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सिरपुर-दक्षिण कोसल का पुरावैभव

सिरपुर-दक्षिण कोसल का पुरावैभव

भारतीय इतिहास में स्वर्णयुगों की गाथाएँ केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हैं कि वे अपने समय की उन्नत अवस्था का परिचय कराती हैं, बल्कि इसलिए भी कि वे हमारे गौरवशाली अतीत को समझने में सहायता करती हैं और राष्ट्र के प्रति सम्मान व आत्मगौरव को और अधिक पुष्ट करती हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में बसा सिरपुर ऐसा ही एक क्षेत्र है, जिसने लगभग 6वीं से 8वीं शताब्दी तक इतिहास के स्वर्णकाल को जिया, लेकिन आज भी अपेक्षित पहचान से दूर है।

आज जिसे सिरपुर कहा जाता है, प्राचीनकाल में वही नगरी श्रीपुर के नाम से जानी जाती थी अर्थात वैभव और समृद्धि की नगरी। महानदी के तट पर बसे इस नगर के पुरातात्विक अवशेष इसकी भव्यता और सम्पन्नता के मूक प्रमाण हैं। जिन अवशेषों की कला और संरचना इतनी समृद्ध हो, वह नगर अपने समय में किस उन्नत स्तर पर रहा होगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है।


प्राचीन वैभव और समृद्धि की नगरी- सिरपुर

फिर भी सिरपुर केवल संपन्नता का प्रतीक भर नहीं था। यह एक बड़ा धर्मकेंद्र और शिक्षा की नगरी भी रहा है। विडंबना यह है कि जहाँ नालंदा और तक्षशिला के नाम से हर भारतीय परिचित है, वहीं सिरपुर का नाम बहुत कम लोग जानते हैं। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद सिरपुर पुरातात्विक मानचित्र पर अवश्य उभरा है, लेकिन इसकी ख्याति अभी भी उस स्तर तक नहीं पहुँच पाई है, जिसकी यह हकदार है।

प्राचीन समय में चित्रोत्पला अथवा कनकनंदिनी के नाम से विख्यात और आज छत्तीसगढ़ की जीवनदायिनी कही जाने वाली महानदी के तट पर सिरपुर फैला हुआ है। यहाँ के भग्नावशेष इतिहास और वर्तमान दोनों ही दृष्टियों से अद्भुत और अप्रतिम हैं। इन अवशेषों की शिल्पकला, वास्तु और स्थापत्य कला भारतीय सांस्कृतिक विरासत के अनमोल नमूने प्रस्तुत करती है।


छत्तीसगढ़ की जीवदायिनी- महानदी

आमतौर पर सिरपुर का नाम लेते ही सबसे पहले लक्ष्मण मंदिर याद आता है, और यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि यह भारत के उन अत्यंत प्राचीन मंदिरों में से एक है, जिसका निर्माण लाल ईंटों से हुआ है। इस मंदिर की संरचना, शिल्प एवं भाव पर आगे विस्तार से चर्चा होगी, लेकिन यह भी महत्वपूर्ण है कि सिरपुर केवल इसी एक मंदिर तक सीमित नहीं है; यहाँ ऐसे अनेक पुरातात्विक स्थलों के प्रमाण हैं, जो इसके प्राचीन वैभव, ऐश्वर्य और धार्मिक-सांस्कृतिक महत्ता के मौन साक्षी बने हुए हैं।

सिरपुर के अन्य प्रमुख स्थलों की चर्चा सुरंग टीला से की जा सकती है। यह स्थान विशेष रूप से शिवलिंगों के समूह और अपने अद्वितीय मंदिर संरचना के लिए जाना जाता है। यहाँ स्थित मंदिर पंचायतन शैली में बना हुआ है। इस शैली में एक मुख्य मंदिर के चारों ओर चार सहायक मंदिर बने होते हैं, जो मिलकर एक प्रकार की चौकोर संरचना बनाते हैं। यह वास्तुरचना न केवल धार्मिक दृष्टि से, बल्कि तकनीकी और सौंदर्यात्मक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।


