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नीलकंठ संस्कृति

नीलकंठ संस्कृति

प्रकृति के साथ सामंजस्यता से संस्कृति और असामंजस्यता से विकृति उत्पन्न होती है। सृष्टि, स्थिति और संहार काल की गति है। पंचमहाभूत (आकाश, वायु, तेजस, अप, पृथ्वी) के संयोग से सृष्टि की रचना होती है, और इनके विद्यटन से अन्त। मनुष्य और अन्य सभी प्राणियों का शरीर इन पंचमहाभूतों से निर्मित है। मृत्यु के पश्चात् शरीर महाभूतों में विलीन हो जाता है। प्रत्येक महाभूत का अपना-अपना ।

साधारण, विशिष्ट एवं आध्यात्मिक गुण है। पंचभूत शरीर के गुण के अनुरूप ही मूल प्रवृत्ति एवं एषणायें उत्पन्न होती हैं, और इसी क्रम में पुरुषार्थ और काल का स्वरूप बनता है। इन सभी के संयोजन से डी मानव संस्कृति का आधार बनता है। मात्र देह-तत्त्व के सिद्धांत पर आधारित संस्कृति की व्याख्या अपूर्ण है। इस संदर्भ में यह कहना आवश्यक है कि संस्कृति के इस रसायन में पांच चार और तीन की संख्या अंकगणितीय नहीं है। इन सांस्कृतिक संख्याओं से भारतीय चिन्तन का अन्तः सम्बन्ध बनता है।

"सस्कृति" शब्द का प्रयोग अर्वाचीन है। संस्कार प्राचीन है। शास्त्रों में षोडष संस्कार का उल्लेख है। भारतीय दृष्टि में मनुष्य एक आध्यात्मिक प्राणी है। अनुष्ठान उसका श्रेयस कर्त्तव्य है। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ और संन्यास मानव जीवन की चार अवस्थायें हैं। इनमें प्रथम दो अनुष्ठानों एवं संस्कारों से सांसारिक जीवन प्रवाहित होता है। अन्तिम दो प्रकृतस्थ होने की सर्वोच्च अवस्था है।

सृष्टि एवं स्थिति के लिये मूल प्रवृत्तियों का संतुष्ट अनिवार्य है। अन्य प्राणियों की तुलना में गनुष्य अपनी प्रवृत्तियों की पूर्ति अधिक जटिलता से करता है। स्वभावत्तः वह सदा असंतुष्ट रहता है, नई एषणाओं और नई आवश्यकताओं को जन्म देता है। वित्तेषणा, पुत्रैषणा, प्राणेषणा, परलोकेषणा आदि की अपने मन-बुद्धि और पराक्रम द्वारा पूर्ति करता है।

किन्तु मनुष्य की विशेषता एषणाओं की पूर्ति में नहीं, निवृत्ति में है। प्राथमिक प्रवृतियों से उत्पन्न एषणाओं की पूर्ति सभी प्राणी प्राणरक्षा के लिये करते हैं। मनुष्य की विशेषता इस बात में है कि वह अर्थ और काम की एषणाओं की पूर्ति धर्म से नियंत्रित होकर करता है। मोक्ष सभी एषणाओं की निवृत्ति की शुद्ध अवस्था है, परम पुरुषार्थ है।

मानववैज्ञानिकों ने सीमित अध्ययन के आधार पर सामूहिक जीवन शैली को संस्कृति की संज्ञा दी है। मनुष्य को संस्कृति का सृष्टिकर्ता कहा गया है। इनके अनुसार संस्कृति दो प्रकार की है-भौतिक (यथार्थ) और सांस्कृतिक (आदर्श)। लोकजीवन (समाज) की आवश्यकताओं के अनुसार ही आचार-विचार बनता और बदलता रहता है, सांस्कृतिक तत्त्वों के आदान-प्रदान होते रहते हैं।

प्राचीन मनीषियों ने आध्यात्मिक संस्कार को मानव-व्यवस्था का आधार माना है। संस्कारों के अनुसरण से ही संस्कृति की सृष्टि होती है। धर्मशास्त्र मानव का आचार-सहिता है।

