आज का पंचांग

संवत् 2082 विक्रमी | चैत्र कृष्ण अष्टमी | बुधवार

नक्षत्र: ज्येष्ठा | योग: वज्र | करण: बालव

पर्व विशेष : | तदनुसार 11 मार्च 2026

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ओ इतिहास की कथाओं ! वाचालता बंद करो

ओ इतिहास की कथाओं ! वाचालता बंद करो


सम्पादकीय टिप्पणी

संसार के हर देश में महापुरुषों का जन्म होता है; लेकिन हर देश अपने महापुरुषों को आदर नहीं दे पाता। भारत देश एक अपवाद है, जिसकी जनता ने अपने महापुरुषों की भरपूर पूजा की है। लेकिन भारत की जनता की इस प्रवृत्ति के लिए भी एक महापुरुष अपवाद है, जिसे पहचानने में ही उसे पूरे 300 वर्ष लग गये। वे हैं - छत्रपति शिवाजी।

यह अवश्य है कि वीरपुरुषों की गणना करते समय महाराणा प्रताप के साथ-साथ शिवाजी का भी नाम आता है, लेकिन प्रायः महाराष्ट्र के एक राजा से अधिक मान्यता उन्हें नहीं दी गई। उन्हें 'पहाड़ी चूहा' और 'लुटेरा' तक इतिहास में कहा गया। ऐसी स्थिति में वे राष्ट्रपुरुष थे-यह तथ्य हृदयंगम हो पाने की गुंजायश ही नहीं थी।
पिछले कुछ वर्षों में तो महापुरुषों का जिस तरह बँटवारा किया जाता हमने देखा है, वह तो और चिन्तनीय है। इसने शिवाजी को मराठा राजा से भी और संकुचित स्थान दिया है। शिवाजी महाराज को केवल OBC का महापुरुष बताकर समाज में उनकी विरासत पर अधिकार को लेकर जो संघर्ष मचाया गया है, वह भारत के लिए दुःखद होना चाहिए।

महापुरुषों के नाम पर अपनी विभाजनकारी राजनीति की रोटियाँ सेंक रहे विखण्डनकारी लोगों ने भारत औ उसके राष्ट्रीय गौरव को ऊँचा करने वाले महापुरुषों के साथ भारी अन्याय किया है।परन्तु असत्य तो असत्य है। हजारो वर्षों की वैचारिक खाद भी उसकी सत्ता स्थापित नहीं कर सकती। ऐसे ही भारत की राष्ट्रीयता और उसके पुजारी महापुरुषों को लेकर जो भ्रम फैलाए गए हैं, वे भी सदा-सदा के लिए समाज को दिग्भ्रमित नहीं कर सकेंगे। समाज में से ही निकलने वाले सत्यान्वेषियों द्वारा झूठ की ये कारा नष्ट की जाएगी।

ऐसा विश्वास व्यक्त करने के पीछे अतीत के ही उदाहरण हमारे पास है। गुलामी के काल में राष्ट्रीयता की भावना को नाश करने और पराजय की मानसिकता को पुष्ट करने के लिए परकीयों ने शिवाजी के प्रति जो अनर्गल मिथ्यावाद किए, उन्हें चुनौती देते हुए गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का यह लेख आज की विभाजनकारी राजनीति के युग में भी अत्यन्त प्रासंगिक है, जो यह बताता है कि महापुरुषों को क्षेत्रीयता, जातीयता, मतान्धता आदि से बाँटने के सारे प्रयत्न अन्ततः निष्फल ही होंगे। क्योंकि 'सत्यमेव जयते नानृतम्।'

तो आइये महान् भारतीय साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की 396वीं जयन्ती पर राष्ट्रीयता के अनन्य प्रवक्ता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की शिवाजी को यह भावप्रवण श्रद्धांजलि पढ़ें!


