गणपति उत्सव दर्पण के रचनाकार मेदिनी प्रसाद पाण्डेय
September 25, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

रंगमंच के तंत्र का ज्ञान पात्रों की सजीवता, घटनाओं का औत्सुक्य और आकर्षण तथा स्वाभाविक कथोपकथन नाटक के प्राण हैं। इन सबको ध्यान में रखकर नाटक यदि नहीं लिखा गया है तो वह केवल साहित्यिक पाठ्य सामग्री रह जाती है। भारतीय हिन्दी भाषी समाज में रामलीला और नौटंकी का प्रसार था। कभी कभी रास मंडली भी आया करती थी जो अष्ठछाप के काव्य साहित्य के आधार पर राधा कृष्ण के नृत्यों से परिपूर्ण संगीत प्रधान कथानक प्रस्तुत करती थी। रामलीला और रासलीला को लोग धार्मिक भावनाओं से देखते थे। गांवों में जो नौटंकी हुआ करती थी उसका प्रधान विषय वीरगाथा अथवा उस प्रदेशिक भाग में प्रचलित कोई प्रेम गाथा हुआ करती थी। ग्रामीणजन का मनोरंजन करने में इनका बहुत बड़ा हाथ होता था। पंडित हीराराम त्रिपाठी के पद्य रासलीला में अधिकतर गाए जाते थे। देखिए उनके इस गीत में गोपियों का कृष्णचंन्द्र पर प्रेम की एक बानगी:-
चल वृन्दावन घनस्याम दृष्टि तबै आवै।
होगा पूरन काम जन्म फल पावै।।
द्रुम लता गुल्म तरू वृक्ष पत्र दल दल में।
जित देखे तित श्याम दिखत पल-पल में।।
घर नेह सदा सुख गेह देखु जल थल में।
पावेगा प्रगट प्रभाव हिये निरमल में ।।
तब पड़े सलोने स्याम मधुर रस गावै। 1।।
तट जमुना तरू वट मूल लसै घनस्यामैं।
तिरछी चितवन है चारू नैन अभिरामैं।।
कटि कसै कांछनी चीर हीर मनि तामैं।
मकराकृत कुण्डल लोल अमोल ललामैं।।
मन स्वच्छ होय दृग कोर ओर दरसावै।। 2।।
मुगलों के आक्रमण के पूर्व भारत के सभी भागों में खासकर राज प्रसादों और मंदिरों में संस्कृत और पाली प्राकृत नाटकों के लेखन और मंथन की परंपरा रही है लेकिन उनका संबंध अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित था। ग्रामीणजन के बीच परंपरागत लोकनाट्य ही प्रचलित थे। मुगलों के आक्रमण से भारतीय परंपराएं छिन्न भिन्न हो गयी और यहां के प्रेक्षागृह भग्न हो गये। तब नाटकों ने दरबारों में भाण और प्रहसन का रूप ले लिया। लेकिन लोकनाट्य की परंपरा आज भी जीवित है...चाहे ढोलामारू, चंदापन या लोरिकियन रूप में हो, आज भी प्रचलित है। आज हमारे बीच जो लोकनाट्य प्रचलित है उसका समुचित विकास मध्य युग के धार्मिक आंदोलन की छत्रछाया में हुआ। यही युग की सांस्कृतिक चेतना का वाहक बना। आचार्य रामचंद्र ने राम कथा को और आचार्य बल्लभाचार्य ने कृष्ण लीला को प्रोत्साहित किया। इनके शिष्यों में सूर और तुलसी ने क्रमशः रासलीला और रामलीला को विकसित किया। इसी समय बंगाल में महाप्रभु चैतन्य ने जात्रा के माध्यम से कृष्ण भक्ति का प्रचार किया। पं. हीराराम के गीत गाये प्रचलित थे:-
कृष्ण कृपा नहिं जापर होई दुई लोक सुख ताहिं न होई।
देव नदी तट प्यास मरै सो अमृत असन विष सम पलटोई।।
धनद होहि पै न पावै कौड़ी कल्पद्रुम तर छुधित सो होई।
तको चन्द्र किरन अगनी सम रवि-कर ताको ठंड करोई।।
द्विज हीरा हरि चरण शरण रहु तोकू त्रास देइ नहिं कोई।।
