आज का पंचांग

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नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर

पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

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प्राचीन चित्रांकन परम्परा में श्रीराम

प्राचीन चित्रांकन परम्परा में श्रीराम

श्रीराम जीवन्त हैं, जिन्होंने पाषाण को अपने पांव के स्पर्श से मानवी रूप में परिवर्तित कर दिया हो वे कैसे पत्थर के हो सकते हैं? इसलिये हमारी आस्था श्रीराम को सजीव स्वरूप में पूजती है। यही कारण है कि आज इस कोरोना काल में हर राम आराधक भले ही राम मन्दिर निर्माण का दैहिक रूप से साक्षी न बन पा रहा हो लेकिन आज हर उस भारतवासी का मन जो श्रीराम के समरसतापूर्ण लोक चरित्र की आराधना करता है वह मन सरयू का तट हो गया है और उसका मानस अयोध्या।

 

श्रीराम की इस कथा को वाल्मीकि ने सबसे पहले शब्दों में गूंथा और फिर यह कथा महाभारत के द्रोण पर्व, अग्नि, गरुड़ और हरिवंश पुराण से लेकर कालिदास के रघुवंश और भवभूति के उत्तररामचरित और दक्षिण के कंबन तक अनेक रूपों में गाई जाती रही। फिर तुलसी तक आते आते रामकथा की सरिता, सागर में बदल गई। तुलसी ने श्रीराम की विरलता को अविरल कर दिया।

भवभूति के उत्तररामचरित में एक सुन्दर प्रसंग चित्रांकन पर केन्द्रित है जब श्रीराम और सीता को लक्ष्मण अयोध्या में उन भित्तिचित्रों को देखने के लिए आमंत्रित करते हैं जिनमें उनकी स्वयं की कहानी को तूलिका से उरेहा गया है। इस प्रसंग का आरंभ चित्रों से ही होता है। ऋषि अष्टावक्र श्रीराम के पास आए हैं। वे बातें ही कर रहे हैं कि लक्ष्मण आ जाते हैं और श्रीराम से कहते हैं कि, "उस चित्रकार ने हमारे बताए अनुसार आपके चरित् इस भीत के ऊपरी भाग में उरेहे हैं, उन्हें आर्य देखें।"

इस पर देवी सीता और श्रीराम उन चित्रों को देखने लगते हैं। इनमें सीता की अग्निपरीक्षा तक की पूरी कथा अंकित है। पहले उन दिव्य अस्त्रों के सजीव चित्र हैं जो श्रीराम को ताड़का वध के लिए विश्वामित्र से प्राप्त हुए थे। श्रीराम उन्हें देखकर देवी सीता से उन्हें प्रणाम कराते हैं ताकि वे दिव्यास्त्र उनकी गर्भस्थ संतति को अनायास प्राप्त हो जाएं। फिर मिथिला के वृत्तांत हैं, जिन्हें देखकर मैथिली कहती हैं, "अहो, यहाँ खिलते हुए नवनील कमल से साँवले, स्निग्ध, मसृण, मांसल, सुभग देह वाले आर्यपुत्र को बनाया है।"

उन्होंने शंकर के शरासन को कुछ न समझकर तोड़ डाला है और विस्मय-चकित मेरे पिता (जनक) एकटक उनके भोले मुँह को, जिसपर काक-पक्ष शोभित हैं, देख रहे हैं।' उन्हें चित्र दिखाते हुए लक्ष्मण कहते हैं, 'यह तो देखिए, आपके पिता तथा पुरोहित शतानंद, वसिष्ठ आदि समधियों की अर्चा कर रहे हैं।' राम कहते हैं, 'यह देखने ही योग्य हैं, विदेहों और रघुओं का संबंध, जहाँ दोनों ओर विश्वामित्र ही समधी हैं, किसे न रुचेगा।'

