चंद्र कलाओं पर आधारित हिन्दू त्यौहार : छेरछेरा पुन्नी विशेष
April 28, 2025
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

छत्तीसगढ़ वैदिक और पौराणिक काल से ही विभिन्न संस्कृतियों का विकास केंद्र रहा है। यहां प्राप्त मंदिरों, देवालयों और उनके भग्नावशेषों से ज्ञात होता है कि यहां वैष्णव, शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन धर्म एवं संस्कृतियों का प्रभाव रहा है।
शैवधर्म का छत्तीसगढ़ में व्यापक प्रभाव परिलक्षित होता है। जिसका प्रमाण विभिन्न शासकों के शासनकाल के सिक्कों, अभिलेखों एवं देवालयों से प्राप्त होता है। छत्तीसगढ़ अंचल में शिव के विभिन्न रूपों का शिल्पांकन प्राप्त होता है। जो शैवधर्म के प्रचार प्रसार का प्रमाण हैं।

भारत के धार्मिक सम्प्रदायों में शैवमत प्रमुख है। शिव ही इनके आराध्य देव हैं। शिव अर्थात शुभ, कल्याण, मंगल, श्रेयस्कर आदि। ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन तीन देवताओं में शिव विद्यमान हैं। इनका कार्य संहार करना है इस कारण इन्हें विनाश का देवता माना जाता है।
शैवमत का मूलरूप ऋग्वेद में रुद्र की कल्पना में मिलता है। अथर्ववेद में शिव को भव, शर्व, पशुपति और भूपति कहा गया है। जनमानस में शिव कल्याणकारी एवं सौम्य रूप में ही प्रतिष्ठित एवं पूज्य हैं।

भारतीय संदर्भ में पुरातात्त्विक स्रोतों में शैव धर्म से संबंधित उपासना का सर्वप्रथम संकेत लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व हड़प्पा सभ्यता के उत्खनन से प्राप्त पुरावशेषों द्वारा होता है। शैव धर्म से संबंधित पर्याप्त मात्रा में मिले हुए लिंगाकार पाषाण प्राप्त हुए है, जिनका संबंध लिंग पूजा से किया गया है।
इसी तरह एक मुहर पर बनी हुई त्रिसिर मानव की आसनस्थ मूर्ति, जिसके मस्तक पर सिंगदार मुकुट बना है, बनर्जी ने उसे कुर्मासान मुद्रा में बैठे हुए बताया है। इस मानव के चारों ओर वृषभ, गैण्डा, हाथी, बाघ, हिरन तथा एक मनुष्य खड़ा है। मार्शल महोदय ने इसे शिव पशुपति का प्रारंभिक रूप माना है।

छत्तीसगढ़ की वर्तमान भौगौलिक सीमा सरगुजा से लेकर बस्तर तक शिवोपासना के प्राचीन अवशेष प्राप्त होते हैं। सरगुजा संभाग के पुरातात्विक स्थल डीपाडीह से लेकर बस्तर के बारसूर तक शिवालयों की एक लम्बी श्रृंखला दिखाई देती है। सिरपुर के पाण्डुवंशी शासक पूर्व में वैष्णव थे, फ़िर महाशिवगुप्त बालार्जुन ने परम महेश्वर की उपाधि धारण की, पूर्व के राजा परम भागवत उपाधि धारण करते थे।
छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक समय तक कल्चुरि राजवंश ने शासन किया। इस काल मे शैवधर्म को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। वे शिव भक्त थे। अनुमानित तथ्यों के अनुसार कल्चुरि शासकों ने अपने इष्ट देव शिव के लिए कई शिवालयों का निर्माण कराया। इन्होंने शिव के चंद्रशेखर, उमामहेश्वर, नटराज, त्रिपुरांतक, नीलकंठ आदि रुपों का शिल्पांकन करवाया।

स्थानीय राजवंश के रूप मे छत्तीसगढ़ के दक्षिण भाग में नलवंश का उद्भव हुआ। इस राजवंश के बारे में जानकारी उनके द्वारा जारी किए गए अभिलेखों एवं मुद्राओं से प्राप्त होती है। छत्तीसगढ़ में सर्वप्रथम मुद्रा प्रचलित करने का श्रेय नलवंशीय शासकों को जाता है। नलवंशीय बस्तर के शासकों द्वारा सिक्कों पर नंदी का अंकन इस बात की ओर संकेत करता है कि वे भी शैवधर्म के अनुयायी थे।

छत्तीसगढ़ में प्राचीनकाल से लेकर अद्यतन शिवालयों का निर्माण होता आ रहा है। प्राचीन प्रमुख शिवालयों में डीपाडीह, हर्राटोला, देवगढ़, महेशपुर, पाली, रतनपुर, शिवरीनारायन, भोरमदेव, मल्हार, खरौद, पलारी, धमधा, सहसपुर नारायणपुर, सरगाँव, ताला, मदकू द्वीप, सिरपुर, आरंग, चंदखुरी, राजिम, फ़िंगेश्वर, पटेवा, बम्हनी, चम्पारण, कोपरा, टेंवारी, सोरिद, कर्णेश्वर महादेव नगरी, केशकाल, कोण्डागांव, गढ़ धनोरा, छिंदगाँव, गुमड़ापाल, बारसूर सहित अनेक स्थानों के शिवालय सम्मिलित हैं।

शिवालयों की व्यापकता से ज्ञात होता है कि छत्तीसगढ़ अंचल में शिवार्चना राजकुलों से लेकर जन जन तक व्यापक थी। यहाँ शिवलिंग के अतिरिक्त शिव पार्वती की संघाट प्रतिमाएँ अनेकों स्थानों से प्राप्त होती है। मदकू द्वीप से तो उत्खनन में स्मार्त लिंग प्राप्त हुए हैं। इससे प्रकट होता है कि छत्तीसगढ़ अंचल में शिवोपासना की सुदीर्घ परम्परा रही है।
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