सामाजिक समरसता के प्रतीक भगवान श्रीराम
April 14, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

भारतीय सनातन परम्परा में भक्ति और समर्पण की अनेक कथाएं हैं, परन्तु माता शबरी का चरित्र असीम धैर्य और निश्छल प्रेम का एक ऐसा पावन उदाहरण है जो ईश्वर को भी अपने भक्त के अधीन कर लेता है। डॉ. प्रीति शर्मा जी द्वारा लिखित इस लेख में शबरी के बाल्यकाल के वैराग्य से लेकर श्रीराम के आगमन की लम्बी प्रतीक्षा और नवधा भक्ति के उपदेश तक का अत्यन्त हृदयग्राही वर्णन किया गया है। यह लेख इस सत्य को पुष्ट करता है कि ईश्वर केवल निर्मल हृदय और सच्ची भक्ति के ही भूखे होते हैं, उन्हें जाति या वैभव से कोई भी प्रयोजन नहीं होता।
भारतीय वाङ्मय और सनातन परम्परा में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन-चरित्र आदर्शों, मर्यादाओं और लोककल्याण का एक अनुपम महाकाव्य है। इस महाकाव्य में जहाँ एक ओर शौर्य, पराक्रम और राजधर्म की उच्च शिखाएं दृष्टिगोचर होती हैं, वहीं दूसरी ओर अगाध प्रेम, समर्पण और अनन्य भक्ति की गहन सरिता भी प्रवाहित होती है।
इसी भक्ति की सबसे निर्मल और पवित्र धारा का नाम शबरी है। शबरी केवल एक वनवासी स्त्री का नाम नहीं है, अपितु यह असीम सब्र, अटूट विश्वास और निश्छल समर्पण का एक ऐसा शाश्वत प्रतीक है जो युगों-युगों तक मानवता को ईश्वर से जुड़ने का सच्चा मार्ग दिखलाता रहेगा। पूर्व जन्म की कथाओं के अनुसार शबरी एक अत्यन्त सुन्दर रानी और प्रभु की अनन्य भक्त थी, जो अपने अगले जन्म में शबरी नामक एक कन्या के रूप में उत्पन्न हुई।
राम के दर्शन की तीव्र अभिलाषा और उनके आगमन के असीम सब्र के कारण ही उनका यह जीवन सम्पूर्ण विश्व में भक्ति की एक सर्वोच्च मिसाल बन गया। शबरी का बाल्यकाल एक वनवासी भील परिवार में व्यतीत हुआ। प्रारब्ध के पावन पुण्यों के कारण वह बचपन से ही भक्तिभाव में पूर्णत: लीन रहा करती थी। पुत्री को निरन्तर वैराग्य और ईश्वर चिन्तन में डूबा देखकर उसके माता और पिता ने उसे वैवाहिक बन्धन में बांधने का निर्णय लिया।
उनकी परम्परा के अनुसार बारात में आने वाले अतिथियों और बारातियों को मांसाहार परोसने के लिए अनेक निरीह पशुओं और पक्षियों को बाड़े में लाकर बांध दिया गया। विवाह के उत्सव में होने वाले इस भारी रक्तपात और मूक प्राणियों की पीड़ा को देखकर शबरी का अत्यन्त कोमल और करुणा से भरा हुआ हृदय क्रन्दन कर उठा।

करुणा और ममत्व की प्रतिमूर्ति शबरी
उसने निश्चय किया कि जिस वैवाहिक जीवन का आरम्भ ही इतने सारे निर्दोष जीवों की हत्या से हो, वह कभी भी सुखदायी और पवित्र नहीं हो सकता। इसी वैराग्य भाव के वशीभूत होकर रात्रि के गहन अन्धकार में मौका पाकर उसने उन सभी प्राणियों को उनके बन्धन से मुक्त कर दिया और स्वयं भी सांसारिक मोह को त्यागकर घने जंगल की ओर भाग गई।
ऐसा माना जाता है कि मुक्त हुए उन मूक प्राणियों ने शबरी को यह हृदयस्पर्शी आशीर्वाद दिया कि जिस प्रकार उसने उन्हें मृत्यु के बन्धन से मुक्त किया है, उसी प्रकार भगवान श्रीराम एक दिन उसे जन्म और मृत्यु के सांसारिक बन्धनों से मुक्ति प्रदान करेंगे। जंगल में भटकते हुए शबरी महर्षि मतंग के आश्रम के समीप पहुँची।