देवी सीता विवाह के दृश्य को कहने लगती हैं, यह, आप चारों भाई गोदान-मंगल करके विवाह-दीक्षित हुए हैं। अहो, ऐसा लगता है कि मैं उसी स्थान और उसी समय में हूं।श्रीराम को भी वैसा ही अनुभव होता है और वे सीता का ध्यान पाणिग्रहण के दृश्य की ओर आकृष्ट करते हैं। भवभूति ने इस स्थल पर सीता के हाथ का वर्णन बड़े सुंदर शब्दों में किया है। लक्ष्मण इन चित्रों के संबंध में और विवरण देते हैं।

भरत की वधु मांडवी और शत्रुघ्न की वधू श्रुतकीर्ति के चित्र दिखाते हैं। इस विवरण के बाद प्रसंग का सर्वश्रेष्ठ अंश आता है। उर्मिला (लक्ष्मण-पत्नी) के चित्र को इंगित करके सीता लक्ष्मण से पूछती हैं, 'वत्स, और यह कौन है ?' लक्ष्मण लजा जाते हैं और मन-ही-मन मुस्कुराते हुए प्रसंग बदलने के लिए परशुराम कांड के चित्र दिखाने लगते हैं। इसी क्रम में वे लोग श्रीराम के किष्किंधा पहुंच जाने तक के चित्रों को देखते हैं और उनके हृदय के प्रसंगानुकूल भांति-भांति के भावों की क्रिया तथा प्रतिक्रिया होती है।

इस प्रसंग से यह स्पष्ट है कि आठवीं शताब्दी में निश्चय ही भित्ति चित्र रामायण के प्रसंगों के आधार पर बने होंगे, जिनका सजीव वर्णन भवभूति ने किया है, किंतु अब ये भित्तिचित्र या अन्य चित्र उपलब्ध नहीं हैं। हम श्रीराम के इन विभिन्न रूपों से परिचित हैं लेकिन श्रीराम के उस स्वरूप से हम बहुत कम परिचित हैं जो चित्रों में है विशेष रूप से मध्यकाल की विभिन्न शैलियों में बनाए गए लघुचित्रों में।

भारत में दसवीं शताब्दी से भोजपत्रों व ताइपत्रों पर बनाए गए सचित्र ग्रंथ व चित्र मिलते हैं। ईस्वी सन् 1020 में ताड़पत्रों पर लिखित रामायण प्राप्त हुई है। रामायण की लोकप्रियता के कारण उसकी अनेक अनुकृतियाँ तैयार की गई। अभी तक हुए शोधों के आधार पर ऐसी 2000 हस्तलिखित पोथियों का पता चला है तथा जहाँ तक सचित्र पोथियों का प्रश्न है वे समूचे भारत में मध्यकाल में चित्रित हुई हैं फिर वे चाहे राजस्थान की या पहाड़ की रियासतें हों अथवा दक्षिण भारत के सुदूर क्षेत्र के अंचल । मुस्लिम प्रभाव के कारण सल्तनत काल या पूर्व मुगल काल की शैलियों में रामायण के अंकन नहीं मिलते हैं।

 

लेकिन यहाँ चर्चा उन लघुचित्रों की है जो मध्यकाल में पूरे भारत की चित्रशैलियों में बनाए गए। सबसे पहले अकबर ने रामायण का अनुवाद अब्दुल कादिर बदायूनी से करवाया तथा इसे सचित्र बनवाया। इसमें 136 चित्र थे तथा यह सन् 1588 में पूर्ण हुई। एक और सचित्र रामायण अब्दुल रहीम खानखाना ने सन् 1598-1599 में बनवाई। ये दोनों क्रमशः जयपुर पोथीखाने और फ्रीर गैलरी वाशिंगटन में हैं।

मेवाड़ में राजा जगतसिंह के समय साहिबदीन नामक एक कुशल चितेरे ने रामायण के अनेक काण्ड सचित्र रूप से सन् 1649 से 1653 के बीच तैयार किये। मनोहर नामक चितेरे ने बालकाण्ड के चित्र बनाए। ये अंकन ब्रिटिश संग्रहालय लंदन तथा छत्रपति वास्तु संग्रहालय मुंबई (पूर्व का प्रिंस ऑफ़ वेल्स संग्रहालय) में संरक्षित हैं तथा ख्यात कला इतिहासकार जे.पी. लॉस्टी ने इन पर विस्तृत शोध किया है।

