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पर्व विशेष : | तदनुसार 14 जून 2026

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प्राचीन भारतीय मुद्राओं में श्रीराम

प्राचीन भारतीय मुद्राओं में श्रीराम


इस पूरी शृंखला में हमने लोक साहित्य, इतिहास, महाकाव्य, स्थापत्य आदि में भगवान श्रीरामचरित्र की प्रशस्ति देखी। परन्तु यह भारतवर्ष की प्राचीन मुद्राओं में भी पूर्णतः रची बसी है। श्री ललित शर्मा जी ने अपने इस शोधपूर्ण लेख में भारत के विभिन्न राजवं, यथा - शुंग, कुषाण, चौहान, और मुगल साम्राज्य आदि की मुद्राओं पर श्रीराम के अंकन का अत्यन्त सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया है। लेखक यह बताते हैं कि श्रीराम किसी एक काल या वर्ग के नहीं हैं, अपितु वे प्रत्येक युग के शासकों से लेकर जनसामान्य, सबके के हृदय में वास करते रहे हैं।


भारतीय इतिहास, एवं संस्कृति में अनेक देवी देवताओं को मुद्राओं, चित्रों, एवं मूर्तियों में यहाँ के नरेशों ने अपने अपने काल में तो अत्यधिक उत्कीर्ण कर प्रचारित किया परन्तु भगवान श्रीराम का मुद्राओं में अंकन बहुत ही कम हुआ मिलता है। इसका कारण भी है कि श्रीकृष्ण की मूर्तियों के उत्कीर्णन तो उनकी लीलाओं के कारण, एवं वैष्णवों में विष्णु व उनके विविध अवतारों की पूजा परम्परा का प्रचलन राजमहलों से लेकर सामान्यजन तक पर्याप्त रहा।

शैवमत में शिव की लिंग तथा देव मूर्ति में उनके गणों सहित अंकन देखने को मिलता है, वहीं शाक्तमत में भी विभिन्न देवी शक्ति का ऐसा ही प्रभाव देखने को मिलता है। इन सभी में वैष्णव श्रीराम का व्यक्तित्व मूलतः मर्यादा, और संस्कारों से बन्धा रहने के कारण उनके कार्यों व कथाओं का विस्तार जन जन में महात्मा तुलसीदास की रामचरितमानस से हुआ जो भारतीय भूमण्डल की ग्राम चौपालों तक पहुंची। मूल रामायण को जन सामान्य में प्राचीनकाल से लेकर अब तक वह स्थान न मिल पाया जो कृष्णलीला या वैष्णव भागवत को मिला।

श्रीराम की लीला में जहाँ आदर्शता, संस्कार, और मर्यादा के प्रतिमान स्थापित हैं वहाँ कृष्णलीला में रास, रंग, वैभव, शृंगार की अधिकता को जन सामान्य ने अधिक अपनाया। साहित्य के विद्वानों ने भी इस विषय पर विश्लेषण तो गम्भीरता से किया परन्तु वे इस विषय में श्रीराम के ऐतिहासिक व्यक्तित्व पर अधिक कार्य नहीं कर पाए। प्रस्तुत आलेख में हम भारतीय जनमानस में राष्ट्र के मंगलनायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के व्यक्तित्व को भारत की प्राचीन मुद्राओं में देखने का प्रयास करेंगे।

श्रीराम का भारतीय प्राचीन मुद्राओं में अधिकृत रूप से अंकन प्राचीन, और मध्ययुगीन शासकों की प्रचलित मुद्राओं से मिलता है जो जनभेद भी समाप्त करता है, और उदारवादी दृष्टिकोण का भी परिचय देता है। प्रख्यात मुद्रा विशेषज्ञ डॉ शशिकान्त भट्ट (इन्दौर) और मुद्रा विज्ञानी डॉ ठाकुर प्रसाद वर्मा (वाराणसी) के शोध का अध्ययन करने से यह ज्ञात होता है कि मुगल सम्राट अकबर वह शासक था जिसने अपने शासनकाल के (अपने राज्यारोहण के 50वें वर्ष) अन्तिम वर्षों में ‘भगवान राम की रामसीय’ प्रकार की स्वर्ण, और रजत की न केवल मुद्राएं चलवाईं अपितु उसने मुगल शैली में रामायण का फारसी में अनुवाद करवाकर उसे चित्रांकित रूप में भी प्रमुखता से उभार कर श्रीराम के महान जीवन आदर्शों को जन जन में अनुकरणीय बनाने में सफलता प्राप्त की।