रायगढ़ के राजा भूपदेवसिंह के शासनकाल में नगर दरोगा ठाकुर रामचरण सिंह जात्रा से प्रभावित रास के निष्णात कलाकार थे। उन्होंने इस क्षेत्र में रामलीला और रासलीला के विकास के लिए अविस्मरणीय प्रयास किया। गौद, मल्दा, नरियरा और अकलतरा रासलीला के लिए और शिवरीनारायण, किकिरदा, रतनपुर, सारंगढ़ और कवर्धा रामलीला के लिए प्रसिद्ध थे। नरियरा के रासलीला को इतनी प्रसिद्धि मिली कि उसे ‘छत्तीसगढ़ का वृंदावन‘ कहा जाने लगा। ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर, उनके बहनोई कोसिरसिंह और भांजा विश्वेश्वर सिंह ने नरियरा और अकलतरा के रासलीला और रामलीला के लिए अथक प्रयास किया। उस काल में जांजगीर क्षेत्रान्तर्गत अनेक गम्मतहार सुरमिनदास, धरमलाल, लक्ष्मणदास चिकरहा को नाचा पार्टी में रास का यथेष्ट प्रभाव देखने को मिलता था। उस समय दादूसिंह गौद और ननका रहस मंडली, रानीगांव रासलीला के लिए प्रसिद्ध था। वे पं. हीराराम त्रिपाठी के श्री कृष्णचंद्र का पचरंग श्रृंगार गीत गाते थे:-
पांच रंग पर मान कसें घनश्याम लाल यसुदा के।
वाके वह सींगार बीच सब रंग भरा बसुधा के।।
है लाल रंग सिर पेंच पाव सोहै,
अँखियों में लाल ज्योैं कंज निरखि द्रिग मोहे।
है लाल हृदै उर माल कसे जरदा के ।।1।।
बहुत कम लोगों को मालूम है कि शिवरीनारायण का अभिनय संसार केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं वरन् देश के कोने कोने में प्रसिद्ध था। हालांकि हर गांव में नाचा, गम्मत, रामलीला और रासलीला पार्टी होती थी लेकिन यहां की रामलीला और नाटक मंडली की बात ही कुछ और थी। ‘‘छत्तीसगढ़ गौरव‘‘ में पंडित शुकलाल पांडेय ने लिखा है:-
हैं शिवलाल समान यहीं पर उत्तम गायक।
क्षिति गंधर्व सुरेश तुल्य रहते हैं वादक।
विविध नृत्य में कुशल यहीं हैं माधव नर्तक।
राममनोहर तुल्य यहीं हैं निपुण विदूषक।
हैं गयाराम पांडेय से अभिनेता विश्रुत यहीं।
भारत में तू छत्तीसगढ़ ! किसी प्रान्त से कम नहीं।।174।।
प्राचीन साहित्य में उल्लेख मिलता है कि पंडित मालिकराम भोगहा ने एक नाटक मंडली यहां बनायी थी। इस नाटक मंडली द्वारा अनेक धार्मिक और सामाजिक नाटकों का सफलता पूर्वक मंचन किया जाता था। भोगहा जी भी छत्तीसगढ़ के एक उत्कृष्ट नाटककार थे। उन्होंने अनेक नाटक लिखे जिसमें राम राज्य वियोग, प्रबोध चंद्रोदय और सती सुलोचना प्रमुख है। इन नाटकों का यहां सफलता पूर्वक मंचन भी किया गया था। भोगहा जी की एक मात्र प्रकाशित नाटक ‘‘राम राज्य वियोग‘‘ में उन्होंने लिखा है:- ‘‘यहां भी कई वर्ष नित्य हरि कीर्तन, नाटक और रासलीला देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। एक समय मेरे छोटे भाई श्रीनिवास ने ‘‘कंस वध उपाख्यान‘‘ का अभिनय दिखाकर सर्व सज्जनों को प्रसन्न किया। इस मंडली में हमारे मुकुटमणि श्रीमान् महंत गौतमदास जी भी सुशोभित थे। श्रीकृष्ण भगवान का अंतध्र्यान और गोपियों का प्रलापना, उनके हृदय में चित्र की भांति अंकित हो गया जिससे आपकी आनंद सरिता उमड़ी और प्रत्यंग को आप सोते में निमग्न कर अचल हो गये। अतएव नाटक कर्त्ता का उत्साह अकथनीय था और एक मुख्य कारण इसके निर्माण का हुआ।‘‘
छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण के लोक स्वरूप:-
