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पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

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जनमानस के आराध्य श्रीराम

जनमानस के आराध्य श्रीराम


“सियाराममय सब जग जानी।” गोस्वामी तुलसीदास जी की ये पंक्तियाँ भारतभूमि में पग-पग पर हमें चरितार्थ होती दिखती है। श्री रवीन्द्र गिन्नौरे जी का यह लेख भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है, जहाँ लेखक ने वेदों, उपनिषदों और विभिन्न क्षेत्रीय रामकथाओं में श्रीराम के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्वरूप की विस्तृत विवेचना की है। इस लेख में विशेष रूप से असम की कार्बी जनजाति में प्रचलित रामायण 'छाबिन आलुन' का अत्यन्त रोचक और प्रामाणिक वर्णन किया गया है। यह लेख उस शाश्वत सत्य की ही पुनरुक्ति है कि श्रीराम महलों से लेकर सुदूर जनजातीय अंचलों तक जन-जन के परम आराध्य हैं।


कौसल्यानन्दन भगवान के समग्र जीवन का यदि हम गहनता से चिन्तन करें, तो ज्ञात होता है कि उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन केवल सामाजिक मर्यादा की रक्षा के लिए जिया और जीवन के हर क्षेत्र में आदर्श को सर्वोपरि रखते हुए सनातन संस्कृति के गौरव को सर्वोच्च शिखर पर स्थापित किया। शैशव अवस्था में ही उन्हें महर्षि विश्वामित्र के साथ भयंकर राक्षसों के संहार के लिए वनों में जाना पड़ा।


श्री राम- जनमानस के परम आराध्य

राजा जनक की अजन्मी पुत्री माता सीता के साथ पाणिग्रहण संस्कार कर उन्होंने विदेह राजा जनक को समाज में एक अत्यन्त सम्मानित स्थान दिलाया। समाज से निर्वासित और लांछित जीवन व्यतीत कर रही ऋषि गौतम की पत्नी अहिल्या का उद्धार कर उन्हें पुनः सामाजिक जीवन में ससम्मान प्रवेश कराने में श्रीराम ने महती भूमिका निभाई।

विदेहराज जनक और ऋषि गौतम देवराज इन्द्र के झूठे लांछन से प्रताड़ित हुए थे। ज्ञान यज्ञ में जो कुछ भी घटित हुआ था, उसमें देवराज इन्द्र ने अपने उच्च पद की गरिमा और बाहुबल का दुरुपयोग करते हुए अहिल्या के साथ छल किया था, किन्तु श्रीराम ने अपने पावन स्पर्श से उन्हें समाज में उनका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाया।

अयोध्या के राजसिंहासन पर अपना राज्याभिषेक होने के ठीक पहले, केवल अपने पिता दशरथ के वचनों का पूर्णतः पालन करने के लिए श्रीराम को 14 वर्ष का अत्यन्त कठिन वनवासी जीवन व्यतीत करना पड़ा। रक्ष संस्कृति के प्रबल पोषक और माता सीता का छलपूर्वक हरण करने वाले दुष्ट रावण से उन्हें भयंकर युद्ध करना पड़ा। लंका पर महान विजय प्राप्त करने के पश्चात जब वे अयोध्या वापस लौटे और रामराज्य की स्थापना की, तो राजधर्म की कठोर मर्यादाओं का पालन करने हेतु उन्हें माता सीता से भी बिछड़ना पड़ा।

यह उस समय की मांग थी और एक आदर्श राजा का परम कर्त्तव्य था, जिसे श्रीराम ने अपने व्यक्तिगत सुखों की बलि देकर स्थापित किया। श्रीराम समय के दास कभी नहीं रहे, बल्कि उन्होंने युगों-युगों के लिए एक अटल मानदंड प्रस्तुत किया। उन्होंने एक आदर्श क्षत्रिय के रूप में स्वयं को जनसाधारण के सम्मुख प्रस्तुत किया। यही कारण है कि द्वापर युग में योगेश्वर श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में अर्जुन को उपदेश देते हुए अपने आप को श्रीराम बताते हुए स्पष्ट कहते हैं कि शस्त्र धारण करने वालों में मैं राम हूँ।

श्रीराम हमारे परम आराध्य हैं। त्रेता युग से लेकर द्वापर और आज के कलियुग तक राम की असीम महिमा को अनेक मूर्धन्य विद्वानों ने अपने ग्रन्थों में पिरोया है। कलियुग में सामान्य जन उन्हें विशेष रूप से गोस्वामी तुलसीदास जी के राम के रूप में भलीभांति जानते हैं। राम एक ऐसे ऐतिहासिक और युगान्तरकारी पुरुष रहे हैं जिन्होंने अपने असाधारण कार्यों से यह सिद्ध किया और अपने विराट व्यक्तित्व से मर्यादा को सदैव सर्वोपरि रखा।