अकबरकालीन सिया-राम जी के सिक्के
अकबरकालीन सिया-राम जी के सिक्के 

प्रख्यात कला इतिहासकार राय आनन्दकृष्ण के अनुसार मुगल सम्राट अकबर द्वारा पहली बाचलिर प्रत भगवान श्रीराम की ये मुद्राएं उन्हें विश्व वन्दनीय महापुरुष होने का मुद्रा शास्त्रीय संसार का सबसे बड़ा अकाट्य प्रमाण हैं। अकबर द्वारा प्रचलित श्रीराम की ये मुद्राएं इस बात का भी प्रमाण हैं कि इनके प्रचलन से अकबर ने हिन्दू मुस्लिम का भेद समाप्त कर अपनी उदारता का प्रामाणिक परिचय दिया था। अकबर ने सन् 1604 1605 ईस्वी में अपनी गोल स्वर्ण व रजत धातु की मुद्राएं जारी कीं, उनमें अग्रभाग पर धनुर्धारी श्रीराम सीता के साथ खड़े हुए हैं।

उसके शीर्ष भाग में नागरी लिपि में ‘श्रीराम सीय’ अर्थात् श्रीराम सीता का लेख अंकन है, तथा पृष्ठभाग में फारसी भाषा में 50 ‘इलाही’ (अर्थात् उसके राज्यारोहण का 50वां वर्ष) व ‘अमरदाद’ (अर्थात् महिना) शब्द अंकित है। अकबर द्वारा जारी इस मुद्रा को ‘रामसीय’ प्रकार की मुद्रा नाम दिया गया, और रामसीता को पुरोभाग पर प्रमुखता लिए अंकित किया गया जो सदैव मुगल शासकों के लिए केवल ‘कलमा शरीफ’ अंकित किए जाने के लिए ही सुरक्षित समझा जाता है।

रामसीय प्रकार की इस मुद्रा से यह धारणा फिर पुष्ट हो जाती है कि अकबर ने श्रीराम सीता की आकृति को मुख्य पुरोभाग पर स्थान देकर उनकी महानतम ईश्वरीय महत्ता को स्वीकार किया था। मुद्रा विशेषज्ञ ठाकुर प्रसाद वर्मा के अनुसार रामसीय प्रकार की मुद्राएं 1994 ईस्वी तक मात्र तीन ही प्रकाश में आ पाई थीं। इनमें से प्रथम चांदी की अठन्नी मुद्रा लखनऊ के जे के अग्रवाल को प्राप्त हुई थी, और वर्तमान में यह मुद्रा भारत कला भवन काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संग्रहालय में प्रदर्शित है।

रामसीय मुद्रा-मुग़ल काल
रामसीय मुद्रा - मुग़ल काल 

यह रजत मुद्रा 81 ग्रेन भार की है। इसके पुरोभाग में बिन्दुयुक्त वृत्त के मध्य में एक पुरुष आकृति है जिसके बाएं हाथ में धनुष है। इसके पीछे एक नारी आकृति है, दोनों की मुद्रा चलते हुए है। धनुर्धर के शीश पर राजमुकुट, घुटनों से नीचे तक जामा, तथा पटका है जिसके दोनों सिरे आगे पीछे लटकते हुए हैं। उनकी पीठ पर बाणों से युक्त तरकश है। जबकि स्त्री के दाहिने कर में एक पुष्प गुच्छ का अंकन है।

उनके बाएं कर में भी पुष्प गुच्छ है। वह तंग चोली व ढीला लहंगा धारण किए हुए है जो पैरों के थोड़ा ऊपर तक है। दोनों आकृतियों के शीश के मध्य (ऊपर) नागरी लिपि में ‘रामसीय’ अंकित है। इस मुद्रा के पृष्ठ भाग के एक वृत्त में लता वल्लरी युक्त पृष्ठभूमि में ‘इलाही अमरदाद’ उत्कीर्ण है। रामसीय प्रकार की एक अन्य मुद्रा केबिन डे फ्रांस संग्रहालय में प्रदर्शित है। यह स्वर्ण धातु से निर्मित है, परन्तु इसके आकार का माप ज्ञात नहीं हो पाया।

