फाग का लोकरंग
February 27, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | चैत्र कृष्ण द्वादशी | मंगलवार
नक्षत्र: शतभिषा | योग: शुक्ल | करण: कौलव
पर्व विशेष : | तदनुसार 14 अप्रैल 2026

प्रकृति मनुष्य को सहचरी है, यह सर्वविदित है। किन्तु मनुष्य प्रकृति का कितना सहचर है? यह प्रश्न हमें निरूत्तर कर देता है। हम सोचने के लिए विवश हो जाते हैं कि सचमुच प्रकृति जिस तरह से अपने दायित्वों का निर्वाह कर रही हैं? क्या मनुष्य प्रकृति के प्रति अपने दायित्वों और कर्तव्यों का निर्वाह कर रहा हैं? नहीं न? प्रकृति कितनी उदारता के साथ हमें जीने के लिए सारे प्राकृतिक संसाधन उनलब्ध करा रही है और मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर प्रकृति को विनष्ट कर रहा है। यह चिंतन का विषय है।
प्राचीन काल से हमारे पूर्वज प्रकृति से जुड़े थे। उनके आचार-विचार, रहन-सहन, जीवन संस्कार और तीज-त्यौहार इन सबका प्रकृति के साथ घनिष्ट संबंध था। प्रकृति और मनुष्य दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। ये बात हमें अपने तीज-त्यौहारों से मालूम होती है। प्रकृति का एक ऐसा ही त्यौहार है होली। होली खुशियों और उल्लास का पर्व है। तब प्रकृति नव-श्रृंगार कर मानव-मन को सम्मोहित करती है। प्रकृति का एक रूप, उसका सलोना रंग, उसका मादक यौवन, सबको अपनी ओर आकर्षित करता है। इस मोहक वातावरण को प्राप्त कर बैरागी मन भी अपना संयम खो देता है और फाग गीतों की लड़ियां बिखरने लगती है।
शीत ऋतु की समाप्ति के साथ बसंत ऋतु का आगमन धीरे-धीरे होने लगता है। धरती संवरने लगती है। पुरवाही अपनी मंद गति को छोड़कर साथ फूलों की खुशबू लेकर इतराते लगती है। खेतों में उन्हारी की फसलें गदराने लगती है। तब भला कोयल कैसे चुप रहे, वह भी बंसत के स्वागत में गीत गाने लगती है। गांव के बाहर महुआ महकने लगता है और पलाश दहकने लगता है, जंगल गमकने लगता है।

पेड़ों पर नई-नई कोपलें फूटने लगती हैं, तब ऐसे में मानव हृदय प्रभावित हुए बिना नहीं रहता, वह भी खुशियों में झूमने लगता है। कुल मिलाकर बसंत सारी प्रकृति और सारे जगजीवन को आल्हाद से भर देता है। फागुन की फगुनाहट आबाल-वृद्ध, स्त्री-पुरूष सबमें उमंग भर देती है। तब छत्तीसगढ़ के गांवों की गलियों और चौपाल होली गीतों से गूंजने लगते हैं। नंगाड़ों की थाप पर जनमानस थिरकने लगता है।
बसंत पंचमी के दिन होले डांड़ (होलिका जलाने का स्थान) में विधि-विधान से पूजन कर अंडी (अरंड) की डाली या पेड़ गाड़कर होलहार बच्चे लकड़ी इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं। इसी दिन से फाग गीतों की स्वर-लहरी गांव की फिजां में गूजने लगती है और नाचने लगता है लोगों का मन मयूर।
छोटे से श्याम कन्हैया हो
छोटे से श्याम कन्हैया
काली दाह जाय, काली दाह जाय
छोटे से श्याम कन्हैया।
छोटे-मोटे रूखवा कदम के…
भुईया लहसे डार, भुईया लहसे डार,
ऊपर में बइठे कन्हैया, मुख मुरली बजाय।
छोटे से श्याम कन्हैया।
साकुंर खोर गोकुल के…
राधा पनिया जाय, राधा पनिया जाय,
पाछू ले आये कन्हैया, गल लिए लपटाय।
छोटे से श्याम कन्हैया।
