आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल पंचमी | मंगलवार

नक्षत्र: मृगशिरा | योग: शोभन | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 21 अप्रैल 2026

आज का पंचांग

संवत् 2083 विक्रमी | वैशाख शुक्ल पंचमी | मंगलवार

नक्षत्र: मृगशिरा | योग: शोभन | करण: बव

पर्व विशेष : | तदनुसार 21 अप्रैल 2026

वैदिक काल की सरस्वती नदी, जो लुप्त हो गई

वैदिक काल की सरस्वती नदी, जो लुप्त हो गई

प्राचीन भारतीय वाङ्ङ्गमय में भारत की पवित्र नदियों का प्रचुर उल्लेख मिलता है। भारतीय संस्कृति में हिमालय की पर्वतमालाओं तथा गंगा, यमुना, सरस्वती तथा सिंधु आदि नदियों को इतनी गरिमा प्राप्त है कि किसी भी शुभ कार्य का प्रारंग्भ करते समय भी इनका स्मरण किया जाता है। प्रात. स्नान करता हुआ एक भक्त अपने शरीर पर जल छिड़‌कते हुए भारत की प्रायः सभी पवित्र नदियों से स्थान करने का महात्म्य प्रान्त करने की कामना इस प्रकार करता है।

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती। नर्मदे सिंधु कावेरि जले स्मिन सनिधि कुरु ॥

यहां वर्णित नदियों में से आज गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सिंधु तथा कावेरी नदियां तो मौजूद है, किन्तु सरस्वती का आज कहीं भी अस्तित्व शेष नहीं हैं। जिस विशाल सरस्वती नदी का ऋग्वेद में अनेक स्थानों पर वर्णन मिलता है, वह कहाँ लुप्त हो गई? कहा जाता है कि ऋग्वेद की रचना सरस्वती और उसकी सहायक नदी दृशद्धती नदी के क्षेत्र में ही थी। ऋग्वेद में सरस्वती नदी की यशगाथा में 89 ऋचाएँ मिलती हैं। इसके 10/75 सूक्त, जिसे नदी सुक्त' कहा गया है, में कई नदियों का उल्लेख एक साथ है। उक्त सूक्त के पंचम मंत्र में सिन्धु की पूरषी नदियों के नाम इस प्रकार दिए गए हैं:-

इसमें गंगे यमुने सरस्वती । शुतुद्रि स्तोर्म सन्चता परुष्णया ।।

असिकन्या मरुदृधे वितस्तयाड। जिकौंच श्रृणुह्या सुषोमया ॥

यहां गंगा, यमुना, सरस्वती, शुतुद्री (सतलुज), परुषणी (रावी), अस्कणी (चेनाव), मरुद्वा (चेनाव की एक सहायक नदी), वितस्ता, (झेतम), जाजीर्कीया, बिपाशा (व्यास) तथा सुधोमा का उल्लेख है। ऋग्वेद में "सप्तसिन्धव" शब्द अनेक बार उल्लिखित हुआ है, परन्तु इसमें निहित ये सात नदियां कौन सी हैं ? इस पर भी विद्वानों में मतैक्य नहीं है।

आम धारणा यही है कि सात नदियाँ शतुद्री, विपाशा परुष्णी, वितरता असिक्नी, सिन्धु तथा सरस्वती ही हो सकती हैं। सरस्वती के सम्बन्ध में मैक्समूलर के इस कथन ने कि सरस्वती अफगानिस्तान की "हरहती" नदी है, एक नई भ्रांति उत्पन्न कर दी। उनका मत है कि फारसी और पुश्तो में "स" का "ह" हो जाता है, इसलिए सरस्वती का "हरहती" हो गया होगा। किन्तु यह सही नहीं है क्योंकि ऋग्वेद में उल्लिखित सरस्वती का उद्‌गम हिमालय पर्वत में है, जो अरब सागर में कच्छ की खाड़ी में गिरती थी। आज यह नदी लुप्त हो चुकी है।