यदि हम राम के जन्म और उनके ऐतिहासिक अस्तित्व की खोज करें, तो ज्ञात होता है कि राम के सूर्यवंशी कुल के आदि पुरुष इक्ष्वाकु का स्पष्ट उल्लेख ऋग्वेद और अथर्ववेद के अनेक मंत्रों में आया है। ऋग्वेद के दसवें मंडल के 93वें सूक्त के 14वें मंत्र में राम का पावन नाम आता है, जहाँ उन्हें सरस्वती नदी प्रदेश के एक महान वैदिक राजा के रूप में वर्णित किया गया है।

ऐतरेय ब्राह्मण में राम श्यापर्ण कुल और जन्मेजय के समकालीन रहे हैं। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार राम एक महान तपस्विनी के पुत्र और महर्षि याज्ञवल्क्य के समकालीन रहे। जैमिनीय उपनिषद में आए राम शात्याभिनी अत्रेय के शिष्य और शंख व्राभव्य के शिक्षक थे। छांदोग्य उपनिषद की कथा के अनुसार राम अश्वपति कैकय देश के राजा थे।


वेद, ब्राह्मणग्रन्थ, उपनिषद और पुराणों में भी वर्णित हैं "राम" 

वैदिक साहित्य के आख्यान और पुराण जो ब्राह्मणों के अर्थवाद के लिए आवश्यक समझे जाते हैं, उन्हें यज्ञ और धार्मिक संस्कारों के पावन अवसर पर ऐतिहासिक गाथा के रूप में सुनाया जाता था। गाथा साहित्य के रचयिता राज दरबार में रहने वाले सूत होते थे और जनसाधारण के बीच गीतों का प्रचार करने वालों को कुशीलव कहा जाता था। त्रिपिटक के आधार पर यह कहा जा सकता है कि महर्षि वाल्मीकि से बहुत पहले ही ये गाथाएं लोक में प्रचलित हो चुकी थीं।

दुनिया में श्रीराम का ही एकमात्र ऐसा दिव्य चरित्र है जिन पर हजारों हजार महाकाव्य और ग्रन्थ लिखे गए हैं। उत्तर प्रदेश सहित हिन्दी भाषी राज्यों में गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस अत्यन्त लोकप्रिय है जो सुमधुर अवधी भाषा में लिखी गई है। पश्चिम बंगाल में कृतिवास रामायण बहुत प्रचलित है जिसे कृतिवास ओझा ने बंगाली भाषा में लिखा है।

केरल और तमिलनाडु में महाकवि कम्बन द्वारा रचित कंब रामायण का गहरा प्रभाव है। महाराष्ट्र में मराठी भाषा में भावार्थ रामायण लिखी गई है। ओडिशा में ओड़िया भाषा में विलंका रामायण प्रचलित है। कश्मीर में कश्मीरी रामायण और कन्नड़ भाषा में महाकवि पम्प की पम्प रामायण जन जन में प्रचलित है। गुजरात के भील जनजातीय समाज में भिलोड़ी रामायण सहित अनेक रामकथाएं प्रचलित हैं।

भारत के उत्तर पूर्वी सीमान्त राज्य असम में निवास करने वाले कार्बी जनजातीय समुदाय के बीच रामकथा 'छाबिन आलुन' के नाम से आज भी पूर्णतः जीवन्त है। वाल्मीकि रामायण के आधार पर लिखी गई इस छाबिन आलुन ने कार्बी जनजाति को भारतीयता के मुख्य प्रवाह से जोड़ा है। उनकी कला, संस्कृति और साहित्य सहित उनकी वर्तमान पहचान भी इसी छाबिन आलुन से स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।

छाबिन आलुन एक ऐसी गीतात्मक रामायण है, जिसमें कार्बी जनजाति का धर्म, संस्कृति और उनका पारम्परिक परिवेश पूरी तरह से रचा बसा है। 14वीं और 15वीं शताब्दी में इस छाबिन आलुन की शुरुआत हुई थी। कुछ विद्वानों का यह दृढ़ मत है कि असम के नगांव और कार्बी आंगलांग जिले में बराही राजा महामाणिक्य का शासन था, जिन्हें रामायण के प्रति विशेष अनुराग था।


देशभर में राम के विविध स्वरुप हैं विद्यमान 

उनके राजकवि माधव कंदली ने राजा की आज्ञा से वाल्मीकि रामायण का स्थानीय भाषा में अनुवाद किया जो उस अंचल में अत्यधिक लोकप्रिय हुआ। कार्बी लोग भी इस रामायण से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे अपनी मातृभाषा में गीतों के रूप में ढाल लिया जिसे छाबिन आलुन कहा गया। छाबिन आलुन में लोकगाथा और लोककथा को लेकर कई ऐसी अद्भुत विशेषताएं मिलती हैं जो इस क्षेत्र की आंचलिक विशिष्टता को प्रतिबिंबित करती हैं।

