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पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

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छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण का लोक स्वरूप और रासलीला

छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण का लोक स्वरूप और रासलीला


एक समय था जब नाट्य साहित्य मुख्यतः अभिनय के लिए लिखा जाता था। कालिदास, भवभूति और शुद्रक आदि अनेक नाटककारों की सारी रचनाएं अभिनय सुलभ है। नाटक की सार्थकता उसकी अभिनेयता में है अन्यथा वह साहित्य की एक विशिष्ट लेखन शैली बनकर रह जाती। नाटक वास्तव में लेखक, अभिनेता और दर्शकों की सम्मिलित सृष्टि है। यही कारण है कि नाटक लेखकों के कंधों पर विशेष उत्तरदायित्व होता है।

रंगमंच के तंत्र का ज्ञान पात्रों की सजीवता, घटनाओं का औत्सुक्य और आकर्षण तथा स्वाभाविक कथोपकथन नाटक के प्राण हैं। इन सबको ध्यान में रखकर नाटक यदि नहीं लिखा गया है तो वह केवल साहित्यिक पाठ्य सामग्री रह जाती है। भारतीय हिन्दी भाषी समाज में रामलीला और नौटंकी का प्रसार था। कभी कभी रास मंडली भी आया करती थी जो अष्ठछाप के काव्य साहित्य के आधार पर राधा कृष्ण के नृत्यों से परिपूर्ण संगीत प्रधान कथानक प्रस्तुत करती थी। रामलीला और रासलीला को लोग धार्मिक भावनाओं से देखते थे। गांवों में जो नौटंकी हुआ करती थी उसका प्रधान विषय वीरगाथा अथवा उस प्रदेशिक भाग में प्रचलित कोई प्रेम गाथा हुआ करती थी। ग्रामीणजन का मनोरंजन करने में इनका बहुत बड़ा हाथ होता था। पंडित हीराराम त्रिपाठी के पद्य रासलीला में अधिकतर गाए जाते थे। देखिए उनके इस गीत में गोपियों का कृष्णचंन्द्र पर प्रेम की एक बानगी:-

            चल वृन्दावन घनस्याम दृष्टि तबै आवै।
            होगा पूरन काम जन्म फल पावै।।
            द्रुम लता गुल्म तरू वृक्ष पत्र दल दल में।
            जित देखे तित श्याम दिखत पल-पल में।।
            घर नेह सदा सुख गेह देखु जल थल में।
            पावेगा प्रगट प्रभाव हिये  निरमल में ।।
            तब पड़े सलोने स्याम मधुर रस गावै। 1।।
            तट जमुना तरू वट मूल लसै घनस्यामैं।
            तिरछी चितवन है चारू नैन अभिरामैं।।
            कटि कसै कांछनी चीर हीर मनि तामैं।
            मकराकृत कुण्डल लोल अमोल ललामैं।।
            मन स्वच्छ होय दृग कोर ओर दरसावै।। 2।।


 मुगलों के आक्रमण के पूर्व भारत के सभी भागों में खासकर राज प्रसादों और मंदिरों में संस्कृत और पाली प्राकृत नाटकों के लेखन और मंथन की परंपरा रही है लेकिन उनका संबंध अभिजात्य वर्ग तक ही सीमित था। ग्रामीणजन के बीच परंपरागत लोकनाट्य ही प्रचलित थे। मुगलों के आक्रमण से भारतीय परंपराएं छिन्न भिन्न हो गयी और यहां के प्रेक्षागृह भग्न हो गये। तब नाटकों ने दरबारों में भाण और प्रहसन का रूप ले लिया। लेकिन लोकनाट्य की परंपरा आज भी जीवित है...चाहे ढोलामारू, चंदापन या लोरिकियन रूप में हो, आज भी प्रचलित है। आज हमारे बीच जो लोकनाट्य प्रचलित है उसका समुचित विकास मध्य युग के धार्मिक आंदोलन की छत्रछाया में हुआ। यही युग की सांस्कृतिक चेतना का वाहक बना। आचार्य रामचंद्र ने राम कथा को और आचार्य बल्लभाचार्य ने कृष्ण लीला को प्रोत्साहित किया। इनके शिष्यों में सूर और तुलसी ने क्रमशः रासलीला और रामलीला को विकसित किया। इसी समय बंगाल में महाप्रभु चैतन्य ने जात्रा के माध्यम से कृष्ण भक्ति का प्रचार किया। पं. हीराराम के गीत गाये प्रचलित थे:-