होली पूरी तरह से प्रकृति का त्यौहार है। इसके साथ होलिका की पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। इस कथा से सभी परिचित है। आततायी, अत्याचारी हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र रामभक्त प्रहलाद को नष्ट करना चाहा। तब होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गई, क्योंकि होलिका को यह वरदान प्राप्त था कि आग उसे नहीं जलाएगी। किन्तु हुआ उल्टा, होलिका जल गई और भगवान की कृपा से प्रहलाद बच गया। इसी की याद में फागुन मास की पूर्णिमा को होली जलाई जाती है और दूसरे दिन रंग-गुलाल लेकर सब अपनी उमंगों को व्यक्त कर रंग खेलते हैं। यह होली समता और सद्भाव का प्ररक है।
बसंत पंचमी के दिन सं गांव-गांव, गली-गली युवाओं में एक नया उत्साह होता है। परम्परा से प्राप्त फाग गीत प्रतिदिन शाम को इन युवाओं के द्वारा बुजुर्गों का मार्गदर्शन प्राप्त कर गाया जाता है, तब बच्चों में भी गीत सीखने की उमंग होती है। गांव की गुड़ी या चौपाल में अप्रत्यक्ष रूप से नई पीढ़ी का निर्माण होने लगता है।
दे दे बुलौआ राधे को नगर में
दे दे बुलौआ राधे को।
कुंजन में होरी होय, नगर में-
दे दे बुलौआ राधे को।
फाग गीतों में राम व कृष्ण से संबंधित विषयों की अधिकता होती है। एक तरह से यह एक आमंत्रण है अपने प्रियजन को होली खेलने के लिए। हर युवा कृष्ण व हर युवती राधा के रूप में होती है। रंग-गुलाल और पिचकारी माध्यम हैं मन से मन को जोड़ने का। होली अवसर देती है अपने आप को प्रिय के रंग में रंगने का।
होली प्रतीक है अत्याचार के विनाश का, जिसमें असत्य रूपी होलिका जल जाती है और सत्य रूपी प्रहलाद बच जाता है। सत्य की प्रतिस्थापना होली का संदेश है। असत्य जलकर विनष्ट होता है और सत्य मुस्काता है। होलिका और प्रहलाद की यह पौराणिक कथा आज भी प्रासंगिक है। आज समाज विरोधी मूल्य सिर उठा रहे हैं और आम आदमी का जीना दूभर हो रहा है। भौतिकता की आंधी में जीवन मूल्यों का क्षरण हो रहा है। तब समाज विरोधी मूल्यों की रोकथाम आवश्यक है।

समाज विरोधी मूल्यों के सर्वनाश से ही जीवन मूल्यों की रक्षा संभव है। ‘होली’ की जलती हुई अग्नि में दुराव, छिपाव, छल-कपट व अहंकार को जलाकर ही समता और सद्भाव की स्थापना कर जीवन मूल्यों को बचाया जा सकता है। होली जलाना इसी का प्रतीकार्थ है। जिस रात होली जलती है, होले डांड़ में डाहकी के साथ अश्लील गीत गाये जाते हैं। भद्दी गालियां नारे के रूप में बोली जाती हैं। इससे छोटे-बड़े सब होते हैं। अमीर-गरीब, ऊँच-नीच का भेद समाप्त हो जाता है। ये भद्दी गालियां असत के विरूद्ध होती हैं। तब फाग गीतों की लड़ियां बिखरती रहती हैं।
आये-आये फगुनवा के रात मोरे ललनी
सईयां अभागा न आये
काखर बर भेजवं मैं लिख-लिख पतिया
काखर बर भेजवं संदेश मोर ललनी
सईयां अभागा न आये।
होलकर रातभर यहां-वहां सूनसान जगह से लकड़ी लाते हैं। उनमें विशेष उत्साह होता है। मुहूर्त देखकर होली जलाई जाती है। गांव-नगर में कई स्थानों पर होली जलती है। उनमें एक स्थान प्रमुख होता है, जहां चकमक पत्थर से अग्नि उत्पन्न कर होली जलाई जाती है। इसे कुंवारी होली कहते हैं। उसके बाद इस स्थान से आग ले जाकर अन्य स्थानों की होली जलाई जाती हैं। सुबह प्रत्येक घर से मुखिया पांच कंडे व चावल के दाने होलिका में डालते हैं। ये पांच कंडे पंचलकड़ियां (मृत व्यक्ति की चिता को दी जाने वाली लकड़ी की परम्परा) के रूप में होते हैं।