प्रकृति दो है-स्थूल और सूक्ष्म। स्थूल प्रकृति पृथ्वी का वातावरण है। सूक्ष्म प्रकृति मूल तत्त्व है, बीज शक्ति है. अनादि है, अनन्त है, अकाल है, पूर्ण है। इसी से जगत की सृष्टि होती है, इसी में जगत की स्थिति है, और इसी में विलय। इसी से शरीर में चित्त का संचरण होता है. अपरिमेय गुणों की अभिव्यक्ति होती है, पृथ्वी में दिशायें बनती है. ऋतुओं का आगमन होता है, वनस्पतियों में पुष्प और फल लगते है. प्राणियों में मूल प्रवृत्तिया बनती हैं, मनुष्य में ऐषणायें जागृत होती है, विज्ञानों का विकास होता है। निखिल ब्रह्माण्ड में चराचर की प्रकृति का जो नियमन करता है वही सूक्ष्म प्रकृति हैं, यही पुरुष है, वही बड़ा। प्रकृति रूप मानव अनाघ्रात है। संसार के योग से ही उसमे सस्कृति का उ‌द्भव, विकास एवं हास होता रहता है। बीज अंकुरित होकर वृक्ष के रूप में फूलता, फलता, सूखत्ता और पुनः बीज से वृक्ष और वृक्ष से बीज बनता रहता है। उसी प्रकार संस्कृति भी फूलती और पकती रहती है। जैसे अरण्य में नाना प्रकार के वृक्ष है वैसे ही सस्कृतियों के मिन्न-भिन्न रूप होते है। बीज अंकुरित होकर बढ़ता है, वृक्ष में फूल और बीज बनता है। जिस प्रकार नया उत्पन्न हुआ बाज पूर्व की फली से भिन्न नहीं होता, उसी प्रकार सस्कृति अपने मूल बीज में अवस्थित रहती है। यही प्राकृतिक नियम है।

     प्रकृति के शाश्वत नियमों के उल्लंघन से विकृति उत्पन्न होती है। जो संस्कृति जितनी अधिक प्रकृतिचारी है, वह अपने आप में उतनी ही पूर्ण, संतुष्ट और शुभ है। इसके विपरीत प्रकृति के शगन से जो जीवन शैली बनती है, वह अपने में अपूर्ण, असंतुष्ट, अशुभ और विकृत है। यदि बीज और वृक्ष का रूपक मान्य है, तो संस्कृति के साथ 'नव' का विशेषण अनुपयुक्त है। नव वृक्ष पूर्व वृक्ष की अपेक्षा नव है, किन्तु बीज यदि एक ही है तो नव-पुराण का भेद अतात्त्विक है। प्रत्येक संस्कृति की एक आत्मा होती है। आत्मा नव या पुरातन नहीं होती। शरीर बदलता है। संस्कृति का बाह्यरूप बदलता है, जैसे जगन्नाथ का कलेवर। परिवर्तन के अपने नियम है। प्रत्येक संस्कृति की अपनी गर्यादा (हद) होती है। मर्यादा के उल्लघन से विकृति पैदा होती है, संस्कृति नष्ट हो जाती है। परन्तु परमार्थिक दृष्टि में मानव रचित मर्यादा का तात्विक महत्त्व नहीं है। जैसा कबीर ने कहा-

हद चले सो मानसा, बेहद चले सो साध हद-बेहद दोनों तजे, ताके मथा अगाध ।

संस्कृतियों का वर्गीकरण भौगोलिक सीमाओं के आधार पर करना व्यर्थ है।

आज सम्पूर्ण मानव संस्कृति दो वर्गों में बंटा है। एक संस्कृति वह है जिसमें मनुष्य का महत्त्व यंत्र की प्रभुसत्ता और पृथकत्व की विशेषता से नापा जाता है। इस वर्ग से पराङ्गमुख एक दूसरी संस्कृति वह है जो ब्रह्माण्ड के शाश्वत नियमों की प्रभुसत्ता तथा प्रकृति से संतुलन बनाये रखने वाले आचार को प्रधानता देती है। ऐसी संस्कृति सभी प्राणियों के पारस्परिक सम्बन्धों की श्रेष्ठता को स्वीकारती है।

भौतिकता-प्रधान और अध्यात्मक प्रधान दो अभिमुख कोटियां हैं। इनके मिश्रण से आज जो "नव संस्कृति उत्पन्न हो रही है वह विकृति है। भारतीय संस्कृति के संदर्भ में इस तथ्य को समझना आवश्यक है।

