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श्राद्ध और तर्पण: पितृ स्मरण की परम्परा

श्राद्ध और तर्पण: पितृ स्मरण की परम्परा


भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव कृतज्ञता है, जो मानव जीवन को पीढ़ियों के अखंड प्रवाह के रूप में देखती है। यहाँ वर्तमान, अतीत की नींव पर खड़ा होकर ही भविष्य की ओर अग्रसर होता है। इसी जीवन-दर्शन का आधारभूत पक्ष पितृ स्मरण है। मृत्यु केवल इस भौतिक देह का अंत है, चेतना का नहीं। सनातन परंपरा में श्राद्ध एवं तर्पण पूर्वजों की संचित ऊर्जा, संस्कारों और परिश्रम के प्रति वही पावन कृतज्ञता ज्ञापन है। श्री प्रतिभू बनर्जी जी का यह लेख स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर के गूढ़ रहस्यों को चर्चा करते हुए हमें भारतीय संस्कृति इस दर्शन पर प्रकाश डालता है। 

मानव के लिए मृत्यु एक अबूझ पहेली रही है। पाश्चात्य दर्शन एवं रिलीजनों के पास इसका सटीक उत्तर नहीं है कि मृत्यु के उपरांत क्या होता है। किन्तु हमारे सुविचारित दर्शन और तपोपूत आध्यात्मिक विचार हमें आत्मा के अजर-अमर होने और इसके मृत्यु पश्चात पुन: जन्म का विश्वास दिलाते हैं। वेदान्त मत इसकी पुष्टि करता है। श्रीमद भगवत गीता के अनुसार मृत्यु के समय मनुष्य जिस भाव का स्मरण करता हुआ स्थूल देह त्याग करता है, आगे उसी को प्राप्त होता है। अर्थात मृत्यु के समय मनुष्य के सारे संस्कार उसके मानसपटल पर आकर खड़े हो जाते हैं। उस संस्कार समूह में जिन संस्कारों की प्रबलता होती है, वे उसके सूक्ष्म शरीर को तदनुरूप आकार प्रदान करते हैं। (भगवत गीता/ अष्टम अध्याय)। 


गीता में आत्मा का विचार

प्रश्न उठता है कि यह स्थूल देह क्या है?
सनातन दर्शन ने तीन शरीर होने की बात कही है- स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर तथा कारण शरीर। यह जो हाथ, पैर, सिर, आँख, नाक कान आदि अंगों वाला अस्थि, रक्त, मांस से बना शरीर दिखता है, यह स्थूल शरीर है। जल, वायु, पावक (अग्नि), आकाश तथा पृथ्वी इन पाँच महाभूतों से बना स्थूल शरीर शुभ-अशुभ कर्मों से प्राप्त सुख-दु:खादि भोगों को भोगने का स्थान है। इसके कारण ही क्रियमाण कर्म संभव हैं। क्रियमाण कर्म वे कर्म हैं, जो मनुष्य वर्तमान में कर रहा है। ये कर्म वे संस्कार हैं जिनका शुभ-अशुभ फल या तो इसी जन्म में भोगा जाएगा या फिर अंत:करण में स्थित चित्त में संचित हो अगले जन्म के प्रारब्ध बनेंगे। इन प्रारब्धों के अनुरूप ही अगला जन्म होता है। मृत्यु होने पर इस स्थूल शरीर का नाश हो जाता है। 

स्थूल शरीर के पीछे हमारे अंत:करण की वृत्तियों (प्राण, बुद्धि, चित्त, अहंकार) और सूक्ष्म तन्मात्राओं (पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच ज्ञानेन्द्रियों) से बना सूक्ष्म शरीर है। यह सूक्ष्म शरीर पाँच कर्मेन्द्रियों, पाँच ज्ञानेन्द्रियों, पाँच प्राण, बुद्धि, चित्त तथा अहंकार से बना है। स्थूल शरीर के नाश (आम भाषा में मृत्यु) हो जाने के बाद भी इस सूक्ष्म शरीर का नाश नहीं होता।