इसके पुरोभाग में बिन्दु युक्त घेरे में दो आकृतियों के ऊपर नागरी लिपि में ‘रामसीय’ शब्द स्पष्ट है। जबकि पृष्ठ भाग में अरबी भाषा में ‘50 इलाही फरवरदीन’ को पुष्पलताओं के मध्य अलंकृत कर उत्कीर्ण किया गया है। रामसीय प्रकार की एक अन्य स्वर्ण मुद्रा ब्रिटिश संग्रहालय लन्दन में प्रदर्शित है जिसका वजन 74.00 ग्रेन, तथा आकार 0.8 इंच है। इस वृत्ताकार मुद्रा के पुरोभाग में बिन्दु युक्त वृत्त में दो आकृतियां हैं।

एक पुरुष तीन कंगूरे वाला मुकुट धारण किए है। वह अपने दो हाथों में क्रमशः धनुष, और बाण धारण किए है जबकि उनके निकट एक स्त्री अपने मुख पर घूंघट डाले हुए खड़ी है। इतिहासकार इसे रामसीय प्रकार की मुद्रा निर्विवाद रूप में मान चुके हैं। इस मुद्रा के पृष्ठ भाग में अरबी में पूर्वोल्लेखित मुद्रा के पृष्ठ भाग की भांति ‘50 इलाही फरवरदीन’ उत्कीर्ण है।

ध्यान से रामसीय प्रकार की उक्त मुद्राओं के सूक्ष्म अध्ययन द्वारा यह बात हमारे समक्ष आती है कि उक्त मुद्राओं में स्वर्ण मुद्रा के पुरोभाग पर श्रीराम को धोती, उत्तरीय तथा सीता को चोली व साड़ी पहने उत्कीर्ण किया है वस्तुतः वह शुद्ध भारतीय पारम्परिक वेशभूषा प्रमाणित होती है, परन्तु रजत मुद्रा में रामसीता के वस्त्र मध्ययुगीन भारतीय परम्परा के स्वरूप में हैं।

इन मुद्राओं में सीता को चूड़ी पहने दर्शाया गया है। वहीं श्रीराम के शीश पर मुकुट इस काल के हिन्दू देवों के शीश पर उत्कीर्ण किए जाने वाले मुकुट की भांति है। इनमें लन्दन, और फ्रांस में प्रदर्शित रामसीय मुद्राओं की पहचान सर्वप्रथम क्रमशः सन् 1892 ईस्वी में स्टेनली लेनपूल ने की, तथा उसके पश्चात् आर बी ह्वाइटहेड ने की।

डॉ वासुदेव शरण अग्रवाल ने भारत कला भवन में चांदी की रामसीय अठन्नी मुद्रा को वर्णित किया तब उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा कि रामसीय प्रकार की स्वर्ण मुद्रा वास्तव में अति विरल मुद्रा है परन्तु चांदी में यह मुद्रा तो अपनी तरह की अकेली ही है। इस प्रकार अकबर द्वारा चलाई गई इन दुर्लभ मुद्राओं के विषय में लेनपूल ने सत्य ही लिखा कि यदि अकबर के बाद उसके कट्टर प्रतिक्रियावादी प्रपौत्र औरंगजेब ने उसकी नीति को न पलटा होता तो भारतीय संस्कृति का इतिहास, और उसका स्वरूप ही कुछ और होता।

विगत वर्षों में श्रीराम विषयक कुछ अन्य मुद्राओं की खोज भी मुद्राशास्त्र के अनेक विद्वानों द्वारा की गई है, जिनसे यह प्रमाणित हुआ अकबर से भी पूर्व भारत में श्रीराम विषयक मुद्राएं प्रचलित थीं। एक विश्वसनीय विवरण के आधार पर ज्ञात हुआ है कि कोटा के मुद्रा विशेषज्ञ शैलेश जैन का कहना है कि कुषाण वंश के एक प्रसिद्ध शासक हुविष्क ने अपने काल में श्रीराम की ताम्र धातु की मुद्रा का प्रचलन किया था जिसमें उसने श्रीराम का अंकन दर्शाया था।