उसके मन में यह गहरा संशय था कि आश्रम में महिलाओं का निवास सर्वथा वर्जित होता है और वह तो एक वनवासी भील कन्या है, इसलिए क्या कोई ऋषि उसकी निस्वार्थ सेवा को स्वीकार करेगा। इसी संकोच के कारण वह छिपकर आश्रम की सेवा करने लगी। वह कन्द, मूल और फल खाकर अपना जीवन निर्वाह करती, छिपकर सन्तों का सत्संग सुनती और रात्रि के समय वृक्षों पर ही सो जाती।
अपने दांतों से वृक्षों की छाल पर राम-राम उकेरना ही उसकी सबसे बड़ी साधना थी। वह नित्य प्रति ब्रह्म मुहूर्त में उठकर आश्रम के प्रांगण में झाड़ू लगाती और जंगल से सूखी लकड़ियां बटोरकर आश्रम के बाहर रख देती थी ताकि ऋषियों को हवन और भोजन पकाने में कोई कष्ट न हो। यह निस्वार्थ सेवा कई दिनों तक अनवरत चलती रही। आश्रम के सभी निवासी इस बात से आश्चर्यचकित थे कि यह अदृश्य सेवक कौन है जो बिना किसी प्रतिफल की कामना के इतनी निष्ठा से सेवा कर रहा है।
एक रात आश्रम के बटुकों ने वास्तविकता जानने का यत्न किया और शबरी को आश्रम की सफाई करते हुए देख लिया। शिष्यों ने तत्काल इसकी सूचना महर्षि मतंग को दी और शबरी को उनके सम्मुख प्रस्तुत किया गया। जब शबरी से इस कृत्य का कारण पूछा गया तो उसने अत्यन्त विनम्रतापूर्वक अपना सब कुछ सच-सच बता दिया।
शबरी के इस निश्छल भाव और त्याग को देखकर महर्षि मतंग का हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने शबरी के सिर पर अपना हाथ रखते हुए अत्यन्त वात्सल्यपूर्ण स्वर में कहा कि उसे अब कहीं और भटकने की कोई आवश्यकता नहीं है। महर्षि ने उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार करते हुए घोषणा की कि बेटी का अपने पिता के आश्रम में रहने पर कोई वर्जना नहीं है और उन्हें समाज के किसी भी आक्षेप की परवाह नहीं है।
महर्षि का मानना था कि ज्ञानी और सन्त पुरुष हाथी के समान होते हैं जो अपनी चाल से चलते हैं और पीछे निन्दा करने वाले अज्ञानियों की तनिक भी परवाह नहीं करते। महर्षि के संरक्षण में शबरी आश्रम में रहकर ऋषियों की पूर्ण निष्ठा से सेवा सुश्रुषा करने लगी। समय अपनी गति से बीतता गया और एक दिन महर्षि मतंग वृद्ध होकर अपनी मृत्यु शैया पर आ गए।
अपने गुरु को परलोक गमन की तैयारी करते देख शबरी अत्यन्त व्याकुल होकर रुदन करने लगी। तब महर्षि ने उसे अपने अत्यन्त निकट बुलाकर सान्त्वना दी और कहा कि वह धीरज धारण करे और असीम धैर्य के साथ प्रतीक्षा करे। उन्होंने शबरी को यह दृढ़ विश्वास दिलाया कि एक दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम स्वयं चलकर इस आश्रम में आएंगे, क्योंकि सच्चा भक्त जब ईश्वर के पास नहीं जा पाता, तो भगवान स्वयं अपनी करुणा से भक्त के पास आकर उसका मान बढ़ाते हैं।

गुरुदेव के परलोकगमन से व्यथित शबरी
जब शबरी ने अत्यन्त जिज्ञासा से पूछा कि वह अपने प्रभु को कैसे पहचानेगी, तो महर्षि मतंग ने श्रीराम के दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा कि वे श्यामल और गौरवर्ण वाले दो भाई होंगे, जिनके सिर पर जटामुकुट होगा, नेत्र कमल के समान विशाल होंगे और जिनकी भुजाएं घुटनों तक लम्बी होंगी। यह परम आश्वासन देकर मुनि अपने योगबल से दिव्य लोक को पधार गए।
