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बलिदान दिवस : वीर हरिसिंह नलवा

बलिदान दिवस : वीर हरिसिंह नलवा


क्या आप जानते हैं कि खैबर के दर्रे से आने वाले आक्रमणकारियों के लिए हरि सिंह नलवा का नाम ही भय का पर्याय था? कश्मीर से पेशावर और जमरुद तक, उनका जीवन केवल युद्धों की कथा नहीं, बल्कि सीमाओं की रक्षा, संस्कृति के स्वाभिमान और अदम्य रणनीति का इतिहास है। आइये उनके बलिदान दिवस (30 अप्रैल 1837) पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करें जिन्होंने कश्मीर, काबुल और खैबर के दर्रे को हमलावरों से मुक्त किया।


आज यदि भारतीय संस्कृति पुनः अपने परम् वैभव की ओर बढ़ रही है तो इसकी नींव में हरिसिंह नलवा जैसे वीरों का बलिदान हैं। जिन्होंने अपनी अंतिम श्वाँस तक हमलावरों से लोहा लिया। महाराजा रणजीत सिंह के सिक्ख साम्राज्य के विस्तार में भी वीर हरिसिंह नलवा का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। सरदार हरि सिंह नलवा की गणना विश्व के श्रेष्ठतम सेनानायक में की जाती है। वे अपनी वीरता के लिये जितने प्रसिद्ध थे उतने ही अपनी सटीक रणनीति केलिये भी प्रसिद्ध थे।


हरिसिंहजी- श्रेष्ठ सेनानायक और कुशल रणनीतिकार 

उनके कार्य हर पीढ़ी और प्रत्येक कालखंड के लिये प्रेरणादायक है। वे पंजाब की लोकगाथाओं में जितने सजीव हैं इतिहास की पुस्तकों में उतने कम। पंजाब के बाहर तो उनकी वीरता के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। खैबर के दर्रे से आने वाला कोई आक्रमणकारी उनके सामने टिक नहीं पाया। पेशावरी पश्तूनों और पठान हमलावरों ने केवल हथियार नहीं डाले अपितु महाराजा रणजीत सिंह का शासन भी स्वीकारा था।

ऐसे वीर यौद्धा और कुशल रणनीतिकार हरिसिंह नलवा का जन्म 28 अप्रैल 1791 को पंजाब के गुजरांवाला में हुआ था। यह क्षेत्र अब पाकिस्तान में है। उनके पिता गुरदयाल सिंह भी सैनिक रहे हैं। माता धर्म कौर धार्मिक विचारों के साथ अपने मोहल्ले में महिलाओं की एक रक्षा टोली का संचालन करतीं थीं। इस प्रकार वीरता और स्वत्व वोध उन्हें विरासत में मिला था। जब वे केवल सात वर्ष के थे तब एक युद्ध में पिता की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद उनका लालन पोषण माता ने किया।

उन्हें कुश्ती लड़ना और लाठी चलाना बचपन में सिखाया गया। जब वे दस वर्ष के हुये तब गुरूद्वारा में "अमृत चखा" और विधिवत सिक्ख धर्म में दीक्षित हुये। इसके साथ उनका कटार और तलवार चलाने का अभ्यास आरंभ हुआ। बारह वर्ष की आयु में उन्होने घुड़सवारी सीखी।1805 में महाराजा रणजीत सिंह ने बसंतोत्सव में तरुणों की प्रतिभा खोज के लिये एक स्पर्धा आयोजित की जिसमें तरुण हरिसिंह ने भाला चलाने, तीर चलाने तथा मल्लयुद्ध में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया और तीनों प्रतियोगिताएँ जीतीं। इससे महाराजा रणजीत सिंह बहुत प्रभावित हुये।

परिवार का परिचय जानकर महाराज ने उन्हें  सेना में भर्ती करके अपना निजी अंगरक्षक नियुक्त कर लिया। एक बार महाराजा रणजीत सिंह किसी यात्रा में थे। अचानक एक शेर के उनपर आक्रमण कर दिया, तब हरिसिंह शेर से भिड़ गये  कटार से उसके मुख पर वार किया। इस पर महाराजा रणजीत सिंह के मुख से निकला "कि तुम तो राजा नल की भाँति वीर हो।" तभी से वे "नलवा" के नाम से वे प्रसिद्ध हो गये।


शेर का निडरता से सामना करने पर नाम पड़ा "नलवा"