इस कथा में आसुरी प्रवृत्ति वाले रावण का विनाश करने के लिए दरहम अर्थात् राजा दशरथ के घर जब राम और लक्ष्मण ने जन्म लिया, तो उन्हें धरती पर संस्कृति और धर्म की स्थापना करने वाले नर रूपी भगवान के रूप में स्वीकारा गया। जैसे ही राम और लक्ष्मण ने जन्म लिया, रावण के सिर का मुकुट स्वतः ही गिर पड़ा। रावण को यह एहसास हो गया कि धरती पर किसी महान वीर पुरुष ने जन्म लिया है।

राजा दशरथ का महल साधारण कार्बी लोगों की तरह दो भागों वाला एक छप्पर का घर बताया गया है। राजा दशरथ की केवल दो पत्नियां बताई गई हैं जिनमें कैकेयी का नाम नहीं है। छिनताकुरी अर्थात् माता सीता को रामाण अर्थात् राजा जनक की पुत्री माना गया है। सबसे रोचक बात यह है कि इस कथा में माता सीता का जन्म एक मोर के अंडे से हुआ बताया गया है।


कार्बीक्षेत्र की मान्यतानुसार माता सीता का जन्म मोर के अंडे से 

उन्हें एक आदर्श कार्बी नारी के रूप में चित्रित किया गया है जो घर का सारा कामकाज करती है, खेत में अपने पिता के लिए खाना लेकर जाती है और सुन्दर कपड़ा बुनना भी जानती है। सीता के द्वारा बुने हुए सुन्दर कपड़े को देखकर प्रभावित हुई रावण की बहन थेछ माहादी अर्थात् शूर्पणखा अपने भाई रावण से उसकी भरपूर प्रशंसा करते हुए कहती है कि सीता ने चिड़िया और फूल आदि की आकृति उकेर कर जो सुन्दर कपड़ा बुना है, वैसा कपड़ा उसने पूरी दुनिया में कहीं नहीं देखा।

राजा जनक को एक कर्मठ कृषक बताया गया है जो पहाड़ों में जंगलों को काटकर खुद खेती करते हैं और खेत में ही बांस का मचान बनाकर अपनी खेती की रखवाली करते हैं। कार्बी रामायण के रावण का सिर 12 खंडों का है और उसके हाथ भी 12 ही हैं। वनवास काल में राम नाराजन ऑल पर्वत में गए जिसे लालूंक वन भी कहा गया है।

वाल्मीकि रामायण की तरह ही सीता ने एक सोने जैसे चमकते हिरण को देखा। लक्ष्मण जब रावण के बाण से मूर्छित हुए तो मृत संजीवनी बूटी लाने के लिए उलिमान अर्थात् हनुमान जी गए और वे समूचा मालंछलि पहाड़ ही उठा लाए। राम की इस पावन गाथा को कार्बी लोग पूरे भक्तिभाव से गाते हैं और राम की चर्चा को अपने जीवन का सबसे पवित्र कार्य मानते हैं।

श्रद्धा और अगाध भक्ति से परिपूर्ण राम की यह पावन गाथा आज 100 से अधिक देशों में पूरी तन्मयता के साथ गाई जाती है। दक्षिण पूर्व एशिया में रामायण के 300 से अधिक संस्करण प्रचलित हैं। प्रमुख रूप से इण्डोनेशिया में काकविन वहां का राष्ट्रीय महाकाव्य है। थाईलैण्ड में रामकियन, कम्बोडिया में रामकेर और मलेशिया में हिकायत शेरी राम बहुत प्रसिद्ध हैं। एशिया के बाहर अफ्रीका, मॉरीशस, फिजी, अमेरिका, चीन, तिब्बत और नेपाल में भी राम गाथा अत्यन्त लोकप्रिय है। 150 से अधिक विश्व की भाषाओं में राम के चरित्र पर आधारित ग्रन्थ लिखे गए हैं।


वैश्विक स्तर पर भी हैं श्रीराम के विविध स्वरुप

माता सीता के राम हर युग की तरह आज भी प्रासंगिक हैं और जन-जन के परम आराध्य देव हैं। यही कारण है कि हमारी महान सनातन संस्कृति की अनमोल धरोहर के रूप में रामकथामन्दाकिनी आज विश्व के अनेक देशों में अपने पूरे प्रवाह से प्रवाहित हो रही है।

-रवीन्द्र गिन्नौरे

 

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