सस्कृति को धर्म से अलग रखने की बात अभारतीय है। ऐसा करने से भारतीय संस्कृति का शाश्वत स्वरूप नष्ट हो जायेगा। भौतिक-प्रधान संस्कृति का ग्रहण अविवेक पूर्ण है। लोक का हित और अहित क्या है, इसका निर्णय भौतिक मापदंडों से नहीं हो सकता। भौतिक मापदंड अपने आप में अस्थिर है। 'नव संस्कृति धर्म से अनियंत्रित है। अतः इसकी ऐषणा का परिणाम वही होगा जो कुंभकरण और भष्मासुर को हुआ था। हमारी लोक कल्याण की भावना कितना ही श्रेष्ठ क्यों न हो, चित्तकारी होकर किसी भी संस्कृति का निर्माण सर्वथा अनिष्टकारी है। जैसा एक पौराणिक आख्यान में कहा गया है, भगवान शिव भंग पीकर बनाने लगे थे गणेश बन गया बंदर-अकुर्व नो गणपतिः चकारशाखा मृगः।

संस्कृति के संदर्भ में धर्म के स्वरूप को समझना आवश्यक है। इसाई और इस्लाम धर्म के अनुसार मनुष्य प्रकृत्त रूप में "अपवित्र' है, क्योंकि आदग और हौया ने ईश्वर की अवज्ञा की थी। इस मिथक से प्रेरित एवं पोषित है पाश्चात्य मानव विज्ञान की "पवित्र" और "अपवित्र" की अवधारणा। इन दो प्रतिमुख कोटियों से मानव विज्ञान ने ससार की सारी विषमताओं की व्याख्या की है। इसे मानव मन का स्वाभाविक स्वरूप बताया गया है।

भारतीय धर्म-दर्शन की एक विशिष्ट परम्परा के अनुसार पवित्र अपवित्र दो असंयोज्य प्रत्तिमुख कोटियां नहीं है। जीवन के चरम उत्कर्ष में धार्मिक आचरणों में इसका व्यावहारिक स्वरूप सुस्पष्ट होता है।

समुद्र मंथन के समय हलाहल प्रकट हुआ, परन्तु कोई भी विषपान के लिये तैयार नहीं था। वस्तुतः कोई सक्षम नहीं था। देवताओं की प्रार्थना पर महादेव ने गरलपान किया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया। इस प्रकार वे नीलकंठ बने। अमृत घट् के निकलने पर सुर और असुरों में "अमृतपान' के लिये छीना-झपटी होती रही, और अन्त में देवताओं की जीत हुई।

नीलकंठ शिव का प्रतीकात्मक स्वरूप विलक्षण है। इनमें सभी प्रकार की प्रतिमुख कोटियों (अमृत और विष) की सांत्यकता बनी है। नीलकंठ महामुनि, महायोगी. महाकामी, महाभोगी हैं. महाशान्त, सहज प्रसन्न होने वाले आशुतोष और महाक्रोधी रुद्र है, महाकल्याणकारी शिव और महाविनाशकारी महाकाल है. महादानी विश्वनाथ और महा दरिद्र दिगम्बर है, महारूपवान और महाकुरुप हैं।

इसी प्रकार भारतीय संस्कृति भी असंयोज्य प्रतिमुख कोटियों को आत्मसात करती है। उदाहरण के रूप में भोग मोक्ष समभाव की शिव नगरी काशी में एक ओर राजा एवं रईसों का भौतिक ऐश्वर्य, दूसरी ओर घोर दरिद्रता। एक ओर शास्त्र, साहित्य और ललित कलाओं का मर्मज्ञ पंडित, दूसरी ओर निरक्षर, उग-गुडे, महामूढ़, महाअंधविश्वासी । एक ओर परम साध्वी जो पति के वियोग में सारे ऐन्द्रिक सुखों का त्याग कर तपस्या कर रही है, दूसरी ओर वासनाओं में लिप्त गणिकाएं। एक और धार्मिक अनुष्ठानों में लगे धर्मज्ञ त्यागी-संन्यासी, दूसरी ओर धन संग्रह की लिप्सा में डूबे व्यापारी। काशी ने इस प्रकार के अनेक प्रतिमुख प्रवृत्ति वाले लोगों का संग्रह किया है।