         कृष्ण कृपा नहिं जापर होई दुई लोक सुख ताहिं न होई।
        देव नदी तट प्यास मरै सो अमृत असन विष सम पलटोई।।
        धनद होहि पै न पावै कौड़ी कल्पद्रुम तर छुधित सो होई।
        तको चन्द्र किरन अगनी सम रवि-कर ताको ठंड करोई।।
        द्विज हीरा हरि चरण शरण रहु तोकू त्रास देइ नहिं कोई।।

रायगढ़ के राजा भूपदेवसिंह के शासनकाल में नगर दरोगा ठाकुर रामचरण सिंह जात्रा से प्रभावित रास के निष्णात कलाकार थे। उन्होंने इस क्षेत्र में रामलीला और रासलीला के विकास के लिए अविस्मरणीय प्रयास किया। गौद, मल्दा, नरियरा और अकलतरा रासलीला के लिए और शिवरीनारायण, किकिरदा, रतनपुर, सारंगढ़ और कवर्धा रामलीला के लिए प्रसिद्ध थे। नरियरा के रासलीला को इतनी प्रसिद्धि मिली कि उसे ‘छत्तीसगढ़ का वृंदावन‘ कहा जाने लगा। ठाकुर छेदीलाल बैरिस्टर, उनके बहनोई कोसिरसिंह और भांजा विश्वेश्वर सिंह ने नरियरा और अकलतरा के रासलीला और रामलीला के लिए अथक प्रयास किया। उस काल में जांजगीर क्षेत्रान्तर्गत अनेक गम्मतहार सुरमिनदास, धरमलाल, लक्ष्मणदास चिकरहा को नाचा पार्टी में रास का यथेष्ट प्रभाव देखने को मिलता था। उस समय दादूसिंह गौद और ननका रहस मंडली, रानीगांव रासलीला के लिए प्रसिद्ध था। वे पं. हीराराम त्रिपाठी के श्री कृष्णचंद्र का पचरंग श्रृंगार गीत गाते थे:- 

               पांच रंग पर मान कसें घनश्याम लाल यसुदा के।
                वाके वह सींगार बीच सब रंग भरा बसुधा के।।
                है   लाल  रंग  सिर   पेंच   पाव   सोहै,
                अँखियों में लाल ज्योैं कंज निरखि द्रिग मोहे।
                है लाल हृदै उर माल कसे जरदा के ।।1।।

बहुत कम लोगों को मालूम है कि शिवरीनारायण का अभिनय संसार केवल छत्तीसगढ़ में ही नहीं वरन् देश के कोने कोने में प्रसिद्ध था। हालांकि हर गांव में नाचा, गम्मत, रामलीला और रासलीला पार्टी होती थी लेकिन यहां की रामलीला और नाटक मंडली की बात ही कुछ और थी। ‘‘छत्तीसगढ़ गौरव‘‘ में पंडित शुकलाल पांडेय ने लिखा है:-

                हैं शिवलाल समान यहीं पर उत्तम  गायक।
                क्षिति गंधर्व सुरेश तुल्य रहते हैं वादक।
                विविध नृत्य में कुशल यहीं हैं माधव नर्तक।
                राममनोहर तुल्य यहीं हैं निपुण विदूषक।
                हैं गयाराम पांडेय से अभिनेता विश्रुत यहीं।
                भारत में तू छत्तीसगढ़ ! किसी प्रान्त से कम नहीं।।174।।

प्राचीन साहित्य में उल्लेख मिलता है कि पंडित मालिकराम भोगहा ने एक नाटक मंडली यहां बनायी थी। इस नाटक मंडली द्वारा अनेक धार्मिक और सामाजिक नाटकों का सफलता पूर्वक मंचन किया जाता था। भोगहा जी भी छत्तीसगढ़ के एक उत्कृष्ट नाटककार थे। उन्होंने अनेक नाटक लिखे जिसमें राम राज्य वियोग, प्रबोध चंद्रोदय और सती सुलोचना प्रमुख है। इन नाटकों का यहां सफलता पूर्वक मंचन भी किया गया था। भोगहा जी की एक मात्र प्रकाशित नाटक ‘‘राम राज्य वियोग‘‘ में उन्होंने लिखा है:- ‘‘यहां भी कई वर्ष नित्य हरि कीर्तन, नाटक और रासलीला देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। एक समय मेरे छोटे भाई श्रीनिवास ने ‘‘कंस वध उपाख्यान‘‘ का अभिनय दिखाकर सर्व सज्जनों को प्रसन्न किया। इस मंडली में हमारे मुकुटमणि श्रीमान् महंत गौतमदास जी भी सुशोभित थे। श्रीकृष्ण भगवान का अंतध्र्यान और गोपियों का प्रलापना, उनके हृदय में चित्र की भांति अंकित हो गया जिससे आपकी आनंद सरिता उमड़ी और प्रत्यंग को आप सोते में निमग्न कर अचल हो गये। अतएव नाटक कर्त्ता का उत्साह अकथनीय था और एक मुख्य कारण इसके निर्माण का हुआ।‘‘ 

छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण के लोक स्वरूप:- 
छत्तीसगढ़ में जन्माष्टमी में श्रीकृष्ण के लोक स्वरूप की कल्पना करके इसे ‘‘आठे कन्हैया‘‘ कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण के स्वरूप की कल्पना उसके लोक रक्षक के रूप में की गयी है। सभी जानते हैं कि उनका जन्म न केवल कंस की आततायी से मथुरा, गोकुल और वृंदावन वासियों को मुक्ति दिलाने के लिए हुआ था बल्कि पूरी सृष्टि को आसुरी वृत्ति से मुक्ति दिलाने के लिए हुआ था। साथ ही माता देवकी के गर्भ से जन्म लेने, माता यशोदा को बाललीला दिखाने, हस्तिनापुर के कौरव-पांडवों के युद्ध में लोकलीला उनका मुख्य उद्देश्य था। डाॅ. पीसीलाल यादव का मानना है कि जब लागों की आवाज कंस के सामंती व्यवस्था में कुचली जा रही थी तब लोक भावनाओं की रक्षा करने के लिए श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। आठे कन्हैया लोक संस्थापक श्रीकृष्ण के जनमोत्सव का केवल प्रतीक मात्र नहीं है, अपितु लोक समूह की शक्ति को प्रतिस्थापित करने का पर्व भी है। उन्होंने हठी इंद्र के मान मर्दन और लोकरक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत उठाया था। शायद इसी कारणलोक संगइक के रूप में श्रीकृष्ण जन जन में पूजनीय हैं। छत्तीसगढ़ के लोकजीवन में आठे कन्हैया के प्रति अगाध श्रद्धा है। इस दिन अधिकांश बड़े-बूढ़े और स्त्री-पुरूष उपवास करते हैं। इस दिन मालपुआ, खीर पूड़ी बनाकर भोग लगाया जाता है।
मटकी फोड़ और दहिकांदो:- 
‘गोविंदा आला ले..‘ गीतों के साथ जन्माष्टमी के दिन मटकी फोड़ और दही लूट प्रतियोगिता प्रायः सभी जगहों में होता है। लड़कों की टोली इस गीत को गाते, नाचते जगह जगह लटके दही और मक्खन के मटकी को फोटते हैं। अनेक जगह ‘मटकी फोड़‘ प्रतियोगिता आयोजित किया जाता है। विजयी टोली को मटकी फोड़ प्रतियोगिता समिति के द्वारा पुरस्कृत किया जाता है। पहले छत्तीसगढ़ में श्रीकृष्ण जन्म के साथ दही लूटकर नाचने की परंपरा थी जिसे दहिकांदो कहा जाता है। 
रायगढ़ में जन्माष्टमी उत्सव:- 
रायगढ़ जिला मुख्यालय में सेठ किरोड़ीमल के द्वारा स्थापित गौरीशंकर मंदिर स्थित है। यहां गौरी शंकर के अलावा राधाकृष्ण की संगमरमर की भव्य मूर्ति भी है। यहां प्रतिवर्ष जन्माष्टमी बड़े धूमधाम से मानाया जाता है। मंदिर परिसर में अनेक प्रकार की झंकियां लगाई जाती है जिसे देखने के लिए छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के हजारों लोग आते हैं। इस अवसर पर अनेक प्रकार के मनोरंजन के साधन, मीना बाजार, झूला और खरीदी के लिए दुकानें लगती है। मेला जैसा दृश्य होता है। पूरे प्रदेश में जन्माष्टमी का अनूठा आयोजन होता है।
नरियरा का राधाकृष्ण मंदिर छत्तीसगढ़ का वृंदावन:- 
जांजगीर-चांपा जिलान्तर्गत अकलतरा रेल्वे स्टेशन से मात्र 10 कि. मी. दूरी पर स्थित ग्राम नरियरा में लगभग 100 साल पुराना राधाकृष्ण मंदिर है। यहां सन 1925 में श्री प्यारेलाल सनाड्य ने रासलीला शुरू किया था जिसे नियमित, संगठित और व्यवस्थित किया ठाकुर कौशलसिंह ने। यहां प्रतिवर्ष माघ सुदि एकादशी से 15 दिन रासलीला होता था। जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग यहां आते थे। वृंदावन के रासलीला की अनुभूति लोगों को होती थी। कदाचित् इसी कारण नरियरा को छत्तीसगढ़ का वृंदावन कहा जाता है। कृष्ण भक्ति का अनूठा उदाहरण यहां देखने को मिलता है। तभी तो ‘छत्तीसगढ़ गौरव‘ में पंडित शुकलाल पाण्डेय गाते हैं:-