छत्तीसगढ़ में जन्माष्टमी में श्रीकृष्ण के लोक स्वरूप की कल्पना करके इसे ‘‘आठे कन्हैया‘‘ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण के स्वरूप की कल्पना उसके लोक रक्षक के रूप में की गयी है। सभी जानते हैं कि उनका जन्म न केवल कंस की आततायी से मथुरा, गोकुल और वृंदावन वासियों को मुक्ति दिलाने के लिए हुआ था बल्कि पूरी सृष्टि को आसुरी वृत्ति से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ था। साथ ही माता देवकी के गर्भ से जन्म लेने, माता यशोदा को बाललीला दिखाने, हस्तिनापुर के कौरव-पांडवों के युद्ध में लोकलीला उनका मुख्य उद्देश्य था। डाॅ. पीसीलाल यादव का मानना है कि जब लागों की आवाज कंस के सामंती व्यवस्था में कुचली जा रही थी तब लोक भावनाओं की रक्षा करने के लिए श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। आठे कन्हैया लोक संस्थापक श्रीकृष्ण के जनमोत्सव का केवल प्रतीक मात्र नहीं है, अपितु लोक समूह की शक्ति को प्रतिस्थापित करने का पर्व भी है। उन्होंने हठी इंद्र के मान मर्दन और लोकरक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था। शायद इसी कारणलोक संगइक के रूप में श्रीकृष्ण जन जन में पूजनीय हैं। छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में आठे कन्हैया के प्रति अगाध श्रद्धा है। इस दिन अधिकांश बड़े-बूढ़े और स्त्री-पुरूष उपवास करते हैं। इस दिन मालपुआ, खीर पूड़ी बनाकर भोग लगाया जाता है।
मटकी फोड़ और दहिकांदो:-
‘गोविंदा आला ले..‘ गीतों के साथ जन्माष्टमी के दिन मटकी फोड़ और दही लूट प्रतियोगिता प्रायः सभी जगहों में होता है। लड़कों की टोली इस गीत को गाते, नाचते जगह जगह लटके दही और मक्खन के मटकी को फोटते हैं। अनेक जगह ‘मटकी फोड़‘ प्रतियोगिता आयोजित किया जाता है। विजयी टोली को मटकी फोड़ प्रतियोगिता समिति के द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। पहले छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण जन्म के साथ दही लूटकर नाचने की परंपरा थी जिसे दहिकांदो कहा जाता है।
रायगढ़ में जन्माष्टमी उत्सव:-
रायगढ़ जिला मुख्यालय में सेठ किरोड़ीमल के द्वारा स्थापित गौरीशंकर मंदिर स्थित है। यहां गौरी शंकर के अलावा राधाकृष्ण की संगमरमर की भव्य मूर्ति भी है। यहां प्रतिवर्ष जन्माष्टमी बड़े धूमधाम से मानाया जाता है। मंदिर परिसर में अनेक प्रकार की झंकियां लगाई जाती है जिसे देखने के लिए छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के हजारों लोग आते हैं। इस अवसर पर अनेक प्रकार के मनोरंजन के साधन, मीना बाजार, झूला और खरीदी के लिए दुकानें लगती है। मेला जैसा दृश्य होता है। पूरे प्रदेश में जन्माष्टमी का अनूठा आयोजन होता है।
नरियरा का राधाकृष्ण मंदिर छत्तीसगढ़ का वृंदावन:-
जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत अकलतरा रेल्वे स्टेशन से मात्र 10 कि. मी. दूरी पर स्थित ग्राम नरियरा में लगभग 100 साल पुराना राधाकृष्ण मंदिर है। यहां सन 1925 में श्री प्यारेलाल सनाड्य ने रासलीला शुरू किया था जिसे नियमित, संगठित और व्यवस्थित किया ठाकुर कौशलसिंह ने। यहां प्रतिवर्ष माघ सुदि एकादशी से 15 दिन रासलीला होता था। जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग यहां आते थे। वृंदावन के रासलीला की अनुभूति लोगों को होती थी। कदाचित् इसी कारण नरियरा को छत्तीसगढ़ का वृंदावन कहा जाता है। कृष्ण भक्ति का अनूठा उदाहरण यहां देखने को मिलता है। तभी तो ‘छत्तीसगढ़ गौरव‘ में पंडित शुकलाल पाण्डेय गाते हैं:-
ब्रज की सी यदि रास देखना हो तो प्यारो !