लोग होले डांड़ की राख को अपने माथे पर लगाते हैं व एक-दूसरे को टीका लगाकर अभिवादन देते व लेते हैं। होलिका की राख पवित्र मानी जाती है, क्योंकि यहां असत्य को जलाकर राख किया गया है। यह राख सत्य की पवित्रता की राख है। इस राख की छोटी-सी गठरी बनाकर कोठी (अन्नगार) में भी रखी जाती है। इस तरह वर्तमान की दृष्टि से भी प्रांसगिक है होली। हमारे जीवन की शुचिता का प्रतिक है होली।
अरे बाजे नंगारा दस जोड़ी
राधा किसन खेले होरी।
पहिली नंगारा अवध में बाजे
रामे-सीता के हवय जोड़ी
राधा किसन खेलय होरी।
होली जलने के बाद जो होली की हुड़द्ंग शुरू होती है, वह सुबह शांत हो जाती है। बाद में फिर हुड़द्ंग होती है धूल-कीचड़ खेलने, गालियां बकने की। जैसे-जैसे सूरज चढ़ते जाता है, हुड़द्ंग की जगह मस्ती बढ़ती जाती हैं। लोगों में रंग और गुलाल की बरसात होने लगती है। रंग और गुलाल से होली का आनंद द्विगुणित हो जाता है। फाग गाने वालों की टोली नंगारा, मांदर तासक और झांझ लेकर घरों में जाकर फाग गीतों का गायन करता है।
गृहस्वामी उनका स्वागत करता है। रंग डालकर गुलाल लगाकर फाग गीत गायन के बाद उन्हें बक्सीस देता है। यह स्वस्थ लोक परम्परा आज भी गांवों में जीवंत बनी हुई है। मस्ती में झूमते लोग समता और सद्भाव के रंग में रंगे होते हैं। होली मन की सारी कलुषता को धोकर मया-पिरित के रंग में सबको सराबोर कर देती है और कंठों से बासंती रंगों में रंगे गीत छलक पड़ते हैं-
मन मोहन नंदलाल बरसानो नहीं आए
बरसानो नहीं आए, बरसानो नहीं आए
रे मन मोहन नंदलाल, बरसानो नहीं आए।
कइसे के बाजे चिकारा, कइसे के सितार
कइसे के बाजे मंजिरा, तबला के झंकार
बरसानो नहीं आए…
चरर ले बाजे चिकारा, सुरूर ले सितार
ठिनिन ले बाजे मंजीरा, तबला के झंकार।
बरसानों नहीं आए
फाग गीत मस्ती और उमंग का गीत है। सुबह से लेकर दोपहर तक फगुआरों का टोली घरों-घर घूमती है और फागुन की मस्ती के रंग बिखेरती है। चारों ओर लोगों के दिलों में प्यार ही प्यार दिखाई पड़ता है। युवकों में विशेष उत्साह होता है। बच्चों की टोली के क्या कहने? रंगो में रंगे लोग, फूलो की तरह खिखिलाते लोग मुहब्बत की महक से सारे वातावरण को महकाते हैं। तो ऐसा है होली का त्यौहार जहां ईर्ष्या और द्वेष का नामो-निशान नहीं होता। नफरत तिरोहित हो जाती है। फाग गीतों की महक दिलों में रह-रह कर घुलती जाती है-
कइसे के चिन्हंव मैं कटही के बिरवा रे सुवना
कइसे के चिन्हंव आमा डार न रे सुवना
कइसे के चिन्हंव आमा डार।
कइसे के चिन्हंव राम जुनकी
कइसे के चिन्हंव हनुमान
निको न लागे रे अजोध्या निको न लागे रे
इहां नई हे लक्ष्मण-राम
अजोध्या निको न लागे रे।
जामत चिन्हंव मै कटही के बिरवा रे सुवना
मउरत आमा डार न रे सुवना के
मउरत आमा डार।
रथ चढ़े चिन्हंव राम जानुकी
गदा धरे हनुमान
निको न लागे रे अजोध्या निको न लागे रे
इहां नई हे लक्ष्मण-राम
अजोध्या निकोन लागे रे।
दोपहर तक घर की महिलाएं गृह-कार्यों में संलग्न रहती हैं। भोजन - पकवान बनाने और कुलदेवता की पूजा की तैयारी महिलाओं को ही करनी पड़ती हैं। जब वे इन कार्यों से निवृत्त हो जाती हैं तब आपस मिलकर रंग-गुलाल खेलती हैं और अपनी भावनाओं को रंगों से सराबोर कर फूलों की तरह खिल-खिल जाती हैं। युवतियों में विशेष उत्साह होता हैं। चारों ओर पिचकारियां चलती हैं। सब एक-दुसरे को रंग में चिभोरने की जुगत में रहती हैं। कहीं-कहीं कालिख भी लगाई जाती है, जिससे बचना जरूरी होता है। पर कोई बचता कहां है?