सुरंग टीला

सुरंग टीला में 32 स्तंभों वाला एक विशाल मंडप भी मिलता है। सीढ़ियों से ऊपर चढ़कर जाने पर मंदिर का ऊपरी भाग दृष्टिगोचर होता है। यहाँ सीढ़ियों की संख्या 43 बताई जाती है, जो इस पूरी संरचना को एक गंभीर और भव्य आयाम प्रदान करती है। छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता स्वर्गीय अरुण कुमार शर्मा के अनुसार, सुरंग टीला के पंचायतन शैली के मंदिर “मायात्तम” व्यवस्था के अनुसार निर्मित किए गए थे।

इसकी रचना देवशिल्पी विश्वकर्मा के पाँच पुत्रों में से दूसरे पुत्र ‘मय’ ने की थी यह मान्यता इस स्थान को धर्म और शिल्प–परंपरा, दोनों ही स्तरों पर विशिष्ट बनाती है।यहाँ खुदाई से प्राप्त गंधेश्वर शिवलिंग भी अद्भुत हैं, मंदिर के पुजारी बताते हैं की यहाँ अलग-अलग समय पर भिन्न-भिन्न प्रकार की सुगंध आती है संभवतः इसीलिए इसे गंधेश्वर महादेव कहा जाता है।


गंधेश्वर महादेव - सिरपुर

सिरपुर में एक अत्यंत दुर्लभ 16 कोणीय योनिपीठ वाला शिवलिंग “धाराशिव” भी मूल स्थिति में प्राप्त हुआ है। यह केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पुरातत्व और शैक्षणिक अनुसंधान के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए भी अमूल्य धरोहर है।सिरपुर से राजप्रासाद के भी अवशेष मिले हैं, जो इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि प्राचीनकाल में श्रीपुर, दक्षिण कोसल के पांडु वंश की राजधानी रहा होगा। राजधानी के रूप में इसका चयन इसकी सामरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है।


खुदाई से प्राप्त राजप्रासाद के अवशेष

इन प्रासादों की संरचना में एक खास बात यह है कि इनका मुख्य प्रवेशद्वार पूर्वाभिमुख है, जबकि अन्य प्रवेशद्वार उत्तराभिमुख हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यहाँ के शिल्पकारों और वास्तुकारों को वास्तुशास्त्र का गहन और व्यवस्थित ज्ञान था। दिशा–निर्देशन, सूर्य की गति और धार्मिक मान्यताओं के अनुरूप निर्मित यह योजना, प्राचीन भारतीय वास्तुज्ञान की उच्च कोटि का प्रमाण मानी जा सकती है।

सिरपुर की पहचान का केंद्र बिंदु लक्ष्मण मंदिर है, जो प्रेम, भक्ति और अनुपम शिल्पकला का संगम प्रतीत होता है। 6वीं शताब्दी के आसपास निर्मित यह मंदिर भारत के सबसे पुराने ईंट–निर्मित मंदिरों में से एक है। नागर शैली में बने इस मंदिर में गर्भगृह, अंतराल और मंडप जैसे मूल स्थापत्य अंगों के साथ-साथ, तोरण और बाह्य दीवारों पर की गई नक्काशी इसकी कलात्मकता को और भी निखारती है।

इतिहास में दर्ज विवरणों से ज्ञात होता है कि सोमवंशी शैव राजा हर्षगुप्त की मृत्यु के बाद उनकी पत्नी रानी वासटादेवी ने उनकी स्मृति में इस मंदिर का निर्माण कराया। रानी वैष्णव परंपरा से थीं और मगध के नरेश सूर्यवर्मा की पुत्री थीं। यही कारण है कि यह मंदिर भले ही विष्णु परंपरा से सम्बद्ध प्रतीत होता है, पर इसके मूल में पति के प्रति एक स्त्री के निष्ठावान, सम्मान और अगाध प्रेम की कथा भी समाई हुई है।


