चंद्र कलाओं पर आधारित हिन्दू त्यौहार : छेरछेरा पुन्नी विशेष
April 28, 2025
संवत् 2083 विक्रमी | अश्विना शुक्ल सप्तमी | शनिवार
नक्षत्र: पूर्वाषाढ़ा | योग: अतिगंड | करण: गर
पर्व विशेष : | तदनुसार 17 अक्टूबर 2026

भगवान राम लोक के आदर्श हैं तथा लोक के कण-कण में समाहित हैं, उन्हें समाज के आदर्श पुरुष के रुप में जाना जाता है इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। उनके चरित्र में सामाजिक समरसता परिलक्षित होती है, वे समाज के प्रत्येक अंग को लेकर साथ चलते हैं तथा अपने सरल, सहज व्यावहार से विपत्तियों पर विजय पाते हैं।
सामाजिक समरसता अर्थात समस्त जाति, धर्म, वर्ग और समुदायों के व्यक्तियों के प्रति आदर, प्रेम एवं आत्मीयता की भावना के साथ उचित व्यवहार करना। समस्त मानव जाति के कल्याणार्थ ही भगवान विष्णु ने श्री राम के रूप में सामान्य मनुष्य की भांति लीलाएँ कर आदर्श प्रस्तुत किया। रामचरित मानस में तुलसी दास जी कहते हैं -
'राम भगत हित नर तनुधारी, सहि संकट किए साधु सुखारी।'
लोकनायक एवं मानव चेतना के आदि पुरुष श्रीराम मानवीय चरित्र का प्रेरणादायक प्रतीक हैं। श्रीराम जैसा एकमात्र विराट व्यक्तित्व ही है जिसकी छबि जनमानस में व्याप्त है। जो समस्त संसार के आदर्श हैं। राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित है। शास्त्रों में लिखा है-
'रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते।'अर्थात योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं, उसे राम कहते हैं।
तुलसीदास जी ने लिखा है -
अपतु अजामिल गजु गनिकाऊ, भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ।
कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई, रामु न सकहिं नाम गुन गाई।।
श्रीराम ने विश्व के कल्याण एवं आदर्श समाज की स्थापना हेतु समस्त आदर्शों एवं जीवनमूल्यों का निर्वहन लौकिक मर्यादाओं में रहकर ही किया। जो वर्तमान में भी प्रासंगिक हैं। श्रीराम सनातन संस्कृति की आत्मा और सामाजिक समरसता के प्रतिबिंब हैं। उन्हें समस्त विश्व आदर्श के रूप में देखता है। श्रीराम ने जीवन के विभिन्न आयामों जैसे पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक, आंतरिक और बाह्य सभी क्षेत्रों में सामाजिक समरसता का आदर्श प्रस्तुत किया है।
आदर्श पुत्र, भाई, मित्र, शिष्य, पति, आदर्श नायक और राजा के एकमात्र आदर्श राम ही हैं। मनुष्य को जीवन में सुख-दुःख, सम-विषम परिस्थितियों का सामना करना ही होता है परंतु इन परिस्थितियों में किस प्रकार सन्तुलित आचरण किया जाए यह श्रीराम से ही सीखा जा सकता है। दया, क्षमा, धैर्य, त्याग, परोपकार, सहयोग इत्यादि मानवीय गुणों को आत्मसात करना राम के जीवन आदर्शों से सीखा जा सकता है।
श्रीराम ने सकारात्मकता का संदेश दिया। सामाजिक समरसता के लिए मनुष्य को अपने कर्तव्यों का ज्ञान एवं सजगता होना
अतिआवश्यक है। जगत के आधार एवं लोक को शांति प्रदान करने वाले प्रभु ने जन्म के साथ ही माता से आज्ञा पालन का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। राम ने माता कौसल्या को अपने अद्भुत स्वरूप के दर्शन कराए एवं विविध चरित्र एवं बाल लीला करने की आज्ञा प्राप्त की।