प्यार के आगे सब नतमस्तक हो जाते हैं और समर्पित भाव से प्रेम और अनुराग के रंग में रंग जाते हैं। सारा गांव ब्रज की तरह आनंद्दायी बन जाता है। हर युवक कृष्ण और हर युवती राधा की तरह शोभायान होते हैं। कहीं न कहीं तो मन में किसी न किसी के प्रति प्रेम शक्ति होती ही है, चोरी-छिपे ही सही। होली के दिन वह रंगों के माध्यम से प्रकट हो ही जाती है। फाग गीतों से वातावरण मन को मुदित कर देता है-
जरगे मंझनिया के घाम ग
आमातरी डोला ल उतार दे
उतार दे, आमा तरी डोला ल उतार दे
पहिली गवन बर ससुर जी मोर आईन
नई जाववं ससुर जी के साथ हो
आमा तरी डोला उतार दे।
फाग गीतों में जहाँ मस्ती और उमंग है, वहीं सामाजिक चेतना की उपस्थिति दिखाई पड़ती हैं। यह उल्लेखनीय है कि सुबह जब लोग जलती होली में कंडा डालने के लिए आते हैं तब वे अपने साथ ढेकना (खटमल), किरनी (पशुओं का खून चूसने वाला जीवाणु) तथा खसु (खुजली) के छिलके को अलग-अलग गोबर की गोली में डालकर लाते हैं और उसे होली में डाल देते हैं। इसके पीछे यह मान्यता है कि इससे ढेकना, किरनी और खुजली समाप्त हो जाती हैं।

जलती होली की आंच लेना सौभाग्य माना जाता है। इस संबंध में यह उक्ति है कि ‘‘जे भागमानी होही तेन ह अवईया होली के आंच पाही।’’ ढेकना व किरनी को होली में जलाना सामाजिक चेतना का प्रतीक है। जो शोषक और अत्याचारी हैं, वे गरीबों को ढेकना और किरनी की तरह चूसते हैं। अतः प्रतीकात्मक रूप से उन्हें जलाना आम व्यक्ति जो शोषित और पीड़ित है, के मन का भाव है। फाग गीत भी इससे अछूता नहीं है-
अरे हां रे ढेकना… कहां लुकाय खटिया म
अरे कहां लुकाए खटिया म रे ढेकना
कहां लुकाए खटिया म
होलिका संग करवं बिनास रे ढेकना
कइसे लुकाए खटिया म
फाग गीतों में सामाजिक चेतना के साथ मनोरंजन भी जुड़ा हुआ है। अपने आस-पास की घटनाओं या घर-परिवार की बातों या फिर खाद्य वस्तुओं को भी गीत का विषय बनाकर मनोरंजक वातावरण पैदा किया जाता है। इसी तरह के कुछ उदाहरण-
अरे हां रे चिंगरी मछरी, चिंग-चिंग कूदे तरिया में
अदवरी बरी में मजा बताय रे चिंगरी मछरी
चिंग-चिंग कूदे तरिया में।
या इसी तरह गुलाबी चना या कांदा भाजी की बात लें। यहां भी मनोरंजन ही दिखाई पड़ता है-
अरे हां गुलाबी चना मजा उड़ाले भजिया में।
और दूसरा गीत यह भी-
अरे हां कांदा भाजी मजा उड़ाले बोईर में।
फाग गीतों में जहां मस्ती है, मनोरंजन हैं, वहीं प्रेम और स्नेह की सुकोमल भावनाएं भी सन्निहित हैं। फाग गीतों में विषय की विविधता है। ये फाग गीत किसी विशिष्ट की नहीं, बल्कि समष्टि की रचनाएं है। जहां किसी व्यक्ति विशेष का भाव भी सामुदायिकता के स्वर में घुल-मिल जाता है और समूह की संपत्ति में शामिल हो जाता है। अब राजा-प्रजा का भाव ही नहीं रहा। होली राजा-प्रजा, सबको एक कर देती हैं। सभी रंग और गुलाल के बहाने प्रेम के रंग में रंग जाते हैं।-
