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'सत्यं-शिवं-सुन्दरं' का आदर्श और हमारा जीवन

'सत्यं-शिवं-सुन्दरं' का आदर्श और हमारा जीवन

कहा जाता है कि आदर्श और जीवन एक-दूसरे के अनुरूप नहीं होते, क्योंकि जीवन का मतलब वास्तविकता से है, जो आदर्श से अवश्य ही भिन्न है, अर्थात् आदर्श के दर्शन-अन्वेषण के लिए हमें जीवन से परे कहीं देखना होगा, और इस मान्यता से 'सत्यं शिवं सुन्दरं' का आदर्श यदि कुछ है तो जीवन से परे भी हमारी दृष्टि का अन्वेषण उसे खोजने का यत्न करे, यह सर्वथा अनिवार्य है। किन्तु इस वक्तव्य का सत्य जीवन की संकुचित परिभाषा के एकान्त विश्वास की सीमा से ही निर्धारित होता है, जीवन की परिभाषा बदल जाने से, व्यापकतर हो जाने से, यह विश्वास सत्य और मान्यता का सहगामी नहीं रह पाता।

जीवों की समस्त किया-प्रक्रियाओं को जीवन कह सकते हैं। मनुष्य के जीवन के दायरे में मनुष्य की आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक सभी क्रिया-प्रक्रियाएँ आयेंगी। एक मानसिकअन्तर्द्वन्द्र या आध्यात्मिक अनुभव या जगत् की वस्तु का सत्य सभी मनुष्य के जीवन की घटनाएँ हैं। उनके मानसिक तथ्य-तत्व भूत-जगत् के वस्तु सत्य से किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण नहीं हैं  वे भी उसके जीवन के आवश्यक और अन्तर्बद्ध अंग हैं। 

 

जीवन अतएव वस्तु-जगत के परे और अतिरिक्त भी जिया जाता है। हम उसे अपनी आत्मा के लोक में, मेघा के संसार में तथा इन्द्रियों के जगत् में विविध व्यक्ति माध्यमों के द्वारा अनुभूत करते हैं। वे उस जीवन से अभिन्नतया आबद्ध हैं, अर्थात् मनुष्य के बाह्य कार्य-समूह का अभिधान ही जीवन नहीं, चिंत्य, अनुभूत और आत्मसात भी जीवन-चित्र को आकृति, मुद्रा, प्रभाव और प्रयोजन प्रदान करता है, इस प्रकार कि जैसे फूल और फल में मिट्टी, पानी, जैसे पात्र में आकर ऐसे कि जैसे कोई सचेतन प्रयोजन मूर्तिकार की कला-सामग्री में प्रविष्ट होकर अन्दर-ही-अन्दर उसका रूप और आकार गढ़ता रहे।

अभिलाषाओं के नक्शे में आदर्श की स्थिति गौरीशंकर श्रृंग की सी हैं। जीवन में व्यवहार या विचार में, जिसे व्यक्ति सर्वोच्च प्राप्य समझ सके, वह इष्ट और अभिप्रेत का सा प्यार जो उसका नाप और मान हो- वही आदर्श है। दूसरे शब्दों में, अपने व्यक्तित्व की संभावनाओं की विराटतम, विशालतम अभिव्यक्ति का नाम ही वह आदर्श रखता है।

आदर्श  एक व्यक्तित्व का  चित्र बन जाता है, व्यष्टि-व्यष्टि की भिन्नताओं के साथ, किन्तु इन चित्रों के अन्तर्भूत सिद्धान्तैक्य का पर्यावलोकन हमें आदर्श के सर्वजनीन सर्वमान्य माप-मान का सामान्य संकेत बताता है। यही "सत्यं-शिवं सुन्दरं" के आदर्श की आधारशिला है। दूसरी प्रक्रिया समाज से व्यक्ति की ओर संक्रमित होते हुए आदर्श की प्रवाह-धारा में दृष्टिगोचर होती है। समाज का समष्टिगत्त आदर्श व्यक्ति व्यक्ति की सीमाओं में वितरित एवं विभक्त होकर, व्यक्तिगत दशाओं से परिवर्तित परिवर्षित होकर सामाजिक और वैयक्तिक आदर्शों का प्रारूप बनाता है।