वे हर युद्ध में महाराजा के साथ होते और अपनी अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते थे। समय के साथ उनकी गणना एक वीर सेनानी के रूप में हुई और वे विभिन्न पदोन्नति लेते हुये सेनानायक बन गये। बाद में इन्हें "सरदार" की उपाधि प्रदान की गई और उनकी गणना महाराजा रणजीत सिंह के सर्वाधिक विश्वासपात्र सेना नायकों में हो गई। उन्होंने पन्द्रह वर्ष की आयु से युद्ध में भाग लेना आरंभ किया और पूरा जीवन सतत युद्ध में ही बीता। उन्होने सबसे पहले 1816 में कश्मीर युद्ध में भाग लिया।

उनकी टुकड़ी के प्रभारी जमादार खुशाल सिंह थे। रसद की कमी, मौसम की खराबी और कुछ सहयोगियों के विश्वासघात के कारण इस टुकड़ी को पीछे हटना पड़ा। लेकिन अगले ही वर्ष श्रीनगर घाटी के रास्ते विश्वासघाती राजौरी किले पर हमला किया और उस पर सिखों का अधिकार हो गया। इसी वर्ष अगला धावा महमूदकोट पर बोला और विजय प्राप्त की। इस सफलता से महाराजा रणजीत सिंह का उत्साह बढ़ा। दो साल बाद, मुल्तान के रास्ते खानगढ़ और मुजफ्फरगढ़ के किलों पर विजय प्राप्त की।

1818 में मुल्तान पर धावा बोला। यह युद्ध सबसे भीषण था। सिक्ख सेना केवल पन्द्रह हजार थी जबकि अफगानों की सेना चालीस हजार की थी। मुल्तान का किलेदार मुजफ्फर खान अपने पाँचों बेटों के मारा गया। हरिसिंह नलवा ने इस युद्ध में अद्भुत रणनीति और वीरता का प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्हें "सरदार" की उपाधि मिली और अपनी टुकड़ी के जमादार बने। तब उनकी आयु केवल सत्रह वर्ष थी। अगला युद्ध जमजमा में लड़ा गया। यह किला बहुत मजबूत था। बहुत धीरज के साथ घेराबंदी की गई। किले की दीवारे क्षतिग्रस्त की गई, रसद काटकर धावा बोला गया और सफलता मिली।

हरिसिंह जी के नेतृत्व में लड़ा गया मुल्तान का भीषण युद्ध
हरिसिंहजी के नेतृत्व में लड़ा गया मुल्तान का भीषण युद्ध

इसी वर्ष पेशावर पर सिक्खों का अधिकार हुआ। इस युद्ध में सरदार हरिसिंह नलवा के नेतृत्व वाली टुकड़ी की भूमिका महत्वपूर्ण रही। पेशावर पर सिक्ख साम्राज्य का अधिकार होने से प्रसन्न महाराजा रणजीत सिंह ने उन्हें मीठा तिवाना की जागीर दी। उन दिनों कश्मीर के एक बड़े भूभाग पर दुर्रानी साम्राज्य का हिस्सा था। दुर्रानी वस्तुतः हमलावर अहमदशाह अब्दाली के वंशज माने जाते थे।

स्थानीय जनता उसके अत्याचार से दुखी थी। सहायता के लिये महाराजा रणजीत सिंह के दरबार में गुहार लगी। महाराज ने अभियान को तीन टुकड़ियों में विभाजित किया गया। पहली टुकड़ी मिसर दीवान चंद के नेतृत्व में तोपखाने के साथ अग्रिम टुकड़ी, दूसरी टुकड़ी खड़कसिंह के साथ और उनके पीछे महाराजा रणजीत सिंहथे। महाराज के रक्षक दल का नेतृत्व सरदार हरिसिंह नलवा कर रहे थे। अंततः दुर्रानियों ने आत्मसमर्पण कर दिया और पूरा कश्मीर सिक्ख साम्राज्य का अंग बना।

वीरगति पाकर भी युद्ध जीता 

मार्च 1837 में महाराजा के पोते नौ निहाल सिंह का विवाह मार्च था। अधिकांश सेना नायक और प्रमुख अमृतसर आकर विवाह की तैयारी में लगे थे। समारोह में ब्रिटिश कमांडर-इन-चीफ और आफगान सरदार दोस्त मोहम्मद खान भी आमंत्रित किये गये थे। लेकिन दोस्त मोहम्मद ने अवसर का लाभ उठाना चाहा। उसे लगा कि यदि सेनानायक हरिसिंह नलवा अमृतसर में रहेंगे तो वह पेशावर पर अधिकार कर लेगा।