हुविष्ककालीन ताम्र सिक्का
हुविष्ककालीन ताम्र सिक्का

इस मुद्रा में श्रीराम धनुष के अंकन के साथ हैं। इस मुद्रा के अग्र भाग पर गज, एवं सवार तथा पृष्ठ भाग पर श्रीराम का अंकन है, एवं वे अपने दोनों करों में क्रमशः तीर तथा धनुष धारण किए हैं। जैन के अनुसार मौर्य काल में पंचमार्क मुद्रा का प्रचलन था जिन पर शासक धातु पर ही अपने शासन की छाप लगाकर मुद्रा का रूप देते थे। उनके अनुसार ऐसी मुद्राओं पर तीन व्यक्ति आकृतियां भी दिखाई देती हैं जो श्रीराम, लक्ष्मण, व सीता ही हैं।

इसके पश्चात् ताम्र, और रजत की मुद्राओं पर भी श्रीराम का अंकन शासकों ने किया वहीं अनेक शासकों ने तो स्वर्ण की मुद्रा पर भी श्रीराम का अंकन किया था। जैन के अनुसार मध्यकाल में 10वीं से 15वीं सदी के मध्य दक्षिण भारत के अनेक शासकों ने श्रीराम पर मुद्रा प्रचलित की थी इनमें उत्तरी कर्नाटक के कदम्ब साम्राज्य, तंजौर के नायक, विजयनगर साम्राज्य, होयसल, शिवगंगा, व मदुरई के नायकों ने भी श्रीराम पर मुद्रा प्रचलित की थी। इसी प्रकार 7वीं सदी के आसपास बंगाल के शासक समताता, और मैनामती ने भी श्रीराम की धनुषधारी स्वर्ण मुद्रा का प्रचलन किया था।

जैन ने मालवा के देवास राज्य के सिक्कों की शोध खोज की थी जिन पर ‘श्रीराम’ का अंकन हुआ है। उनका कहना है कि राजस्थान में अजमेर के चौहान वंश के नरेश बीसलदेव ने भी अपनी प्रचलित स्वर्ण मुद्रा पर श्रीराम का चित्र अंकित करवाया था। यह मुद्रा 12वीं सदी के आसपास प्रचलित हुई थी। मुद्रा विशेषज्ञ डॉ प्रशान्त पी कुलकर्णी के शोध के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में मगध साम्राज्य का विकास हुआ, और उनके काल में पहली बार सिक्कों पर श्रीराम सीता, और लक्ष्मण का अंकन छाप के रूप में अंकित हुआ।

ये सिक्के मौर्योत्तर काल अर्थात् ईसा पूर्व पहली दूसरी सदी के हैं। यह काल शुंगकाल रहा। इस काल के पंजाब, और विदर्भ के सिक्कों पर भी श्रीराम के अंकन के दुर्लभ उदाहरण हैं, तथा इसमें वे हाथों में धनुष बाण लिए एक योद्धा के रूप में हैं। मध्यकाल में दक्षिण भारत की मुद्राओं पर सभी देवी देवताओं का चित्रण अंकित किया गया था जिसमें विजयनगर, होयसल, चालुक्य प्रमुख थे। इनकी मुद्राओं पर भी श्रीराम के दर्शन हुए। मुद्रा विशेषज्ञ अविनाश रामटेके के संग्रह में विदर्भ के पौनी से प्राप्त तांबे की चौकोर ऐसी मुद्रा है जिसमें कोदण्डधारी श्रीराम, और सीता की छवियां अंकित हैं।

इस अंकन में श्रीराम मुद्रा के अग्रभाग पर धनुष बाण धारण किए हुए हैं। यह ताम्र धातु की मुद्रा है, और प्रथम सदी ईसा पूर्व की है। एक पंचमार्क मुद्रा जो पहली दूसरी सदी ईसा पूर्व की है वह अन्तर्राष्ट्रीय नीलामीकर्ताओं के संग्रह में है। इसमें दो तरफा के पिछले भाग पर तीन मानव आकृतियां स्पष्ट रूप से अंकित हैं, और निष्कर्ष रूप से ये अंकन श्रीराम, लक्ष्मण, और सीता की मानी गई हैं।

एक अन्य मुद्रा रजत धातु की शुंग कालीन मिली है जिसके विश्लेषण पर डॉ प्रशान्त कुलकर्णी ने बताया कि इसके मुख्य भाग पर तीन छापे हैं, एक में दो सर्पों से घिरी हुई छड़ी, दूसरे में एक खरगोश, और तीसरी छाप में तीन मानव आकृतियों में से एक जिन्हें लक्ष्मण, श्रीराम, और सीता के रूप में वर्णित किया गया है। यह व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है कि यह मुद्रा पुष्यमित्र शुंग के काल की है।

