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भारतीय जीवन का आधार संस्कार एवं हम

भारतीय जीवन का आधार संस्कार एवं हम


क्या आप जानते हैं कि हमारे सुदृढ़ भारतीय समाज की नींव किन्हीं शासकीय विधानों पर नहीं, अपितु उन सनातन संस्कारों पर टिकी है जो हमें जन्म से लेकर अन्त्येष्टि तक गढ़ते हैं? आइए समझें कि कैसे आधुनिकता की चकाचौंध में भी हमारी संस्कार रूपी जड़ें ही हमारे अस्तित्व की वास्तविक पहचान हैं!


भारतीय समाज की संरचना मात्र भौतिक विधानों अथवा नियमों के आधार पर निर्मित नहीं हुई है। इस महान सनातन परम्परा की नींव उन गम्भीर नैतिक मूल्यों तथा जीवन के परिष्कारों पर आधारित है, जिन्हें हम संस्कार के नाम से जानते हैं। शास्त्रों में स्पष्ट प्रतिपादित है कि मनुष्य केवल जन्म से श्रेष्ठ नहीं बनता। उसे श्रेष्ठता के शिखर पर पहुँचाने का कार्य सुसंस्कार करते हैं।

यही संस्कार आचरण, विचार तथा व्यावहारिक जीवन को सकारात्मक दिशा देते हैं। जब समाज के व्यक्ति संस्कारों से अभिसिंचित होते हैं, तब सम्पूर्ण समाज एक सुदृढ़ रूप धारण कर लेता है। यह निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया व्यक्ति को पशुवत जीवन से ऊपर उठाकर देवत्व की ओर ले जाती है। प्रायः लोग भ्रम पाल लेते हैं कि संस्कार केवल कुछ धार्मिक अनुष्ठान अथवा पूजा पाठ तक सीमित हैं। परन्तु यह विचार सर्वथा अपूर्ण है।

संस्कार केवल कर्मकाण्ड नहीं हैं, अपितु सम्पूर्ण जीवन को अनुशासन तथा मर्यादा में आबद्ध करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जीवन में माता पिता द्वारा स्थापित उच्च आदर्श, गुरुजनों की शिक्षा तथा समाज द्वारा निर्धारित नैतिक प्रतिमान, ये सभी मिलकर संस्कारों के विशाल भवन का निर्माण करते हैं। भारतीय परम्परा में मानव जीवन को सुचारु रूप से संचालित करने के निमित्त 16 संस्कारों का स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है। इन सभी संस्कारों का मूल उद्देश्य अन्तःकरण में उत्तरदायित्व का बोध, करुणा, सत्यनिष्ठा तथा कर्तव्यों के प्रति निष्ठा का विकास करना है।


मानवजीवन के शुद्धिकरण से जुड़े है षोडश संस्कार

भारतीय जीवन दर्शन में परिवार को व्यक्ति के संस्कारों की प्रथम पाठशाला स्वीकार किया गया है। बालक जन्म के पश्चात सबसे पहले अपने घर के वातावरण से सीखना आरम्भ करता है। बड़े बुजुर्गों का सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, सत्य का आचरण तथा कठोर परिश्रम का महत्त्व, यह सब वह माता पिता तथा परिजनों को देखकर आत्मसात करता है।

उस व्यवस्था में दादा दादी तथा नाना नानी की शिक्षाप्रद कहानियाँ बच्चों के कोमल मन पर नैतिक शिक्षा की गहरी छाप छोड़ती थीं। यद्यपि आज एकल परिवार की अवधारणा प्रबल हो रही है, परन्तु इस नवीन परिस्थिति में संस्कारों की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। यदि परिवार के भीतर परस्पर प्रेम, कड़ा अनुशासन तथा उन्मुक्त संवाद हो, तो बच्चे आत्मविश्वासी तथा उत्तरदायी नागरिक बनते हैं। विपरीत इसके, यदि निरन्तर कलह तथा असंवेदनशीलता का वास हो, तो बच्चे समाज में भारी असन्तुलन उत्पन्न करते हैं।


घर के बुजुर्गों से जीवन जीने की कला सीखती है भावी पीढ़ी

केवल परिवार ही नहीं, विद्यालय भी व्यक्ति के जीवन में संस्कारों का बीजारोपण करते हैं। प्राचीन भारत की गुरुकुल परम्परा में शिक्षा के साथ-साथ अनुशासन, गुरुजनों की सेवा एवं संयम का विशेष महत्त्व था। आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली में भी नैतिक शिक्षा, सामूहिक गतिविधियाँ तथा समाज सेवा के कार्यक्रम संस्कार निर्माण में भारी सहायता प्रदान करते हैं।