जैसे सरोवर के फैले हुए जल में तैरते हुए कुम्भ-पात्रों में सरोवर का ही थोड़ा-सा जल भरा रहता है, सरोवर जैसे समष्टि का आदर्श हो और कुम्भोदरनिहित जल मानो वह हो, जिसे व्यक्ति ने समाज के सरोवर से लेकर अपना आदर्श बनाया। समाज की अन्तरात्मा और अन्तर्नयन इस आदर्श के द्रष्टा होते हैं, मनुज भी अपनी सामाजिक अन्तदृष्टि और समष्टिगत अनुभूति की राह उस दर्शन और भाव को व्यक्तिगत बनाता है। यों, उस सामाजिक आदर्श का शिलान्यास होता है, जो अपने प्रभाव और परिणाम की प्रक्रिया में व्यक्तिगत दृष्टिलोक का प्रभाव और प्रजनन करता है।

"सत्यं शिवं सुन्दरे" का आदर्श व्यक्तियों के अन्तर्भूत सिद्धानतैक्य का पूंजीभूत स्वरूप है, या समाज की आत्मानुभूमि और मान्यता द्वारा विपरीत और संक्रमित कल्पना है- इसका निश्चय अतीत दुःसाध्य है। प्रतीत तो ऐसा होता है कि वह दोनों ही पहलुओं से घनिष्टतया संग्रंथित है। यदि उसका उद्भव व्यक्ति की परिधि में माना जाय तो समाज की स्वीकृति निहिताभिप्राय है। यदि समाज की आत्मानुभूति में उसका उद्भव हुआ है तो व्यक्ति का विचारैक्य और समाज अनुभूति स्वतः मान्य है।

सत्य तो यह है कि "सत्यं शिवं सुन्दरं" का आदर्श एक अत्यन्त व्यापक प्रतीति है, व्यापक गत्यामकता के अर्थ में भी, व्यापक सुविस्तृत होने के अभिप्राय से है। वह एक ही साथ सामाजिक आदर्श भी है, और उपादेयता में सर्वत्र ही सत्य है, और अभिप्रेत भी है। क्षितिजलीला की तरह उसका क्षेत्र व्यापकतम अप्राप्य है, किन्तु जीवन के लीलापट पर उसके आंगिक और पक्षीय सत्य-दर्शन का वैभव उसकी सरस और विराट निखिलता का परिचायक है।

अपनी चिरन्तनता में भी वह जीवन में क्षण-क्षण पर बदलते हुए धारा प्रवाहों को अन्तर्निहित किये हुए है। इसी अर्थ में वह शाश्वत होकर भी सामायिक है, परिवर्त्य होकर भी नश्वर नहीं है। इसी माने में "सत्यं शिवं सुन्दरं" के आदर्श में गति के गुण स्मन्दित होते हैं वह गत्यात्मक है। आदर्श यही रहता है, इष्ट की आकृतियाँ यही रहती हैं, किन्तु व्याख्याएँ बदल जाती हैं, दृष्टिकोण दूसरा हो जाता है। अब तक ध्रुविलास की कांति सुन्दर थी, तो अब भ्रूभंग की कांतिमयता स्थानापन्न हो गयी है।

अब तक यदि सुन्दर की परिधि में ही विश्व परिगण्य था तो अब शिवं की संपादन-सीमा में ही सुन्दरता सन्निहित है। सत्य की धाराएँ भी इसी प्रकार बदल जाती हैं। सत्य, या जिसे विवेकसिद्ध मान्यता कह लीजिए, जीवन की विविध रीतियों और विश्वासों का अनुचर है। विवेक संस्कार का परिणाम है। संस्कार उत्तराधिकार और वातावरण में मूलबद्ध रहता है। उत्तराधिकार को निर्णायिका प्रवृत्ति और वातावरण की सांकेतिक दिशा-निर्देशिका दोनों ही बदलती हैं, नवीन और विविध परिवर्तनों का उद्भव करती हैं।

इस सत्य-दर्शन के ओर इसी प्रकार इस आदर्श के विविध पहलुओं को देखने के कोण बदलते हैं, रंग बदलते हैं। किन्तु जब भी इस सतत परिवर्तन के प्रभंजन में इस आदर्श की चिरन्तनता निर्विवाद है। सत्य के रूप-विशेष पर विवाद होता है; किन्तु वादी प्रतिवादी दोनों ही अपनी मान्यता को सत्यता का गौरव देने के लिए खूब आतुर और उत्सुक भी रहते हैं।