ले नरियर नरियरा ग्राम को शीघ्र सिधारो ।
यदि लखना हो सुहृद ! आपको राघव लीला।
अकलतरा को चलो करो मतम न को ढीला ।
शिवरीनारायण जाइये लखना हो नाटक सुघर।
बस यहीं कहीं मिल जायेंगे जग-नाटक के सूत्रधार।। 114।
संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सेवानिवृत्त उप संचालक श्री राहुल कुमार सिंह के अनुसार यहां के पंडित रामकृष्ण पाण्डेय के पास 60-70 साल पुराने हस्तलिखित स्क्रिप्ट में वंदना के बाद कृष्ण कथा के विभिन्न प्रसंगों को लीला शीर्षक दिया गया है जो मानचरित, वैद्य, गोरे ग्वाल, खंडिता मान, दान, जोगन, चीर हरन, होरी, राधाकृष्ण विवाह, यमलार्जुन, उराहनो, माखन चोरी, गोचारण, पूरनमासी, चन्द्रप्रस्ताव, गोवर्धन गोप, मालीन और प्रथम स्नेह लीला नाम से है।
कृष्ण भक्ति से ओत प्रोत ग्राम नरियरा की प्रतिष्ठा छत्तीसगढ़ के वृन्दावन की रही है। यहां मंचित होने वाली लीला में गांव के गोकुलप्रसाद दुबे, राजाराम, कुंजराम के अलावा आसपास के अभिनेता होते थे जिनमें जनकराम सैदा, कपिल महराज अमोरा, रामबल्लभदास, प्रभुदयाल, मदनलाल, श्यामलाल चतुर्वेदी कोटमी और गउद वाले रासधारी दादूसिंह प्रमुख थे। संगीत पक्ष का दायित्व विशेसर सिंह पर होता था। इनके जन्मजात प्रतिभा में निखार तब आया जब वे नासिक में पंडित विष्णु दिगंबर पुलस्कर के भतीजे चिन्तामन राव और उत्तरप्रदेश के सेमरौता के उस्ताद मरौव्वत खान से प्रशिक्षित हुये। स्थानीय कलाकारों को भी तालीम के लिए वृन्दावन भेजे जाने की जानकारी मिलती है।
रासलीला में तबला वादक पंडित गोकुल प्रसाद दुबे, सारंगी वादक भारत प्रसाद, बाजा मास्टर पचकौड़ प्रसाद, तबला पर भानसिंह, इसराज पर अफरीद के पं. रामेश्वरधर दीवान और बांसुरी पर साहेबलाल, चिकारा पर भैंसतरा के रघुनंदनदास वैष्णव, जैजैपुर के महेन्द्रप्रताप सिंह पखावजी के साथ बेलारी के बसंतदास, कुथुर के शिवचरन, मेंहदी के काशीराम तथा कोसा के पुर्रूराम। इसप्रकार नरियरा में पूरे अंचल के कलाकारों और संगीतकारों का समागम रासलीला के अवसर पर होता था। यहां रासलीला प्रसिद्ध राधाकृष्ण मंदिर परिसर में होता था जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग यहां आते थे और गांव वाले उनका अतिथि सत्कार करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। नरियरा की मंच परम्परा ने पचासादि के दशक में करवट ली और बल्लभसिंह इस दौर के अगुवा हुए। अब रासलीला के साथ धार्मिक और सामाजिक नाटकों का मंचन यहां होने लगा। इस दौर में मंचन होने वाले नाटकों में सती सुलोचना, भक्त प्रहलाद, वीर अभिमन्यु, सत्यवादी हरिशचन्द्र, उषा अनिरूद्ध, मोरध्वज, दानवीर कर्ण आदि।
लेख:
प्रो. अश्विनी केशरवानी
डागा कालोनी, चांपा (छ.ग.)