लाल ईंटों से निर्मित सिरपुर का लक्ष्मण

मंदिर के तोरण पर शेषशैय्या पर विराजमान भगवान विष्णु, उनकी नाभि से उद्भूत ब्रह्मा और चरणों में बैठी माता लक्ष्मी का अद्भुत चित्रण है। मंदिर की दीवारों पर विष्णु के दशावतार का सूक्ष्म और प्रभावशाली निरूपण भी देखने को मिलता है। यह सब मिलकर लक्ष्मण मंदिर को धार्मिकता, कला और मानवीय संवेदना तीनों स्तरों पर अद्वितीय बनाता है।

सिरपुर केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, धर्म, शिक्षा और वास्तुकला का जीता-जागता प्रमाण  है। यह वह नगर है जहाँ ईंटों और पत्थरों में इतिहास बोलता है, जहाँ भग्नावशेष भी अपने स्वर्णयुग की स्मृतियों को संजोए खड़े हैं, और जहाँ शिल्प, भक्ति तथा प्रेम एक ही धारा में बहते प्रतीत होते हैं।

यह प्रमुख बौद्ध केंद्र भी रहा है जब आप यहाँ आनंद प्रभुकुटी विहार जाते हैं हैं तब आपको ऐसी शांति की अनुभूति होती है लगता है मानो बुद्ध के काल में ही पहुँच गए हो । इस विहार के अन्दर पृथ्वी को छूने वाली बुद्ध की छह फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है जिसके समीप ही तुरतुरिया और गणेश्वर मंदिर भी स्थित है ।यह आज भी बुद्धधर्म  के अनुयायियों के साथ-साथ सभी श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख स्थल है । यह विहार महाशिवगुप्त बालार्जुन के काल में बुद्ध के प्रिय शिष्य “आनंद प्रभु” द्वारा बनवाया गया था ।


आनंद प्रभुकुटी विहार से प्राप्त बुद्ध प्रतिमा

व्हेनसांग जो की चीनी यात्री था उसने भी 7वीं शताब्दी में महाशिवगुप्त बालार्जुन के काल में सिरपुर की यात्रा की । अपने यात्रा वृतांत में उसने यहाँ के भव्य औए सुन्दर मंदिरों, बौद्ध विहारों और मूर्तिकला की मुक्तकंठ से प्रशंसा की है । लोकमतानुसार प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक और महायान शाखा के गुरु “नागार्जुन” ने भी सिरपुर की यात्रा की इसलिए यहाँ एक गुफा नागार्जुन गुफा के नाम से जानी जाती है जहाँ सन् 2013 और 2014 में दलाई लामा ने सिरपुर यात्रा के दौरान ध्यान किया । सिरपुर की धरोहर को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा ‘पुरखा के सुरता’ कार्यक्रम के अंतर्गत प्रतिवर्ष अंतर्राष्ट्रीय सिरपुर बौद्ध महोत्सव भी आयोजित की जाती है ।


चीनीयात्री -व्हेनसांग

यह विडम्बना ही है कि नालंदा और तक्षशिला की तुलना में सिरपुर की चर्चा बहुत कम होती है। यह केवल हमारी ऐतिहासिक स्मृति की कमी नहीं, बल्कि उस अतीत के प्रति उपेक्षा भी है, जो कभी भारत के हृदय स्थल में स्वर्णकाल के रूप में धड़कता था। आवश्यकता केवल इतनी है कि सिरपुर और श्रीपुर की यह अनकही गाथा अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचे, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें कि छत्तीसगढ़ की इस पावन धरती पर कभी वैभव, विद्या, धर्म और शिल्प का ऐसा अनुपम संगम बसता था, जिस पर आज भी भारत को गर्व होना चाहिए ।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा

 

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