ब्रज की सी यदि रास देखना हो तो प्यारो !
ले नरियर नरियरा ग्राम को शीघ्र सिधारो ।
यदि लखना हो सुहृद ! आपको राघव लीला।
अकलतरा को चलो करो मतम न को ढीला ।
शिवरीनारायण जाइये लखना हो नाटक सुघर।
   बस यहीं कहीं मिल जायेंगे जग-नाटक के सूत्रधार।। 114।

संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन के सेवानिवृत्त उप संचालक श्री राहुल कुमार सिंह के अनुसार यहां के पंडित रामकृष्ण पाण्डेय के पास 60-70 साल पुराने हस्तलिखित स्क्रिप्ट में वंदना के बाद कृष्ण कथा के विभिन्न प्रसंगों को लीला शीर्षक दिया गया है जो मानचरित, वैद्य, गोरे ग्वाल, खंडिता मान, दान, जोगन, चीर हरन, होरी, राधाकृष्ण विवाह, यमलार्जुन, उराहनो, माखन चोरी, गोचारण, पूरनमासी, चन्द्रप्रस्ताव, गोवर्धन गोप, मालीन और प्रथम स्नेह लीला नाम  से है।

कृष्ण भक्ति से ओत प्रोत ग्राम नरियरा की प्रतिष्ठा छत्तीसगढ़ के वृन्दावन की रही है। यहां मंचित होने वाली लीला में गांव के गोकुलप्रसाद दुबे, राजाराम, कुंजराम के अलावा आसपास के अभिनेता होते थे जिनमें जनकराम सैदा, कपिल महराज अमोरा, रामबल्लभदास, प्रभुदयाल, मदनलाल, श्यामलाल चतुर्वेदी कोटमी और गउद वाले रासधारी दादूसिंह प्रमुख थे। संगीत पक्ष का दायित्व विशेसर सिंह पर होता था। इनके जन्मजात प्रतिभा में निखार तब आया जब वे नासिक में पंडित विष्णु दिगंबर पुलस्कर के भतीजे चिन्तामन राव और उत्तरप्रदेश के सेमरौता के उस्ताद मरौव्वत खान से प्रशिक्षित हुये। स्थानीय कलाकारों को भी तालीम के लिए वृन्दावन भेजे जाने की जानकारी मिलती है।

रासलीला में तबला वादक पंडित गोकुल प्रसाद दुबे, सारंगी वादक भारत प्रसाद, बाजा मास्टर पचकौड़ प्रसाद, तबला पर भानसिंह, इसराज पर अफरीद के पं. रामेश्वरधर दीवान और बांसुरी पर साहेबलाल, चिकारा पर भैंसतरा के रघुनंदनदास वैष्णव, जैजैपुर के महेन्द्रप्रताप सिंह पखावजी के साथ बेलारी के बसंतदास, कुथुर के शिवचरन, मेंहदी के काशीराम तथा कोसा के पुर्रूराम। इसप्रकार नरियरा में पूरे अंचल के कलाकारों और संगीतकारों का समागम रासलीला के अवसर पर होता था। यहां रासलीला प्रसिद्ध राधाकृष्ण मंदिर परिसर में होता था जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग यहां आते थे और गांव वाले उनका अतिथि सत्कार करने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। नरियरा की मंच परम्परा ने पचासादि के दशक में करवट ली और बल्लभसिंह इस दौर के अगुवा हुए। अब रासलीला के साथ धार्मिक और सामाजिक नाटकों का मंचन यहां होने लगा। इस दौर में मंचन होने वाले नाटकों में सती सुलोचना, भक्त प्रहलाद, वीर अभिमन्यु, सत्यवादी हरिशचन्द्र, उषा अनिरूद्ध, मोरध्वज, दानवीर कर्ण आदि।

लेख:
प्रो. अश्विनी केशरवानी
डागा कालोनी, चांपा (छ.ग.)

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