गणपति उत्सव दर्पण के रचनाकार मेदिनी प्रसाद पाण्डेय
September 25, 2026
रायगढ़ रियासत के राजा चक्रधरसिंह का कला के क्षेत्र में योगदान
September 15, 2026
रायगढ़ रियासत के दीवान और सुप्रसिद्ध साहित्यकार: डॉ.बल्देवप्रसाद मिश्र
September 07, 2026
छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण का लोक स्वरूप और रासलीला
September 04, 2026
लोकपर्व भोजली
August 29, 2026
रथयात्रा विशेष: भगवान जगन्नाथ का मूल स्थान "शिवरीनारायण"
July 15, 2026
वह धरती, जहाँ आज भी हैं श्री राम के पदचिह्न
April 17, 2026
धूलपंचमी को मेला के अवसर पर पीथमपुर के कालेश्वरनाथ
March 08, 2026
छत्तीसगढ़ में संक्रांति पूजा
January 14, 2026
18 दिसंबर को जयंती के अवसर पर गुरू घासीदास और सतनाम परम्परा
December 16, 2025
पंडित मालिकराम भोगहा का साहित्यिक अवदान
November 26, 2025
संगीत और नृत्य का संगम प्रो. कल्याणदास महंत
October 19, 2025
छत्तीसगढ़ में दशहरा की अद्भूत परम्परा
October 02, 2025
धर्म एवं आस्था का केन्द्र माँ बमलेश्वरी
September 27, 2025
ऐश्वर्य की महादेवी महानदी
July 04, 2025
शक्ति रुपेण संस्थिता : छत्तीसगढ़ की देवियां
April 12, 2024
धर्म एवं आस्था का केन्द्र माँ बमलेश्वरी
April 11, 2024
पीथमपुर धूल पंचमी मेले में शिव बारात
March 30, 2024
आध्यात्म और पर्यटन का संगम गिरौदपुरी का मेला
March 19, 2024
खेलत अवधपुरी में फाग, रघुवर जनक लली
March 15, 2024
छत्तीसगढ़ के बिखरे साहित्यकारों को समेटने वाले ठाकुर जगमोहन सिंह
March 11, 2024
लखनेश्वर दर्शन करि कंचन होत शरीर : शिवरात्रि विशेष
March 08, 2024
शिवरीनारायण का माघी मेला
February 22, 2024
राम से बड़ा राम का नाम
January 30, 2024
जहाँ श्रीराम जानकी मंदिर में रावण का पहरा है
January 20, 2024
मकर संक्रांति पर्व का महत्व एवं गंगा सागर स्नान दर्शन
January 14, 2024
छत्तीसगढ़ के गौरव पं. लोचन प्रसाद पाण्डेय
January 04, 2024
छत्तीसगढ़ के प्रकाशमान संत बाबा गुरु घासीदास
December 18, 2023
पंडित मालिकराम भोगहा का साहित्यिक अवदान
November 30, 2023
ऐश्वर्य की महादेवी महानदी
November 06, 2023
छत्तीसगढ़ का लोक उत्सव दशहरा
October 24, 2023
छत्तीसगढ़ के प्रमुख शक्ति स्थल
October 17, 2023
छत्तीसगढ़ में रामानंद सम्प्रदाय के मठ एवं महंत
October 09, 2023
प्रतिभाशाली मुकुट काव्य के मुकुट मनोहर
September 30, 2023
राजा चक्रधर सिंह और रायगढ़ का गणेशोत्सव
September 19, 2023
कुशल प्रशासक, शिक्षाशास्त्री और साहित्यकार बल्देवप्रसाद मिश्र
September 12, 2023
छत्तीसगढ़ी का व्याकरण रचने वाले काव्योपाध्याय हीरालाल
September 11, 2023
छत्तीसगढ़ में रासलीला और श्रीकृष्ण के लोक स्वरूप
September 07, 2023
लंका पर चढ़ाई करने के लिए श्री रामचंद्र जी ने इस दिन को चुना
August 30, 2023
महर महर करे भोजली के राउर : भोजली तिहार
August 30, 2023
स्वतंत्रता संग्राम के अमर सेनानी : छत्तीसगढ़
August 15, 2023
चित्रोत्पला गंगा की सांस्कृतिक विरासत
July 27, 2023
वर्षा ॠतु में छत्तीसगढ़ी लोक जीवन की उमंग
July 13, 2023
छत्तीसगढ़ की नाट्य परंपरा
May 25, 2023
नदियाँ और उनका सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व : संदर्भ छत्तीसगढ़
May 19, 2023
संघर्ष, साधना और विजय: निराला की कालजयी कृति ‘राम की शक्ति पूजा’
October 17, 2026
शारदीय नवरात्रि: छत्तीसगढ़ के सोनपैरी और लचकेरा ग्राम की लोकपरम्पराएँ
October 17, 2026