गुरु के उन वचनों पर शबरी ने ऐसा दृढ़ विश्वास किया जो आज तक मानवता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उसने अपनी सम्पूर्ण आयु केवल राम के आगमन की प्रतीक्षा में व्यतीत कर दी। प्रतिदिन वह मार्ग को साफ करती, वन से ताजे मीठे फल चुनकर लाती और इस प्रकार प्रतीक्षा करते-करते वह एक अत्यन्त वृद्ध महिला हो गई।
उसके शरीर की शक्ति क्षीण हो गई परन्तु राम दर्शन की अभिलाषा ने उसके मन को कभी मलिन या छोटा नहीं होने दिया। जब भगवान श्रीराम माता सीता की खोज में वन-वन भटक रहे थे, तब परमधाम जाते हुए कबन्ध नामक गन्धर्व ने उन्हें शबरी के आश्रम का मार्ग बताया था। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस अलौकिक मिलन का वर्णन करते हुए लिखा है,
ताहि देइ गति राम उदारा।
सबरी कें आश्रम पगु धारा॥
सबरी देखि राम गृहँ आए।
मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।
गुरु वचनों पर अडिग विश्वास के फलस्वरूप अन्तत: शबरी के राम मिलन का पावन मार्ग प्रशस्त हुआ। श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण के साथ उस कुटिया में पधारे। उन्होंने अत्यन्त मधुर और आत्मीय स्वर में अपना परिचय देते हुए कहा कि वे महाराज दशरथ के पुत्र राम हैं और ये उनके छोटे भाई लक्ष्मण हैं, तथा वे दोनों अपनी माता शबरी के दर्शन करने की अभिलाषा से यहाँ आए हैं।

गुरु की वाणी पर रहा अटल विश्ववास
महर्षि मतंग द्वारा बताए गए स्वरूप से मिलान कर शबरी का हृदय गदगद हो गया और उसके नेत्रों से आनन्द की अश्रुधारा बह निकली। उसने अपने कांपते हुए कंठ से कहा कि उसके प्रभु अन्तत: आ ही गए और वह भावविभोर होकर उनके श्रीचरणों से लिपट गई। उसने अत्यन्त श्रद्धा से दोनों भाइयों के चरण पखारे और उन्हें आदरपूर्वक आसन पर बैठाया।
श्रीराम ने अत्यन्त स्नेह से शबरी से कहा कि उन्हें बहुत भूख लगी है और वे कुछ भोजन ग्रहण करना चाहते हैं। यह सुनकर शबरी अपनी कुटिया से अत्यन्त रसीले और मीठे बेर लेकर आई। वह जंगल के प्रत्येक वृक्ष को भलीभांति जानती थी, परन्तु अपने प्रभु को कोई भी खट्टा या बेस्वाद फल न मिल जाए, इसलिए वह प्रत्येक बेर को स्वयं चखकर और उसकी मिठास सुनिश्चित करने के पश्चात ही श्रीराम को अर्पित कर रही थी।
यह दृश्य वात्सल्य और समर्पण की पराकाष्ठा था। श्रीराम उस जूठे बेर को सर्वोच्च और पवित्र भोग मानकर अत्यन्त आनन्द के साथ ग्रहण कर रहे थे। वे अगाध प्रेम के वशीभूत होकर बार-बार शबरी से बेर मांग रहे थे। भगवान ने अनुभव किया कि उन्होंने अपने जीवन में अनेक राजसी मिष्ठान्न खाए हैं, परन्तु ऐसा अमृततुल्य फल उन्हें आज तक प्राप्त नहीं हुआ।
लोककथाओं के अनुसार लक्ष्मण ने उन जूठे बेरों को बेमन से अपने हाथ में तो लिया परन्तु उन्हें खाया नहीं और दूर फेंक दिया। यही फेंके हुए बेर कालान्तर में द्रोणाचल पर्वत पर संजीवनी बूटी बने, जो मेघनाद के प्रहार से मूर्च्छित होने पर लक्ष्मण के प्राण बचाने का साधन सिद्ध हुए। यदि लक्ष्मण भी शबरी माता के हाथों का वह प्रसाद उसी समय ग्रहण कर लेते, तो कदाचित उनके जीवन पर वह घोर संकट ही नहीं आता।