यदि शिक्षा प्रणाली केवल जीविकोपार्जन अथवा धन संचय तक सीमित रह जाए तथा उसमें से मानवीय मूल्यों को निष्कासित कर दिया जाए, तो समाज में केवल अन्धी प्रतिस्पर्धा जन्म लेगी। ऐसी स्थिति में मनुष्यों के मध्य सहयोग, प्रेम तथा संवेदना की भावना निरन्तर क्षीण होती जाएगी। इसलिए नितान्त आवश्यक है कि शिक्षा के क्षेत्र में मानवीय मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की जाए।

संस्कार ही वह अदृश्य कड़ी हैं जो सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में बाँधकर रखते हैं। हमारे समाज में मनाए जाने वाले विभिन्न पर्व, प्राचीन परम्पराएँ तथा सामूहिक अनुष्ठान सामाजिक एकता को निरन्तर बल प्रदान करते हैं। विवाह अथवा नामकरण जैसे संस्कार केवल व्यक्तिगत उत्सव नहीं होते। ये अवसर सम्पूर्ण समुदाय की सहभागिता के महान अवसर होते हैं।


समाज को एकता सूत्र में बांधते हैं संस्कार

इन आयोजनों के माध्यम से लोग एक दूसरे के सुख दुःख में सम्मिलित होते हैं तथा उनके सामाजिक सम्बन्ध सुदृढ़ हो जाते हैं। संस्कार व्यक्ति को उसके विविध कर्तव्यों के प्रति भी सजग बनाए रखते हैं। जब नागरिक पूर्ण रूप से सत्यनिष्ठा तथा उत्तरदायित्व के संस्कारों से युक्त होते हैं, तब समाज में शान्ति और प्रगति सम्भव हो पाती है।

आज का युग प्राविधिक विकास तथा अत्यधिक भौतिक प्रगति का युग है। सामाजिक माध्यम तथा भागदौड़ भरी जीवनशैली ने मनुष्य को अत्यन्त व्यस्त बना दिया है। इस दौड़ में हमारे पारम्परिक मूल्यों का निरन्तर क्षरण हो रहा है। बढ़ती असहिष्णुता, परिवारों का विघटन तथा मानवीय आचरण में दिखाई देने वाला नैतिक पतन इसी मूल्यहीनता के उदाहरण हैं।

हमें आधुनिकता को स्वीकार करना चाहिए, परन्तु अपनी गहरी सांस्कृतिक जड़ों को कदापि विस्मृत नहीं करना चाहिए। नवीन पीढ़ी को यह समझाना आवश्यक है कि सफलता का सच्चा मापदण्ड धन नहीं, अपितु व्यक्ति का उत्तम चरित्र तथा समाज के प्रति उसका निःस्वार्थ उत्तरदायित्व ही होता है। सम्पूर्ण समाज में संस्कारों के निर्माण में महिलाओं की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। शास्त्रों में माता को सन्तान की प्रथम गुरु माना गया है।


आधुनिकता और परम्परा का संगम है सार्थक जीवन का मार्ग

यदि महिला शिक्षित तथा मानसिक रूप से सशक्त होगी, तो वह अपने परिवार तथा आने वाली पीढ़ी को एक सकारात्मक दिशा प्रदान कर सकेगी। आज अनेक संस्थाएँ महिलाओं को शिक्षित करने का महान कार्य कर रही हैं। यह प्रयास केवल आर्थिक उन्नति का साधन नहीं है, अपितु इसके माध्यम से सम्पूर्ण समाज में सकारात्मक तथा उच्च संस्कारों के प्रसार का मार्ग भी प्रशस्त होता है। 

यह पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाता है कि संस्कार ही हमारे समाज की वास्तविक आत्मा हैं। ये वे तत्त्व हैं जो व्यक्ति को केवल भौतिक दृष्टि से सफल नहीं बनाते, अपितु उसे आन्तरिक रूप से एक श्रेष्ठ मानव के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। बदलते समय के साथ बाहरी जीवनशैली में परिवर्तन आ सकते हैं, परन्तु शाश्वत नैतिक मूल्यों की आवश्यकता सदैव अक्षुण्ण बनी रहेगी।

यह हम सभी का परम पुनीत कर्त्तव्य है कि हम अपने बच्चों के मनों में निश्छल प्रेम, परम सत्य, अहिंसा, सेवा तथा कठोर अनुशासन जैसे उच्च मूल्यों का सिंचन करें। जब प्रत्येक व्यक्ति अपने अन्तःकरण में श्रेष्ठ संस्कारों का दीप प्रज्वलित करेगा, तभी समाज में सदाचरण का दिव्य प्रकाश फैलेगा। सुदृढ़ समाज की आधारशिला केवल सशक्त संस्कारों की नींव पर ही सुरक्षित रह सकती है। अतः अपनी सांस्कृतिक धरोहर को संजोते हुए पीढ़ियों को संस्कारित नागरिक बनाने का दृढ़ संकल्प लें।

-श्रीमती स्मारिका राजपूत
कुछ फ़र्ज़ हमारा भी' (KFHB NGO) की सह-संस्थापिका एवं सामाजिक कार्यकर्ता, रायपुर

 

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