मित्रता की लोक परंपराएं
August 01, 2026
संवत् 2083 विक्रमी | श्रवण कृष्ण दशमी | रविवार
नक्षत्र: आर्द्रा | योग: व्यतिपात | करण: विष्टि
पर्व विशेष : | तदनुसार 06 सितंबर 2026

भारत में परंपराओं और तीज-त्यौहारों का महत्वपूर्ण स्थान है। एक ही मूल चिंतन विभिन्न क्षेत्रों में कई रूपों में प्रकट होता है। वर्षा ऋतु में गाँव, पशुधन, फसल की रक्षा के लिए गुजरात का 'बन्दी', त्रिपुरा की 'केर पूजा'(सीमा पूजा), नागालैंड का 'गेंना' और तमिलनाडु का 'एल्लई कावल' मानसूनी महामारियों से गाँव की सुरक्षा हेतु मनाए जाते हैं। इसी परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी 'सावनाही' का पर्व है, जो छत्तीसगढ़ और मध्य भारत में सावन में गाँव बाँधकर फसलों, पशुधन व पूरे समुदाय की रक्षा करती है।
सवनाही पूरे गाँव की सुरक्षा और ग्राम देवी-देवताओं के प्रति आस्था का लोकपर्व है। पीढ़ियो से चली आ रही यह परंपरा ग्रामीण समाज में अत्यंत महत्व रखती है। ऐसी लोकमान्यता है की सावन लगते ही या देवशयनी एकादशी के बाद नकारात्मक शक्ति, भूत-प्रेत, बीमारियाँ अधिक सक्रिय हो जाते हैं, इसलिए सवनाही का आयोजन किया जाता है और गाँव की रक्षा के लिए विशेष पूजा की जाती है। हालांकि इसका मूल उद्देश्य मौसम परिवर्तन दौरान सभी प्रकार के बीमारियों या किसी महामारी से सुरक्षित करना हो सकता है।

गाँव की सीमा पर सवनाही पूजा का दृश्य
(फोटो सौ: CG Encyclopedia)
सवनाही (सवनाही बरोई) गाँव बनाने तथा गाँव बाँधने की परंपरा है। बस्तर क्षेत्र में इसे माटी-पूजा या कोडिंग नाम से जाना जाता है। यह लोकविश्वास है की परंपरा को निभाने से गांव सभी प्रकार के हानि- बीमारी, जादू-टोना, अदृश्य नकारात्मक बाधाओं, बुरी ताक़त, और असुरी आत्मा से सुरक्षित रहेगा।
सामान्यतः इसका आयोजन आषाढ़ के अंतिम इतवार या सावन मास के प्रथम रविवार को किया जाता है, यह परंपरा 5 -7 रविवार तक चलती है। कुछ गाँवों में स्थानीय परंपरा के अनुसार इसकी तिथि भिन्न हो सकती है।
सवनाही पूजन गाँव की अंतिम सीमा पर किया जाता है। मुख्य स्थान- गाँव के अंतिम छोर, खार में, नदी- नाले के किराने, गाँव की पूर्व दिशा की सीमा (सियार), शीतला माता मंदिर (ठंडाई, जुड़वार, माता- पहुचउनी)
सवनाही मनाने के प्रमुख उद्देश्य
गाँव को सभी प्रकार की बीमारियों से सुरक्षित रखने के लिए। जादू -टोना, हानि बीमारियों, अदृश्य बाधाओं तथा बुरी शक्तियों से रक्षा के लिए। गाँव के जन, गाय, बैल, भैंस, बकरी एवं अन्य पालतू जीव-जंतुओं की सुरक्षा के लिए। गाँव में चेचक, हैजा जैसी महामारियाँ प्रवेश न करें तथा ग्रामवासी स्वस्थ एवं सुख-शांति के साथ रहें।
खेती-बाड़ी और किसान की अच्छी फसल एवं अधिक उत्पादन की कामना के लिए। सावन में बैगा झाड़-फूँक बंद कर देते हैं। सावन में टोनही एवं भूत-प्रेत की शक्ति बढ़ने की मान्यता है। प्रकृति के प्रति सम्मान तथा सुख-शांति और समृद्धि की कामना के लिए। गाँव के देवी-देवताओं की आराधना और प्रार्थना की जाती है।
सवनाही की पूजा-विधि
सावन मास के प्रथम रविवार से एक दिन पहले, अर्थात शनिवार की संध्या को गाँव का कोटवार रात में शीतला मंदिर में सवनाही मनाने के लिए पूरे गाँव की गलियों में हांका लगाकर सभी को एकत्र होने का संदेश देता है।
रात होते ही गाँव का बैगा महाराज, सिरहा, वरिष्ठ राउत, प्रमुख किसान तथा गाँव के वरिष्ठ व्यक्ति शीतला मंदिर में एकत्र होते हैं। पूजा की समस्त सामग्री एकत्र की जाती है। एक जोड़ा नारियल, बंदन, सिंदूर, नींबू, अगरबत्ती, काला-सफेद-लाल कपड़ा/ झंडा, टुकनी, सुपली, फिंता, अंडा, चूजा या काली मुर्गी, पैरा, नीम की लकड़ी से बनी छोटी बैलगाड़ी आदि।

