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ललितकला की नाट्यविधा को समेटे सीताबेंगरा और जोगीमारा की गुफाएं

ललितकला की नाट्यविधा को समेटे सीताबेंगरा और जोगीमारा की गुफाएं

लोकविनोदजनकं लोकशिक्षाकरं शुभम्।
श्रुत्वा द‍ृशत्वा च नाट्यं स्यात् सर्वोपकारकम्॥

अर्थात “जो लोक का विनोद उत्पन्न करे, लोक को शिक्षा दे और कल्याणकारी हो - ऐसा नाट्य, सुना और देखा जाने पर सब प्रकार से उपकार करने वाला होता है।”​

भरतमुनि का नाट्यशास्त्र प्राचीन भारत का एक महत्वपूर्ण और आधारभूत ग्रंथ है, जिसे नाट्य और ललित कलाओं का विश्वकोश कहा जा सकता है। इसे भारतीय नाट्यशास्त्र का आदिग्रन्थ माना जाता है, जिसमें नाटक संगीत, नृत्य, छंद, अलंकार और रस की संपूर्ण विवेचना की गई है। जिनमें नाट्य की उत्पत्ति, रंगमंच की स्थापना, मंच पूजा, नृत्य के विभिन्न रूप, और अभिनय की तकनीकें शामिल हैं।


भरतमुनि का नाट्यशास्त्र

संभवतः आपको यह लग रहा होगा की नाट्य पर इस श्लोक की इस लेख में क्या प्रासंगिकता है ? शीर्षक तो किसी स्थान से जुड़ा प्रतीत होता है लेकिन बात किसी ललित विधा की हो रही है ऐसा क्यों ? क्योंकि आज हमारा लेख विश्व की प्राचीनतम नाट्य शाला पर केन्द्रित है । हम इस लेख के माध्यम से आपको ले चलेंगे  सीताबेंगरा और जोगीमारा की गुफाओं की यात्रा पर! तो चलिए अपनी इस शब्द यात्रा से विश्व की प्राचीनतम नाट्यशाला की सैर करते हैं ।

जोगीमारा और सीताबेंगरा गुफाएँ छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले स्थित रामगढ़ पहाड़ियों में अवस्थित हैं जिनका इतिहास लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है। ये गुफाएँ मौर्यकालीन स्थापत्य और कला का जीवंत प्रमाण हैं और इन्हें विश्व की सबसे प्राचीन नाट्यशालाओं में गिना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार यह वही क्षेत्र है जहाँ भगवान राम, सीता और लक्ष्मण अपने वनवास के दौरान प्रवास करते थे जिससे इन गुफाओं का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व और अधिक बढ़ जाता है।


सीताबेंगरा गुफा 

जोगीमारा गुफा एक छोटा आयताकार कक्ष है जिसका आकार लगभग पंद्रह फीट लंबा, बारह फीट चौड़ा और नौ फीट ऊंचा है। इसकी दीवारों पर पशु-पक्षी, पुष्प और मानव आकृतियों के रंगीन भित्ति चित्र उकेरे गए हैं जो प्राचीन भारतीय कला के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इसके अलावा यहां ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण अभिलेख भी मिले हैं जिनमें सूतनुका और देविदिन्न (रूपदक्ष) नामक पात्रों के प्रेम संबंध का विवरण मिलना भारतीय उपमहाद्वीप के सबसे प्राचीन प्रेम अभिलेखों में से एक है। यह गुफा संस्कृति और विश्राम दोनों के लिए प्रयुक्त होती थी, इसका छत का घुमावदार स्वरूप और समतल फर्श इसका प्रमाण है।

सीताबेंगरा गुफा जोगीमारा के पास स्थित है यह लगभग चौवालिस फीट लंबी और पंद्रह फीट चौड़ी गैलरी जैसी संरचना है। इसके सामने चंद्राकार रूप में प्राकृतिक चट्टानी मंच है जिसके तीन स्तर दर्शकों के बैठने हेतु बनाए गए हैं। इस संरचना से यह पता चलता है कि यहाँ कलाकारों के लिए मंच और दर्शकों के लिए दर्शक दीर्घा की व्यवस्था थी । गुफा के मुख पर बने दो गोलाकार छेद लकड़ी के स्तंभों के लिए बने थे जिनसे पर्दा लगाया जाता था ताकि अभिनय के समय मंच और दर्शक के बीच की दूरी बनी रहे। इस प्रकार सीताबेंगरा नाट्यशाला का प्रारंभिक स्वरूप प्रस्तुत करती है, जिसे विश्व की पहली रंगशाला माना जाता है।

इन गुफाओं की भित्ति चित्रकला मौर्यकालीन कला का अद्भुत उदाहरण है विभिन्न रंगों का प्रयोग प्रकृति में निवासरत जीवों को एक सजीव रूप प्रदान करता है। साथ ही अभिलेखों से ज्ञात होता है कि यह स्थल केवल धार्मिक पूजा हेतु नहीं अपितु नाट्य संगीत और सांस्कृतिक क्रियाकलापों का केंद्र भी था। उल्लेखनीय है कि स्थानीय परंपराएं इस स्थान को रामायण काल से जोड़ती हैं जहां भगवान राम ने वनवास के दौरान कुछ समय व्यतीत किया। रामगढ़ की यह पवित्र भूमि सामाजिक सांस्कृतिक इतिहास में एक विशिष्ट महत्व रखती है।


गुफा से प्राप्त भित्ति चित्र

वर्तमान में ये गुफाएं पुरातत्व विभाग के संरक्षण में हैं और नियमित रूप से पर्यटक और शोधकर्ता यहां आते हैं। मौसम व मानवीय हस्तक्षेप से इन भित्ति चित्रों तथा अभिलेखों को खतरा है इसलिए संरक्षण के उपाय आवश्यक हैं। रामगढ़ महोत्सव जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम इन गुफाओं के महत्व को व्यापक जनसमूह तक पहुंचाते हैं तथा पर्यटकों को आकर्षित करते हैं जिससे यह क्षेत्र सांस्कृतिक पर्यटन का केंद्र बन चुका है।

नाट्यशास्त्र के दृष्टिकोण से यह क्षेत्र अभूतपूर्व महत्व का है क्योंकि यहां की संरचना तथा अभिलेख भारतीय रंगमंच के विकास को समझने में सहायक हैं। नाट्य के मुख्य उद्देश्य मनोरंजन शिक्षा तथा सांस्कृतिक संवर्धन इन गुफाओं में प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। कलाकार और दर्शक के मध्य संवाद की प्रारंभिक कड़ी के रूप में इसे भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की अमूल्य धरोहर माना जाता है।

अतः जोगीमारा और सीताबेंगरा गुफाएं केवल प्राचीन कला तथा स्थापत्य का नमूना ही नहीं बल्कि भारतीय नाट्यशास्त्र और संस्कृति का ऐसा इतिहास हैं जो अभी भी जीवित प्रतीत होता है । ये गुफाएं हमारे अतीत की गूढ़ कहानियां जीवंत रूप में प्रस्तुत करती हैं और भारतीय सांस्कृतिक विरासत को समृद्ध बनाती हैं।

लेख-
श्रीमती सोनल बाजपेयी
शोधार्थी- भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा 

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