जे.पी लॉस्टी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मेवाड़ की उस सचित्र रामायण को प्रतिष्ठा दिलाने का था जो मेवाड़ के राजा जगतसिंह (1628 से 1652) के समय में उनके अप्रतिम कलाकार साहिबदीन और मनोहर तथा एक अनाम चितेरे ने बनाई थी। वाल्मीकि रामायण की अनुकृति महात्मा हीरानंद ने की। इसमें रामायण के सातों कांड चित्रित किए गए।

इनमें से क्रमशः 2, 4, 6 के सचित्र कांड महाराणा भीमसिंह (1778 से 1828) ने कर्नल जेम्स टॉड को भेंट कर दिए जिन्हें वे लंदन ले गए तथा जिन्हें उन्होंने ड्यूक ऑफ ससेक्स को भेंट किया और जो आज ब्रिटिश लाइब्रेरी लंदन में हैं। जो शेष तीन कांड भारत में रहे उनमें से एक अभी प्राच्य संस्थान जोधपुर में है और शेष छत्रपति शिवाजी महाराज संग्रहालय, मुम्बई (पूर्व प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय), एक व्यक्तिगत संग्रह और बड़ौदा संग्रहालय में हैं।

महाराणा जगतसिंह के संरक्षण में रामायण के विभिन्न कांडों पर 400, चित्र तीन चित्रशालाओं में बने। जेरी लॉस्टी ने रामायण के इन सभी अंकनों को सहेजा और इनका अध्ययन किया। उन्होंने मुझे बताया था कि वर्ष 1971 में जब वे ऑक्सफोर्ड से सीधे ब्रिटिश संग्रहालय आए तो एक युवक के रूप में उनमें भारतीय सचित्र ग्रंथों का अध्ययन करने की तीव्र जिज्ञासा थी।

तब तक रामायण के ये खंड ब्रिटिश लाइब्रेरी में स्थानांतरित नहीं हुए थे। रामायण के इतने बड़े आकार के अंकनों को देखकर वे विस्मित हो गए। इन्हें अभी तक कहीं प्रदर्शित भी नहीं किया गया था। इन उपेक्षित से सचित्र ग्रंथों की उन्होंने सुध ली। इनके तमाम संदर्भ खोजे, शैलीगत मिलान किया, निरंतर भारत आकर इनकी कड़ियां जोड़ीं, कलाकारों के इतिहास को खोजा और सम्पूर्ण रामायण की प्रदर्शनी वर्ष 2008 में लंदन में आयोजित की।

इस अवसर पर उनकी इन अंकनों पर केंद्रित कृति इंग्लैंड और भारत दोनो देशों से एक साथ प्रकाशित हुई। इसी के साथ उनका एक अपनी तरह का इकलौता अभियान आरंभ हुआ और वह था इन चित्रों और इनके पाठ को एक साथ डिजिटल रूप में लाने का तरीका ताकि सामान्य पाठक और विशेषज्ञ दोनों पाठ के साथ इन चित्रों को देखकर रामायण की कथा और उसके मर्म से एकात्म हो सकें।

उनका सपना साकार हुआ 21 मार्च 2014 को जब छत्रपति शिवाजी महाराज वास्तु संग्रहालय, मुंबई जिसे पूर्व में प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय के नाम से जाना जाता था तथा जमशेदजी टाटा ट्रस्ट के सहयोग से लगभग एक सौ पचास वर्ष बाद हमारे देश की यह अनमोल धरोहर अपनी संपूर्णता में जगत के सामने आ सकी। अवसर पर आयोजित समारोह में संग्रहालय के निदेशक डॉक्टर सव्यसाची मुखर्जी सहित ब्रिटिश उपउच्चायुक्त तथा विशेष रूप से मेवाड़ के महाराणा अरविंद सिंह जी उपस्थित थे। आज इस संग्रहालय की वेबसाइट पर जाकर एक क्लिक में अपनी इस महान विरासत को हम देख सकते हैं।