वैदिक काल की सरस्वती

ऋग्वेद काल में सरस्वती नदी सिन्धु नदी से भी विशाल थी। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केन्द्र, अहमदाबाद के अन्तरिक्ष अनुप्रयोग केन्द्र द्वारा सरस्वती तथा अन्य नदियों द्वारा मार्ग परिवर्तन के सम्बन्ध में कुछ उपयोगी अध्ययन किए गए हैं। इनसे पता चलता है कि अन्य कई नदियाँ भी सरस्वती में मिलती थीं यह "नारा" से होती हुई कच्छ की खाड़ी में समुद्र में गिरती थी।


                                             वैदिक काल की महान नदी सरस्वती दो नदियों शुतुद्रि (सतलज) और जिसे आज  ''यमुना " कहा जाता है दोनों के मेल से बनी थी ा
                                             अरावली  उस समय ऊंचा पर्वत न होकर एक  वृच्छादित क्षेत्र मात्र था जिसका ढलान  दक्षिण-पश्चिम के ओर था  

यह विशाल नदी हिमालय से निकल कर उत्तरापथ में हरियाणा, मारवाड़ और बहावलपुर होती हुई सीधे कच्छ की खाड़ी में समुद्र में जा मिलती थी। यह नदी पूर्व-महाभारत वैदिक काल की एक गौरवपूर्ण नदी थी। गंगा और यमुना का उल्लेख ऋग्वेद में अपेक्षाकृत बहुत ही कम है, किन्तु सरस्वती की प्रशंसा करते हुए ऋषि लोग कभी नहीं अघाते थे। इसी के किनारे वे सामगायन करते हुए यज्ञ यागी के अनुष्ठानों में दश्वचित रहते थे।

इसके किनारे पर 1200 से अधिक बस्तियाँ और ऋषि-आश्रम तथा अनेक नगर बसे थे, जो हड़प्पा संरकृति (आज से 4000 से 4100 वर्ष पूर्व) के थे। वह नदी कहां गई? आज हरियाणा में घग्घर तथा राजस्थान में मारवाड़, पाकिस्तान में बहाबलपुर तथा सिन्ध में नारा के रेत से भरे सूखे नालों के रूप में उसके अवशेष दृष्टिगोचर होते हैं। इन सूखे नालों में अब बरसात में बाढ़ का पानी ही बहता है।

सरस्वती नदी पश्चिमी गढ़वाल में हिमालय पर्वत के बन्दरपूंछ से निकलती थी और आदि बद्री, भवानीपुर तथा बालछापुर की पहाड़ी तराई से दक्षिण की ओर बहती हुई शुतुद्रि (सतुलज) से मिलती थी। सतलुज तिब्बत के दक्षिण पश्चिम में कैलाश पर्वत से निकलती थी। प्राचीन सरस्वती आज की यमुना और सतलुज के संगम से बनती थी। उस काल में यमुना उत्तर से पश्चिम की ओर बहती थी और गंगा में नहीं मिलती थी। यमुना और सतलुज का यह संगम पटियाला के 25 किलोमीटर दक्षिण में शतराना के स्थान पर होता था।

आगे इसका विस्तार 6 से 8 किलोमीटर तक हो जाता था, जिसके अवशेष आज परपर के रूप में दिखाई देते हैं। घग्घर को मारवाड़ तथा पाकिस्तान के बहाबलपुर में "हकरा" के नाम से जाना जाता है और कच्छ की खाड़ी में गिरने से पूर्व सिन्ध में इसे "नारा" कहा जाता है। दृषद्वती जो आजकल सूखे नाले के रूप में चितंग या चीतांग के नाग से जानी जाती है, सिरसे के पास सरस्वती नदी में मिलती थी।

सरस्वती और दृषद्वती के बीच ही कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत का इतिहास प्रसिद्ध युद्ध हुआ था। इसी प्रदेश को "ब्रह्मावर्त" की पुण्य भूमि माना जाता है। लगभग 40,000 वर्ष पूर्व थार के रेगिस्तान सहित पश्चिमी राजस्थान में पानी का कोई अभाव नहीं था। इसकी पुष्टि बालू के टिब्बों के गरम चमकीले रेतों और लुनकरन सार तथा होतबाना झीलों की कीचड़ों के नीचे दबे अनाज की बालों के अवशेषों से हो जाती है।

