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लोककलाओं का प्राणाधार - श्रीरघुनाथचरित

लोककलाओं का प्राणाधार - श्रीरघुनाथचरित


दशरथनन्दन रामभद्र के चरित्र का जितना गम्भीर बखान वेदों और पुराणों ने किया है, लोककलाओं ने उसे उतनी ही आत्मीयता और सरलता से बखाना है। युवा लेखिका वर्षा देवी ने अपने इस लेख में इन लोककलाओं के प्राणरूप का सुन्दर-सजीव चित्रण किया है। लेखिका ने यह बतलाने का प्रयास किया है कि किस प्रकार मधुबनी की तूलिका, अवध की रामलीला और दक्षिण भारत की कठपुतलियों ने कोसलेन्द्र राम को जन-जन का राम बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेखिका द्वारा यह अद्भुत विवेचना प्रमाणित करती है कि लोक ने राम को केवल पूजा नहीं है, प्रत्युत पूरे अपनत्व के साथ उन्हें जिया भी है।


सो सुखधाम राम अस नामा।
अखिल लोक दायक बिश्रामा॥

अपने नाम को चरितार्थ करने वाले रघुकूलभूषण राम भारत की सनातन संस्कृति के आधार है। वे केवल अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट या धर्मशास्त्रों के मूर्तिमन्त स्वरूप नहीं है। वरन् सच कहें तो वे भारत की मिट्टी के सौरभ हैं, यहाँ के लहलहाते खेतों की हरीतिमा और जन-मन का स्पन्दन हैं। राम का चरित्र ने महलों की भव्यता और काव्य की सीमाओं को पार कर सामान्य मनुष्य की बोलियों, उनके पारम्परिक गीतों और उनकी विविध कलाओं में अपना स्थायी स्थान बनाकर 'मर्यादा पुरुषोत्तम' से कहीं ऊपर उठकर एक सर्वव्यापी 'लोकनायक' का चित्र हो चुका है। 

यही कारण है कि आज भारतवर्ष के हर कोने में, हर प्रान्त की कला में श्रीराम की एक सर्वथा भिन्न और आत्मीय छबि लिए दृष्टिगोचर होते हैं। शास्त्रों की अपनी एक कठोर मर्यादा है जिसमें राम का एक नियत और अनुशासित स्वरूप है, किन्तु लोकगीतों के स्वरों में राम की अभिव्यक्ति बिल्कुल स्वच्छन्द  है। वाल्मीकि रामायण या गोस्वामी तुलसीदास जी के रामचरितमानस ने राम को एक महान आदर्श के रूप में सम्पूर्ण जगत के सम्मुख स्थापित किया, परन्तु भारत के लोककलाकारों ने उस आदर्श को लोक में उनके सखा, पुत्र और अपने सुख-दुख के साथी के रूप में स्थापित किया। 

शास्त्रों ने राम को भगवान बनाया, लेकिन भारत की लोककलाओं ने उन्हें अपना एक पारिवारिक सदस्य बना लिया। भारत के प्रत्येक राज्य में राम का एक अलग और भावपूर्ण रूप देखने को मिलता है। उत्तर प्रदेश की रामलीला इसका सबसे बड़ा और जीवन्त उदाहरण है। यूनेस्को की विश्व प्रसिद्ध धरोहर सूची में सम्मिलित उत्तर प्रदेश की रामलीला अभिनय की वह महान कला है जिसने रामकथा को समाज के अन्तिम व्यक्ति तक समान रूप से पहुँचाया है।

इसी प्रकार बिहार की विख्यात मधुबनी चित्रकला और ओडिशा के प्रसिद्ध पटचित्रों में राम सीता के पावन विवाह और वनवास के मार्मिक दृश्यों को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरा जाता रहा है। दक्षिण भारत के 'तोलु बोम्मलता' अर्थात् छाया नाटक और राजस्थान की पारम्परिक कठपुतलियों में श्रीराम की अजेय गाथा आज भी लोकप्रेरणा का अजस्र स्रोत बनी हुई हैं। इन लोककलाओं के माध्यम से राम और उनके आदर्शों का निहित सन्देश पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता रहा है।

