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शूकर वराह मन्दिर (बघेरा-केकड़ी) का कला सौन्दर्य

शूकर वराह मन्दिर (बघेरा-केकड़ी) का कला सौन्दर्य


मानव सभ्यता के विकास के साथ निवास के अतिरिक्त पूजा-अर्चा के लिए भवनों की आवश्यकता पड़ी ।  मन्दिर निर्माण की प्रक्रिया का आरम्भ तो मौर्य काल से शुरू हो गया था किन्तु आगे चल कर उसमें कई परिवर्तन होते गये और गुप्त काल को मन्दिर की विशेषताओं के साथ देखा जा सकता है। संरचनात्मक मन्दिरों के अतिरिक्त एक अन्य  प्रकार  के मन्दिर थे जो चट्टानों को काटकर निर्मित किये जाते थे।  गुप्त काल में मन्दिर आकार में छोटे-एक वर्गाकार चबूतरे में जिस पर चढ़ने के लिए सोपान तथा मध्य में चौकोर कक्ष जो गर्भगृह के रूप में होता  था। 

छठी शताब्दी ईस्वी तक उत्तर और दक्षिण भारत में मन्दिर वास्तु कला शैली लगभग समान थी,लेकिन छठी शताब्दी ईस्वी के पश्चात प्रत्येक क्षेत्र का भिन्न-भिन्न दिशाओं में विकास हुआ। मन्दिर स्थापत्य सम्बन्धी नामकरण-जैसे पंचायतन,भूमि,विमान भद्रस्थ,कर्णरथ और प्रतिरथ आदि भी प्राचीन ग्रन्थों में मिलते है। 

राजपूताना मध्य भारत तथा समीपवर्ती प्रदेशों में मन्दिर निर्माण का कार्य उन्नति पर रहा। छठी शती तक गुप्त नरेशों ने स्थापत्यकला के विकास में काफी हाथ बंटाया। यह सत्य है कि तत्कालीन समय में कलाकार एवं मनुष्यों की कल्पना, विचार सौन्दर्य मृदुलता, कोमलता तथा मधुरता से भरा पड़ा था। ऐतिहासिक उल्लेखों के आधार पर कहा जा सकता है कि राजपूताने में मन्दिरों का निर्माण मध्य युग (10 वीं सदी) तक होता रहा। 


शूकर वराह मन्दिर

प्राचीनकाल से ही राजस्थान विभिन्न सभ्यताओं और संस्कृति का उद्गम स्थल रहा है। अजमेर जिले की केकड़ी तहसील में स्थित बघेरा ग्राम ऐसे ही प्राचीन स्थलों में से एक है जिसकी प्रसिद्धि मुख्य रूप से यहाँ पर स्थितप्राचीन  शूकर वराह मन्दिर के कारण है। 

बघेरा जिला मुख्यालय अजमेर से लगभग 100 किमी.दक्षिण-पूर्व में स्थित है। स्कन्दपुराणान्तर्गत व्याघ्रपादपुर माहात्म्य में इसकी स्थिति पुष्कर और जम्बूद्वीप के मध्य पुष्कर से 13 गव्यूति दूर उल्लेखित मिलती है।  इस माहात्म्य में इस ग्राम का प्राचीन नाम व्याघ्रपादपुर कहा गया है। बघेरा बनास की सहायक डाई नदी के किनारे स्थित है| कार्लाइल के अनुसार पुराणों में इस का नाम बावा मिलता है। इस पुराण में व्याघ्रपाद ऋषि के नाम पर इस ग्राम के नाम का नामकरण का उल्लेख मिलता है। 

ऐतिहासिक एवं पुराणों तथ्यों के आधार पर बघेरा की स्थापना मान्धाता के आमात्य शंखसेन ने व्याघ्रपाद ऋषि के नाम पर व्याघ्रपादपुर के नाम से की थी। उल्लेख मिलता है कि शंखसेन का पुत्र व्याघ्रदत्त था। उपर्युक्त सामग्री के आधार पर कहा जा सकता है कि 7-8 वीं शती ई.से लगाकर चौहान साम्राज्य तक इस ग्राम का धार्मिक,राजनैतिक अथवा व्यापारिक किसी न किसी रूप में महत्त्व अवश्य रहा होगा। 