 
ओ इतिहास की कथाओं !
वाचालता बंद करो
 
- रवीन्द्रनाथ टैगोर
 

सुदूर किसी एक शताब्दी के एक अप्रसिद्ध दिन में, जो अज्ञात है, महाराष्ट्र के किसी एक बन-पर्वत पर अन्धकार में बैठ कर हे राजा शिवाजी, तुम्हारे तेजोज्ज्वल भाल में विद्युत् तरंग के समान यह भाव उत्पन्न हुआ था 'खण्डित-अव्यवस्थित भारत को मैं एक धर्मराज्य से सूत्र में आबद्ध करूंगा।'
उस दिन बंगदेश स्वप्नावस्था से चकित हो जागा नहीं। यह समाचार उसे नहीं मिला, छूटकर बाहर नहीं आया। उसके प्राङ्गणमें शुभ शंखध्वनि नहीं हुई। अपनी कोमल निर्मल श्यामल चादर बिछाकर तन्द्रातुर संध्या के समय सैकड़ों ग्रामवासियों को छाती से लगाकर वह शान्तिपूर्वक सो रहा था ।

हिन्दवी स्वराज्य के स्वप्नद्रष्टा- शिवाजी महाराज
हिन्दवी स्वराज्य के स्वप्नद्रष्टा- शिवाजी महाराज 

तदुपरान्त एक दिन महाराष्ट्र प्रदेश से तुम्हारी वज्रशिखा ने दशोदिशाओंमें युगान्तरकारी विद्युत्वह्नि से महामंत्र लेख रच दिया। उस प्रलय संध्या में मुगलों का मुकुट-युक्त सिर पीले पत्ते की तरह कांपने लगा । महाराष्ट्र के उस वज्रनिर्घोष में क्या समाचार था, उस दिन भी बंग ने सुना नहीं।

तत्पश्चात् दिल्ली का राजप्रासाद उस झंझायुक्त गहन रात्रि में खाली हो गया और समस्त दीपमालिका धीरे-धीरे एक- एक कर अन्धकार में विलीन हो गयी । मुगलों की महिमा शव-लुब्ध गृद्धों के तीव्र और वीभत्स चीत्कार के साथ श्मशान- शैय्या में परिणत होने लगी । उनकी साम्राज्य-सीमा मुट्ठी भर राख मात्र रह गई।

उसी दिन इस बंग प्रदेश में बाजार के एक किनारे पदध्वनि किये बिना सुरंग के अंधेरे में व्यवसायी अंग्रेज राजसिंहासन ले आया । बंग ने गंगाजल से चुपचाप उसका अभिषेक कर दिया। रात्रि के अवसान पर व्यवसायी का मापदण्ड राजदण्ड के रूप में दिखने लगा ।

हे वीर मराठा ! हे भावुक ! उस दिन तुम कहां थे? तुम्हारा नाम कहां था? तुम्हारी वह गैरिक-ध्वजा कहां धूल में लोट रही थी? यह छोटी-सी बात है कि विदेशियों ने इतिहास में तुम्हें डाकू कहकर परिहास किया है। अट्टहास कर तुम्हारे पुण्य प्रयासों को लुटेरे के अव्यर्थ प्रयास की संज्ञा दी और सभी लोगों को भी यही समझाया गया।

ओ इतिहास की कथाओं! अपनी वाचालता बन्द करो। ओ मिथ्यामयी! तुम्हारे लिखे पर आज विधाता का लिखा हुआ ही जीतेगा। जो अमर है, उसे तुम्हारी व्यंग्यवाणी कैसे दबाकर मारेगी? जो तपस्या सत्य है उसे कोई त्रिकाल में भी बाधा नहीं दे सकता यह निश्चित है।

हे वीर राजतपस्वी ! तुम्हारी उदारभावना विधि के भण्डार में संचित हो गयी है। उसका एक भी कण खाने में क्या काल समर्थ है? हे सत्यसाधन! कौन जान पाया कि स्वदेश-लक्ष्मी के देवालय में तुम्हारा प्राणोत्सर्ग चिरयुगान्तर के लिए भारत की सम्पत्ति हो गया !

हे राजवैरागी! तुम दीर्घकाल तक गिरिकन्दराओं में अज्ञात, अप्रसिद्ध रहे। जिस प्रकार वर्षाकाल का निर्झर पूरी शक्ति लगाकर पर्वत को विदीर्णकर प्रकट होता है उसी प्रकार तुम भी प्रकट हुए। सम्पूर्ण विश्व विस्मय से विचार करने लगा कि जिसकी ध्वजा सम्पूर्ण आकाश आच्छादित कर देती है वह लघु होकर इतने दिन तक कहां छिपा था?