सत्य तो आदर्श तब भी रहता है, विवाद व्याख्या पर होता है; और यह समझ लेने की आवश्यकता है कि यह चिरंतन सत्य, नाम मात्र का ही नहीं, भाव और अभिप्राय का भी है। मोटे तौर पर सत्य न्याय है। 'न्याय', तर्क की प्रक्रिया से प्राप्त प्रतीति है। तर्क अन्तिम कभी नहीं हो सकता। बुद्धि और वातावरण के परिमार्जन और परिवर्तन के साथ तर्क की मान्यताएँ तिथिक्रम शून्य होकर मृत और अमान्य हो जाती हैं।

नयी मान्यताएँ, नये आधार और नयी राहें उनका स्थान ले लेती हैं। न्याय संगत इस प्रकार सदैव एक-रूप ही नहीं रहता। उस अनेकता में एकता ही सत्य है। वह एकता ही सत्य है। यह एकता शाश्वत है, और इसलिए सत्य भी शाश्वत है। क्षण-क्षण और युग-युग की न्याय-बुद्धि में जो चिरन्तन तथ्य है, वही सत्य है। समय या युग विशेष का सत्य न्याय है, तो युगों की न्यायबुद्धि में एकसूत्रता के सामंजस्य का नाम सत्य है।

सत्य की सापेक्षता पर बहुत गहन विचार और विवेचन हुआ है कि सत्य एकांकी नहीं, अपितु सापेक्ष होता है। इस वक्तव्य की सुस्पष्ट तर्कसिद्धता निरापद है और दृष्टिकोण की भिन्नता, जिसके मूल में शायद प्रस्थिति और वातावरण का अन्तर है, हमारी धारणाओं को भिन्न घरातल पर पहुँचा देती है, यह ज्ञान की प्रक्रिया के दृष्टा के लिए नया सत्य नहीं है।

दार्शनिक स्याद्वाद के सात वक्तव्यों को इस वैचारिक सापेक्षता के सामंजस्य से देखा जाय तो सत्य को प्रवृत्ति और स्वभाव का आभास मिलता है- वहीं पक्षीय सत्य और पूर्ण सत्य का भिन्नत्व हमारे समक्ष आता है। पक्षीय सत्य के लिए, जैसाकि छान्दोग्य उपनिषद् में कहा है: 'वाचारम्भणम् विकारोनामधेयम्' एक दृष्टि से समय का सत्य, स्थान का सत्य आदि पक्षीय सत्य हैं। चिरन्तन एकसूत्रता पूर्ण सत्य का आभास है।

कहते हैं, समाज का सत्य भी होता है, व्यक्ति का भी सत्य होता है, किन्तु वास्तव में इस भिन्नता और वैविध्य में जो शाश्वत माननीय दृष्टि है, वही सत्य है, समाज विशेष का सत्य समय और विस्तार की सीमाओं से परिमित रहता है। व्यक्ति का एकान्तिक सत्य भी स्वार्थ, समय और विस्तार में संकुचित बन जाता है। सत्य इनको चिरन्तन एकसूत्रता में मिल पायेगा। समाज व्यक्तियों का अंकगणित समूह नहीं है।

उसे एक आंगिक संगठन कहा जाता है। उस आंगिक संगठन की जो सामान्य वाणी है, वही समाज का सत्य या जिसे रुसो ने वास्तविक इच्छा कहकर पुकारा है, कहा जा सकता है। किन्तु क्या सचमुच कोई ऐसे आंगिक समाज की तथाकथित सामान्य वाणी संभूत या सम्भव है, जिसे ग्रन्थकारों ने कल्पना की बुनकरी और बाग्जाल अथवा वाक्ठल के ताने-बाने में सजा कर सिद्ध करने का प्रत्यत्न किया है, उसके न होने के बारे में ही नहीं, न हो सकने के बारे में भी, हमें पर्याप्त विश्वास की गुंजाइश दिखती है।