बघेरा ग्राम मे वराह की मूर्ति
बघेरा ग्राम मे वराह की मूर्ति 

बघेरा ग्राम से उत्तर दिशा में वराहसागर तालाब के किनारे प्राचीन शूकर वराह मन्दिर अवस्थित है। प्राचीन शूकर वराह मन्दिर आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था।  विवेच्य मन्दिर का निर्माण बेंगू (मेवाड़) के रावत मेघसिंह (काली मेघ) चूण्डावत ने राणा अमरसिंह(प्रथम) के काल में करवाया था। 

 बघेरा ग्राम का शूकर वराह मन्दिर विष्णु के वराह अवतार को समर्पित है। नागर शैली में पूर्वाभिमुख उक्त मन्दिर ऊँची जगती पर सुन्दरता एवं सुडौलता से निर्मित है । मन्दिर स्थापत्य शिल्प की लगभग समस्त संरचनाओं से परिपूर्ण है यथा मंडप, अन्तराल, गर्भगृह आदि मण्डप पर सोपान द्वारा पहुंचा जा सकता है।  मण्डप आठ स्तम्भों पर आधारित है | स्तम्भों पर सुंदर घंटियों का शिल्पांकन है।  मन्दिर के मुख्य द्वार पर वैष्णव संतों को योग मुद्रा में शिल्पित किया गया है। गर्भगृह के द्वार पर शाखा लतापत्र, रूपशाखा तथा नागवल्ली से सुशोभित है। 

मन्दिर का सभा मण्डप वृहदता लिए हुए है वर्गाकार रचना में है जिसका माप लगभग 20x20 है फीट है |मन्दिर परिसर तक पहुंचने के लिए 15 सोपानों की श्रृंखला है  एवं सभा मण्डप तक जाने के लिए 5 सोपान अवस्थित है। मन्दिर का जंघा भाग प्राचीन है जिसमें चूने द्वारा चिनाई नजर नही आती है। मन्दिर के चारों और समृद्ध शिल्प के अंतर्गत गज, संगीत कला की आकृतियाँ उत्कीर्ण है।  मन्दिर के गर्भगृह के सम्मुख विशाल स्तम्भ पर करबद्ध श्वेत पाषाण की सुन्दर गरुड प्रतिमा अवस्थित है। मन्दिर में संरक्षित एवं सुरक्षित अभिलेख प्राचीनता एवं जीर्ण- शीर्ण अवस्था के कारण अपठनीय है। 

स्तम्भ पर गरुड प्रतिमा
स्तम्भ पर गरुड प्रतिमा

राजपूत काल के देवालय अलंकरण युक्त शिखर, गर्भगृह, स्तम्भों सहित सभा मण्डप से युक्त है। गर्भगृह में शूकर वराह की अत्यन्त आकर्षक, विलक्षण, विशाल एवं अल्पज्ञात, अनूठी श्याम वर्ण प्रतिमा, जिसमें 525 देव आकृतियों को श्री विग्रह में शिल्पांकित किया गया है पूजान्तर्गत है। 

सम्पूर्ण वैदिक स्वरूप को देखने से ज्ञात होता है कि भारतीय कला जहाँ एक ओर धार्मिक संस्कारों से अनुप्राणित हैवहाँ दूसरी ओर सौन्दर्य तथा आनन्द के तत्वों से पूर्ण है। कलाकारों ने भारतीय शिल्प के विभिन्न अंगों को कल्पना द्वारा चारूत्व से मण्डित किया  कहा जा सकता है कि शिल्प कला का मूल भाव सृष्टि में व्याप्त चेतना में सौन्दर्यमय परमतत्व के दर्शन करना है। भारतीय स्थापत्यकला ने धर्म के गौरव में सौंदर्यानुभूति प्रदान कर सत्यं शिवं सुन्दरम् की अवधारणा को रेखांकित किया है। 

लेख -
श्रीमती पुष्पा शर्मा
अजमेर राजस्थान

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