''भए प्रकट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।"
"उपजा जब ग्याना प्रभु मुसुकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।"
"माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रुपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।
श्रीराम ने सन्तान धर्म का पालन करना सिखाया।
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा।
महामुनि विश्वामित्र ने ऋषि-मुनियों की मारीच और सुबाहु जैसे राक्षसों से रक्षा हेतु राजा दशरथ से राम-लक्ष्मण को वन ले जाने की मांग की ।
'जहँ जप जग्य जोग मुनि करहिं,अति मारीच सुबाहुहि डरहीं।'
"अति आदर दोउ तनय बोलाए।हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाए"
"सौंपे भूप रिषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस।
जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस ।।
पिता-माता एवं गुरु की आज्ञानुसार वे दोनों भाइयों ने गुरु के आसाथ वन को प्रस्थान किया। श्रीराम ने संसार के समक्ष आज्ञा पालन का सर्वश्रेष्ठ आदर्श प्रस्तुत किया।
मुनि विश्वामित्र की आज्ञा पाकर श्रीराम ने ताड़का वध एवं गौतम मुनि की स्त्री अहिल्या का उद्धार किया ।
"गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर।।"
जीवन में सफलता प्राप्त कर मनुष्य को गर्व ना करते हुए विन्रमता पूर्ण व्यवहार करना चाहिए। श्री राम इस संदर्भ में भी अनुकरणीय हैं। जनकपुरी में सीता स्वयंवर में श्रीराम ने शिव धनुष (पिनाक) को तोड़ने के पश्चात गर्व ना करते हुए महामुनि परशुराम के क्रोध का सामना विन्रमता से करते हुए मधुर वाणी से उनके क्रोध को शान्त किया।
"राम कहा मुनि कहहु बिचारी,
रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी।
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना,
मैं केहि हेतु करौं अभिमाना।"
श्री राम ने 14 वर्षों के वनवास की कठोर आज्ञा को बड़ी सहजता से स्वीकार कर कुल की मान-मर्यादा और वचन के महत्व को सम्पूर्ण समाज के समक्ष प्रस्तुत किया।
'रघुकुल रीति सदा चली आई ,प्राण जाइ अरु वचन न जाई।
राम को वनवास मिला था। उन्हें सारी सुख-सुविधाएं साथ ले जाने की कोई बाध्यता नहीं थी। परंतु उन्होंने वनवासी जीवन व्यतीत कर मनुष्य को समयानुसार सादा एवं सुविधाविहीन जीवन जीना भी सिखाया। राम ने अपने वनवास काल में समाज के उपेक्षित वर्ग केंवट अर्थात निषाद राज को गले लगाकर समाज में मनुष्य के महत्व को समझाया। सभी मानव एक हैं और सब में उस परमतत्व का वास है।
जिस समुदाय को समाज ने उपेक्षित कर सारी सुख -सुविधाओं से वंचित कर रखा था, उसके साथ मित्रता का भाव रखते हुए जातिभेद जैसी सामाजिक कुरीति को मिटाने का प्रयास किया। जो वर्तमान में भी अनुकरणीय है क्योंकि इन्ही संकीर्ण मानसिकता से जन-जन के मध्य वैमनस्य और विरोध की भावना पनपती है, जिससे समाज एवं राष्ट्र की हानि होती है। श्रीराम ने सामाजिक वैमनस्य ऊँच -नीच,जाति-पांति को दूर कर सामाजिक समरसता का आदर्श प्रस्तुत किया।
"यह तौ राम लाई उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा।