जिसे आंगिक समाज की सामान्य इच्छा कह कर ग्रन्थकार हमारे मस्तिष्क में उतारना चाहता है, वह कौन जानता है कि हल्लावादियों का प्रतीक्षण प्रचार ही नहीं हैं? कैसे समझा जाय कि जिसे आंगिक समाज की इच्छा कह कर गुरुत्व दिया जा रहा है वह एक तानाशाही सरकार की प्रस्तावना ही नहीं है? आंगिक समाज की कल्पना में तथ्य हो सकता है, किन्तु उसकी सामान्य इच्छा या तो एकमात्र छ‌द्मवेदी छलना है, अथवा ग्रन्थाकार की मानसिक अस्पष्टता और अव्यावहारिक तथा अवास्तविक सूझ मात्र है।

समाज का सत्य इसलिए इस आंगिक समाज की सामान्य इच्छा का ठीक अनुरूप नहीं। वह भी मनुष्य के सत्य का ही उपांग है। मनुष्य का सत्य एकांगी स्वार्थ द्वारा निर्धारित नहीं होता। उसकी करुणा, सहानुभूति, संवेदना, स्वार्थ और आत्माभिव्यंजन आदि संगृहीत होकर उसके सत्य को जन्म देते हैं। मनुष्य का सत्य समाज से, वातावरण से संस्कार लेता है, रूप-आकार लेता है, दिशा लेता है, किन्तु उस पर एक अद्वितीय वैयक्तिक मुद्रा अवश्य रहती है।

इस आधार पर सत्य को हम मनोविज्ञान की प्रत्यभिज्ञा का पर्याय कह सकते हैं। सत्य जानने की क्रिया का फल और परिणाम है। हमारे चेतन-उपचेतन में जो संस्कार, जो विश्वास, जो ज्ञान निवास करता है, वही हमारा सत्य है। यह सत्य घटनात्मक नहीं, अपितु भावनात्मक (Abstract) होता है, अर्थात् प्रत्यभिज्ञा की भावनात्मक एकसूत्रता का पूर्ण प्रभाव ही सत्य है। सत्य का आदर्श उसकी एकांगिता में नहीं, व्यापकता में है।

घटना में नहीं, भाव में है; विशिष्टता (Particularity) में नहीं, सामान्यतः (Generality) में है: संकुचित दायरे में नहीं, विस्तृत और उदार दृष्टिकोण में है। "सत्यं-शिवं-सुन्दरं" की त्रिमूर्ति में एक ही सत्य-रूप की प्रतिष्ठा है। सत्य कर्तव्य-पथ के प्रवाह में आकर शिवं बन जाता है और भावना (Affection) से समन्वित होकर सुन्दरं के रूप में दर्शन देती है। सत्य शिवं की कारयित्री प्रेरणा है। वह उसकी आधारभूमि है और उद्भव क्षेत्र भी है। व्यक्ति का उदात्त शिवं भाव ही समाज का सत्य है।

शिवं मूलतः एक सामाजिक स्फुरण है। उसका वेग और परिणाम भी सामाजिक ही है। साहित्य के क्षेत्र में इसका शास्त्रीय समानान्तर साधारणीकरण में मिलता है। 'परस्य न परस्येति ममेति न ममेति च' अथवा 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की प्रेरणा से कर्म-प्रवृत्त और कृतसंकल्प समाजकेन्द्रिक संयोजनाएँ शिवं का मूल आधार हैं। शिवं भी सत्य ही की तरह भेद में अभेद या विपरीतताओं में ऐकय के समान है, वह एकांगी नहीं हो सकता।

'स्वात्मनि एवं समाप्त महिमा' की आपाधापी शिवं का प्रेय नहीं है, वह समाज के, जगत के कल्याण की ओर अपनी दृष्टि स्थित करके चलता है। जिसे आधुनिक युग में सामाजिक हित-संपादन का परिवर्धन (Maximisation of Social Welfare) कहते हैं, वहीं शिवं है। सामाजिक को व्यापकतर बनाकर सृष्टिगत किया जा सकता है। हित की सीमाएँ जीवन के प्रत्येक भाग और कोने को छूती हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को इष्ट बनाकर हित की प्रेरणा विकास की संपूर्णता का दर्शन करती रहे। सत्य और सौन्दर्य का फलीभव शिवं में ही होता है।