राम के वनगमन का चित्र- मधुबनी चित्रकला
राम के वनगमन का चित्र- मधुबनी चित्रकला

रामकथा की यह पावन सरिता केवल भारत की भौगोलिक सीमाओं तक ही सीमित नहीं है, अपितु इसने सम्पूर्ण विश्व को अपने प्रेम के सूत्र में पिरोया है। उत्तर भारत की रामलीला को जब यूनेस्को द्वारा मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में वैश्विक मान्यता दी गई, तो यह सम्पूर्ण भारत के लिए एक महान गौरव का क्षण था।

रामकथा ने थाईलैण्ड जैसे देशों में 'रामकिएन' के रूप में राष्ट्रीय ग्रन्थ का सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया है और वहाँ की लोककलाओं में भी राम का अत्यंत गहरा और व्यापक प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। यह अत्यंत आश्चर्यजनक और सुखद है कि इंडोनेशिया जैसे एक मुस्लिम बहुल देश में भी 'वासांग कुलित' नामक छाया नाटक के माध्यम से रामायण की पावन कहानियां विगत कई सदियों से अनवरत रूप से दिखाई जा रही हैं।

लोककलाओं में भगवान श्रीराम का प्रकृति के साथ एक अत्यंत अद्भुत, आत्मीय और गहरा रिश्ता दिखाया गया है। वनवास के उस अत्यंत कठिन कालखंड के दौरान श्रीराम का कोल, भील, निषादराज और विशाल वानर सेना के साथ जो आत्मीय जुड़ाव था, वह वास्तव में मनुष्य और प्रकृति के बीच के सामंजस्य का एक महान प्रतीक है।

श्रीराम- प्रकृति और मनुष्य के मध्य सामंजस्य का प्रतीक
श्रीराम- प्रकृति और मनुष्य के मध्य सामंजस्य का प्रतीक

मधुबनी चित्रकला हो या आन्ध्र प्रदेश की पारम्परिक कलमकारी कला, इन सभी में राम को प्रायः सघन वनों, सुन्दर पक्षियों और कुलांचे भरते हिरणों के बीच पूरी सहजता के साथ चित्रित किया जाता है। यह विलक्षण चित्रण हमें आज के इस आधुनिक और यन्त्रचालित दौर में पर्यावरण संरक्षण और जीव मात्र के प्रति निश्छल प्रेम की एक मौन किन्तु अत्यंत सशक्त सीख प्रदान करता है। राम केवल अयोध्या नगरी के चक्रवर्ती राजा नहीं हैं, अपितु वे समस्त चराचर जगत के रक्षक के रूप में भारत के अनगिनत लोकचित्रों में अपनी कृपामयी मुस्कान बिखेरते हैं।

भारतीय लोककला का सबसे बड़ा और ऐतिहासिक योगदान यह रहा है कि इसने रामकथा को केवल शिक्षित वर्ग या समाज के उच्च तबके तक ही सीमित नहीं रहने दिया। चाहे वह कोई अनपढ़ बुनकर हो, मिट्टी के सुन्दर बर्तन बनाने वाला कोई साधारण कुम्हार हो, या फिर अपने घर की कच्ची दीवार पर सुन्दर चित्र उकेरती हुई कोई गृहणी हो, श्रीराम इन सभी के लिए एक समान और ऊर्जावान प्रेरणा बने हैं।


