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भोरमदेवक्षेत्र की शिल्पकला में रूपायित रामकथा के प्रसंग

भोरमदेवक्षेत्र की शिल्पकला में रूपायित रामकथा के प्रसंग


इतिहास को सहेजने की हमारी सुदीर्घ परम्परा में भारतवर्ष के अन्यान्य प्राचीन मन्दिरों की पाषाण भित्तियों पर श्रीरामकथा अंकित है। इसी क्रम में प्रो० आर एन विश्वकर्मा जी द्वारा रचित यह शोधपूर्ण लेख छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) के भोरमदेव क्षेत्र की मूर्तिकला में श्रीराम के विविध प्रसंगों का अत्यन्त सूक्ष्म चित्रण प्रस्तुत करता है। घटियारी के मन्दिर में अशोक वाटिका का दृश्य हो या गंडई के मन्दिर में राम लक्ष्मण और हनुमान का मिलन, ये शिलाखण्ड हमें बताते हैं कि रामकथा ने किस प्रकार स्थापत्य कला के माध्यम से भी जन जन के हृदय में अपना अमर स्थान बनाया।


प्राकृतिक सम्पदा तथा पुरातत्त्व की दृष्टि से छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) अत्यधिक समृद्ध प्रदेश रहा है। प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ होकर ऐतिहासिक काल तक प्राप्त कलावशेषों की अविच्छिन्न शृंखला इस भूभाग के महत्त्व को प्रकट करती है। साहित्यिक साक्ष्यों में वाल्मीकि रामायण से ज्ञात होता है कि राम ने दंडकारण्य जाने के लिए दक्षिण पूर्वी पथ का अवलम्बन लिया होगा और वे बिलासपुर, तथा रायपुर जिलों से होकर दंडकारण्य गए होंगे।

रामायण में वर्णित राम वनगमन तथा वनवास अवधि की घटनाओं से इस क्षेत्र का अवश्य निकट का सम्बन्ध रहा है, यही कारण है कि इस भूभाग की लोककथा एवं किंवदन्तियों में रामायण के अनेक प्रसंग मिलते हैं। वाल्मीकि रामायण में राम की माता कौशल्या को दक्षिण कोसल की राजकुमारी माना गया है। अधिकांश विद्वान बस्तर क्षेत्र की पहचान रामायण में वर्णित दंडकारण्य के रूप में करते हैं, तथा मानते हैं कि भगवान राम ने वनवास काल का अधिकांश भाग दंडकारण्य में बिताया था।

छत्तीसगढ़ का दक्षिण पश्चिमी भूभाग भोरमदेव क्षेत्र के रूप में ज्ञात है। इसके अन्तर्गत जिला कवर्धा से लेकर जिला राजनांदगांव के डोंगरगढ़ तक का सालेटेकरी से लगा हुआ भूभाग आता है, जिसमें सिलीपचराही, बकेला, बोड़ला, भोरमदेव, मड़वा महल, सहसपुर लोहारा, गंडई, घटियारी, और डोंगरगढ़ आदि कला केन्द्र समाहित हैं। यह क्षेत्र कलचुरियों के माण्डलिक कवर्धा के नागवंशी शासकों द्वारा शासित रहा है। इस क्षेत्र में बने हुए शिव मन्दिर शिल्पियों की अनुपम कला विज्ञता का परिचय देते हैं। यहाँ के मन्दिरों में रामकथा के अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रसंग प्राप्त होते हैं।

मड़वा महल- भोरमदेव, कवर्धा
मड़वा महल- भोरमदेव, कवर्धा

गंडई नगर के टिकरीपारा में स्थित शिव मन्दिर (छमासी रात का मन्दिर) कला प्रेम का एक ज्वलन्त उदाहरण है, जिसके अधिष्ठान भाग पर रामकथा का रोचक अंकन दृष्टव्य है। मन्दिर के नरथर में विभिन्न दृश्यावलियों के मध्य रामायण के कथानकों का अंकन किया गया है। यहाँ राम लक्ष्मण एवं हनुमान की मित्रता, बालि सुग्रीव का मल्ल युद्ध, राम द्वारा बालि वध, राम लक्ष्मण के सम्मुख शूर्पणखा द्वारा प्रणय निवेदन, सीता का अशोक वाटिका में शोकाकुल बैठना, और लंका विजय के उपरान्त वानरों का हर्षोल्लास में नाचना कूदना आदि उकेरा गया है।

शिव मंदिर- गंडई, साभार- श्री सौरभ सक्सेना
शिव मंदिर- गंडई, साभार- श्री सौरभ सक्सेना 

