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दधिमती शक्तिपीठ (नागौर) के रामकथा मूर्ति फलक

दधिमती शक्तिपीठ (नागौर) के रामकथा मूर्ति फलक


वाल्मीकि, कम्ब, तुलसीदास आदि महाकवियों के महाकाव्य ही केवल रामकथा के प्रसारक नहीं हैं, अपितु भारतवर्ष के मन्दिरों की स्थापत्यकला भी रामकथा सुनाती हैं। श्रीमती पुष्पा शर्मा जी ने अपने इस लेख में इसी मन्दिर स्थापत्य में इतिहास की इसी परम्परा के अन्तर्गत राजस्थान के नागौर जिले में स्थित दधिमती माता मन्दिर के उन दुर्लभ पाषाण फलकों का अत्यन्त सूक्ष्म चित्रण प्रस्तुत किया है, जिनमें श्रीराम के वनवास से लेकर लंका विजय तक के दृश्य उत्कीर्ण हैं। कितना अद्भुत है रामचरित्र कि जिसे हमारे पूर्वजों ने केवल हृदय में ही नहीं, अपितु पाषाणों पर भी उकेर कर शाश्वत कर दिया था, ताकि आने वाली पीढ़ियां इससे प्रेरणा लेती रहें।


भारत की प्राचीन स्थापत्यकला में मन्दिरों का विशिष्ट स्थान है। राजस्थान का पश्चिमी भाग विशेषतः मारवाड़ क्षेत्र प्रतिहार कालीन संस्कृति, और कला की दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध रहा है। नागौर जिले का अंचल उसका अभिन्न अंग है। स्थापत्य, और मूर्तिकला की गौरवशाली परम्परा इस क्षेत्र में प्राचीन काल से ही विद्यमान रही है। यहाँ प्रतिहार, चौहान, और राठौड़ कालीन स्थापत्य, और मूर्तिकला के अनेक अनुपम उदाहरण मिलते हैं।

भारत के मन्दिरों की सरणि हो या उत्तर भारत के वृहद क्षेत्र में विस्तृत मन्दिर, रामायण के प्रसंगों का उत्कीर्णन प्रायः दृष्टव्य है। राजस्थान के नागौर जिला मुख्यालय से 40 किलोमीटर दूर जायल तहसील में स्थित दधिमती माता का यह प्राचीन मन्दिर गोठ, और मांगलोद गांवों के मध्य में स्थित है, जो प्रतिहार कालीन मन्दिर स्थापत्य का सिरमौर है।

दाधीच ब्राह्मणों के अतिरिक्त जाट, राजपूत सहित आदि वंश गोत्र की कुलदेवी को समर्पित यह मन्दिर भारतीय स्थापत्य, और मूर्तिकला का गौरव है। पुरातत्त्व, और संग्रहालय विभाग राजस्थान द्वारा संरक्षित शिखरबद्ध यह मन्दिर पूर्वाभिमुख है। वेदी बन्ध की सादगी जंघा भाग में रथिकाओं में देवी देवताओं की मूर्तियां, मंडोवर, और शिखर की मध्यवर्ती कंठिका में चारों ओर रामायण दृश्यावली, नागर शैली का भव्य शिखर प्रतिहार कालीन परम्परा के अनुरूप है। यह महामारू शैली के मन्दिर का एक सुन्दर उदाहरण है।

दधिमती मंदिर , नागौर
दधिमती मंदिर ,नागौर

राजस्थान की प्रतिहार कालीन मूर्तिकला में रामायण दृश्यावली का प्राचीनतम अंकन दधिमती माता मन्दिर में प्राप्त होता है। शिखर भाग में 15 बड़े फलकों में राम वनवास से लंका विजय तक के दृश्य मनमोहक रूप में अंकित किए हुए हैं। इन पाषाण पट्टिकाओं में श्रीराम का चित्रण वनवासी वेश में जटामुकुट धारित, और कर में धनुष, पीठ पर तरकस बान्धे प्रत्यालीढ़ मुद्रा में अंकित किया गया है।


पाषाण पट्टिकाओं में वनवासी वेशभूषा में श्रीराम

इन पाषाण शिल्प में मारीच वध, सुग्रीव संवाद, श्रीराम रावण युद्ध आदि रामकथा प्रसंग को शिल्पकारों ने अत्यन्त बारीकी से शिल्पित किया है। विवेच्य मन्दिर के स्थापत्य, और शिल्पकला को गहनता से देखा जाए तो देवालय की दक्षिण पूर्व दिशा में रामकथा प्रसंग की सुन्दर पट्टिका दृष्टव्य है। इसमें प्रथम पट्टिका श्रीराम, और अनुज लक्ष्मण के वनागमन से प्रारम्भ होती दिखाई देती है। शिल्पांकन में श्रीराम शरसंधान करते हुए स्वर्ण मृग का पीछा कर रहे हैं। पट्टिका के अन्तिम छोर पर दो मानव आकृतियां उत्कीर्ण की गई हैं जो मारीच, और लक्ष्मण की प्रतीत होती हैं।