रामायण के चित्रों पर ऐतिहासिक कार्य फ्रांस के राष्ट्रीय संग्रहालय म्यूजी गियूमे की प्रमुख डॉक्टर अमीना ताहा हुसैन ओकाडा ने किया है। उन्होंने निरन्तर 10 वर्षों तक पूरे विश्व में घूमकर सभी प्रमुख संग्रहालयों और व्यक्तिगत संग्रहों से रामायण के 10 हज़ार चित्रों में से 660 चित्रों को चुनकर 5 खण्डों में उन्हें फ्रेंच में प्रकाशित किया है। मुगल शैली के बाद के काल में राजस्थान और हिमाचल प्रदेश तथा मालवा और बुन्देलखण्ड सहित पूरे भारत के विभिन्न अंचलों में रामकथा के प्रसंगों के शानदार रूपायन हुए।

कांगड़ा, गुलेर, बाहु और बसोहली सहित पहाड़ की विभिन्न शैलियों में और जयपुर, कोटा, बूंदी तथा मेवाड़ सहित राजस्थान की अनेक रियासतों और ठिकाणों में रामकथा चित्रित की गई। पहाड़ की शांग्री रामायण के भावप्रवण अंकन जो विश्व में विभिन्न संग्रहालयों में संरक्षित हैं हमारी विशिष्ट धरोहर हैं। इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है 'औतारचरित'। इसका मूल नाम है अवतारचरित। यह ग्रंथ हाड़ौती के झालावाड़ अंचल का प्रतिनिधि सचित्र ग्रंथ है। इस ग्रंथ के रचयिता बारहठ नरहरदास हैं जिनका वास्तविक नाम नरहरिदास है।

इस सचित्र ग्रंथ से तुलनीय कोई अन्य सचित्र ग्रंथ राजस्थानी शैलियों में शायद ही हो। अद्भुत रंग संयोजन, रेखाओं की लयात्मकता, आनुपातिक आकृतियाँ तथा अत्यन्त कौशल के साथ उरेही गई नैसर्गिक दृष्यावलियाँ इस ग्रंथ की विशेषता हैं। राजस्थानी शैलियों में निर्मित किए गए सचित्र ग्रंथों में यह ऐसा इकलौता सचित्र ग्रंथ प्रतीत होता है जो परवर्तीकाल में अर्थात 19वीं सदी में तैयार किया गया और जिसमें कलम की इतनी बारीकी है अन्यथा 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध तथा 19वीं सदी में कलम स्थूल होने लगती है, रंग बिखरने लगते हैं तथा ब्रिटिश प्रभाव के कारण स्थानीयता विलुप्त होने लगती है।

संभवतः यह एकमात्र ऐसा सचित्र ग्रंथ है जिसमें रामचरितमानस के प्रसंगों को चित्रित किया गया है तथा चितेरे ने अपनी कल्पना का प्रयोग करते हुए भी चित्र बनाए हैं। औतारचरित पांच भागों में सजिल्द रूप में राजकीय संग्रहालय झालावाड़ में संग्रहीत है। इन पांच भागों में दो भाग सचित्र हैं। ग्रंथ के प्रथम दृष्टयावलोकन से यह स्पष्ट होता है कि यह ग्रंथ अपूर्ण है। केवल दो जिल्द सचित्र हैं। पहली जिल्द जो पृष्ठ क्रमांक । से 133 तक है उसमें 132 चित्र हैं तथा दूसरी जिल्द में 157 पूर्ण चित्र व 34 अपूर्ण चित्र हैं। पहली जिल्द में अवतारों का विवरण है।

औतारचरित के पहले अंकन में भगवान गणेश के सामने सरस्वती विराजी हैं तथा उनके पीछे एक सेविका अपने हाथ में चंवर लिए खड़ी हैं। इस ग्रंथ में सर्वाधिक दृश्य नरसिंह अवतार पर केन्द्रित हैं। हिरण्यकश्यपु तथा प्रहलाद की कथा को विस्तार से चित्रित किया गया है। ग्रंथ के अंत में निम्नानुसार पुष्पिका है।

 