सरस्वती और उसकी सहायक नदियों का जल राजस्थान के भाग में बहुतायत से उपलब्ध था। दक्षिण भाग में लवनावती (लूनी) के वर्षभर बहने वाले स्त्रोतों का जाल बिछा था, जो सरस्वती, दृषद्वती तथा लूनी का एक उपजाऊ क्षेत्र रहा था।

श्री वी० एन० मिश्र के अनुसार यहीं पाषाण युग के लोगों ने बस्तियां बसाई थी, जो उनकी संस्कृतियों का एक बड़ा केन्द्र रहा था। आज से 10,000 से 3500 वर्ष पूर्व यहां की जलवायु नम थी और वर्षा भी अब से तीन गुनी मात्रा में होती थी। लोगों ने आज से 3,000 वर्ष पूर्व सांभर झील के क्षेत्र में तथा लुनकारनसर के पास खेती करना आरंभ कर दिया था। हड़प्पन संस्कृति की 1,600 बस्तियों में से 75 प्रतिशत आवासीय बस्तियों के अवशेष घग्घर पाटी में अमावली और कालिबंगन तथा हकरा पाटी में अलीमुराद तथा कोट में प्राप्त होते हैं।

आज से 4,600-4500 से 4,2000 वर्ष पूर्व की हड़प्पन सभ्यता लगभग 13 लाख किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई थी। इस सभ्यता के पुराने अवशेष सरस्वती के निचले भाग में तथा बाद के अवशेष शिवालिक की पहाड़ियों तक मिलते हैं। लगभग 3,700 वर्ष पूर्व सरस्वती को उसकी सहायक नदियों से जल मिलने में कमी आने लगी। ऐसा क्यों हुआ?

इसका एक कारण जलवायु में भारी परिवर्तन हो सकता है, क्योंकि लगभग 3,700 वर्ष पूर्व के आस पास इन झीलों के पानी का खारा हो जाना इसका संकेत है। दूसरा कारण सरस्वती के जल स्त्रोंतों का मार्ग परिर्वतन है। जिसे डा०के० एस० बाल्दीय द्वारा "पाइरेसी" अर्थात् जल अपहरण या जल चोरी कहा गया है। यह चोरी कैसे हुई और किसने की?

 

 

गंगा ने सरस्वती जल का अधिग्रहण कर लिया

भौगोलिक परिवर्तनों के कारण भारतीय उपमहद्धीप के उत्तरी भाग में कई विर्वतनिकी (टेक्टोनिक) परिवर्तन हुए और अरावली पर्वत धीरे-धीरे ऊपर उठना आरंम्भ हो गया, जिससे सरस्वती के मार्ग में भी परिवर्तन होना आरंम्भ हो गया। अब इसके बहाव का रूख पूर्व की ओर हो गया। सम्भवतः चौतांग नाला सरस्वती द्वारा मार्ग परिर्वतन का ही सूचक है। अरावली की ऊंचाई में वृद्धि के कारण चम्बल की एक शाखा ने अपना मार्ग उत्तर दिशा से दक्षिण की ओर बहते हुए गहरा कर दिया।

इसका प्रभाव सरस्वती पर भी पड़ा। वर्षा ऋतु में सरस्वती की बाढ़ का पानी इस नए चैनल (जिसे बाद में "यमुना" कहा जाने लगा) की और बह निकला, जिसका परिणाम यह हुआ कि सरस्वती का जल गंगा की दक्षिणी सहायक नदी चम्बल की ओर बहने लगा। जिसे चम्बल ने ग्रहण कर लिया। इस प्रकार सरस्वती का यह जल गंगा को प्राप्त हो गया।

डा० रा० अ० चान्सरकर ने भी भारत की दृश्य भूमि का भू-वैज्ञानिक आभार नाम पुस्तक में इस मत का समर्थन किया है। इस प्रकार जल की कमी के कारण यह सरस्वती नदी कालान्तर में मरुभूमि में पूर्णतः सूख गई। पटियाला के पास "सुरसती" नाम से जो एक छोटी सी नदी है, कहा जाता है कि यही सरस्वती का अवशेष है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार कुछ लोगों का मानना है कि अदृश्य रूप से सरस्वती नदी प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम स्थल पर आकार मिल गई है। इसी कारण से प्रयाग को त्रिवेणी का संगम कहा जाता है। किन्तु न तो वेद में इसकी कहीं कोई पुष्टि मिलती है और न कोई प्रत्यक्ष प्रमाण ही इसका साक्षी है।