घर-घर में विद्यमान है श्रीराम 

रामकथा ने समाज के हर वर्ग को समानता के एक पावन सूत्र में पिरोया है। इसका सबसे बड़ा और प्रामाणिक उदाहरण हमें अवध क्षेत्र की रामलीला या बंगाल के पटचित्रों में स्पष्ट रूप से मिलता है, जहाँ विगत कई सदियों से हिन्दू और मुस्लिम सहित अन्य सभी समुदायों के कलाकार पूरी तरह से मिलजुलकर राम के पावन आदर्शों को लोकजीवन में जीवन्त रखे हुए हैं। वास्तव में यह एक सांस्कृतिक लोकतन्त्र ही है जिसने राम को सच्चे अर्थों में एक महान लोकनायक के रूप में प्रतिष्ठित किया है।

शास्त्रों में राम को भगवान विष्णु का साक्षात् अवतार और मर्यादा के सर्वोच्च शिखर के रूप में चित्रित किया गया है। परन्तु इसके सर्वथा विपरीत, लोकगीतों में राम माता कौशल्या के एक अत्यंत लाड़ले पुत्र हैं। जन्म के समय गाए जाने वाले पारम्परिक सोहर गीतों में माता कौशल्या की गोद में बैठे राम की मनमोहक छबि का ऐसा चित्रण होता है कि जिस पर सम्पूर्ण संसार न्योछावर हो जाए।

लोककथाओं में श्रीराम एक ऐसे अत्यंत साधारण और सहज पथिक हैं जो अपने नंगे पाँवों से काँटों भरी दुर्गम राहों पर निरन्तर चलते रहते हैं। इसी अद्भुत अपनत्व और प्रेम की सबसे सुन्दर झलक जनजातीय माता शबरी के अलौकिक प्रसंग में मिलती है। यहाँ श्रीराम की महानता उनके अवध नरेश होने में बिल्कुल नहीं है, बल्कि एक अत्यंत निर्धन वनवासी माता के जूठे बेरों को पूरे अधिकार और प्रेम से खाने में दिखाई देती है।

लोककला की यही सबसे बड़ी खूबी है कि वह राम को केवल एक ईश्वर से कहीं अधिक अपना एक अत्यंत प्रिय पारिवारिक सदस्य मानती है। जब किसी छोटे से गाँव का एक साधारण लोककलाकार अपनी ढोलक बजाकर पूरे उत्साह के साथ "अवध में राम जन्मे" गाता है, तो वह केवल किसी प्राचीन कथा का गान नहीं कर रहा होता है, बल्कि वह तो अपने ही घर के आंगन में आए किसी नए और प्यारे मेहमान का उत्सव पूरे हर्षोल्लास के साथ मना रहा होता है।

रामलीला- सदियों से है राम से जुड़ने का माध्यम
रामलीला- सदियों से है राम से जुड़ने का माध्यम 

यह एक शाश्वत सत्य है कि लोककलाओं के राम केवल दूर से पूजे नहीं जाते, अपितु वे तो अपनों की तरह हर पल जिए जाते हैं। राम किसी एक विशिष्ट सम्प्रदाय के नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानवता और कला जगत के शाश्वत आदर्श हैं। जब तक भारत की यह लोकसंस्कृति और परम्पराएं जीवित हैं, राम की कथा इसी प्रकार अमर रहेगी। एक ओर तो  यह लोककलाओं की ही असीम शक्ति है, जिसने राम के पावन चरित्र जन-जन तक पहुँचाया।

वहीं दूसरी ओर इन लोककलाओं के प्राणाधार बन इन्हें अमरत्व प्रदान कर रहे हैं। अतः साररूप में हम वही बात कह सकते हैं, जो हमने यहाँ बारा-बार दुहराई है कि शास्त्रों ने राम को एक महान मर्यादा दी है, परन्तु यह लोककलाएं ही हैं जिन्होंने राम को ममता, अपनापन और जन-जन का अटूट विश्वास प्रदान किया है।

-वर्षा देवी
(लेखिका बी.एससी. (AI & ML) की छात्रा एवं आधुनिक तकनीक की अध्येता हैं, जो विज्ञान, भविष्योन्मुख विषयों और तकनीकी विषयों के साथ-साथ सांस्कृतिक विषयों पर भी सतत लिखती हैं।)

 

 

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