।। इतिश्री  वेदव्यास  अवतार  चरित्रंबारहठनरहरदाससेन विरचितं संपूर्ण ।।

।। 5000।। दोहा।। ।6।। छंद 44।। कवित्त ।। श्री ।।

जैसा कि पूर्व में उल्लेख किया गया है औतारचरित का यह प्रथम खण्ड दशावतारों से जुड़ी हुई कथाओं पर केन्द्रित है।

ग्रंथ का दूसरा सचित्र भाग पृष्ठ 134 से 325 तक है जिसमें रामकथा चित्रित की गई है। रामायण I वाल्मीकि ने रची जिस पर केन्द्रित अंकन प्रायः सभी शैलियों में हुए हैं। इस चित्रांकन की कथा के लिये बहुत विस्तार चाहिये। यह तो केवल छोटी सी झांकी है। यहाँ इन्हीं विभिन्न शैलियों में रचे गए लघुचित्रों की झांकी प्रस्तुत है। जिन महान चितेरों ने श्रीराम को रचा उनकी आस्था और उनका विश्वास भी तुलसी की तरह अगाध और अटूट था। वे भी तुलसी की तरह चातक थे जो निरन्तर अपने मन की आंखों से अपने श्रीराम को निहारकर उन्हें और उनकी कथा को रचा करते थे।

 

14वीं सदी में दक्षिण भारत के विजयनगर राज्य की स्थापना के साथ ही वहाँ के वीरभद्र मंदिर लेपाक्षी तथा विठ्ठल मंदिर हम्पी में रामायण की प्रमुख घटनाओं का मण्डप की छत पर चित्रांकन किया गया था। 16वीं सदी में सम्राट अकबर के नवरत्न टोडरमल ने 75 हजार श्लोकों वाले 'टोडरनन्द' काव्य ग्रन्थ का 23 जिल्द में प्रथम बार सम्पादन करवाया था। इस ग्रन्थ में उन्होंने 'रामावतार' का सचित्र वर्णन किया है।

इसी समय अकबर के एक और नवरत्न अब्दुर्रहीम खानखाना ने सम्राट के आदेश पर वाल्मीकि रामायण का संस्कृत से फारसी में अनुवाद और श्रीराम के जीवन की प्रमुख घटनाओं को आकर्षक रूप में मुगल शैली में चित्रांकित किया था। इस चित्रांकन में भरत का वन में आगमन तथा श्रीराम से मिलन और अयोध्या चल कर राजपाट संभालने का अनुरोध किया गया है। मुगलकाल की यह चित्रांकन परम्परा कई मायनों में विशिष्ट है। इसमें भरत के सैनिक एवं सेवक मुगलकालीन वस्त्र पहने प्रदर्शित किये गये है जो विविध रंगों के है।

इसमें पगड़ियों पर भी मुगल प्रभाव दर्शित है। कुछ व्यक्ति हाथी के महावतों के रूप में है। हाथियों का श्रृंगार व शारीरिक सौष्ठव उत्तम है। सैनिकों के हाथों में ढाल, तलवार, खड़ग है तथा वे सभी सफेद रंग का पट्टा कमर में बांधे है। उनकी अंगरखी के विन्यास काफी आकर्षक हैं।

सारे सैनिक सघन वन से घिरे क्षेत्र में दर्शाये हैं जिसके एक छोर पर चट्टानों के ऊपर स्वयं हिन्दू शाही वेश में मुकुटधारी भरत नील वर्णीय श्रीराम के समक्ष अयोध्या पधारने का निवेदन कर रहे हैं। भरत के पीछे बैठे एक अन्य विशिष्ट जन की मुद्रा भी अनुग्रह भाव की है। श्रीराम शान्त भाव से पीतवस्त्र पहने बैठे हैं। उनके हाथ में धनुष व पीठ पर तरकश बंधा हुआ है। वे शान्त भाव से भरत के अनुग्रह को स्वीकार न करने की विवशता को दर्शा रहे हैं।

 

 