16वीं सदी में दक्षिण भारत में अरविदु राजवंश की स्थापना 1570 1571 ईस्वी में विजयनगर के चौथे राजवंश के संस्थापक तिरुमलाराय (1565 1572 ईस्वी) द्वारा की गई थी। इसकी मुख्य मुद्रा स्वर्ण की थी जिस पर श्रीराम, सीता, और लक्ष्मण का अंकन है। इस मुद्रा की डिजाइन का उपयोग फुल होन, और हाफ होन मुद्रा में किया जाता था।

दक्षिण के एक अरविदु वंश के तिरुमाला नामक राजा द्वारा निर्मित स्वर्ण, और रजत की मुद्राएं भी उल्लेखनीय हैं। इनके अग्रभाग पर श्रीराम, सीता, और लक्ष्मण की छवियों का अंकन हुआ है। मुद्रा के पृष्ठ भाग पर तेलुगु लिपि में ‘तिरूमलरायुलु’ शब्द का अंकन है। चन्द्रपुर महाराष्ट्र के मुद्रा अनुसन्धानकर्ता अशोक सिंह ठाकुर के अनुसार उनके मुद्रा संग्रह में चौहान राजवंश के शासक विग्रहराज चतुर्थ (12वीं सदी) की 4.02 ग्राम की दुर्लभ स्वर्ण मुद्रा है।

इस मुद्रा में एक ओर श्रीराम का चित्र अंकित है जिसमें उनके एक कर में धनुष तो दूसरे कर में बाण का अंकन है। इस पर एक पक्षी, और पुष्प का अंकन भी है। साथ ही इस पर ‘श्रीराम’ भी लिखा है। मुद्रा पर पुष्पों की सज्जा व कमल पुष्प का भी अंकन है। मुद्रा के दूसरे भाग पर देवनागरी में तीन पंक्तियां हैं जिसमें ‘श्रीमद् विग्रह राजदेव’ अंकित है। नीचे की ओर चन्द्रमा, और तारे का अंकन है। ठाकुर के अनुसार उन्हें यह दुर्लभ मुद्रा राजस्थान से प्राप्त हुई थी।

इन्दौर के मुद्रा संग्रह करने वाले प्रो डी एल मीणा का कहना है कि एक मुद्रा उनके संग्रह में है। यह अण्डाकार मुद्रा शुंगकाल की है जो 4.15 ग्राम की है तथा प्रोटीन धातु (लेड, टिन, और कॉपर) की है। इस पर श्रीराम, लक्ष्मण, व सीता का वनगमन का दृश्य है। यह अपने प्रकार की एक मात्र मुद्रा है। इस मुद्रा पर मुद्रा विशेषज्ञ डॉ देवेन्द्र हाड़ा ने शोध पत्र भी लिखा है। उनके अनुसार यह मुद्रा ईसा से दूसरी सदी पूर्व की है तथा इस पर वाल्मीकि रामायण के अरण्यकाण्ड के दृश्य का अंकन है।

राजस्थान पुरातत्त्व विभाग के मुद्रा विशेषज्ञ जफरउल्ला खां के एक विवरण के अनुसार राजस्थान के सीकर जिले में पंचमार्क मुद्राएं प्राप्त हुई थीं। उत्खनन का स्थान उक्त जिले का गुरार नामक स्थान था जहाँ 11 जून 1998 ईस्वी को विभाग द्वारा उत्खनन कराया गया था उसमें प्राप्त पंचमार्क मुद्रा की संख्या 2744 थी इनमें से 61 मुद्राओं पर ‘थ्री मेन’ (तीन मानव आकृतियों) का अंकन था। इन मानव आकृतियों का सूक्ष्म अध्ययन करने के पश्चात् मुद्रा शास्त्रियों का यह मत रहा कि इन मुद्राओं पर बायीं ओर क्रमशः सीता, श्रीराम, व लक्ष्मण का अंकन हुआ है।

