रामतापनीयोपनिषद उन्हें आनन्द दायिनी, आदिशक्ति और उत्पत्ति, स्थिति तथा संहार की कारण स्वीकार करता है। वे इच्छा, क्रिया और ज्ञान की संगमन हैं।
जगज्जननी सीता जी का प्राकट्य एक परम दिव्य घटना है। जब मनु और शतरूपा निराकार ब्रह्म को साकार राम रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्यारत थे, उसी समय पूर्व जन्म में सुनयना और जनक भी सीता को पुत्री रूप में पाने के लिए साधनारत थे। जनक के पास ज्ञान और सुनयना के पास दृष्टि है; ये दोनों जब मिल पूर्ण हुए, तभी पूर्ण ब्रह्म उनकी गोदी में आ सका। जगज्जननी 'विदेह' होकर भी देह के कल्याण में लीन विदेहराज के घर प्रगट होने को सँवर गई। जनक के ज्ञान यज्ञ और निष्काम कर्म से वे सुता बन पधारीं।

ऋग्वेद में असुर संहारणी व विष्णु सान्निध्या वर्णित सीता
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार पूर्व जन्म में वे वेदवती रूप में भगवान विष्णु की परम भक्त थीं। उन्हें पति रूप में पाने हेतु कठोर तपस्या कर रही थीं। एक दिन रावण विमान में बैठे उधर से जा रहा था। वेदवती की सुंदरता देख उससे परिणय अनुरोध किया। उसके द्वारा मना किए जाने पर क्रोधित रावण ने वेदवती के केश पकड़ लिए। वेदवती ने अपने पार्श्व से कटारी निकाल केश काट दिए और शाप दिया कि अगले जन्म में वही उसकी मृत्यु का कारण बनेंगी।
रावण ने ऋषियों के रक्त से भरे स्वर्ण कलश में वे केश डुबा दिए। जहाँ भी कलश को रखने की सोचते, वही प्रलय दिखाई देता। धरती के पाताल में समा जाने का भय लगता। अन्ततः उसे मिथिला की पवित्र धरती पर पुनौरा धाम में रखा गया। 'पुनौरा' वस्तुतः पुंडरीक (सफेद कमल) का अपभ्रंश है, जिस पर साक्षात लक्ष्मी जी विराजमान होती हैं।
इसके पश्चात् मिथिला में भयंकर सूखा पड़ने लगा। प्रजा वत्सल राजा जनक से प्रजा का कष्ट देखा न गया। एक ऋषि के सुझाव पर जनक और सुनयना ने हल चलाकर यज्ञ भूमि तैयार की। हल चलाते समय उसका नकुला अग्रभाग फाल (सीत) से किसी धातु के टकराने की आवाज आई। श्री रामभद्राचार्य जी के अनुसार धरती की खुदाई करने पर, श्री राम के जन्म के 7 वर्ष बाद, वैशाख शुक्ला नवमी को कलश से एक अनुपम आभायुक्त दिव्य कन्या सीता का प्राकट्य हुआ।

सीताजी के प्राकट्य की दिव्य घटना
इस पर्व को 'जानकी नवमी' भी कहा जाता है। जनक ने उसे गोदी में लेकर हृदय से चिपका लिया। हल की फाल (सीत) से जमीन फाड़कर प्रकट होने के कारण उनका नाम "सीता" रखा गया। जनक की दुलारी होने के कारण वे जनक दुलारी, मिथिलावासी होने से 'मिथिलेश' कुमारी, पृथ्वी से पैदा होने के कारण भूमिजा, विदेह की पुत्री होने के कारण वैदेही और जानक की पुत्री होने से जानकी नाम से भी जानी जाने लगीं।
सीता परात्पर ब्रह्म राम की आह्लादिनी शक्ति हैं, जो उन्हें कर्म करने के लिए प्रेरित करती हैं। वे राम के हृदय रूपी कमल पर सुशोभित होती हैं। वासु (सीता) और देव (राम) वासुदेव एक दूसरे से अभिन्न हैं। आवश्यकता होने पर कोमल सीता भी चंडिका बन सहस्त्रमुख रावण का वध करने को तत्पर होती हैं। उन्होंने बाल्यावस्था में एक दिन शिव के जिस धनुष को बड़े-बड़े योद्धा भी हिला नहीं पाते थे, उसे एक हाथ से उठा लिया। यह देख राजा जनक आश्चर्यचकित हुए। वाल्मीकि रामायण के अनुसार उन्होंने उसी दिन निश्चय किया कि वे अपनी पुत्री का विवाह उसी वीर से करेंगे जो इस धनुष को उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा सके।

शिवधनुष को सहजता से उठाती बालिका सीता
पद्मपुराण सीता जी को जगन्माता, अध्यात्म रामायण सत्य और योगमाया का साक्षात स्वरूप और महारामायण समस्त शक्तियों का स्रोत तथा मुक्तिदायिनी स्वीकार करता है। अद्भुत रामायण में वे शिव के शक्तिशाली धनुष को धारण करने वाली भद्रकाली हैं। क्षण भर में रावण को नष्ट करने वाली उनकी लीला रावण के अहंकार और राक्षसी वृत्ति का नाश करने वाली है। सीता उपनिषद के अनुसार ये योगमाया शाश्वत शक्ति का आधार हैं। शौनकीय तंत्र के अनुसार, वे ही मूल प्रकृति हैं। उपनिषद में "सी" (परम सत्य) और "ता" (वाग्देवी) मिलकर सीता बनती हैं; इन्हीं से समस्त वेद प्रवाहित होते हैं।
सीता जी का 'नील स्वरूप' सूर्य, अग्नि एवं चंद्र को प्रकाशित करता है। सूर्य की प्रचंड शक्ति द्वारा सीता ही काल का निर्धारण कर काल धात्री बनती हैं। उनकी करुणा और अनुग्रह से ही यह संसार चल रहा है। वे ही परमब्रह्म की क्रिया-शक्ति, इच्छा-शक्ति और ज्ञान-शक्ति, पंचक्लेशहरणी और सर्व मंगलकारिणी हैं। अद्भुत रामायण के अनुसार वे लंकापति रावण से भी अधिक शक्तिशाली 1000 मुख वाले रावण का वध करती हैं।

सहस्त्रशीर्षा रावण का वध करती सीता
भगवती सीता कार्य कारणों से परे और कार्य कारण शक्ति सम्पन्ना हैं। वे ही ब्रह्माणी, लक्ष्मी और गौरी आदि शक्तियों की उत्पादिका हैं। रामानंद स्वरूपिणी हैं। यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, वेद अध्ययन, आत्म ज्ञान आदि कर्मों से प्राप्त फल का कोटि गुना फल केवल "सीता" नाम स्मरण से ही प्राप्त होता है।
-श्री रामनिवास शर्मा
पूर्व उप निदेशक शिक्षा, राजस्थान
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