मुद्रा विशेषज्ञ डॉ. शशिकान्त भट्ट के निजी संग्रह में श्रीराम का एक ओर विशिष्ट चित्र मुगलकाल का है जिसमें श्रीराम और अंगद का मिलाप निहारते हुए भगवान ब्रह्मा, शिव, विष्णु और वायुदेव चित्रित है। इस दुर्लभ चित्र में आकाश में तीनो देवों एवं वायुदेव पद्मासन मुद्रा में एक दूसरे से राम अंगद मिलन को निहारने की वार्ता करते विराजे हुए है। इनमें ब्रह्मा तथा वायु को गौरवर्णीय ओपरना तथा धोती एवं माला पहने दर्शाया है, जबकि विष्णु को गहरे श्याम रंग व पीत वस्त्र में एवं शिव को आसमानी रंग से पीतवस्त्र धारण किये दर्शाया है।

उनके गले में गहरे नीले रंग का सर्प भी दर्शाया गया है। इनके ठीक नीचे धरती पर एक घने वन में श्याम वर्णीय श्रीराम को राजसी मुकुट (जिस पर मध्य युगीन तीन पंखुड़ियाँ जड़ी हैं) पहने, ग्रीवा में मोतियों की लटकन वाली श्वेतमाला तथा हरे रंग का ओपरना व पीत वस्त्र की धोती पहने दर्शाया है। वे अपने दायें हाथ की अंगुली मुद्रा से समक्ष खड़े वानरराज अंगद को आवश्यक नीति निर्देश देते हुए दर्शित है। उनके पीछे उन्हीं की भांति मुकुट पहने सेवक भाव से लक्ष्मण खड़े हैं।

श्रीराम के समक्ष यूथपति मुकुटधारी जाम्बवन्त नील वर्णीय रूप में खड़े हुए हैं वे अपने दोनों हाथों की मुद्रा से राम को सलाह देते हुए दर्शित है। उनकी धोती, ओपरना भी दर्शनीय है। उनके पास ही श्वेत पगड़ी व श्वेत ओपरना पहने एक धोती धारित सेवक के हाथों में 2 तलवारें तथा लम्बा भाला है। संभवतः यह दृश्य श्रीराम व जाम्बवन्त के मध्य वार्ता तथा दिशा एवं अस्त्र शस्त्र के उपयोग को लेकर दर्शाया गया है।

श्रीराम, अंगद, लक्ष्मण तथा अन्य सेवक वानरों के शीश के मुकुट मध्य युगीन हिन्दू देवों के शीश पर उत्कीर्ण किये जाने वाले मुकटों की भांति है। सभी की वेशभूषा भी पारम्परिक शुद्ध भारतीय है। उनके पीछे वीर वेश में ढाल, तलवार थामें एक अन्य वानर सेवक भी खड़ा है। अंगद के समक्ष ही युद्ध के अस्त्रशस्त्र सिरटोप, भाला, वक्ष कवच, तलवार तथा कमर कटार भी रखी है जिन पर मध्ययुगीन अस्त्रों की शैली है।

प्रतीत होता है सारे वानरपति श्रीराम के समक्ष अस्त्रशस्त्रों के संग्रहण की सूचना देने तथा इस दूत नीति पर मार्गदर्शन लेने आये हैं, जो अंगद के साथ हैं। श्रीराम का एक अन्य विशिष्ट चित्र भी इसी काल का है जिसमें वे वन में स्वर्ण मृग का पीछा करते हुए ऊकेरे गए हैं। चित्र में वृक्ष-वनस्पति तथा पाषाण खण्डों को सुन्दरता से  अंकित किया गया है। श्रीराम यहाँ मुकुट पहने ऊकेरे गये हैं।

वे अपने हाथों से धनुष पर बाण चढ़ाये स्वर्णमृग पर संधान करने को तत्पर है। उनकी इस मृगया मुद्रा से भयभीत स्वर्णमृग वन में कुलाचें भरते हुए भाग रहा है। उसके सींग तथा शरीर पर स्वर्ण रंग व उन पर गोलाकार हरी-लाल एवं सफेद बिन्दिया व नीचे का वेत भाग एवं मुख अत्यन्त प्राणवान है। I