लेकिन किसी कारण हरिसिंह नलवा पेशावर में ही रुक गये। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि वे बीमार थे जबकि कुछ का मानना है कि गुप्तचर सूचना के आधार पर वे रुके थे। सच जो हो। दोस्त मोहम्मद की सेना ने जमरुद की ओर कूच कर दिया उसका इरादा शबकदर, जमरुद और पेशावर के किलों पर अधिकार करने का था। हरिसिंह नलवा जमरुद किले में पहुंचे। उनके साथ उस समय केवल 600 सैनिक ही थे। भीषण युद्ध हुआ।

हरिसिंह नलवा ने जमरुद और पेशावर की रक्षा करने के साथ अफगान सेना को बुरी तरह क्षति पहुंचाई को और उनके चौदह तोपखाने छीन लिये। 30 अप्रैल 1837 का दिन था। भयंकर युद्ध हुआ। इसी बीच दो गोलियां हरिसिंह नलवा को लगीं। वे वीरगति को प्राप्त हो गये। शरीर त्यागते समय उन्होंने संकेत करके समझाया कि उनकी मृत्यु का समाचार छिपाया जाय।

मातृभूमि की रक्षा के लिए अंतिम श्वांस तक किया युद्ध
मातृभूमि की रक्षा के लिए अंतिम श्वांस तक किया युद्ध

सहायकों ने ऐसा ही किया इससे सिक्ख सैनिक यथावत लड़ते रहे। अंत में विजय मिली और पेशावर की सुरक्षा हो सकी। महाराजा रणजीत सिंह को युद्ध की सफलता पर तो संतोष हुआ लेकिन वीर सेनापति हरिसिंह नलवा के बलिदान का दुख भी हुआ। इस विजय का कोई उत्सव नहीं मनाया गया।

कुशल निर्माता भी

महान सेनानायक हरिसिंह नलवा वीर सैनिक के साथ कुशल निर्माता भी थे। उन्होने अपने जीवनकाल 56 इमारतों का निर्माण कराया। इनमें किले, प्राचीरें, मीनारें, गुरुद्वारे, तालाब, समाधियाँ , मंदिर, हवेलियाँ , सराय और उद्यान शामिल हैं। उनके द्वारा हरिपुर के किलेबंद का निर्माण अपने आप में उदाहरण है। 1822 में निर्मित यह एक सुनियोजित नगर था। गुजरांवाला को एक व्यापारिक केन्द्र रूप में विकसित कर उन्होंने एक समृद्ध नगर के रूप में बदला था।

इसके समीप बसा हरिपुर उनके नाम से ही विकसित हुआ। उन्होंने हरिपुर के दक्षिण-पश्चिम और रावलपिंडी के उत्तर-पश्चिम में स्थित हसन अब्दाल कस्बे में गुरु नानक की उस क्षेत्र की यात्रा की स्मृति में गुरुद्वारा पंजा साहिब का निर्माण करवाया और अमृतसर में हरमंदिर साहिब परिसर के भीतर अकाल तख्त के गुंबद को ढकने के लिए सोना दान किया था। बढ़ते हुए मुस्लिम और अफगानी कबीलों के आक्रमण रोकने के लिये उन्होंने जमरूद में एक अभेद किले का निर्माण करवाया। यह हर हमलावर केलिये मानों मौत का कुँआ था।


युद्ध कौशल के साथ दूरदर्शी भी थी हरिसिंहजी 

वह काल-खंड कुछ ऐसा था जिसमें भारत के उत्तरीय क्षेत्र आक्रांताओं की क्रूरता और सल्तनतकाल में हिन्दू स्त्रियों के अपहरण बलात्कार धर्मान्तरण और लूटमार से समाज बहुत त्रस्त हो गया थ। इस विपरीत परिस्थिति में महाराजा रंजीतसिंहजी ने सिक्ख साम्राज्य की नींव रखीऔर नलवाजी जैसे महान सेना नायक की वीरता और रणनीति से अफगानिस्तान जैसे दुर्गम प्रदेश पर विजय प्राप्त की और धर्म ध्वजा लहराई।

उनकी मृत्यु के बाद, उनके पुत्र जवाहर सिंह नलवा और अर्जुन सिंह नलवा ने सिख राज्य की संप्रभुता के लिए निरन्तर युद्ध किये। उनके पुत्र जवाहर सिंह नलवा चिल्लियांवाला की लड़ाई में अपनी बहादुरी के लिए प्रसिद्ध हैं। भारत के पहले व्यक्तिगत ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता अभिनव बिंद्रा, उन्हीं के वंशज हैं।

- श्री रमेश शर्मा
   भोपाल

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