यह सूक्ष्म शरीर ही पुनर्जन्म का कारण है, क्योंकि यह मन की वासनाओं और कामनाओं से बना है और स्थूल शरीर नष्ट हो जाने के बाद भी वासनाएँ और कामनाएँ नष्ट नहीं होती। हमारा सूक्ष्म शरीर इन्हें लेकर नष्ट होने वाले स्थूल शरीर से लेकर अगले स्थूल शरीर तक की यात्रा करता है। पुनर्जन्म पाये स्थूल शरीर में पिछले जन्मों की वासनाएँ सूक्ष्म शरीर के साथ आ पहुँचती हैं। जन्म-मरण-पुनर्जन्म-पुनर्मरण का यह चक्र चलता रहता है। इस प्रकार सूक्ष्म शरीर प्रारब्ध संस्कारों का वाहन है।


कर्म और पुनर्जन्म की अवधारणा

कारण शरीर हमारे संचित कर्मों का वाहन है। यह वह उच्चतम अंतर शरीर है, जो आत्मा को ढँकता है। इस शरीर का भी आरंभ तथा अंत हैं और इसीलिए यह अविनाशी आत्मा से भिन्न है। कारण शरीर के साथ हमारा सूक्ष्म शरीर ऊर्ध्वलोक गमन करता है। इसी को हम ‘जीव’ कहकर पुकारते हैं। अपवादों को छोड़ दिया जाए तो ठीक मृत्यु के बाद व्यक्ति नहीं जान पाता/ पाती कि उसका स्थूल शरीर अब नहीं रहा। स्थूल शरीर से मुक्त आत्मा तंद्रा अवस्था में अपने सम्पूर्ण जीवन के संस्कारों को सूक्ष्म शरीर के माध्यम से वहन कर मानस लोक या प्रेतलोक ले जाती है।

तर्पण और श्राद्ध के मंत्रों के माध्यम से उस तंद्राग्रस्त आत्मा को यह भान कराने का यत्न किया जाता है कि वह स्थूल शरीर से मुक्त हो चुकी है। एक तरह से निद्रा में लीन व्यक्ति को हौले से हिला कर जगाने का उपक्रम। निकट आत्मीयों (पुरुष या महिला) द्वारा की गई इस शुभ व कल्याणकारी चेष्टा का प्रभाव प्रेतात्मा तक पहुँच कर उन्हें देहभान से मुक्त होने में सहायता करती है, ताकि वे अपने कर्मानुसार अगले जन्म की ओर प्रस्थान कर सकें। 

पितृ ऋण से उन्मुक्त होने के लिए हर हिन्दू को विवाह कर संतान उत्पन्न कर वंश वृद्धि करना एवं अपने दिवंगत पूर्वजों का श्राद्ध करना शास्त्र निर्दिष्ट है। श्राद्ध पितरों के लिए श्रद्धा के साथ किया जाने वाला वो अनुष्ठान है जिसमें पिंडदान, हवन, भोजन कराना और दान देना जैसे कर्मकाण्ड किए जाते हैं। यह हजारों वर्ष पुरानी परंपरा है, जिसे आज भी उसी श्रद्धा से पालित किया जा रहा है। हम सभी जानते हैं कि त्रेतायुग में भगवान श्रीराम ने अपने पिता अयोध्या नरेश दशरथ की मृत्यु का समाचार पा नदी तट पर श्राद्ध कर्म किया था।


पिंडदान की परंपरा

तर्पण-श्राद्ध के बहाने पूर्व पुरुषों की स्मृति बनी रहती है। पिण्डदान द्वारा श्राद्ध कर्म एवं तिल युक्त जल द्वारा तर्पण करने की व्याख्या करते हुये रामकृष्ण मिशन रायपुर के ब्रह्मलीन स्वामी आत्मानन्द ने अपने ग्रंथ ‘गीततत्व चिंतन (भाग 1)’ में लिखा है- 