यदि इन तीनों विशिष्ट चित्रों का साम्य संत तुलसीदास कृत रामचरित मानस में वर्णित घटनाओं से बैठाया जाये तो इसमें प्रथम चित्र श्रीराम के वन से अयोध्या लौटने का विनय करते भरत का है। रामचरित मानस में संत तुलसीदास अपने निम्न दोहे में यह घटना इस प्रकार रेखांकित करते हैं।

भरत सीलगुर सचिव समाजू । सकुच सनेह विबस रघुराजू ।

प्रभू करि कृपा पाँवरी दीन्ही। सादर भरत सीस धरि लीन्हीं।।

अर्थात् 'इधर तो भरत जी का प्रेम और उधर गुरुजनों, मंत्रियों तथा समाज की उपस्थिति। यह देखकर श्रीराम (रघुराज) संकोच एवं प्रेम के वशीभूत (विवश) हो गये। अन्त में उनके प्रेमवश प्रभू श्रीराम ने कृपा करके उन्हें अपनी खड़ाऊ प्रदान की और भरतजी ने उन्हें सम्मान पूर्वक अपने सिर पर धारण किया।' इसी प्रकार द्वितीय विशिष्ट चित्र श्रीराम जाम्बवन्त की वार्ता का तथा अंगद से श्रीराम की वार्ता निहारते भगवान ब्रह्मा, शिव, विष्णु एवं वायुदेव का है। संत तुलसीदास का इस बारे में रामचरित मानस का यह दोहा सटीक बैठता है -

सुनु सर्वग्य सकल डर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी।

मंत्र कहऊ निजमति अनुसारा। इत पठाइअ बालि कुमारा।। अर्थात् 'हे सर्वज्ञ! है सबके हृदय में बसने वाले अर्न्तयामी! है बुद्धि, बल, तेज, धर्म और गुणनिधान। मैं जाम्बवन्त अपनी बुद्धि के अनुसार आपको सलाह देता हूं कि आपके द्वारा बालिकुमार अंगद को रावण के पास अपना दूत बनाकर भिजवाया जाए।' तथा

नीक मंत्र सबके मन माना। अंगद सन कह कृपा निधाना।

बालितनय बुधि बल गुना धामा। लंका जाहु तात मम कामा ।।

अर्थात् 'जाम्बवन्त की यह अच्छी सलाह सभी के मन में जंच गयी। कृपा के निधान श्रीराम ने अंगद से कहा- "हे बल, बुद्धि गुणों के धाम वालिपुत्र। तुम मेरे कार्य के लिये लंका जाओ।"  तृतीय विशिष्ट चित्र स्वर्णमृग का वन में पीछा करते धनुर्धारी श्रीराम का है। संत तुलसीदास इस बारे में रामचरितमानस में यह दोहा रचते हैं जो इस चित्र के अंकन पर सटीक बैठता है -

मृगविलोकी कटि परिकर बांधा। करतल चाप रुचिर सर साँधा ।।

प्रभूहि बिलोकी चला मृग भाजी। धाए रामु सरासन साजी ।।

अर्थात् - 'स्वर्णमृग को देखकर श्रीराम ने कमर में अपना पटका बांधा और धनुष को हाथ में धारण कर उस पर सुन्दर बाण चढ़ाया। यह देखते ही आखेट के भय से श्रीराम को देखकर मृग कुलांचे मारते हुए भागा और श्रीराम भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे भागे।'

एक अन्य विशिष्ट चित्र रामायण के पत्र से है। इसमें श्रीराम और परशुराम की भेंट है। राजस्थानी शैली का यह चित्र उदयपुर से प्राप्त हुआ है और वर्तमान में मुम्बई के छत्रपति शिवाजी वास्तु संग्रहालय की चित्रकला विथिका में क्रमांक 54.1/19 पर प्रदर्शित है। चित्रकार मनोहर द्वारा ऊकेरा यह चित्र ईस्वी सन् 1649 का है। यह पूरा चित्र 38 गुणा 2.5 सेमी लम्बा एवं 31.18 सेमी चौड़े पत्र पर है। इसे मेवाड़ महाराणा जगतसिंह के राज्याश्रय में बनाया गया था। यह मूलतः रामायण के बिखरे चित्रों में से एक है।