एक दृश्य में राम लक्ष्मण के सम्मुख हनुमान को अंजलिबद्ध मुद्रा में खड़ा दिखाया गया है, जिससे अनुमान होता है कि वे सुग्रीव के दूत रूप में राम लक्ष्मण से भेंट कर रहे हैं। एक अन्य फलक में बालि वध का अत्यन्त मनोरम दृश्य अंकित है, जिसमें सात ताड़ वृक्षों की ओट में श्रीराम को बाण संधान करते हुए उकेरा गया है।

राजनांदगांव जिले की कला में रामकथा के शिल्पांकन का दूसरा उदाहरण घटियारी के शिव मन्दिर (11वीं 12वीं शती ईस्वी) के कलावशेषों में मिलता है। इस मन्दिर की मलबा सफाई से अशोक वाटिका में सीता हनुमान की भेंट का फलक प्राप्त हुआ है, जो सम्प्रति जिला पुरातत्त्व संग्रहालय राजनांदगांव में संगृहीत है। इस शिलाखण्ड में सीता के विरहिणी तथा आर्त रूप को प्रकट करने में शिल्पी पूर्ण रूप से सफल दिखाई देता है।

शिव मंदिर- घटियारी
शिव मंदिर- घटियारी

ललछौंह बलुआ प्रस्तर फलक पर निर्मित इस मनोरम अंकन में अशोक वृक्ष के नीचे अर्धपर्यंकासन मुद्रा में एक नारी को उच्चासन पर बैठे दिखाया गया है। सामने प्रतिमाभिमुख हनुमान को नमस्कार मुद्रा में बैठे दिखाया गया है। सम्पूर्ण अंकन से प्रतीत होता है कि कपि एवं नारी में कोई गम्भीर वार्ता हो रही है, जिसमें कपि नारी की बातों को ससम्मान सुन रहा है।

वाल्मीकि रामायण के प्रकाश में इस सम्पूर्ण प्रतिमा को अशोक वाटिका के दृश्य के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। जब हनुमान लंका दहन के पश्चात् सीता से मिलने अशोक वाटिका जाते हैं, यह उसी प्रसंग का शिल्पांकन है जहाँ सीता हनुमान की शक्ति से प्रभावित हैं और उनके चलते समय शुभकामना व्यक्त करती हैं।

इसी प्रकार बेमेतरा जिले के दक्षिणी सीमान्त में स्थित ग्राम सहसपुर के बजरंगबली मन्दिर में भी रामायण के प्रसंगों का अंकन मिलता है। इस 14वीं 15वीं शती के मन्दिर में हाथ जोड़े हनुमान जी राम लक्ष्मण से सुग्रीव का मिलाप करा रहे हैं। राम के पैरों के पास हाथ जोड़े उत्कटासन में बैठे हनुमान श्रीराम की ओर उन्मुख हैं। इसी के ऊपरी फलक में बालि सुग्रीव के मल्ल युद्ध का मनोरम अंकन है।

इस प्रकार भोरमदेव क्षेत्र की शिल्पकला में यद्यपि रामकथा के प्रमाण सीमित हैं, तथापि वे अत्यन्त रोचक एवं जीवन्त हैं। उपरोक्त पुरातात्त्विक प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि इस क्षेत्र के जनजीवन में रामकथा पूर्णतः रची बसी थी, जिसका अंकन इस क्षेत्र की शिल्पकला में भी दिखलाई देता है।

जिस प्रकार साहित्यकार अपनी लेखनी से तत्कालीन परिस्थितियों का वर्णन करता है, उसी प्रकार शिल्पकार भी अपनी छेनी हथौड़ी के माध्यम से अपने काल की धार्मिक, और सामाजिक परिस्थितियों को शिल्पकला में रूपायित कर आगत पीढ़ी के लिए सुरक्षित कर देता है।

कुलमिलाकर भोरमदेव क्षेत्र के मन्दिरों में उकेरे गए ये रामकथा के प्रसंग इस बात के साक्षात् प्रमाण हैं कि हमारे पूर्वजों ने राम के आदर्शों को अपनी कला, और स्थापत्य में आत्मसात करके सम्पूर्ण राष्ट्र को एक आत्मीय, और सांस्कृतिक धागे में पिरोने का महान कार्य किया। ये मन्दिर, और पाषाण शिल्प यह सिद्ध करते हैं कि युग चाहे जो भी हो, किन्तु भारतवर्ष की समग्र चेतना का प्रधान केन्द्र सदैव जन जन के राम ही रहे हैं।

-प्रो० आर एन विश्वकर्मा
(लेखक प्रतिष्ठित इतिहासविद् व पूर्व विभागाध्यक्ष हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्त्व में अपनी विशेषज्ञता व लेखनी से वे ज्ञानकोष को सतत समृद्ध करते रहे हैं।)

 

 

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