सिया-राम और लक्ष्मण से सम्बंधित सिक्का
सिया-राम और लक्ष्मण से सम्बंधित सिक्का

इस क्रम में ब्रिटिश पुरातत्त्ववेत्ता सर जान एलन ने अपने एक शोध पत्र में ‘थ्री मेन’ व डॉ परमेश्वरीलाल गुप्ता ने ‘तीन मानव आकृति’ के रूप में इन मुद्राओं की आकृतियों को माना तथा चर्चा की परन्तु ये थ्री मेन नहीं हैं अपितु इनमें दो पुरुष व एक महिला हैं। प्रथम दो पुरुष की आकृति में शीश पर केवल एक एक जूड़ा बंधा है जबकि तीसरी आकृति जो एक महिला की है उसके शीश पर दो चोटियां, और तीन जुड़े बंधे हुए हैं। इन 7 प्रकार की सभी 61 मुद्राओं पर तीसरी महिला आकृति का प्रत्येक मुद्रा पर बायीं ओर ही अंकित पाया जाना वाल्मीकि रामायण में रेखांकित है जिसमें निम्न श्लोक इसकी पुष्टि करता है।

दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा।
पुरतो मारूतिर्यस्य तं वन्दे रघुनन्दनम्।।

उक्त विवेचन पर मुद्रा शास्त्र के विद्वान जफरउल्ला खां का मानना है कि विवेच्य स्थल से प्राप्त 61 मुद्राओं पर सूर्य का अंकन नहीं है जिन पर सूर्य के स्थान पर श्रीराम का अंकन है, क्योंकि श्रीराम स्वयं सूर्यवंशी थे इसलिए सूर्य का अंकन इन मुद्राओं पर नहीं किया गया। उन्होंने ‘प्राचीन सिक्कों पर भारतीय धार्मिक प्रतीकों के चिह्न’ नाम से एक विस्तृत शोध पत्र भारतीय मुद्रा परिषद् के 85वें वार्षिक अधिवेशन में जब प्रस्तुत किया तब देश विदेश के मुद्रा शास्त्रियों में हलचल मच गई थी, और भारतीय मुद्रा विभाग की प्रमाणिक पुस्तक में उनके इस अभिनव शोध को स्थान भी मिला था।

भारत में विगत 200 वर्षों में कई प्रदेशों में श्रीराम, व श्रीहनुमान के अंकन वाले कई सिक्के श्रद्धावश टंकित किए जिन्हें ‘रामटका’ नाम से जाना गया। इनमें श्रद्धा भाव रहा जो भक्तों को खूब भाया। भक्तों ने इन्हें अपने पूजागृहों में रखा। इनके अग्रभाग के मध्य में सिंहासन पर छत्र के नीचे श्रीराम, व सीता जी बिराजे हुए हैं तथा उनके बाएं लक्ष्मण व दाएं भरत व शत्रुघ्न खड़े हैं। श्रीराम सीता के सिंहासन के नीचे सेवारत श्रीहनुमान बैठे हैं, जबकि इस टके के पृष्ठ भाग पर धनुर्धारी श्रीराम, व सीता जी खड़े हुए हैं व वृत्ताकार नागरी लिपि में एक अस्पष्ट लेख व संवत् 1940 टंकित है।

लोकप्रिय रामटका सिक्का
लोकप्रिय रामटका सिक्का

यदि देखा जाए तो रामटका रामकथा (रामायण) के अनुशीलन की दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है जिसमें भगवान विष्णु के विभिन्न (श्रीराम के) अवतारों की धारणा में एक नई मान्यता को टंकित किया गया है। बिहार, और बंगाल में वहां की परम्परानुसार तो श्रीराम के साथ श्री जगन्नाथ को भी दर्शाया गया। इस टके के अग्रभाग पर सिंहासन में छत्र के नीचे श्रीराम, व सीता जी विराजित हैं, एवं उनके बाएं लक्ष्मण व दाएं भरत व शत्रुघ्न खड़े हुए हैं।

सिंहासन के नीचे सेवारत बैठे हनुमान टंकित हैं। इस टके के पृष्ठ भाग पर मन्दिर में विराजित श्री जगन्नाथ जी के मध्य में बहन सुभद्रा व दाएं श्री बलराम हैं तथा वृत्ताकार में नागरी लिपि में ‘श्री श्री जगन्नाथ स्वामी’ टंकित है। देखा जाए तो यह टका एक ओर मूर्ति विज्ञान व उसकी धारणाओं का मुद्रा पर प्रभाव दर्शाता है तो दूसरी ओर विष्णु अवतारों में श्रीराम के साथ साथ श्रीजगन्नाथ जी का भी समावेश अभिव्यक्त करता है।