सौन्दर्य भी सत्य का ही स्वरूप है। भावना के क्षेत्र में, जैसा कि दादू की भूमिका में रवीन्द्र ने कहा है- सत्य की पूजा सौन्दर्य में है, जैसे कि विष्णु की पूजा नारद की वीणा में है। भावना का जगत कोमल तंतुओं से निर्मित होता है। सुन्दरं के स्थान पर भारतीय साहित्य में 'प्रिय' शब्द का प्रयोग हुआ है। वास्तव में 'सुन्दर' शब्द में 'प्रिय' व्यापक और समुचित भी है। वह एक मनोवैज्ञानिक ऐटीट्यूड भी बताता है। सुन्दरं का अभिप्राय अत्यन्त गत्यात्मक है, होना चाहिए।

'समै समै सुन्दर सबै, रूप कुरुप न कोय, मन की रूचि जेती जितै, तित तैसी रूचि होय' की उक्ति में अन्तराल का महान सत्य है। सौन्दर्य की, सत्य की, कल्याण की सभी धारणाएँ सतत परिवर्तनशील हैं। यथार्थवाद जिस प्रकार छायावाद के सौन्दर्यबोध से विपरीत खड़ा होकर विकास-श्रृंखला की एक महत्वपूर्ण चाहे प्रतिक्रियावादी ही कड़ी है, उसी प्रकार सौन्दर्य की धारणा सदैव बदलने वाली है। यद्यपि उनमें क्रान्तिकारी वैपरीत्य इसलिए संभव नहीं कि मनुष्य की प्रवृत्तियाँ, आदतें और भावनाएँ, जो कि सौन्दर्यबोध का मूल उत्स है, इस प्रकार नहीं बदल सकती।

सौन्दर्य की परिभाषा, कि सौन्दर्य हमारी इन्द्रियों के रूप-संबंधों की अन्तर्भूत एकता है, पर्याप्त संतोषजनक है, किन्तु इससे आधुनिक (Asymmatrical Art) का वर्गीकरण कहाँ होगा, यह आपत्ति उठती है। यहाँ 'प्रिय' शब्द की श्रेष्ठता सिद्ध होती है, या यों कहिए कि यहाँ' प्रिय' शब्द सुन्दर की परिभाषा देता है। यदि आधुनिक कला प्रिय है तो वह हमारे आदर्श की परिधि से बहिर्गत नहीं मानी जायेगी। सौन्दर्य कलात्मक या पर्याय नहीं भी हो, तो उसमें अन्तर्निहित तो अवश्य है।

साहित्य का सहित भाव सौंदर्य कलात्मक का पर्याय नहीं भी हो, तो उसमें अन्तर्निहित तो अवश्य है। साहित्य का साहित्यभाव सौंदर्य का ही द्योतक है। सौन्दर्य एक द्रावी प्रभाव है। वह अपने वेग में और ऊष्मा में, आत्मीयता में और सहानुभूति में हमारे मन पर अधिकार कर लेने में समर्थ है। इसीलिए वह सत्यं और शिवं का प्रभावशाली माध्यम कहा जा सकता है। हमारा जीवन उस प्रभाव के छायामाधुर्य में उदात्त बनता है मंगलमय बनता है और उल्लास की रागिनियों से सजीव बनता है।

प्रयोजन का वह माध्यम ही नहीं, स्वयं प्रयोजन भी है। इसलिए कि यदि आनन्द हमारे जीवन का विश्रान्ति-उपवन है तो सौन्दर्य उस उपवन में प्रसूत सुवास और माधुर्य है।

यह आदर्शत्रयी अतः जीवन की चिरन्तनता में अंकित है। पूर्ण जीवन का स्वप्न इन तीनों के अन्तर्बद्ध 'सच्चिदानन्द' की कल्पना के बिना अधूरा ही है।

पंत जी के शब्दों में:

वही प्रज्ञा का सत्य स्वरूप,

हृदय में बनता प्रणय अपार,

लोचनों में लावण्य अनूप, लोक सेवा में शिव अविकार।

जीवन को पूर्णता के आदर्श की उपलब्धि का पंच इसी त्रयों से निर्मित हुआ है। जहाँ सत्य ही शिव है और शिव ही सुन्दर है, तीनों एक में, और एक तीनों में अन्तर्भूत-वह आदर्श हमारे जीवन का सर्वोच्च इष्ट है। वही सार्थक जीवन है।

डा. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी
'सत्यं-शिवं-सुन्दरं' का आदर्श और हमारा जीवन
"संस्कृति :अंक-02"

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