रात्रि में शीतला माता मंदिर में बैगा, सिरहा, राउत और ग्रामीण पूजा की तैयारी करते हुए
ग्राम के समस्त देवी-देवताओं की पूजा करने निकलते है। शीतला माता, भैंसासुर, ठाकुर देव, सवनाही माता आदि। उस रात बेगा के साथ जाने वाले सभी लोग पूरी रात अपने घर वापस नहीं जाते और नहीं सोते। किसी सार्वजनिक स्थल, मंदिर अथवा देवालय में पूरी रात व्यतीत करते हैं।
गांव की सीमाओं पर पूजा अर्चना करते हैं। खार में हल को उल्टा गाड़कर उसकी पूजा करते हैं। सभी सामान के साथ ह्यूम-जग देकर, धूप, अगरबत्ती, अंडा-चूजा या काली मुर्गी सवनाही माता को अर्पित किया जाता है (स्थानीय परंपरा के अनुसार) तथा वहाँ से वापस आ जाते हैं।

गाँव की सीमा पर हल की पूजा
इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि पूजा के पश्चात कोई पीछे मुड़कर नहीं देखता, अन्यथा बुरी शक्तियाँ उनके साथ वापस आ सकती हैं। सवनाही माता नाराज़ हो जाती है। आमजनों के बीच यह मुनियादी (हाँका) किया जाता है कि रात को घर से नहीं निकलना है और दूसरे दिन कामकाज में नहीं जाना है, गांव की सीमा पार नहीं करना है।

सवनाही पूजा
दूसरे दिन अर्थात् रविवार सुबह चरवाहे गांव के सभी मवेशियों को गौठान में एकत्र कर लेते हैं, इसके बाद मवेशियों के मालिक अपने-अपने घर से पलाश के पत्तों में एक भुँसा रोटी (भूत-प्रेत की रोटी) को लेकर शीतला मंदिर पहुँचते हैं, जिसे गोबर छेना (कंडों) पर सेंका जाता है।
जब समस्त सामग्री तैयार हो जाती है, तब बैगा बांये हाथ से उस छोटी बैलगाड़ी को खींचता है और दूसरे हाथ से चावल फेंकता चलता है। बैगा के पीछे-पीछे गाँव के लोग तथा राउत, मवेशियों के साथ गाँव के पूर्व दिशा की ओर स्थित सीमा (सरहद) की ओर जाते हैं, जहाँ सवनाही माता / देवी की पूजा की जाती है।

नीम के लकड़ी की बैलगाड़ी
(फोटो सौ: CG Encyclopedia)
बैगा सभी सामग्री को गाँव के देवी-देवताओं को अर्पण करता है तथा गाँव के सुख-समृद्धि एवं रक्षा की प्रार्थना करता है। सवनाही देवी की सात बार परिक्रमा की जाती है तथा बैगा द्वारा मंत्र उच्चारण भी किया जाता है। भूंसे की रोटी का भोग लगाकर उसे ग्राम-सीमा के पार रख दिया जाता है। मुर्गी के मस्तक पर बंदन लगाकर, उसे सियार के उस पार, भूत-प्रेत तथा रक्सा की भेंट के रूप में छोड़ दिया जाता है।
वापस आने के बाद नारियल फोड़कर प्रसाद वितरित किया जाता है, जिसे सिर्फ़ वही लोग खाते है जो बैगा के साथ पूजा में रहते हैं। पूजा के दिन काम-काज बंद, गांव के बाहर जाना बंद, कुँवा, तालाब, नदी तथा अन्य सार्वजनिक जगह से पानी भरना बंद रहता है। पूजा सम्पन्न होने के बाद (हांका पश्चात) कार्य प्रारम्भ करते हैं। अलग-अलग क्षेत्र में परंपरा के तौर- तरीके या प्रक्रिया भिन्न हो सकती है लेकिन हर जगह इसका मूल भाव एक ही है। प्रकृति का आभार व्यक्त करना और समुदाय में सद्भाव बनाए रखना।
सवनाही चित्रकारी
पूजन के पश्चात महिलाओं द्वारा घरों की मुख्य दीवारों पर गाय के गोबर से लेपन कर विभिन्न प्रकार की आकृति बनाई जाती है।

पूजा के बाद दीवार पर गोबर से
पारंपरिक आकृतियाँ बनाती महिला
मनुष्य, द्वारपाल, त्रिशूल, बाघ, बंदर, शेर आदि। चार अंगुल की दो लाइन से पूरे घर को बाँधा जाता है। ग्रामीणों की मान्यता है की गोबर की चित्रकला घर का वातावरण शुद्ध करती है और बाहरी बीमारियों का घर में प्रवेश नहीं होने देती। भूत-प्रेत इन दिनों को देखकर डर जाते हैं और घर के अंदर प्रवेश नहीं करते।
सवनाही (सवनाही बरोई ) छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो ग्राम-देवताओं के प्रति श्रद्धा, विश्वास और प्रकृति के प्रति सम्मान उजागर करता है। बदलते समय में ऐसी लोकपरंपराओं का संरक्षण हमारी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
लेख -
योगिता साहू
कृषि-उद्यमी एवं लोक संस्कृति की अध्येता
सवनाही: ग्राम देवी देवता की आराधना और ग्राम सुरक्षा की परंपरा
August 07, 2026