राजा विकरामादित महाराजा
केंवरा लगे तोर बागों में।
के ओरी लगे राजा केकती अऊ केंवरा
के ओरी लगे अनार महाराजा
केंवरा लगे हे तोर बागों में
नव ओरी लगे राजा केकती अऊ केंवरा
दस ओरी लगे अनार महाराजा
केंवरा लगे तोर बागों में ।
दोपहर लोग घर में पूजा आदि से निवृत्त होने के बाद फिर संध्या के समय नंगारा, मांदर, तासक और मंजीरा के साथ गांव की गुड़ी या चौपाल में उपस्थित होते हैं। बीच में गायकों और वादकों की टोली और चारों ओर दर्शक दीर्घा, जिसमें गांव की माताएं, बहू-बेटियां शामिल होती हैं। इस समय गीतों का गायन पूरी तरह से मर्यादित होता है। सब एक-दूसरे को गुलाल का टीका लगाकर परस्पर अभिवादन करते हैं। सारा गांव गुड़ी में उपस्थित होकर झूमता है। बच्चे हाथों में पिचकारी लेकर रंग डालते हैं। खुश होते हैं और चिड़ियों की तरह फुदक-फुदक कर नाचते हैं। शाम का दृश्य बड़ा मनोहारी होता हैं।
छत्तीसगढ़ी फाग गीतों में कबीर की उपस्थिति हर गीतों के प्रारंभ में दिखाई पड़ती है। कबीर सामाजिक चेतना के केन्द्र बिन्दु हैं। उनकी आहट लगभग अनिवार्य सी है। तभी तो गायक गीत छोड़ने से पूर्व‘ ‘अरा ररा सुन ले मोर कबीर’ कहकर अपना गायन प्रारंभ करता है। साखी के रूप में दोहा बोलता है-
अरा ररा सुनले मोर कबीर
बन बन बाजे बांसुरी, के बन बन नाचे मोर।
बन बन ढूंढे राधिका, कोई देखे नंद किशोर।।
फागुन का महिना हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का उन्नायक है। इससे हमारे सामाजिक मूल्य जुड़े हुए हैं। समाज विरोधी मूल्यों का दमन और मानवीय मूल्यों की स्थापना इसका प्रमुख उद्देश्य है। होली का पर्व समता, सद्भाव और समरसता का गायक है। यह त्यौहारों का नायक है। तभी तो गांव-गांव में लोककंठों से यह गीत गायक फागुन से पूछता है कि अब जाने के बाद फागुन तुम कह आओगे?
फागुन महारज, फागुन महाराज
अब के गए ले कब अइहो हो
अब के गए ले कब अइहो?
कोन महिना हरेली, कब तीजा रे तिहार?
कोन महिना दसेरा, कब उड़े रे गुलाल?
अब के गए ले कब अइहो?
सावन महिना हरेली, भादो तीजा रे तिहार,
कुंवार महिना दसेरा, फागुन उड़े रे गुलाल।
अब के गए ले कब अइहो?
होली हमारी सांस्कृतिक अस्मिता की सुन्दर पहचान है। प्रेम, अनुराग, कामना, सद्भाव और सह-अस्तित्व के रंगों में होली सबको अपने रंग में रंग लेती है। होली के फाग गीतों की सुरभि दिग-दिगन्त युगों-युगों तक बिखरती रहे और हमारी मनुजकता सदैव महकती रहे, यही मंगल कामना है।
आलेख
डाॅ. पीसी लाल यादव
‘‘साहित्य कुटीर‘‘ गंडई पंड़रिया जिला राजनांदगांव (छ.ग.) मो. नं. 9424113122
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