ऋग्वेद काल में सरस्वती पश्चिम समुद्र तक निरन्तर बहती थी। ब्राह्मण युग में इसका सूखना आरंभ हुआ। ताण्डय ब्राह्मण (25/10/16) में सरस्वती के लुप्त होने तथा जैमिनीय ब्राह्मण (4/26/12) में पुनः निकलने के स्थान का उल्लेख है सरस्वती के लुप्त होने के स्थान का नाम "विनशन" है, जो आधुनिक सिरसा के समीप है। सरस्वती के सूख जाने पर इसके तट पर बसे लोग अन्यत्र चले गए। कहा जाता है कि "सारस्वत ब्राह्मणों" के पूर्वज कभी सरस्वती नदी के तट पर ही रहते थे।

मार्कंडेय और बारह पुराणों से पता चलता है कि सरस्वती महाभारत काल में सूखने लगी थी महाभारत के वनपर्व तथा सिद्धान्त शिरोमणि में भी सरस्वती के लुप्त होने का उल्लेख है। भू उपग्रह से लिए गए चित्रों से पता चलता है कि यमुना नदी ने 10 से 40 किलोमीटर तक पूर्व की और अपना मार्ग बदला है। इस बीच हुए परिवर्तनों के कारण ही सतलुज पश्चिम की ओर अपना मार्ग बदला और वह सिन्धु नदी में जा मिली। इस प्रकार सरस्वती जल के अभाव में सूखती चली गई।

 

श्री के०एस० बलदीय के अनुसार 1245 ई० तक हिमालय से निकलने वाली इस नदी का कुछ पानी हकरा नारा जल वाहिका में बहता रहा था। यही वह समय है जब इस मरुभूमि से भारी संख्या में लोगों का प्रब्रजन हुआ था। सतलुज से जो थोड़ा बहुत जल कभी-कभी मिलता रहता था, वह भी 1593 ई० के बाद सतलुज द्वारा पूर्णतः अपना मार्ग बदल लेने के बाद, बिल्कुल बंद हो गया।

नवीनतम खोज हाल में ही, भाभा एटोमिक रिसर्च सेंटर द्वारा की गई एक खोज के अनुसार सरस्वती नदी के मार्ग का पता चल गया है। जिससे स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि सरस्वती नदी कभी राजस्थान से होकर गुजरती थी, इसकी पुष्टि भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र के आइसोटोप विभाग द्वारा जल-विज्ञान संबंधी विषय पर आक्सीजन, हाइड्रोजन और कार्बन के आईसोटोपो का अध्ययन करते समय राजस्थान में सरस्वती के प्राचीन मार्ग का पता चला है। विभाग के अध्यक्ष डॉ० एस० एन० राव का कहना है कि आज भी उस रेगिस्तानी इलाके में 50-60 मीटर गहराई में भूमिजल विद्यमान है।

इससे इस बात की भलीभांति पुष्टि हो जाती है कि कभी सरस्वती नदी यहां बहती थी। हिमालय के बर्फ से निकलने वाली दो नदियों-अर्थात् यमुना और सतलुज से मिलने वाले जल से वंचित होकर सरस्वती एक नाला मात्र रह गई, जिसमें शिवालिक से निकलने वाले वाह घग्घर डांगरी, मार्कण्डेय, सरसुती आदि छोटे-छोटे जल स्त्रोतों का कुछ जल ही बहता है।

इतनी विशाल सरस्वती का अस्तित्व अब कहीं शेष नहीं है। यदि कुछ है, तो बस राजस्थान की मरूभूमि में आकर विलीन हो गए वे सूखे जल स्त्रोत है। जो उस विशाल गौरवमयी सरस्वती और मानव इतिहास की मूकगाथा सुनाने से लिए शेष हैं।

डॉ० परमानन्द पांचाल
वैदिक काल की सरस्वती नदी, जो लुप्त हो गई
"संस्कृति : अंक-03"

 

 

Follow us on social media and share!