‘जब मनुष्य मर जाता है तो वह सूक्ष्म शरीर में विद्यमान रहता है। ऐसे सूक्ष्म शरीर पर हमारे विचारों का अधिक प्रभाव पड़ता है। पिण्ड-तर्पण आदि का तात्पर्य यह है कि हम दिवंगत आत्मा की तुष्टि के लिए मानो तीव्र कामना करते हैं। पिण्ड और जल केवल प्रतीक हैं। मृतात्मा इस पिण्ड और जल को ग्रहण नहीं करता। ये प्रतीक तो हमारी भावना को तीव्र बनाने में सहायक होता है। पिंडोदक दान में एक प्रथा और है – सच्चरित्र ब्राह्मणों को भोजन से तृप्त करना। मृतात्मा सूक्ष्म शरीर में रहने के कारण स्थूल भोजनादि ग्रहण नहीं कर सकता, वह किसी स्थूल शरीर के माध्यम से परितृप्त होना चाहता है। सच्चरित्र ब्राह्मण जब श्राद्ध भोज में आते हैं तो वे अपने भीतर उन पितरों का आवेश मानकर आते हैं, जिनका श्राद्ध किया जा रहा है।’

श्राद्ध विशेष अवसरों पर किए जाने वाला अनुष्ठान है, जबकि शास्त्रों में प्रतिदिन तर्पण करने का विधान है। शुक्ल यजुर्वेद- वाजसनेयी संहिता में कहा गया है, ‘एक जीव (ध्यान दें, जीव से तात्पर्य केवल ब्राह्मण या सवर्ण नहीं है, बल्कि इससे सभी चार वर्णों का बोध होता है) के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने पितरों का पूजन करे, क्योंकि उनके आशीर्वाद से ही जीव नि:श्रेयस (अर्थात मोक्ष) को प्राप्त कर सकता है। उनके आशीर्वाद के बिना इस जीवन में ऋद्धि, सिद्धि एवं श्रेष्ठता की प्राप्ति नहीं हो सकती।’   


शुक्ल यजुर्वेद संहिता 

नित्य तर्पण करना पितृयज्ञ का अनिवार्य अंश है। मनुस्मृति में ‘पितृयज्ञस्तु तर्पणम्’ कहते हुये इसे पितृयज्ञ ही कह दिया। तर्पण नित्य किए जाने वाले कर्म का भाग है, जिसमें एक हिन्दू अपने पूर्व पुरुषों अर्थात पितरों को जल, तिल और कुश से मंत्रों के द्वारा तृप्त करता है। यदि तर्पण करना प्रतिदिन संभव न हो, तो भीष्माष्टमी में एवं श्राद्ध पक्ष में तिल-जल से तर्पण अवश्य करना चाहिए। पितृ तर्पण करना वाला व्यक्ति जब श्रद्धा पूर्वक तिल-जल अंजुरी में ले ‘त्रिप्यतामेतत सलिलोदकं तस्मै (पुरुष पितर के लिए)/ तस्यै (स्त्री पितर के लिए) स्वधा’ कह पितर को स्मरण कर अंजलि देता है तो निश्चित रूप से उसकी भावना सूक्ष्म शरीर धारी पितर तक पहुँचती है। इतना ही नहीं, तर्पण करते हुए गोत्र और वर्ण के संकुचित दायरे ऊपर उठ प्राचीन ऋषियों, नाग आदि सर्पों, पशुओं, पक्षियों, सूक्ष्म जीवों, संतानहीन लोगों, सप्तदीप निवासियों अतीत कुल कोटि नामधारी पितरों के कल्याणार्थ तिल-जलांजलि दी जाती है।

पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण की यह परंपरा हमारी भारतीय संस्कृति की अनमोल विरासत है। भले ही हमारे पूर्वज इस संसार से विदा हो गए हो, पर उनके प्रति कृतज्ञता होने का भाव कभी नहीं छूटता। जब हम तर्पण के माध्यम से अपने कुल के साथ-साथ पूरी प्रकृति और अज्ञात जीवों के कल्याण की कामना करते हैं, तो सर्वे भवन्तु सुखिनः का भाव मानस में चरितार्थ होता नजर आता है। कृतज्ञता का यही सांस्कृतिक बोध हमें एक संवेदनशील और प्रबुद्ध समाज बनाता है, जिसे अगली पीढ़ी तक अक्षुण्ण पहुँचाना हमारा पावन कर्तव्य है।


लेख-
प्रतिभू बनर्जी, रायपुर,छत्तीसगढ़

(लेखक  सेवानिवृत्त  मुख्य  बैंक  प्रबंधक,  'राजभाषा गौरव'  से  सम्मानित  प्रतिष्ठित  हिंदी  साहित्यकार  और  एक  समर्पित  समाजसेवी  हैं।)

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