निषाद राज को श्रीराम का मित्र जानकर भरत ने हृदय से लगा लिया।
"लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।।
तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता।मिलत पुलक परिपूरित गाता।।
सीता जी द्वारा स्वर्णमृग को देखकर आकर्षित हो उसकी प्राप्ति की इच्छा करना भी मानव जाति को शिक्षा देना ही उद्देश्य था। भौतिक सुख-सुविधाएं मनुष्यों को आसक्त कर भगवत भक्ति के मार्ग से विचलित करती हैं। श्री राम ने शबरी जूठे बेर ग्रहण कर नवधा भक्ति का ज्ञान देकर उद्धार किया।
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।
जब शबरी ने कहा- "अधम जाति मैं जड़मति भारी" श्रीराम ने समरसता का संदेश देते हुए कहा
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।।
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं, सावधान सुनु धरु मन माहीं।।
श्री राम को समाज के निर्बल, दीन-हीन-पतितों, तिरस्कृत वर्ग के लोग विशेष प्रिय थे। उनके प्रति सहानुभूति एवं सम्मान का भाव रखते हुए उनका कल्याण किया। समस्त प्राणियों के प्रति दया एवं सहयोग का आदर्श प्रस्तुत किया। श्रीराम के कहा –
‘सब मम प्रिय मम उपजाए,
सबतें अधिक मनुज मोहि भाए।’
पुनि पुनि सत्य कहहुँ तोहि पाही,
मोहि सेवक सम प्रिय कोई नाहीं।
प्रभु श्री राम ने केंवट, कोल, किरात, भील के साथ-साथ वानर, भालू, पशु-पक्षियों को भी अपने वनवास काल में सहयोगी एवं सलाहकार बनाकर ही रावण से युद्ध किया। वे चाहते तो अयोध्या और जनकपुर से सहयोग ले सकते थे परंतु उन्होंने इन्ही उपेक्षित व निर्बल समझने जाने वाले समुदाय का सहयोग लेकर लंका विजय प्राप्त की और सामाजिक समरसता का सन्देश दिया कि धरती का प्रत्येक प्राणीजन का स्थान एवं भूमिका महत्वपूर्ण होती है। जीवन में सभी का सहयोग अपेक्षित है।
श्री राम सीता हरण के पश्चात सामान्य मनुष्य की भांति विलाप करते हुए वन्यजीवों से पता पूछने लगे-
हे खग मृग हे मधुकर श्रेणी, देखी तुम सीता मृग नयनी।
श्री राम ने सीख दी कि संकट के समय मनुष्य की मनोदशा विचलित हो सकती है परंतु लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर होते रहना चाहिए। सीता की खोज में वन में परमभक्त हनुमान से भेंट होना तथा बाली वध कर, सुग्रीव व अंगद को किष्किंधा का शासन सौंपना। हनुमान जी द्वारा अधर्म का प्रतीक लंका दहन तथा श्रीराम द्वारा रावण वध कर समस्त समाज को बताना कि जब आध्यात्मिक मूल्यों एवं सामाजिक व्यवस्था की हानि होती है तब इनकी रक्षा हेतु पद, कुल, समूह की चिंता किए बिना दण्डित किया जाना अतिआवश्यक है।
जब-जब होई धरम के हानि,
बाढहिं असुर अधम अभिमानी।
तब-तब प्रभु धरि विविध सरीरा,
हरहिं कृपानिधि सज्जन पीरा ।
वानर सेना द्वारा रामसेतु निर्माण और गिलहरी के सहयोग के प्रसंग से सभी परिचित हैं। श्रीराम का शक्तिशाली होते हुए भी समुद्र से मार्ग के लिए प्रार्थना करना उनके धैर्य, विनम्रता एवं सहनशीलता का परिचायक है परन्तु मार्ग नहीं मिलने पर उन्होंने शक्ति का अंतिम उपाय किया।
बिनय न मानत जलधि जड़, गए तीनि दिन बीति।
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होत न प्रीति ।।’