इस कथाचित्र में परशुराम श्रीराम के विवाह की बारात को रोकते हुए हैं। वे श्रीराम को उनकी योग्यता प्रमाणित करने हेतु विशाल शिव धनुष को झुका कर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाने की चुनौती देते हैं। श्रीराम आसानी से धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा लेते है और एक बाण निकालते है। परशुराम इससे अवाक रह जाते हैं और तत्काल उन्हें यह आभास हो जाता है कि श्रीराम कोई असाधारण मनुष्य हैं।

चित्रकार ने इस घटना को पूरी सूक्ष्मता और मनोयोग से ऊकेरा है और इस हेतु उसने संकेतों, कथा कहने की तकनीक के साथ-साथ बड़े चटक रंगों का भी सुन्दर इस्तेमाल किया है। प्रस्तुत चित्रांकन में जो तीन अलग-अलग जगहें दिखाई है वे अलग-अलग रंग की पृष्ठभूमि में है। आगे के हिस्से में पंच ऋषि यज्ञ कर रहे है। बारात में श्रीराम और उनके अनुज रथों पर सवार है तथा उनके पीछे सीता तथा दूसरी महिलायें दो हाथियों पर रखे हौदों में बैठे पीछे आ रही हैं। परशुराम देवलोक से उतर कर आये हैं, जिसे हल्के बैगनी रंग में दर्शाया गया है।

गुस्से में भरे हुए परशुराम काफी बड़े आकार में दर्शाये हैं जिससे उनका व्यक्तित्व इस चित्र में बड़े प्रभावी रूप में उभर आया है। प्रस्तुत चित्र में भगवान विष्णु के दो अवतारों के मिलने के इस पल को निहारने के लिए आकाश में देवता एकत्रित हुए दर्शाये हैं। घटनाओं के क्रम में श्रीराम तथा परशुराम बार-बार दिखाए गए हैं। श्रीराम के अतुलनीय पराक्रम तथा चमत्कार से शांत और ट्रिनम हुए परशुराम सामान्य मनुष्य के आकार में आ गए हैं और फिर उनके हाथ में धनुष के स्थान पर पुष्प है जो अब सन्धि तथा श्रीराम के प्रति भक्तिभाव का प्रतीक है।

सांवले सलोने श्रीराम के हाथ में भी एक पुष्प है जो परशुराम के प्रति आदर समभाव का सूचक है। इस चित्र के अन्तिम कोने में इस घटना का अन्तिम रूप चित्रित है जिसमें परशुराम फिर महेन्द्र पर्वत की ओर तपस्या करने जाते दिखायी देते हैं। एक विशिष्ट चित्र कला विशेषज्ञ नर्मदा प्रसाद उपाध्याय (इन्दौर) के व्यक्तिगत संग्रह में है। यह चित्र 'राम दरबार' का है जो 19वीं सदी के प्रारम्भिक दशकों में झालावाड़ कलम की विशेषता का प्रतिनिधित्व करता है।

इस चित्र में श्रीराम सीता सहित स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान है तथा उनके एक हाथ में कमल पुष्प है। दोनों के शीश पृष्ठ में प्रभामण्डल का अंकन व उसके ऊपर अयोध्या नगरी का वैभव प्रकृति प्रदत्त हरियाली के मध्य ऊकेर कर प्राणवान बनाया है। यहाँ श्रीराम एवं सीता ने परम्परागत वस्त्राभूषण धारण किये हैं। श्रीराम का एक पैर नीचे बैठे भक्त हनुमान के घुटनों पर रखे हाथों में है। पीछे दो परिचायक मोरछल लिये हैं व भरत भी इसमें दर्शाये गये हैं।

इस प्रकार भारतीय चित्रांकन परम्परा में श्रीराम का अंकन विशिष्ट गरिमा के साथ मध्यकालीन व उत्तर मध्यकालीन संस्कृति में दिखायी देता है।

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