द्वितीय पट्टिका में सीता हरण का चित्रण है। वृक्ष के नीचे एक स्त्री आसीन है, और दूसरी समीप में खड़ी भिक्षा देती हुई दृष्टव्य है। पुरातत्ववेत्ताओं के आधार पर दोनों आकृतियां ही पंचवटी में सीता का प्रतिनिधित्व करती हैं। लंकापति रावण भिक्षुक वेश में कमण्डलु लिए शिल्पित है। इस पट्टिका में रावण देवी सीता का हरण कर आकाश मार्ग से जाता हुआ प्रतीत हो रहा है।


सीताहरण को दर्शाती द्वितीय पट्टिका 

तृतीय पट्टिका में श्रीराम, और लक्ष्मण वनवासी वेश में जटाजूट धारण धनुष बाण धारण किए शिल्पित हैं। इसी पट्टिका में एक लघु शिल्प है जहाँ जटायु, और श्रीराम का अंकन है। इसी पट्टिका के अन्त में शबरी को दो विभिन्न मुद्राओं में उकेरा गया है।

चतुर्थ पट्टिका में श्रीराम द्वारा सप्त ताल के वृक्षों का एक तीर से भेदन, और पट्टिका के एक ओर सुग्रीव बाली युद्ध का अंकन है। दोनों भाइयों के समीप बाल वानर रूप का शिल्पांकन किया गया है।

पंचम पट्टिका में विभीषण का श्रीराम की छावनी में आना, और जलधि से पथ मांगने का प्रसंग, भक्त हनुमान का लंका में सीता की खोज के लिए प्रस्थान आदि दृश्य शिल्पित हैं। श्रीराम वरद मुद्रा में विभीषण के साथ मित्रता आदि का उत्कीर्णन दृष्टव्य है।

मन्दिर के गर्भगृह के पृष्ठ भाग की भित्ति पर 5 पट्टिकाएं हैं जिन पर श्रीराम लक्ष्मण वानरों के साथ, सेतुबन्ध, इन्द्रजीत, और लक्ष्मण युद्ध तथा राम रावण युद्ध के दृश्य शिल्पित किए गए हैं। सेतुबन्ध के दृश्यांकन में वानर समूह विशाल शिलाओं को उठाए गतिमान मुद्रा में, कुछ वानर सिर, और कुछ कन्धों पर शिला को उठाए उत्कीर्ण हैं। पट्टिका के छोर पर दो वानर बैठे हुए शिल्पित हैं। मध्य पट्टिका में युद्ध राम, और रावण, लक्ष्मण, और इन्द्रजीत का अंकन है।


सेतुबंधन और युद्ध प्रसंग 

इसी क्रम में चौथी पट्टिका पर नागपाश में बन्धे लक्ष्मण पर आक्रमण का प्रसंग उत्कीर्ण है, जिसमें श्रीराम लक्ष्मण वानर सेना के मध्य हैं, लक्ष्मण पर शक्ति आघात के कारण श्रीराम व्याकुल, पक्षिराज गरुड़ ने एक नाग को पकड़ रखा है, और दूसरा समीप में उत्कीर्ण है। श्रीराम के सम्मुख एक मानवाकृति प्रणाम करते हुए शिल्पित है, पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार यह लघु प्रतिमा वैद्यराज सुषेण की है। एक वानर पाषाण को कन्धे पर धारण किए है जिसमें कुछ लता, और टहनियां अंकित हैं, प्रतीत होता है उक्त चित्रण राम भक्त हनुमान का है जो संजीवनी लेकर आए हैं।


नागपाश में बंधे लक्ष्मण और संजीवनी लाते हनुमान जी 

अन्तिम पट्टिका में लक्ष्मण प्रत्यालीढ़ मुद्रा में आक्रामकता के साथ आक्रमण करते हुए प्रतीत होते हैं, राक्षसों के धड़, और सिर पृथक् हुए अंकित हैं। इसी क्रम में रावण रथ पर सवार, आयुध धारण किए हुए है, श्रीराम रावण पर बाणों की वर्षा कर रहे हैं, जिससे दशानन के शीश छिन्न भिन्न हो गए हैं। देवालय के पूर्वी भाग का कुछ हिस्सा जीर्णोद्धार के कारण अब अवशेष मात्र है। अन्तिम पट्टिका का अधिकांश भाग अवशेष के रूप में है, परन्तु अस्पष्ट रूप में पहचाना जा सकता है कि उक्त पट्टिका में लंका विजय का दृश्यांकन है।

एक अन्य पट्टिका में श्रीराम, और लक्ष्मण नगर में प्रवेश करते हुए दर्शाए गए हैं, सुन्दर अट्टालिकाओं के साथ वातायन आधे खुले हैं, द्वार शाखा पकड़े हुए एक स्त्री का अंकन दृष्टव्य है, सम्भवतः यह देवी सीता हैं। राजस्थान के मन्दिरों में एक मात्र उक्त मन्दिर पर सम्पूर्ण रामायण के प्रसंग का सबसे प्राचीनतम उदाहरण है जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है। यह प्रतिहार कालीन शैली का विशिष्ट उदाहरण है।

-श्रीमती पुष्पा शर्मा
(लेखिका समर्पित शिक्षिका व इतिहास की शोधार्थी हैं। उनका प्रधान अदान क्षेत्रीय इतिहास, संस्कृति और पर्यटन के विषयों पर केन्द्रित विमर्शों में है।)

 

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