श्रीराम की नीति रही कि मनुष्य को सहनशील होना चाहिए परन्तु जब सहनशीलता को निर्बलता मानते हुए यदि कोई अधिकारों का हनन करता है या करने का प्रयास भी करता है तब इसी सिद्धांत का अनुकरण करते हुए अपनी शक्ति से अवश्य परिचित करा देना ही उचित है। सेतुबंध पश्चात श्रीराम का सुग्रीव की वानर सेना के नेतृत्व में लंका पर आक्रमण करना सहयोग के महत्व को दर्शाता है। बिना सहयोग एवं एकता जीवन में किसी भी प्रकार का युद्ध जीता नहीं जा सकता।
बाँधा सेतु नील नल नागर। राम कृपाँ जसु भयउ उजागर।।
बूड़हिं आनहिं बोरहिं जेई। भए उपल बोहित सम तेई।।
श्रीराम लोकप्रिय लोकनायक, महान्यायवादी थे। उन्होंने बाली वध के पश्चात सुग्रीव एवं अंगद को किष्किंधा का एवं रावण वध के पश्चात विभीषण को लंका का राज्याधिकारी बनाकर, दूसरों के धन-संपत्ति तथा राज्य के प्रति मोह नहीं रखना सिखाया। रावण वध से यह बताया कि यदि किसी देश का राजा आचरण से दुराचारी और अभिमानी होगा तो उसके कुल एवं राज्य दोनों का विनाश निश्चित है। जिस प्रकार रावण जैसे महाज्ञानी और शिवभक्त का हुआ।
वनवास के पश्चात अयोध्या के महाराजा श्री रामचन्द्र अपनी सम्पूर्ण जीवन यात्रा में सामाजिक समरसता का आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने व्यक्तिगत संबंधों को गौण रखते हुए प्रजा के प्रति विशेष ध्यान रखा। श्री राम का चरित्र विश्वबन्धुत्व परस्पर प्रेम का है। समस्त जगत को मात्र उपदेश से नहीं स्वयं अनुकरण करके मानव जीवन में होने वाली विभिन्न क्रियाओं एवं प्रतिक्रियाओं द्वारा मर्यादाओं में रहते हुए अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया और मर्यादा पुरूषोत्तम कहलाए।
प्रभु श्री राम का जीवन चरित्र सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण है और रामनाम का प्रताप मानव समाज में रचा बसा है। यहाँ कण -कण में और रोम-रोम में राम ही हैं। पथ प्रदर्शक राम ही हैं। राम के नाम से ही दिन का प्रारंभ होता है। अपने से बड़ों का अभिवादन करना हमारी संस्कृति और परंपरा का अभिन्न अंग है। ग्रामीण अथवा शहरी सभी क्षेत्रों में राम-राम के साथ ही अभिवादन किया जाता है। कार्य का शुभारंभ जय श्री राम के उदघोष के साथ ही होता है। जीवन की अंतिम यात्रा भी राम नाम सत्य है से पूर्ण होती है। राम शब्द का उल्टा उच्चारण भी उद्धार करता है। आदि कवि वाल्मीकि जी राम नाम के प्रताप को जानते हुए’ मरा-मरा’ कहते पावन हो गए।
‘जान आदिकबि नाम प्रतापु।भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।।
एक समय था जब विश्व के राजकुल श्रीराम को आदर्श मानकर राज करते थे तथा अपने नाम के साथ राम का नाम जोड़ते थे तथा जिससे वे प्रजा के बीच राम राज्य की स्थापना कर राम जैसे राज कर सकें। श्रीराम समरसता के सबसे बड़े प्रतीक हैं। श्री राम भारत के ही नहीं बल्कि समस्त विश्व के आदर्श हैं। श्री राम ने अपने जीवनकाल में जो मानवीय मूल्य अपनाए वे आज भी प्रासंगिक हैं।
सन्दर्भ
1-श्रीरामचरित मानस
2-punjabkesari.in
3-Prabhasakshi. com
4-Panchjanya. com
5-Amarujala. com
आलेख

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