          संस्कृति धर्म से अधिक व्यापक है। तमिल ब्राह्मणों में वैष्णव और शैव का साम्प्रदायिक भेद गहरा है, किन्तु उनकी सांस्कृतिक परम्परा एक है। यदि सांस्कृतिक परम्परायें मूलरूप से भिन्न हों तो धर्म उनके बीच एक्य नहीं ला सकता। भारत, थाइलैण्ड और तिब्बत के बौद्धों में एकता का अभाव स्वाभाविक है, क्योंकि उनके बीच की सांस्कृतिक दूरी लम्बी एवं गहरी है। बंगाल और पंजाब-सिन्ध के मुसलमानों ने धर्म को आधार मानकर पाकिस्तान बनाया था। किन्तु कुछ ही समय में उनकी राजनैतिक एकता टूट गयी। इस्लाम धर्म दो क्षेत्रों की विभिन्न संस्कृति को एक सूत्र में बांधने में असफल रहा।

भारतीय वर्ण-व्यवस्था में नीलकंठ संस्कृति का स्वरूप बनता है। प्रत्येक वर्ण के अपने-अपने कुलाचार, लोकाचार और देशाचार हैं। इनकी विविधता के महत्त्व को स्वीकारा गया है। प्राचीन भारतीय शास्त्रों में, स्मृतियों में, विशेषकर मनु और बौद्धायन सूत्रों में, मिन्नता का दृष्टिकोण सुप्रतिष्ठित है। धार्मिक कृत्य, शिल्प, साहित्य, कला कौशल तथा अन्य सांस्कृतिक उत्कर्षों में वर्ण की भूमिका स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

     शास्त्रीय विधान के अनुसार वर्णाश्रम समाज में बुद्धिजीवी ब्राह्मण धन का संग्रह नहीं करेगा, वह स्वेच्छा से गरीबी और सादगी का जीवन व्यतीत करेगा, भिक्षाटन ही जीविकोपार्जन का साधन होगा, किन्तु अपने उच्च विचारों के प्रतिपादन के लिये वह समाज में सर्वश्रेष्ठ माना जायेगा। राजन्य वर्ग अपनी शक्ति और क्षमता से समाज की रक्षा करेगा किन्तु उस पर बुद्धिजीवी ब्राह्मणों का अंकुश बना रहेगा। उसका ब्राह्मण से दूसरा स्थान होगा। वैश्य पूंजी की वृद्धि करेगा, किन्तु धन के उपभोग में उसे खुली छूट नहीं दी जायेगी।

     वह धन का संग्रह समाज के हितों में करेगा। श्रमिक वर्ग पर इस प्रकार प्रतिबंध रखा गया है जिससे वे आधुनिक आन्दोलनकारियों की तरह तोड़फोड़ न कर सकें। सैद्धान्तिक दृष्टि से इस व्यवस्था में ऐसा विधान है कि पूंजी (धन) और अधिकार (शासकीय शक्ति) किसी एक वर्ण के हाथ में न रहे। उसी प्रकार प्राचीन आश्रम व्यवस्था (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वाणप्रस्थ, संन्यास) में जीवन-यात्रा सुनियोजित थी, पीढ़ियों में टकराव नहीं था।

अतः प्रत्येक व्यक्ति और संस्कृति के लिये एक सुनिश्चित स्थान था, किसी को इस बात की छूट नहीं थी कि वह दूसरे की संस्कृति को निगल जाये। सहअस्तित्व की भावना को प्रोत्साहित करना ही भारतीय सस्कृति का लक्ष्य रहा है। नीलकंठ शिव की तरह भारतीय संस्कृति में सभी धर्मों का स्थान है।

आज भारतीय संस्कृति पर पश्चिमी संस्कृति का इन्द्रजाल छाया हुआ है। विधान में एकता और सहअस्तित्व की बात कही जाती है, किन्तु प्रतिमुख प्रवृत्ति के लोगों के लिये यहां अब कोई स्थान नहीं है। आधुनिक संस्कृति प्राचीन संस्कृति को निगलने का प्रयास कर रही है।

श्री वैद्यनाथ सरस्वती
नीलकंठ संस्कृति 
"संस्कृति: अंक -01"

 

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