इसी प्रकार मैं पूर्व भारत का कवि चिन्ता करता हूं, यह देखकर आश्चर्यचकित होता हूं कि बंग के आंगनद्वार में किस प्रकार, कहां से तुम्हारी जयभेरी बज उठी! तीन सौ वर्षों के प्रगाढ़ अंधकार को चीरकर तुम्हारी कीर्ति इस प्राचीदिशा में आज नवीन किरणें प्रसारित कर पुनः उदीयमान हो रही है।

गुरुदेव - रविन्द्रनाथ टैगोर
गुरुदेव - रविन्द्रनाथ टैगोर

जो सत्य है वह सैकड़ों शताब्दी के विस्मरण से भी नहीं मरता। उपेक्षा से भी नहीं मरता, अपमान से भी वह अस्थिर नहीं होता, आघातों में भी अटल रहता है, जिसके विषय में सभी सोचते थे कि कर्म की सीमाओं में कभी का समाप्त हो गया, वही सत्य आज भारत के द्वार पर पूज्य अतिथि का वेश धरकर आया है ।

आज भी उसका वही मन्त्र - उसके वही उदार नयन, भविष्य की ओर टकटकी लगाये देख रहे हैं - कौन जानता है वे वहां कौन-सा महान् दृश्य देख रहे हैं। हे निराकार तपस्वी! आज केवल अपनी तपोमूर्ति लेकर आए हो - फिर भी अपनी पुरातन उस शक्ति को लेकर आये हो - यह तो तुम्हारा ही कार्य है।

आज तुम्हारा सैन्य, अश्वसेना, प्रखर अस्त्र और वह ध्वज नहीं है और न आकाशभेदी 'हर-हर महादेव' ध्वनि ही है। केवल तुम्हारा नाम पितृलोक से उतर कर आह्वान करता है। हे स्वामी! आज बंगाली के मन ने ब्राह्म मुहूर्त में ही तुम्हें अपने हृदयासन पर विराजित किया है।

तीन शताब्दियों से किसी ने भी इस बात का विचार नहीं किया, स्वप्न में भी चिन्ता नहीं की थी कि तुम्हारा श्रेष्ठ नाम बंग और महाराष्ट्र को बिना युद्ध के एक कर देगा, तुम्हारी तपस्या का तेज जो बहुत दिनों से अन्तर्धान था, आज अकस्मात् वाणीरूप में नवचैतन्य और नवप्रभात ला देगा ।

 मराठा साम्राज्य का मानचित्र
मराठा साम्राज्य का मानचित्र

हे धर्मराज ! एक दिन जब महाराष्ट्र प्रान्त से तुमने आह्वान किया था - उस भैरव-स्वर से भी हमने तुम्हें राजा जाना नहीं, राजा माना नहीं, इस पर हम लज्जित भी नहीं हुए। तुम्हारे कृपाण की उज्ज्वलता एक दिन जब बंगाकाश में चमकी थी, घोर विपत्ति के दिनों में भी उस ताण्डव लीला को हम समझ नहीं सके किन्तु हम छिप गये ।

हे अमर मूर्ति ! तुम आज मृत्यु सिंहासन पर बैठे हो, तुम्हारे सम्मुन्नत भाल पर जो राज-मुकुट शोभित है उसकी दिव्य ज्योति कभी किसी भी काल में छिपेगी नहीं। हे राजन् ! हमने तुम्हे आज पहचान है, पहिचाना है, पहिचाना है कि तुम महाराज हो, तुम्हारे लिए राजसम्मान (भेंट) लेकर आठकोटि बंगनन्दन आज खड़े होंगे।

उस दिन तुम्हारी बात तक नहीं सुनी थी किन्तु आज हम सभी तुम्हारी आज्ञा सिर झुकाकर स्वीकार करेंगे। तुम्हारे ध्यान-मन्त्र में सारा देश भारत कंठ-से-कंठ तथा हृदय-से हृदय लगाकर संगठित हो जायेगा। वैरागी का (समर्थ रामदास का) उत्तरीय जो दरिद्र का बल है, हम ध्वजा बनाकर फहरायेंगे। हमारा पाथेय होगा- 'भारत एक धर्मराज्य होगा' आपका यह महत् वचन।

शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु - समर्थ स्वामी रामदास
शिवाजी के आध्यात्मिक गुरु - समर्थ स्वामी रामदास

मराठों के साथ आज हे बंगाली! एक स्वर से बोलो 'जयतु शिवाजी'। मराठों साथ आज हे बंगाली! महोत्सव मनाकर एक साथ चलो। आओ शिवाजी के पुण्य नाम को, भारत के पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण सभी को एक स्थान में एकत्रकर एक साथ महिमा से गौरवान्वित करें।

-गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, 1902,
बांग्ला साहित्यिक पत्रिका 'बंगदर्शन'

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