ये रामटका अलग अलग धातुओं में अलग अलग धार्मिक स्थलों में टंकित होकर प्रसारित हुए। इनमें राम दरबार वाले टके अयोध्या के हैं, तथा श्री जगन्नाथ जी वाले दक्षिण क्षेत्र के हैं। इनमें कुछ और रामटका भी मिले हैं जिन पर डॉ मेजर महेश गुप्ता ने प्रकाश डाला है और ये सब श्रीराम से ही सम्बद्ध हैं। प्रथम चांदी के रामटका के अग्रभाग में पूर्व की भांति श्रीराम सीता सिंहासनारूढ़ हैं परन्तु उनके पास लक्ष्मण भी हैं।

हनुमान ने अपने दोनों हाथों से छत्र को पकड़ रखा है। इसके चारों ओर देवनागरी में अस्पष्ट सा कुछ लिखा हुआ है। इसके पृष्ठ भाग में श्रीराम लक्ष्मण सामने देखते हुए खड़े हैं। वे अपने बाएं हाथ में तीर तथा दाएं कन्धे पर कमान धारण किए हैं। परन्तु इन आयुधों के साथ ये दोनों भाई तलवार, और ढाल भी धारण किए हैं। यहाँ यह भी ध्यान देने योग्य होगा कि ये दोनों आयुध धारण किए हुए रामटके बहुत ही कम मात्रा में दिखाई देते हैं। इसके चारों ओर देवनागरी में अधूरे अक्षरों में ‘रामलक्ष्मण जनक जपलक हनमनक’ टंकित किया हुआ है।

कुछ और प्राप्त रामटकों का परिचय इस प्रकार है। रजत के एक रामटके के अग्रभाग में श्रीराम सीता सिंहासन पर विराजमान हैं। इसमें सीता हाथ जोड़े, गर्दन झुकाए श्रीराम को नमन कर रही हैं, और श्रीराम अपने बाएं हाथ को उठाते हुए उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं। इस टके में लक्ष्मण छत्र को पकड़े हुए श्रीराम के बायीं ओर खड़े हैं तथा दायीं ओर हनुमान हाथ जोड़े खड़े हैं।

नीचे ‘राम सात (सीता)’ टंकित किया हुआ है। पृष्ठ भाग में हवा में उड़ते हुए हनुमान जी को सूर्य को पकड़ते हुए दिखाया गया है। उनके नीचे पेड़ पौधे, पहाड़ का अंकन है तथा उनके ऊपर ‘हमान’ (हनुमान) टंकित है। पीतल के एक अन्य रामटका के अग्रभाग में 9 खाने में कुल 9 अंक अर्थात् 1 से 9 तक अंकित हैं। इनका प्रत्येक कोण से जोड़ 15 आता है। इसके पृष्ठभाग में श्रीराम दरबार का पूर्ण अंकन है।

रामदरबार से सम्बंधित
रामदरबार से सम्बंधित 

इसमें श्रीराम सीता सिंहासन पर विराजमान हैं, तथा उन पर छत्र छाया है। इनके बायीं ओर लक्ष्मण तथा दायीं ओर भरत शत्रुघ्न हैं। हनुमान नीचे हाथ जोड़े बैठे हैं। एक अन्य पीतल, एवं चांदी का पत्र चढ़ा रामटका भी उल्लेखनीय है। इसके अग्रभाग में पूर्व की भांति राम दरबार का चित्र है, तथा पृष्ठ भाग में हनुमान जी को खड़ी अवस्था में हवा में खड़े दर्शाया है। उनके पांवों के नीचे वृक्ष दिख रहे हैं।

उनके दाएं हाथ में गदा व बाएं हाथ में पर्वत खण्ड है। उनके शीश पर राजसी मुकुट है तथा उनके चारों ओर देवनागरी में ‘राजा रामसत लछमनक हनमन ज’ (राजा राम सीता लक्ष्मण हनुमान की जय) अंकित है। पीतल का एक और रामटका भी इसलिए उल्लेखनीय है कि इसमें पूर्व में विवेचित जय जगन्नाथ की भांति महादेव शिव का भी अंकन है। इस टके के अग्रभाग में चतुर्भुज शिव बाघ के चर्म पर पालथी मार कर विराजित हैं।