छत्तीसगढ़ में शाक्त परंपरा: वैदिक और लोक-आस्था का अद्भुत संगम
October 17, 2026
चौहान सम्राटों की इष्टदेवी: महाशक्ति चामुण्डा
October 16, 2026
जनजातीय युवती वल्ली और भगवान कार्तिकेय का विवाह
October 16, 2026
शत्रु पर विजय का वरदान प्राप्त होता है बगुलामुखी देवी मन्दिर
October 15, 2026
विज्ञान, मानवीय संवेदना एवं राष्ट्र के प्रेरणापुंज - डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
October 15, 2026
भील जनजाति की लोकआस्था में रायकुंडा की महिषासुरमर्दिनी
October 15, 2026
सप्तमातृका: छत्तीसगढ़ और बस्तर की शक्ति परम्परा
October 15, 2026
हाड़ौती अंचल के प्रमुख देवी मन्दिर
October 14, 2026
प्रतियोगी परीक्षा की विफलता से राष्ट्रपति पद तक: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी की जीवन यात्रा
October 14, 2026
डंगचघिन दाई : दारिका नटनी की समाधि से लोकदेवी तक
October 13, 2026
राजा विक्रमादित्य की आराध्या: हरसिद्धी देवी
October 12, 2026
शक्ति उपासना का पर्व नवरात्र
October 11, 2026
सर्वपितृ अमावस्या: तर्पण और श्राद्ध का महात्म्य
October 10, 2026
भारतीय डाक सेवा की ऐतिहासिक यात्रा
October 09, 2026
पितृपक्ष: लोकजीवन में पुरखों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व
October 09, 2026
भारतीय ज्ञान परम्परा में सामाजिक समरसता
October 08, 2026
बैगा समुदाय में बच्चों के खेल
October 07, 2026
सौम्यता: भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव
October 06, 2026
संघर्ष, साधना और विजय: निराला की कालजयी कृति ‘राम की शक्ति पूजा’
October 17, 2026
शारदीय नवरात्रि: छत्तीसगढ़ के सोनपैरी और लचकेरा ग्राम की लोकपरम्पराएँ
October 17, 2026
छत्तीसगढ़ में शाक्त परंपरा: वैदिक और लोक-आस्था का अद्भुत संगम
October 17, 2026
चौहान सम्राटों की इष्टदेवी: महाशक्ति चामुण्डा
October 16, 2026
जनजातीय युवती वल्ली और भगवान कार्तिकेय का विवाह
October 16, 2026
शत्रु पर विजय का वरदान प्राप्त होता है बगुलामुखी देवी मन्दिर
October 15, 2026
विज्ञान, मानवीय संवेदना एवं राष्ट्र के प्रेरणापुंज - डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम
October 15, 2026
भील जनजाति की लोकआस्था में रायकुंडा की महिषासुरमर्दिनी
October 15, 2026
सप्तमातृका: छत्तीसगढ़ और बस्तर की शक्ति परम्परा
October 15, 2026
हाड़ौती अंचल के प्रमुख देवी मन्दिर
October 14, 2026
प्रतियोगी परीक्षा की विफलता से राष्ट्रपति पद तक: डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जी की जीवन यात्रा
October 14, 2026
डंगचघिन दाई : दारिका नटनी की समाधि से लोकदेवी तक
October 13, 2026
राजा विक्रमादित्य की आराध्या: हरसिद्धी देवी
October 12, 2026
शक्ति उपासना का पर्व नवरात्र
October 11, 2026
सर्वपितृ अमावस्या: तर्पण और श्राद्ध का महात्म्य
October 10, 2026
भारतीय डाक सेवा की ऐतिहासिक यात्रा
October 09, 2026
पितृपक्ष: लोकजीवन में पुरखों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता का पर्व
October 09, 2026
भारतीय ज्ञान परम्परा में सामाजिक समरसता
October 08, 2026
बैगा समुदाय में बच्चों के खेल
October 07, 2026
सौम्यता: भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव
October 06, 2026
This is the commets tab content.
This is the Tags tab content.
Note * Your email address will not be published. Required fields are marked
शक्ति उपासना का पर्व नवरात्र
October 11, 2026