शबरी ने अत्यन्त हीन भावना से भरते हुए श्रीराम से निवेदन किया कि वह तो समाज की दृष्टि में नीचों में भी नीच है और एक मन्दबुद्धि तथा पापिनी स्त्री है। इस पर करुणानिधान श्रीराम ने अत्यन्त कोमल शब्दों में उसे समझाते हुए कहा कि वे किसी भी व्यक्ति से उसकी जाति, पन्थ, कुल, धर्म, बड़प्पन, धन या गुण के आधार पर कोई नाता नहीं रखते, अपितु वे केवल और केवल सच्ची भक्ति का नाता ही स्वीकार करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि माता कौसल्या से भी उनका कोख का सम्बन्ध नहीं बल्कि शतरूपा की भक्ति का ही नाता है। तुलसीदास जी ने इस भाव को इस प्रकार उकेरा है-
अधम ते अधम अधम अति नारी।
तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता।
मानउँ एक भगति कर नाता॥
श्रीराम ने आगे कहा कि उनकी दृष्टि में शबरी का प्रेम और भक्ति इतनी श्रेष्ठ है कि वे उसे अत्यन्त प्रिय मानते हैं।
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें।
सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई।
तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥
श्रीराम ने उस महान तपस्विनी को तीन बार भामिनी कहकर प्रणाम किया। उन्होंने उसके सन्त स्वभाव और अगाध सेवाभाव की भूरि-भूरि प्रशंसा की। भगवान ने स्पष्ट किया कि जो परम गति बड़े योगियों को भी दुर्लभ होती है, वही आज शबरी के लिए सहज ही सुलभ हो गई है। श्रीराम ने उसे यह ज्ञान दिया कि उनके दर्शन का परम फल यह होता है कि जीव अपने वास्तविक और सहज स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
मम दरसन फल परम अनूपा।
जीव पाव निज सहज सरूपा॥
जनकसुता कइ सुधि भामिनि।
जानहि कहु करिबरगामिनी॥
इसके पश्चात श्रीराम ने शबरी से माता सीता की खोज के विषय में मार्गदर्शन मांगा और उस पर अपनी अनन्त कृपा दृष्टि डालते हुए उसे नवधा भक्ति का महान उपदेश प्रदान किया।
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं।
सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
श्रीराम ने विस्तार से बताया कि सन्तों का सत्संग, भगवान की कथा प्रसंगों में रति, अभिमानरहित होकर गुरु के चरणों की सेवा, प्रभु के गुणों का गान, दृढ़ विश्वास के साथ मन्त्र जाप, इन्द्रियों पर नियन्त्रण, शील, सन्तोष, सम्पूर्ण चराचर जगत में ईश्वर का दर्शन, किसी में दोष न देखना और कपटरहित सरल व्यवहार ही नवधा भक्ति के नौ सोपान हैं। इनमें से किसी एक का भी पूर्ण निष्ठा से पालन करने वाला जीव उन्हें अत्यन्त प्रिय होता है।
प्रभु ने शबरी को यह भान कराया कि वह तो इन सभी नौ भक्तियों से पूर्णत: परिपूर्ण है और उसके इसी अगाध प्रेम के कारण ही उन्होंने स्वयं आकर उसे दर्शन दिए हैं। अन्तत: भगवान की आज्ञा और आशीर्वाद प्राप्त कर शबरी ने योगाग्नि में अपना भौतिक शरीर त्याग दिया और दिव्य शरीर धारण कर साकेत लोक को प्रस्थान कर गई। शबरी का यह सम्पूर्ण जीवन इस बात का शाश्वत प्रमाण है कि जहाँ असीम सब्र और अटूट विश्वास होता है, वहाँ भगवान स्वयं चलकर आते हैं और अपने भक्त को परम आनन्द और मोक्ष प्रदान करते हैं।
-डॉ० प्रीति शर्मा
असीम धैर्य और अटूट विश्वास की प्रतिमूर्ति शबरी
April 04, 2026