उनके दाएं हाथ में त्रिशूल, बाएं हाथ में डमरू तथा अन्य दो हाथ हृदय पर हैं। उनके शीश की जटा से गंगा निकल रही है। उनकी ग्रीवा में सर्प, एवं मस्तक पर तृतीय नेत्र है। इस टंकन में नागरी भाषा में ‘शिवाय नमः’ जैसे अस्पष्ट शब्द हैं जबकि पृष्ठ भाग में पूर्व की भांति श्रीराम दरबार का चित्र अंकित है। ये रामटका आज भी अनेक आस्थावादी हिन्दू परिवारों के पूजा गृहों में रखे हुए मिलते हैं।

इसी क्रम में एक ऐसा देश भी है जहाँ श्रीराम के नाम पर ‘राममुद्रा’ भी प्रचलित है। भारतीय आध्यात्मिक गुरु महर्षि महेश योगी द्वारा 7 अक्टूबर 2000 ईस्वी को अमेरिका के आयोवा नामक राज्य में महर्षि वैदिक सिटी राजधानी के रूप में स्थापित की गई थी। उन्होंने यहाँ के राष्ट्रगान रूप में भगवद्गीता को ससम्मान प्रतिष्ठापित किया था। इस राज्य के शासक महाराजाधिराज राजा राम कहे जाते हैं, और वर्तमान में प्रोफेसर टोनी अबू नाडेर यहाँ के प्रथम शासक और वर्तमान महाराजाधिराज राजा राम के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

मूलतः इसी आधार पर यहाँ की रामराज्य मुद्रा ‘राम’ को नीदरलैण्ड, और संयुक्त राज्य अमेरिका के आयोवा राज्य में कानूनी अधिकार दिया गया है। विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार इस मुद्रा में 1, 5 और 10 के नोट हैं। इन नोट मुद्राओं में एक ओर देवनागरी लिपि में ‘विश्व शान्ति राष्ट्र’ सहित मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का सुन्दर आवक्ष चित्र, और 18 लिपियों में ‘राम’ मुद्रित है। उक्त चित्र के नीचे देवनागरी में ‘राजा राम राम ब्रह्म परमारथ रूपा’ छपा है। इस नोट के द्वितीय ओर कल्पवृक्ष, कामधेनु तथा विश्व शान्ति राष्ट्र के ध्वज का चित्र है, एवं देवनागरी में ‘राम राज्य मुद्रा’, और ‘महर्षि वैदिक प्रशासन रामराज्य’ का अंकन है।

इन मुद्राओं को यहाँ के केन्द्रीय बैंक ने वर्ष 2001 ईस्वी में जारी किया था। सूत्रों के अनुसार 35 अमेरिकी राज्यों में श्रीराम पर आधारित प्रकार चलते हैं। महर्षि संस्था के वित्तमन्त्री बेंजामिन फेल्डमैन ने बीबीसी से एक साक्षात्कार में स्पष्ट कहा था कि श्रीराम का उपयोग निर्धनता दूर करने, और विश्व शान्ति के हेतु हो सकता है। उन्होंने कहा कि श्रीराम की इस मुद्रा का उपयोग निर्धन लोगों के लिए मकान, सड़कें, और अस्पताल बनवाने के लिए होगा।

सूत्रों के अनुसार राममुद्रा की विनिमय दरें इस प्रकार हैं। यथा 1 राम = 10 यूएस डॉलर्स, 1 राम = 11.0827 यूरो, 1 राम = 1278.30 येन, 1 राम = 479.29 रुपये, 1 राम = 15.080 लेबनीज पाउण्ड। प्राप्त जानकारी के अनुसार इस समय कोई एक लाख ‘राम’ नोट प्रचलन में हैं। कागजी मुद्रा की तरह ही 10 ‘राम’ की स्वर्णमुद्रा भी प्रचलन में है। इसमें एक ओर श्रीराम का अंकन है, तथा दूसरी ओर कल्पवृक्ष तथा कामधेनु की चित्राकृति उत्कीर्ण है।

-श्री ललित शर्मा
(
लेखक प्रतिष्ठित इतिहासकार, पुराविद, मुद्राशास्त्रज्ञ व शोधकर्त्ता हैं। वे राजस्थान एवं मालवा समेत भारत के ऐतिहासिक व पुरातात्विक विमर्श के क्षेत्र में कार्यरत हैं।)

 

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